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जैव विविधता और पर्यावरण

विश्व की प्रवासी प्रजातियों की स्थिति

  • 09 Mar 2026
  • 112 min read

प्रिलिम्स के लिये: विश्व की प्रवासी प्रजातियों की रिपोर्ट 2024, वन्यजीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर सम्मेलन (CMS), IUCN रेड लिस्ट श्रेणी, अत्यधिक रोगज़नक एवियन इन्फ्लूएंजा (HPAI) H5N1, ऑलिव रिडले कछुआ, बॉन सम्मेलन, मध्य एशियाई फ्लाईवे (CAF), अमूर फाल्कन, हिम तेंदुआ, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP), राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना (NBSAP), पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA), BBNJ संधि, नवीकरणीय ऊर्जा   

मेन्स के लिये: संयुक्त राष्ट्र की विश्व की प्रवासी प्रजातियों की स्थिति रिपोर्ट 2024 के अंतरिम अद्यतन के प्रमुख निष्कर्ष, प्रवासी प्रजातियों से संबंधित प्रमुख तथ्य, प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण के लिये आवश्यक कदम

स्रोत: डाउन टू अर्थ

चर्चा में क्यों?

संयुक्त राष्ट्र की विश्व की प्रवासी प्रजातियों की स्थिति रिपोर्ट 2024 के एक चिंताजनक अंतरिम अद्यतन में चेतावनी दी गई है कि वन्यजीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर सम्मेलन (CMS) के तहत संरक्षित वैश्विक प्रवासी प्रजातियों की 49% आबादी घट रही है

सारांश

  • संयुक्त राष्ट्र की एक चिंताजनक अंतरिम रिपोर्ट से पता चलता है कि कन्वेंशन ऑन माइग्रेटरी स्पीशीज़ (CMS) के तहत आने वाली 49% प्रवासी प्रजातियों की आबादी घट रही है, जो दो वर्ष पहले 44% थी।
  • मुख्य खतरों में आवास का नुकसान, एवियन फ्लू और अत्यधिक दोहन शामिल हैं।
  • इन प्रवृत्तियों के बावजूद, साइगा मृग और स्किमिटर-हॉर्न्ड ओरिक्स जैसी प्रजातियों के संरक्षण में लक्षित प्रयासों से सफलता भी मिली है।

संयुक्त राष्ट्र की ‘विश्व की प्रवासी प्रजातियों की स्थिति रिपोर्ट 2024’ के अंतरिम अद्यतन के प्रमुख निष्कर्ष क्या हैं?

