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प्रिलिम्स फैक्ट्स

प्रारंभिक परीक्षा

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का 23वाँ स्थापना दिवस

स्रोत: पीआईबी

चर्चा में क्यों?

जनजातीय कार्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) का 23वाँ स्थापना दिवस मनाया, जिसमें अनुसूचित जनजातियों (STs) के अधिकारों की सुरक्षा और संवर्द्धन के लिये NCST के संवैधानिक दायित्व तथा उद्देश्यों को रेखांकित किया गया।

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग क्या है?

  • परिचय: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग एक संवैधानिक निकाय है जिसकी स्थापना संविधान के अनुच्छेद 338A के तहत 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के माध्यम से की गई थी। इस संशोधन द्वारा पूर्ववर्ती संयुक्त राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग का विभाजन किया गया, ताकि जनजातीय समुदायों की विशिष्ट समस्याओं और विकासात्मक आवश्यकताओं पर केंद्रित एवं प्रभावी ध्यान दिया जा सके।
  • संरचना: इसमें एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और 3 अन्य सदस्य (जिनमें कम-से-कम एक महिला सदस्य शामिल होती है) होते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर तथा मुहर सहित वारंट के माध्यम से की जाती है। सदस्यों की सेवा शर्तें एवं कार्यकाल राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किये जाते हैं।
  • कार्यकाल एवं सेवा शर्तें:  अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य 3 वर्ष की अवधि के लिये पद धारण करते हैं। जिसमें अध्यक्ष केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के समकक्ष, उपाध्यक्ष राज्य मंत्री के समकक्ष और सदस्य भारत सरकार के सचिव के समकक्ष होते है।
    • कोई भी सदस्य दो से अधिक कार्यकाल के लिये नियुक्त नहीं किया जा सकता।
  • मुख्य कार्य: अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों के कार्यान्वयन की जाँच और पर्यवेक्षण करना, अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित विशिष्ट शिकायतों की जाँच करना, सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी और सलाह देना, विकास प्रगति का मूल्यांकन करना, राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करना, केंद्र/राज्य सरकारों को सिफारिशें करना।
    • अतिरिक्त कार्य (राष्ट्रपति द्वारा 2005 में निर्दिष्ट): लघु वन उपज (MFP) पर स्वामित्व और खनिज व जल संसाधनों पर अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, अवैध भूमि हस्तांतरण को रोकना, PESA अधिनियम, 1996 के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करना, विस्थापित आदिवासियों के लिये राहत और पुनर्वास में सुधार करना और झूम खेती को समाप्त करना शामिल है।
  • रिपोर्टिंग तंत्र: राष्ट्रपति को वार्षिक/आवधिक रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, राष्ट्रपति की ओर से संसद के समक्ष रिपोर्ट और की गई कार्रवाई का ज्ञापन प्रस्तुत किया जाता है, राज्य से संबंधित रिपोर्ट राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के समक्ष प्रस्तुत करने के लिये भेजी जाती हैं।
  • शक्तियाँ: जाँच के लिये दीवानी न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त हैं—व्यक्तियों को तलब कर सकता है, दस्तावेज़ प्रस्तुत करने की मांग कर सकता है, हलफनामे प्राप्त कर सकता है, सार्वजनिक अभिलेखों की मांग कर सकता है, अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने के लिये सशक्त है।
  • अनिवार्य परामर्श: केंद्र और राज्य सरकारों को अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाले सभी प्रमुख नीतिगत मामलों पर आयोग से परामर्श करना होगा।

