सामाजिक न्याय
जनसंख्या विस्फोट से जनसंख्या स्थिरीकरण तक
- 07 Mar 2026
- 104 min read
प्रिलिम्स के लिये: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS), प्रतिस्थापन स्तर, कुल प्रजनन दर, यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (UNFPA)।
मेंस के लिये: भारत में प्रजनन दर में परिवर्तन से संबंधित प्रमुख बिंदु, भारत में न्यून प्रजनन दर के मुख्य कारण, भारत में न्यूनतम प्रजनन दर के प्रभाव और सतत जनसंख्या वृद्धि हेतु ज़रूरी उपाय।
चर्चा में क्यों?
पिछले 25 वर्षों में भारत ने प्रजनन में उल्लेखनीय संक्रमण का अनुभव किया है, इसे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के क्रमिक आँकड़ों ने उच्च-प्रजनन वाले विकासशील राष्ट्र से परिवर्तन को दर्शाया है, जहाँ अधिकांश राज्यों का प्रतिस्थापन स्तर 2.1 तक पहुँच गया है या उससे नीचे आ गया है।
- इन रुझानों ने पॉल और ऐनी एर्लिच द्वारा प्रस्तुत एक समय के प्रभावशाली "पॉपुलेशन बॉम्ब" सिद्धांत को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया है, जिसमें माना गया था कि तीव्र प्रजनन दर आर्थिक विकास से आगे निकल जाएगी और भारत में सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव डालेगी।
सारांश
- भारत ने उप-प्रतिस्थापन प्रजनन स्तर की ओर संक्रमण किया है, NFHS-5 में कुल प्रजनन दर (TFR) 2.0 रिपोर्ट की गई है, जो एक प्रमुख जनसांख्यिकीय संक्रमण को दर्शाती है।
- प्रेरक कारकों में महिला शिक्षा, शहरीकरण, गर्भनिरोधक तक पहुँच और बदलते सामाजिक मानदंड शामिल हैं।
- यह स्तर जनसांख्यिकीय लाभांश प्रदान करता है, जिसमें बढ़ती वृद्ध आबादी, कार्यबल में कमी और क्षेत्रीय असमानताओं जैसी चुनौतियों के लिये रणनीतिक नीतिगत प्रतिक्रियाओं की आवश्यकता होती है।
भारत में प्रजनन दर में परिवर्तन से संबंधित प्रमुख तथ्य क्या हैं?
- ऐतिहासिक संदर्भ: वर्ष 1950-70 के दशक में भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) निरंतर उच्च बनी हुई थी, जो वर्ष 1960 के दशक की शुरुआत में प्रति महिला लगभग 6 बच्चों के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई। वर्ष 1970 के दशक से परिवार नियोजन संबंधी पहलों और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के कारण इसमें निरंतर गिरावट देखी गई।
- वर्ष 2000 तक कुल प्रजनन दर घटकर लगभग 3.5 बच्चे प्रति महिला रह गई, जो वर्ष 1980 और 1990 के दशक के दौरान निरंतर प्रगति को दर्शाता है।
- NFHS-5 बेंचमार्क: NFHS-5 (2019-21) ने राष्ट्रीय कुल प्रजनन दर 2.0 को दर्ज किया, जो राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम बार प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे आने का संकेत है।
- वर्तमान अनुमान (2020 के दशक के मध्य): वर्ष 2023-25 तक भारत की कुल प्रजनन दर व्यापक रूप से लगभग 1.9 बच्चे प्रति महिला होने का अनुमान है, जो उप-प्रतिस्थापन प्रजनन की एक सतत अवधि की पुष्टि करता है।
- क्षेत्रीय विविधताओं का बरकरार रहना: यह भिन्नता महत्त्वपूर्ण रूप से बनी हुई है। दक्षिणी राज्यों (जैसे– केरल और तमिलनाडु) और शहरी क्षेत्रों में कुल प्रजनन दर 1.4–1.8 तक पहुँच गई है, जबकि कुछ उत्तरी राज्य (जैसे– बिहार और उत्तर प्रदेश) अभी भी प्रतिस्थापन स्तर तक नही पहुँचे हैं या उसके नज़दीक हैं।
- भविष्य का अनुमान: वर्ष 2060-80 के दशक तक स्थिर होने या क्रमिक गिरावट से पहले भारत की जनसंख्या के लगभग 1.7–1.9 बिलियन तक पहुँचने की उम्मीद है।
भारत में न्यूनतम प्रजनन दर के मुख्य कारण क्या हैं?