  • आबादी में गिरावट और विलुप्ति का खतरा: केवल 2 वर्षों में CMS में सूचीबद्ध प्रजातियों की घटती आबादी का अनुपात 44% से बढ़कर 49% हो गया है।
    • परिणामस्वरूप, बढ़ती या स्थिर प्रवृत्ति वाली प्रजातियों का प्रतिशत घटकर 38% रह गया है, जबकि विलुप्ति के खतरे का सामना करने वाली प्रजातियाँ अब कुल सूचीबद्ध प्रजातियों का 24% हो गई हैं, जो पहले 22% था।
  • संरक्षण स्थिति में गिरावट: वर्ष 2022 के बाद पुनर्मूल्यांकन की गई CMS में सूचीबद्ध 386 प्रजातियों में से 34 (9%) को IUCN रेड लिस्ट की अलग श्रेणी में स्थानांतरित किया गया, जिनमें अधिकांश (26 प्रजातियाँ) अधिक गंभीर खतरे वाली श्रेणी (जैसे- लुप्तप्राय से गंभीर रूप से लुप्तप्राय) में चली गईं।
    • इनमें से 69% प्रजातियाँ प्रवासी तटीय पक्षी हैं, जिनकी संख्या में गिरावट का मुख्य कारण महत्त्वपूर्ण ठहराव स्थलों और गैर-प्रजनन क्षेत्रों में पर्यावास की हानि और विखंडन है।
  • नए और पहले से मौजूद खतरों का उभरना:
    • प्रमुख खतरे के रूप में एवियन फ्लू: अत्यधिक रोगजनक एवियन इन्फ्लूएंजा (HPAI) H5N1 एक नया गंभीर खतरा बन गया है, जो पेंगुइन, पेलेकेन, क्रेन और जलीय स्तनधारियों जैसे- फर सील और सी लॉयन सहित कई प्रजातियों में बड़े पैमाने पर मृत्यु का कारण बन रहा है।
    • पर्यावास की हानि और विखंडन: रेखीय अवसंरचना (सड़कें, रेलवे, बाड़) का विस्तार आवासों को विखंडित करता रहता है, जैसा कि मंगोलियाई गज़ेल की गतिशीलता में गंभीर गिरावट से देखा गया है।
      • भूमि उपयोग परिवर्तन के कारण वन्यजीवों की आबादी में भारी गिरावट आई है जैसे कि मारा–लोइटा ब्लू वाइल्डबीस्ट (Mara-Loita Blue Wildebeest) की संख्या 1970 के दशक के अंत से 75% तक घट गई
    • अत्यधिक दोहन और बायकैच: शार्क और रे के लिये अति-मत्स्यन तथा बायकैच प्रमुख खतरे बने हुए हैं। अफ्रीका और यूरेशिया में रैप्टर (शिकारी पक्षी) का अवैध शिकार, विषप्रयोग तथा ऊर्जा अवसंरचना (जैसे- बिजली लाइनों और पवन टर्बाइनों) से टकराव का गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
  • क्षेत्रीय सफलता की कहानियाँ और पुनर्प्राप्ति: नकारात्मक प्रवृत्तियों के बावजूद, लक्षित संरक्षण प्रयासों के कारण कुछ प्रजातियों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है:
    • स्किमिटर-हॉर्नड ओरिक्स को चाड में पुनर्प्रवेश कार्यक्रमों की सफलता के बाद ‘वनों से विलुप्त (Extinct in the Wild)’ से पुनर्वर्गीकृत कर ‘लुप्तप्राय’ श्रेणी में रखा गया।
    • साइगा मृग (Saiga Antelope) की संख्या कज़ाखस्तान में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी, जिसके परिणामस्वरूप इसकी स्थिति ‘लुप्तप्राय’ से सुधरकर ‘संकटापन्न’ हो गई।
    • भूमध्यसागरीय मोंक सील की संख्या में वृद्धि के कारण इसकी स्थिति ‘लुप्तप्राय’ से सुधारकर ‘सुभेद्य’ कर दी गई।

प्रवासी प्रजातियाँ क्या हैं ?

  • परिचय: प्रवासी प्रजातियाँ वे वन्यजीव हैं, जिनमें जलीय, पक्षी तथा स्थलीय प्रजातियाँ शामिल होती हैं, जिनकी आबादी चक्रीय और पूर्वानुमेय रूप से एक भौगोलिक क्षेत्र से दूसरे भौगोलिक क्षेत्र की ओर प्रवास करती है।
    • ये प्रजातियाँ प्रजनन (Breeding), भोजन प्राप्त करने (Feeding) तथा विश्राम करने के लिये रुकने वाले स्थानों (Stopovers) हेतु अलग-अलग स्थलों पर निर्भर करती हैं। उनके प्रवास मार्ग के दौरान यदि इन महत्त्वपूर्ण स्थलों में से किसी एक का भी लोप हो जाए, तो इससे पूरी आबादी  के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
  • टैक्सोनॉमिक स्कोप: प्रवासी प्रजातियों में विभिन्न प्रकार के जीव शामिल होते हैं-
    • पक्षी: बार-टेल्ड गॉडविट, आर्कटिक टर्न
    • मैमल्स: टेरेस्ट्रियल मैमल्स में वाइल्डबीस्ट, साइगा एंटीलोप, आदि शामिल हैं, जबकि मरीन मैमल्स में हंपबैक व्हेल, ग्रे व्हेल, आदि शामिल हैं।
    • मछली: सैल्मन, यूरोपियन ईल, आदि 
    • रेंगने वाले: लेदरबैक टर्टल, ऑलिव रिडले टर्टल, आदि
    • कीट: मोनार्क बटरफ्लाई, ग्लोब स्किमर ड्रैगनफ्लाई।
  • प्रवासी प्रजातियों का संरक्षण: प्रवासी प्रजातियों का संरक्षण CMS (1979) के तहत किया जाता है, जिसे बॉन कन्वेंशन भी कहा जाता है। भारत वर्ष 1983 से CMS का एक हिस्सा रहा है।
  • भारत का भौगोलिक महत्त्व: भारत प्रमुख वैश्विक प्रवासी मार्गों (Flyways) पर अवस्थित होने के कारण के कारण प्रवासी प्रजातियों के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, विशेष रूप से मध्य एशियाई फ्लाईवे (CAF) के संदर्भ में, जो सैकड़ों प्रवासी पक्षी आबादी को आश्रय प्रदान करता है। भारत समुद्री कछुओं, स्तनधारियों तथा अन्य जीव समूहों के लिये भी महत्त्वपूर्ण प्रवासन मार्गों की मेज़बानी करता है।