भारत में अनुसूचित जनजातियों से संबंधित प्रावधान

  • परिचय: भारत का संविधान अनुसूचित जनजातियों की कोई स्पष्ट परिभाषा प्रदान नहीं करता है, लेकिन अनुच्छेद 342 के माध्यम से उनकी पहचान की प्रक्रिया निर्धारित करता है। इसके साथ ही विशेष प्रशासनिक प्रावधान पाँचवीं अनुसूची और छठी अनुसूची में निहित हैं तथा उनकी सुरक्षा के लिये विभिन्न संरक्षणात्मक कानूनों का भी प्रावधान किया गया है।
  • संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 366(25) के अनुसार, अनुसूचित जनजातियाँ (STs) वे जनजातियाँ या जनजातीय समुदाय अथवा उनके भाग हैं, जिन्हें संविधान के प्रयोजनों के लिये अनुच्छेद 342 के अंतर्गत अनुसूचित जनजाति माना गया है।
    • अनुच्छेद 342(1): यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को राज्यों के लिये राज्यपाल से परामर्श कर अनुसूचित जनजातियों के रूप में जनजातियों को निर्दिष्ट करने का अधिकार प्रदान करता है।
  • अनुसूचित क्षेत्र: पाँचवीं अनुसूची, छठी अनुसूची के राज्यों (असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम) के अलावा अन्य राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों (STs) के प्रशासन को नियंत्रित करती है।
    • छठी अनुसूची: यह असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के जनजातीय क्षेत्रों के लिये  स्वायत्त ज़िला परिषदों का प्रावधान करती है।
  • प्रमुख कानून: नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989, पेसा अधिनियम, 1996 जिसके द्वारा अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज का विस्तार किया गया, वन अधिकार अधिनियम, 2006 जिसके तहत वन अधिकारों को मान्यता दी गई।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) का संवैधानिक आधार क्या है?
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के माध्यम से अनुच्छेद 338-A के तहत एक संवैधानिक निकाय के रूप में की गई है, जिसका उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों (STs) के अधिकारों की सुरक्षा करना है।

2. संविधान के तहत अनुसूचित जनजातियों की पहचान कैसे की जाती है?
अनुच्छेद 342 के तहत राष्ट्रपति राज्यपाल से परामर्श कर अनुसूचित जनजातियों (STs) को निर्दिष्ट करते हैं; जबकि अनुच्छेद 366(25) संवैधानिक प्रयोजनों के लिये अनुसूचित जनजातियों की परिभाषा प्रदान करता है।

3. पाँचवीं और छठी अनुसूची में क्या अंतर है?
पाँचवीं अनुसूची अधिकांश राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन करती है, जबकि छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम में स्वायत्त ज़िला परिषदों का प्रावधान करती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रश्न. यदि किसी विशिष्ट क्षेत्र को भारत के संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अधीन लाया जाए, तो निम्नलिखित कथनों में कौन-सा एक, इसके परिणाम को सर्वोत्तम रूप से प्रतिबिंबित करता है?  (2022)

(a) इससे जनजातीय लोगों की ज़मीनें गैर-जनजातीय लोगों को अंतरित करने पर रोक लगेगी।

(b) इससे उस क्षेत्र में एक स्थानीय स्वशासी निकाय का सृजन होगा।

(c) इससे वह क्षेत्र संघ राज्यक्षेत्र में बदल जाएगा।

(d) जिस राज्य के पास ऐसे क्षेत्र होंगे, उसे विशेष कोटि का राज्य घोषित किया जाएगा।

उत्तर: (a)


प्रश्न. भारत के संविधान की किस अनुसूची के अधीन जनजातीय भूमि का, खनन के लिये निजी पक्षकारों को अंतरण अकृत और शून्य घोषित किया जा सकता है? (2019)

(a) तीसरी अनुसूची

(b) पाँचवीं अनुसूची

(c) नौवीं अनुसूची   

(d) बारहवीं अनुसूची

उत्तर: (b)


प्रश्न. भारत के संविधान में पाँचवीं अनुसूची और छठी अनुसूची के उपबंध निम्नलिखित में से किसलिये किये गए हैं? (2015)

(a) अनुसूचित जनजातियों के हितों के संरक्षण के लिये

(b) राज्यों के बीच सीमाओं के निर्धारण के लिये

(c) पंचायतों की शक्तियों, प्राधिकारों और उत्तरदायित्वों के निर्धारण के लिये

(d) सभी सीमावर्ती राज्यों के हितों के संरक्षण के लिये

उत्तर: (a)


प्रारंभिक परीक्षा

निर्यात प्रोत्साहन मिशन के तहत 7 अतिरिक्त उपायों का शुभारंभ

स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों?

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने निर्यात प्रोत्साहन मिशन (EPM) के तहत सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों (MSMEs) को सशक्त बनाने और भारत की वैश्विक निर्यात प्रतिस्पर्द्धा को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से 7 अतिरिक्त उपायों का शुभारंभ किया

  • इन अतिरिक्त उपायों के शुभारंभ के साथ ही EPM के तहत प्रस्तावित 11 उपायों में से 10 अब प्रचालनगत हैं, जिनमें पहले से लागू तीन उपायबाज़ार पहुँच सहायता, निर्यात ऋण के लिये पूर्व और पश्चात शिपमेंट पर ब्याज सब्सिडी तथा निर्यात ऋण हेतु संपार्श्विक सहायता—भी शामिल हैं।

निर्यात प्रोत्साहन मिशन के तहत किये गए 7 नए उपाय क्या हैं?