- महिला शिक्षा प्राथमिक चालक के रूप में: न्यूनतम प्रजनन दर का महत्त्वपूर्ण संबंध महिला शिक्षा से है। NFHS-5 के आँकड़ों के अनुसार 12 या उससे अधिक वर्षों की शिक्षा प्राप्त महिलाओं की कुल प्रजनन दर 1.8 है, जबकि अशिक्षित महिलाओं के लिये यह 2.8 है, क्योंकि शिक्षित महिलाएँ देरी से विवाह करती हैं, कॅरियर को प्राथमिकता देती हैं और अधिक प्रजनन स्वायत्तता का प्रयोग करती हैं।
- शहरी-ग्रामीण विभाजन: शहरी कुल प्रजनन दर (~1.6) ग्रामीण कुल प्रजनन दर (~2.1) से काफी कम है, जो शहरों में उच्च जीवन लागत, कॅरियर केंद्रित, छोटे आवास स्थान और बदलती जीवनशैली से प्रेरित हैं जो बड़े परिवारों को हतोत्साहित करती है।
- आर्थिक दबाव: यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (UNFPA) की विश्व जनसंख्या स्थिति 2025 रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि वित्तीय तनाव, असुरक्षित रोज़गार (~21%), आवास संबंधी मुद्दे (~22%) और किफायती बाल देखभाल की कमी (~18%) प्रमुख बाधा हैं, जिसके कारण युगल अधिक बच्चे चाहने के बावजूद कम बच्चे पैदा करना चाहते हैं या माता-पिता बनने में देरी करते हैं।
- गर्भनिरोधक तक पहुँच: भारत के दीर्घकालिक परिवार नियोजन कार्यक्रमों के परिणामस्वरूप गर्भनिरोधक प्रसार दर लगभग 67% हो गई है, जो प्रभावी जन्म अंतराल को सक्षम बनाती है और अनियोजित गर्भधारण को कम करती है।
- कमज़ोर होती पुत्र प्राथमिकता: पुत्रों के लिये पारंपरिक सांस्कृतिक प्राथमिकता, जो पितृवंशीय उत्तराधिकार और वृद्धावस्था सुरक्षा से प्रेरित है, बढ़ती शिक्षा, बदलती लैंगिक रूढ़ियों और लड़कियों को आर्थिक संपत्ति के रूप में देखे जाने के कारण कमज़ोर हो रही है, जिससे बार-बार बच्चे पैदा करने का दबाव कम हो रहा है।
- सामाजिक मानदंडों में परिवर्तन: वर्तमान अभिभावक पालन-पोषण में "मात्रा से अधिक गुणवत्ता" के पक्षधर हैं, अधिकतर परिवार बच्चों की शिक्षा और उनके भविष्य के लिये अधिक निवेश कर रहे हैं, जो शिशु मृत्यु दर में कमी (वर्ष 1990 में 89 प्रति 1000 जीवित जन्म से वर्ष 2023 में 25 प्रति 1000 जीवित जन्म) और वृद्धावस्था सहायता के लिये बच्चों पर निर्भरता कम करने वाली बेहतर स्वास्थ्य सेवा/बचत द्वारा समर्थित है।
भारत में कम प्रजनन दर के क्या प्रभाव हैं?