Central_Asian_Flyway

वन्यजीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय (CMS)

  • परिचय: CMS, जिसे बॉन अभिसमय भी कहा जाता है, एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय संधि है, जिसका संचालन संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा किया जाता है। यह प्रवासी प्रजातियों की रक्षा करने तथा विभिन्न देशों में उनके आवासों के संरक्षण के लिये वैश्विक ढाँचा प्रदान करती है।
    • इसे 1979 में जर्मनी के बॉन में अपनाया गया था और यह 1 नवंबर, 1983 को प्रभाव में (लागू) आया।
  • उद्देश्य: वन्यजीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय (CMS) का उद्देश्य उन विशिष्ट चुनौतियों का समाधान करना है, जिनका सामना प्रवासी प्रजातियाँ करती हैं। ये प्रजातियाँ अपने जीवन चक्र के दौरान (जैसे- प्रजनन, भोजन या अन्य उद्देश्यों हेतु) नियमित और पूर्वानुमेय रूप से राष्ट्रीय सीमाओं को पार करती हैं। इसलिये इनके प्रभावी संरक्षण के लिये केवल राष्ट्रीय उपाय पर्याप्त नहीं होते, बल्कि समन्वित अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई आवश्यक होती है।
  • दो परिशिष्ट: CMS में दो परिशिष्ट शामिल हैं:
    • परिशिष्ट-I: इसमें विलुप्ति की कगार पर पहुँचीं प्रवासी प्रजातियाँ शामिल हैं और सदस्य देशों (Parties) पर इनका संरक्षण सुनिश्चित करने हेतु सख्त उपाय लागू करने का दायित्व होता है, जैसे- शिकार (Hunting), प्रपाशन (Trapping) और विषप्रयोग (Poisoning) पर रोक लगाना, पर्यावासों का संरक्षण या पुनर्स्थापन करना, प्रवास बाधाओं (जैसे- अवरोध) को कम करना आदि।
      • परिशिष्ट-I में कुल 188 प्रजातियाँ शामिल हैं। CMS परिशिष्ट-I में भारत की प्रमुख प्रजातियाँ: ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, साइबेरियन क्रेन, ऑलिव रिडले टर्टल, लेदरबैक सी टर्टल आदि।
    • परिशिष्ट-II: इसमें ऐसी प्रवासी प्रजातियाँ शामिल हैं, जिनकी संरक्षण स्थिति अनुकूल नहीं है और जो अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से महत्त्वपूर्ण लाभ प्राप्त कर सकती हैं। यह परिशिष्ट प्रवासन मार्ग वाले देशों (Range states) के बीच लक्षित समझौते (Agreements) या समझौता ज्ञापन (MoUs) के समन्वय और वार्ता का समर्थन करता है।
  • संचालन निकाय: कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज़ (COP) मुख्य निर्णय लेने वाला निकाय है, जो समय-समय पर बैठक करके क्रियान्वयन की समीक्षा, प्रस्तावों को अपनाने और परिशिष्टों में संशोधन करता है। CMS COP 15 मार्च, 2026 में कैंपो ग्रांडे, ब्राज़ील में आयोजित होगी। (पिछली बैठक, CMS COP 14, समरकंद, उज्बेकिस्तान में हुई थी)।

प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण के लिये कौन-से कदम उठाने आवश्यक हैं ?