निर्यात संवर्द्धन हेतु उपाय (वित्तीय सहायता)

  • वैकल्पिक व्यापार साधनों (एक्सपोर्ट फैक्टरिंग) हेतु सहायता: यह उपाय MSME के लिये वहनीय कार्यशील पूंजी समाधान के रूप में एक्सपोर्ट फैक्टरिंग को बढ़ावा देता है, जिसके तहत पात्र लेनदेन की फैक्टरिंग लागत पर 2.75 प्रतिशत की ब्याज सब्सिडी प्रदान की जाएगी। सहायता की अधिकतम सीमा प्रति MSME वार्षिक 50 लाख रुपये है।
    • एक्सपोर्ट फैक्टरिंग एक व्यापार वित्त तंत्र है जिसमें एक निर्यातक अपनी विदेशी देय प्राप्य राशियों (इनवॉइस) को एक विशेष वित्तीय संस्था, जिसे फैक्टर कहा जाता है, को छूट पर बेच देता है। इसका उद्देश्य तुरंत नकदी प्रवाह प्राप्त करना होता है, ताकि निर्यातक को विदेशी खरीदार के भुगतान की प्रतीक्षा न करनी पड़े
  • ई-कॉमर्स निर्यातकों के लिये ऋण सहायता: डायरेक्ट ई-कॉमर्स क्रेडिट फैसिलिटी के तहत 50 लाख रुपये तक समर्थन मिलेगा, जिसमें 90% गारंटी कवरेज शामिल है। ओवरसीज इन्वेंटरी क्रेडिट फैसिलिटी के तहत 5 करोड़ रुपये तक समर्थन मिलेगा, जिसमें 75% गारंटी कवरेज शामिल है।
    • 2.75% का ब्याज सब्सिडी उपलब्ध होगा, जो प्रति आवेदक वार्षिक 15 लाख रुपये की सीमा तक सीमित है।
  • उभरते निर्यात अवसरों के लिये सहायता: यह उपाय निर्यातकों को विभिन्न साझा जोखिम और ऋण साधनों के माध्यम से नए या उच्च जोखिम वाले बाज़ारों तक पहुँच बनाने में सक्षम बनाता है। इन संरचित तंत्रों का उद्देश्य निर्यातकों के आत्मविश्वास तथा नकदी प्रवाह को सुदृढ़ करना है।

निर्यात दिशा हेतु उपाय (गैर-वित्तीय सहायता )

  • व्यापार विनियम, प्रत्यायन एवं अनुपालन सक्षमीकरण (TRACE): निर्यातकों को अंतर्राष्ट्रीय परीक्षण, निरीक्षण और प्रमाणन (TIC) आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता करता है। पात्र व्यय के लिये सकारात्मक सूची के तहत 60% और प्राथमिकता सकारात्मक सूची के तहत 75% का आंशिक प्रतिपूर्ति प्रदान करता है, जिसमें प्रति इंपोर्ट-एक्सपोर्ट कोड (IEC) 25 लाख रुपये की वार्षिक सीमा रखी गई है।
  • लॉजिस्टिक्स, ओवरसीज वेयरहाउसिंग एंड फुलफिलमेंट की सुविधा प्रदान करना (FLOW): यह ई-कॉमर्स एक्सपोर्ट हब सहित ओवरसीज वेयरहाउसिंग एंड फुलफिलमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुँच बनाने में सहायता करता है। अधिकतम 3 वर्षों के लिये स्वीकृत परियोजना लागत का 30% तक प्रदान करता है।
  • माल ढुलाई एवं परिवहन हेतु लॉजिस्टिक्स उपाय (LIFT): निम्न निर्यात तीव्रता वाले ज़िलों में निर्यातकों के समक्ष आने वाली विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों को कम करता है। माल ढुलाई व्यय का 30% तक आंशिक प्रतिपूर्ति प्रदान करता है, जो प्रत्येक IEC पर प्रति वित्तीय वर्ष 20 लाख रुपये की सीमा के अधीन है।
  • व्यापार बुद्धिमत्ता एवं सुविधा हेतु एकीकृत सहायता (INSIGHT): यह उपाय निर्यातकों की क्षमता निर्माण को सुदृढ़ करता है, 'जिलों को निर्यात केंद्र' पहल के तहत जिलों और क्लस्टर स्तर पर सुविधा प्रदान करता है।
  • वित्तीय सहायता परियोजना लागत का 50% तक है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकार के संस्थानों तथा विदेशों में भारतीय मिशनों के प्रस्तावों के लिये 100% तक समर्थन प्राप्त है।

निर्यात प्रोत्साहन मिशन (EPM) क्या है?