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सकारात्मक |
चिंताएँ/जोखिम |
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जनसांख्यिकीय लाभांश: जब आश्रितों की तुलना में कामकाजी आयु वर्ग (15–59 वर्ष) की आबादी अधिक होती है, तो कार्यबल की भागीदारी बढ़ने, बचत तथा निवेश में वृद्धि होने, शिक्षा एवं मानव पूंजी में अधिक निवेश के कारण आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है। |
वृद्ध होती आबादी: बुज़ुर्गों की आबादी में तेज़ वृद्धि (2050 तक लगभग 20% होने का अनुमान), जिससे वृद्धावस्था आश्रितता अनुपात बढ़ेगा और स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन तथा सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों पर दबाव पड़ेगा। |
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संसाधनों पर दबाव में कमी: कम जनसंख्या वृद्धि से भूमि, जल, भोजन, अवसंरचना और पर्यावरण पर दबाव घटता है, जिससे संसाधनों के क्षरण तथा जलवायु प्रभाव में कमी आती है। |
संकुचित होता कार्यबल: कम युवा आबादी के नौकरी बाज़ार में प्रवेश करने से भविष्य में श्रम की कमी हो सकती है, जिससे यदि उचित प्रबंधन न किया जाए तो GDP वृद्धि और नवाचार की गति धीमी पड़ सकती है। |
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“सिल्वर इकॉनमी” के विकास का अवसर: वृद्ध होती आबादी नए बाज़ार अवसर पैदा करती है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं, सहायक आवास सुविधाओं, वरिष्ठ नागरिकों हेतु अवकाश यात्रा तथा सेवानिवृत्त लोगों के लिये अनुकूलित वित्तीय उत्पादों की मांग बढ़ेगी। |
समृद्ध होने से पहले वृद्धावस्था की चुनौती: भारत के पर्याप्त रूप से समृद्ध बनने से पहले ही उसकी आबादी तेज़ी से वृद्ध हो सकती है, जिससे बुज़ुर्गों की देखभाल की कमी, सामाजिक असमानताओं में वृद्धि और मज़बूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र के अभाव में राजकोषीय बोझ बढ़ने का खतरा उत्पन्न हो सकता है। |
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स्वास्थ्य और प्रजनन परिणाम: कम प्रजनन दर का संबंध महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार से होता है, जैसे– परिवार नियोजन तक बेहतर पहुँच, बार-बार गर्भधारण से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों में कमी तथा बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के संदर्भ में समग्र कल्याण में वृद्धि। |
सैंडविच जनरेशन का बोझ: कार्यशील आयु वर्ग की आबादी (15-59 वर्ष) को दोहरा बोझ उठाना होगा, उन्हें अपने बच्चों की परवरिश करनी होगी (जिनकी शिक्षा अत्यधिक महंगी है) और साथ ही अपने बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल भी करनी होगी, इससे उन पर आर्थिक और मानसिक तनाव बढ़ सकता है। |
सतत जनसंख्या वृद्धि प्राप्त करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- मानव पूंजी में निवेश: प्रति परिवार कम बच्चों की स्थिति में प्रति व्यक्ति आर्थिक उत्पादकता बढ़ाना आवश्यक हो जाता है। इसके लिये राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 के माध्यम से बुनियादी शिक्षा संकट को दूर करना, युवाओं को भविष्य की नौकरियों (जैसे– AI और हरित ऊर्जा) के लिये कौशल प्रदान करना तथा मिशन इंद्रधनुष जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से निवारक स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश करना आवश्यक है, ताकि एक स्वस्थ एवं उत्पादक कार्यबल सुनिश्चित किया जा सके।
- परिवार-समर्थक आर्थिक वातावरण: जन्म दर को अत्यधिक कम होने से रोकने के लिये सरकार को बच्चों के पालन-पोषण की लागत कम करनी होगी। इसके लिये बेहतर बाल देखभाल सुविधाएँ (आंगनवाड़ी 2.0), दोनों अभिभावकों हेतु सवेतन अभिभावकीय अवकाश और विशेष रूप से मध्यम वर्ग के लिये कर रियायतें प्रदान करना आवश्यक है।
- सिल्वर इकॉनमी के लिये तैयारी: जनसंख्या के वृद्ध होने के साथ भारत को उपयुक्त अवसंरचना विकसित करनी होगी। इसमें असंगठित क्षेत्र हेतु व्यापक पेंशन व्यवस्था, बुज़ुर्गों की देखभाल के लिये जेरियाट्रिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार तथा वरिष्ठ नागरिकों के लिये सुलभ एवं अनुकूल शहरी ढाँचे का विकास शामिल होना चाहिये, ताकि उनकी जीवन गुणवत्ता बेहतर हो सके।
- आंतरिक प्रवासन का प्रबंधन: प्रजनन दर में गिरावट सभी राज्यों में समान नहीं (जैसे– बिहार ~2.98 और केरल ~1.7) है। इसलिये सरकार को उच्च प्रजनन दर वाले राज्यों से कम प्रजनन दर वाले राज्यों की ओर आंतरिक श्रम गतिशीलता को प्रोत्साहित करना चाहिये, ताकि श्रम की कमी को पूरा किया जा सके तथा प्रवासियों के सुगम एकीकरण के लिये उपयुक्त नीतियाँ बनाई जा सकें।
निष्कर्ष
भारत का प्रतिस्थापन स्तर से नीचे की प्रजनन दर की ओर संक्रमण एक महत्त्वपूर्ण जनसांख्यिकीय परिवर्तन को दर्शाता है, जो जनसांख्यिकीय लाभांश और सतत विकास के अवसर प्रदान करता है। हालाँकि जनसंख्या के वृद्ध होने, कार्यबल के संकुचन एवं क्षेत्रीय प्रजनन असमानताओं जैसी उभरती चुनौतियों से निपटने के लिये मानव पूंजी विकास, सामाजिक सुरक्षा के विस्तार व संतुलित जनसंख्या प्रबंधन पर केंद्रित सक्रिय नीतियों की आवश्यकता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ गई है, फिर भी यह एक अवसर और एक चुनौती दोनों प्रस्तुत करती है।” चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. प्रतिस्थापन स्तर की प्रजनन दर क्या है?