CMS ने अपनी परिशिष्टों को मज़बूत करने पर ज़ोर देने के साथ ही बढ़ते खतरों से निपटने के लिये प्राथमिकता वाली कार्रवाइयों की रूपरेखा तैयार की है, जिसके तहत पर्यावास संरक्षण, अत्यधिक दोहन की रोकथाम, प्रदूषण को कम करने और जलवायु परिवर्तन से संबंधित चुनौतियों का समाधान करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

  • पर्यावास का संरक्षण, जोड़ना और पुनर्स्थापित करना: प्राथमिकता वाले कार्यों में संरक्षित क्षेत्रों के दायरे को प्रमुख जैव विविधता स्थलों तक बढ़ाना शामिल है। साथ ही, राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना (NBSAP) में प्रजातियों की प्राथमिकताओं को एकीकृत करके और पर्याप्त संसाधन सुरक्षित करके प्रबंधन प्रभावशीलता को बढ़ाना भी इसमें शामिल है।
    • जैव विविधता के ह्रास को रोकने के लिये KMGBF के लक्ष्य 2 के अंतर्गत वर्ष 2030 तक कम-से-कम 30% निम्नीकृत पारिस्थितिक तंत्रों की प्रभावी बहाली सुनिश्चित करना अनिवार्य है। इसके लिये मानकीकृत वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के माध्यम से नियमित निगरानी और पारिस्थितिक कनेक्टिविटी (जो वर्तमान में 10% के चिंताजनक स्तर से नीचे है) को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिये।
    • बुनियादी ढाँचे के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिये पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) और रणनीतिक पर्यावरण आकलन (SEA) का अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिये। इसके साथ ही, अक्षय ऊर्जा, रैखिक बुनियादी ढाँचे और प्रदूषण के संबंध में प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय (CMS) के दिशा-निर्देशों का पालन करना भी आवश्यक है।
  • अत्यधिक दोहन से निपटना: अत्यधिक मत्स्यन और अवैध शिकार को कम करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत किया जाना चाहिए। इसमें मत्स्य पालन की निगरानी, मत्स्य निकायों के साथ CMS की भागीदारी और BBNJ संधि का अनुमोदन शामिल है।
    • यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि राष्ट्रीय विधियाँ CMS परिशिष्ट I में सूचीबद्ध प्रजातियों को 'पकड़ने' (Take) — जिसमें शिकार, मत्स्यन और संग्रहण शामिल है, से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करें तथा इस संबंध में मिलने वाली किसी भी छूट या अपवाद को सख्ती से विनियमित किया जाए।
  • पर्यावरण प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों को कम करना:प्रवासी प्रजातियों पर प्रदूषण के प्रभाव को कम करने के लिए प्राथमिक कार्यों में CMS द्वारा अनुमोदित दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रकाश प्रदूषण को कम करना, संवेदनशील क्षेत्रों में क्वाइटिंग टेक्नोलॉजीज़ के माध्यम से पानी के भीतर होने वाले शोर को सीमित करना तथा विषैले सीसा युक्त गोला-बारूद के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से शीघ्र समाप्त करना शामिल है। 
    • महत्त्वपूर्ण पर्यावासों के निकट कीटनाशकों का उपयोग कम करना एक अतिरिक्त उपाय है। इसके अतिरिक्त, प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिये समस्याग्रस्त प्लास्टिक को खत्म करना और अनावश्यक उत्पादन को कम करना भी इसमें शामिल हैं।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के शमन हेतु लक्षित पारिस्थितिक तंत्र पुनर्स्थापन के माध्यम से पर्यावास की गुणवत्ता और कनेक्टिविटी को सुदृढ़ करना अनिवार्य है। इसके साथ ही, चरम मौसम की घटनाओं के जोखिम को कम करने और प्रवासन मार्गों में जलवायु-प्रेरित परिवर्तनों के अनुरूप 'डायनेमिक मैनेजमेंट' (गतिशील प्रबंधन) रणनीतियों को लागू किया जाना चाहिये।
    • यह सुनिश्चित करने के लिये कि नवीकरणीय ऊर्जा अवसंरचना के विस्तार से प्रवासी प्रजातियों को कोई हानि न पहुँचे, CMS ऊर्जा कार्य बल के दिशा-निर्देशों का अनुपालन आवश्यक है।