प्रतिस्थापन स्तर की प्रजनन दर (प्रति महिला 2.1 बच्चे) वह प्रजनन दर है जिस पर कोई जनसंख्या बिना प्रवासन के एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक स्वयं को ठीक-ठीक प्रतिस्थापित कर लेती है।
2. भारत की वर्तमान कुल प्रजनन दर (TFR) क्या है?
NFHS-5 (2019–21) के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) 2.0 तक गिर गई है और हालिया अनुमानों (2023–25) के अनुसार यह लगभग 1.9 बच्चे प्रति महिला है, जो प्रतिस्थापन स्तर से नीचे की प्रजनन दर को दर्शाता है।
3. जनसांख्यिकीय लाभांश क्या है?
यह उस आर्थिक विकास की क्षमता को दर्शाता है जो तब उत्पन्न होती है जब कार्यशील आयु वर्ग (15–59 वर्ष) की आबादी आश्रितों की तुलना में अधिक होती है, जिससे उत्पादकता, बचत और निवेश बढ़ाने में मदद मिलती है।
4. महिला शिक्षा प्रजनन दर कम करने के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उच्च महिला शिक्षा से विवाह में देरी होती है, कार्यबल में भागीदारी बढ़ती है, प्रजनन संबंधी निर्णयों में स्वतंत्रता आती है और छोटे परिवार की प्राथमिकता विकसित होती है।
5. ‘सिल्वर इकॉनमी’ क्या है?
सिल्वर इकॉनमी उस आर्थिक अवसर को दर्शाती है जो वृद्ध होती आबादी से उत्पन्न होता है, जिसमें जेरियाट्रिक स्वास्थ्य सेवाएँ, सेवानिवृत्ति सेवाएँ, सहायक आवास सुविधाएँ और वरिष्ठ नागरिकों के लिये वित्तीय उत्पाद जैसे क्षेत्रों को शामिल किया जाता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स
प्रश्न. आर्थिक विकास से जुड़े जनांकिकीय संक्रमण के निम्नलिखित विशिष्ट चरणों पर विचार कीजिये: (2012)
- निम्न जन्म दर के साथ निम्न मृत्यु दर
- उच्च जन्म दर के साथ उच्च मृत्यु दर
- निम्न मृत्यु दर के साथ उच्च जन्म दर
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर उपर्युक्त चरणों का सही क्रम चुनिये:
(a) 1, 2, 3
(b) 2, 1, 3
(c) 2, 3, 1
(d) 3, 2, 1
उत्तर: (c)
प्रश्न. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (IGNOAPS) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2008)
- ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों के 60 वर्ष अथवा उससे अधिक आयु के सभी नागरिक इस योजना के पात्र हैं।
- इस योजना के तहत केंद्रीय सहायता प्रति लाभार्थी 300 प्रति माह की दर से है। योजना के तहत राज्यों से समतुल्य राशि देने का आग्रह किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न. 'जनसांख्यिकीय शीत' (डेमोग्राफिक विंटर) की अवधारणा क्या है? क्या यह दुनिया ऐसी स्थिति की ओर अग्रसर है? विस्तार से बताइये। (2024)
प्रश्न. जनसंख्या शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों की विवेचना करते हुए भारत में इन्हें प्राप्त करने के उपायों पर विस्तृत प्रकाश डालिये। (2021)
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