निष्कर्ष:

प्रवासी प्रजातियों की संख्या में हो रही गिरावट को रोकने के लिये तत्काल और समन्वित कार्रवाई अनिवार्य है। उनके आवासों का संरक्षण, अत्यधिक दोहन और प्रदूषण से निपटना तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्राथमिकताएँ हैं। अब तक हुए सुधार यह दर्शाते हैं कि CMS (प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय) के तहत निरंतर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से, इन सीमा-पार प्रजातियों को भविष्य की पीढ़ियों के लिये सुरक्षित रखना संभव है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण (CMS) में 'प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय' की भूमिका का परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. प्रवासी प्रजातियों पर सम्मेलन (CMS) क्या है?
CMS या बॉन कन्वेंशन, UNEP द्वारा प्रशासित एक संधि है, जिसे वर्ष 1979 में अपनाया गया था और यह राष्ट्रीय सीमाओं के पार प्रवासी प्रजातियों एवं उनके आवासों के संरक्षण के लिये एक वैश्विक कानूनी ढाँचा प्रदान करती है।

2. CMS के अंतर्गत दो परिशिष्ट कौन-से हैं ?
परिशिष्ट I में उन लुप्तप्राय प्रवासी प्रजातियों की सूची दी गई है, जिन्हें सख्त संरक्षण की आवश्यकता है। परिशिष्ट II में उन प्रजातियों की सूची दी गई है, जिनकी संरक्षण स्थिति अनुकूल नहीं है, लेकिन जिन्हें समझौतों या समझौता ज्ञापनों के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से लाभ मिलता है।

3. CMS परिशिष्ट I में कौन-कौन सी भारतीय प्रजातियाँ सूचीबद्ध हैं ?
भारत में पाई जाने वाली प्रमुख प्रजातियों में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, एशियाई हाथी, बंगाल फ्लोरिकन, साइबेरियन क्रेन, ऑलिव रिडले टर्टल, लेदरबैक टर्टल और हॉक्सबिल टर्टल शामिल हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रिलिम्स

प्रश्न. जैव विविधता के साथ-साथ मनुष्य के परंपरागत जीवन के संरक्षण के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण रणनीति निम्नलिखित में से किस एक की स्थापना करने में निहित है? (2014)

(a) जीवमंडल निचय (रिज़र्व)
(b) वानस्पतिक उद्यान
(c) राष्ट्रीय उपवन
(d) वन्यजीव अभयारण्य

उत्तर: (a)


प्रश्न. प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिये अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) तथा वन्य प्राणिजात एवं वनस्पतिजात की संकटापन्न स्पीशीज़ के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर अभिसमय (CITES) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2015)

  1. IUCN संयुक्त राष्ट्र का एक अंग है तथा CITES सरकारों के बीच अंतर्राष्ट्रीय करार है। 
  2. IUCN प्राकृतिक वातावरण के बेहतर प्रबंधन के लिये विश्व भर में हज़ारों क्षेत्र-परियोजनाएँ चलाता है। 
  3. CITES उन राज्यों पर वैध रूप से आबद्धकर है, जो इसमें शामिल हुए हैं, लेकिन यह कन्वेंशन राष्ट्रीय विधियों का स्थान नहीं लेता है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(A) केवल 1

(B) केवल 2 और 3

(C) केवल 1 और 3

(D) 1, 2 और 3

उत्तर: (B)


मेन्स:

प्रश्न. भारत में जैव विविधता किस प्रकार अलग-अलग पाई जाती है? वनस्पतिजात और प्राणिजात के संरक्षण में जैव विविधता अधिनियम, 2002 किस प्रकार सहायक है ? (2018)

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