  • परिचय: EPM एक निर्यात-संवर्द्धन पहल है, जिसे खंडित निर्यात समर्थन तंत्रों को एकल, डिजिटल रूप से निगरानी किये जाने वाले ढाँचे में समेकित करने के लिये डिज़ाइन किया गया है, ताकि भारतीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों और श्रम-गहन क्षेत्रों की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाई जा सके। 
    • EPM 6 वर्षों तक चलेगा, जिसमें वित्त वर्ष 2025-26 से वित्त वर्ष 2030-31 तक कुल 25,060 करोड़ रुपये का परिव्यय शामिल है।
  • शासन संरचना: यह मिशन वाणिज्य विभाग द्वारा संचालित है, जिसमें विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) नोडल कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में कार्य करता है। 
    • इसमें सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, निर्यात संवर्द्धन परिषदों और राज्य सरकारों के बीच समन्वय शामिल है।
  • एकीकृत उप-योजनाएँ: EPM दो पूरक धाराओं के माध्यम से कार्य करता है:
    • निर्यात प्रोत्साहन: वित्तीय सक्षमकों पर केंद्रित है, जिसमें सस्ते व्यापार वित्तपोषण, ब्याज अनुदान, एक्सपोर्ट फैक्टरिंग और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिये ऋण संवर्द्धन शामिल है।
    • निर्यात दिशा: गैर-वित्तीय सक्षमकों पर केंद्रित है, जैसे– गुणवत्ता अनुपालन, ब्रांडिंग, व्यापार मेलों में भागीदारी, लॉजिस्टिक्स और ज़िला-स्तरीय क्षमता निर्माण के लिये समर्थन।
  • क्षेत्रीय फोकस: वस्त्र, चमड़ा, रत्न एवं आभूषण, इंजीनियरिंग वस्तुएँ और समुद्री उत्पाद जैसे टैरिफ-प्रभावित क्षेत्रों को प्राथमिकता देता है। 
    • निर्यात दिशा के तहत यह आंतरिक और निम्न-निर्यात वाले ज़िलों को लक्षित समर्थन प्रदान करता है ताकि भारत के निर्यात आधार को व्यापक बनाया जा सके और समावेशी भागीदारी को बढ़ावा दिया जा सके।
  • महत्त्व: भारत के मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के बढ़ते नेटवर्क ने लगभग 70% वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद और दो-तिहाई वैश्विक व्यापार तक पहुँच योग्य बना दिया है। मिशन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम और स्टार्टअप वास्तव में इन तरजीही पहुँच अवसरों का उपयोग कर सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. निर्यात प्रोत्साहन मिशन (EPM) क्या है?
EPM एक केंद्र प्रायोजित अंब्रेला योजना है, जिसका उद्देश्य MSMEs के लिये बिखरी हुई निर्यात सहायता योजनाओं को एकीकृत कर एक डिजिटल रूप से निगरानी योग्य ढाँचे में समाहित करना है।

2. EPM के अंतर्गत दो प्रमुख उप-योजनाएँ कौन-सी हैं?
EPM दो उप-योजनाओं के माध्यम से संचालित होता है: निर्यात प्रोत्साहन (इसमें ब्याज सब्सिडी और ऋण जैसी वित्तीय सुविधाओं पर ध्यान दिया जाता है), निर्यात दिशा (इसमें अनुपालन, लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग जैसी गैर-वित्तीय सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है)।

3. FTA के संदर्भ में EPM का क्या महत्त्व है?
FTA के माध्यम से लगभग 70% वैश्विक GDP तक पहुँच बनाई जा सकती है। इस संदर्भ में, EPM (निर्यात प्रोत्साहन योजना) MSMEs को बाज़ार पहुँच का प्रभावी ढंग से उपयोग करने में सहायता करता है, जिसके लिये यह वित्त, ऋण, लॉजिस्टिक्स और अनुपालन से संबंधित बाधाओं को दूर करता है।

 

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. भारत के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2023) 

  1. 'सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (एमएसएमईडी) अधिनियम, 2006’ के अनुसार, जिनका संयंत्र और मशीनरी में निवेश 15 करोड़ से 25 करोड़ रुपए के बीच है, वे 'मध्यम उद्यम' हैं। 
  2. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को दिये गए सभी बैंक ऋण प्राथमिकता क्षेत्रक के अधीन अर्ह हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 

(b) केवल 2 

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही  2 

उत्तर: (b)


प्रश्न 2. फरवरी 2006 से प्रभावी हुआ SEZ एक्ट, 2005 के कुछ उद्देश्य हैं। इस संदर्भ में निम्नलिखित पर विचार कीजिये:

  1. अवसंरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) सुविधाओं का विकास 
  2. विदेशी स्रोतों से निवेश को प्रोत्साहन  
  3. केवल सेवा क्षेत्र में निर्यात को प्रोत्साहन  

 उपर्युक्त में से कौन-सा/से अधिनियम का/के उद्देश्य है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 3

(c) केवल 2 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a) 


रैपिड फायर

मिज़ोरम और अरुणाचल प्रदेश का राज्य दिवस

स्रोत: पीआईबी

20 फरवरी को प्रधानमंत्री ने अरुणाचल प्रदेश और मिज़ोरम के लोगों को उनके राज्य स्थापना दिवस पर शुभकामनाएँ दीं। यह दिन 20 फरवरी, 1987 को दोनों राज्यों को पूर्ण राज्य का दर्जा दिये जाने की स्मृति में मनाया जाता है।

  • राज्य का दर्जा प्रदान करना: 53वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1986 द्वारा मिज़ोरम को राज्य का दर्जा दिया गया, जबकि 55वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1986 के माध्यम से अरुणाचल प्रदेश को राज्य का दर्जा प्रदान किया गया।

मिज़ोरम

  • परिचय: मिज़ोरम 20 फरवरी, 1987 को भारतीय संघ का 23वाँ राज्य बना। यह मिज़ोरम शांति समझौते (1986) के बाद संभव हुआ, जो भारत सरकार और मिज़ो नेशनल फ्रंट के बीच संपन्न हुआ था।
    • इस समझौते से उग्रवाद के लंबे दौर का अंत हुआ और मिज़ोरम के 1972 में केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
  • ऐतिहासिक विकास: मिज़ोरम को मूल रूप से असम का लुशाई हिल्स ज़िला कहा जाता था और वर्ष 1954 में इसका नाम बदलकर मिज़ो हिल्स रखा गया।
  • संवैधानिक संरक्षण: मिज़ोरम को भारत के संविधान की छठी अनुसूची [अनुच्छेद 244(2)] के अंतर्गत एक “जनजातीय क्षेत्र” के रूप में मान्यता दी गई है, जिससे जनजातीय अधिकारों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्वायत्तता सुनिश्चित होती है।

अरुणाचल प्रदेश

  • परिचय: अरुणाचल प्रदेश 20 फरवरी, 1987 को भारतीय संघ का 24वाँ राज्य बना। इससे पहले यह नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (NEFA) के नाम से जाना जाता था। वर्ष 1972 में इसका नाम बदलकर अरुणाचल प्रदेश रखा गया और इसे केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया।
  • औपनिवेशिक उद्भव: अरुणाचल प्रदेश का आधुनिक इतिहास यंडाबू की संधि (1826) के बाद ब्रिटिश नियंत्रण के साथ प्रारंभ हुआ, जो प्रथम आंग्ल–बर्मी युद्ध (1824–1826) के पश्चात हुई थी। इसके बाद शिमला संधि (1914) के माध्यम से तिब्बत और NEFA के बीच सीमा का निर्धारण किया गया, जिसे मैकमोहन रेखा के रूप में जाना जाता है।
  • ऐतिहासिक विकास: 1962 तक अरुणाचल प्रदेश असम के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत रहा। इसके बाद इसके रणनीतिक महत्त्व को देखते हुए इसे अलग से प्रशासित केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया।

और पढ़ें: भारत में राज्यों का पुनर्गठन


रैपिड फायर

अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय

स्रोत: द हिंदू

पूर्व फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते को अपनी मादक पदार्थ विरोधी नीति से जुड़े कथित मानवता के विरुद्ध अपराधों के आरोपों में अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय में पूर्व-ट्रायल सुनवाई का सामना करना पड़ेगा। माना जाता है कि इस अभियान में मारे गए लोगों की संख्या हज़ारों तक पहुँची।

अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय

  • परिचय: अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय विश्व का प्रथम स्थायी अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय है, जिसकी स्थापना अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गंभीरतम अपराधों के लिये व्यक्तियों के अभियोजन हेतु की गई है। यह पूरकता के सिद्धांत पर कार्य करता है, अर्थात यह तभी हस्तक्षेप करता है जब राष्ट्रीय न्यायिक प्रणालियाँ कार्य करने में असमर्थ या अनिच्छुक हों।
    • पूरकता का सिद्धांत यह स्थापित करता है कि अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय अंतिम उपाय के रूप में कार्य करता है और केवल तभी हस्तक्षेप करता है जब राष्ट्रीय प्राधिकारी वास्तविक रूप से अभियोजन या कार्यवाही करने में अनिच्छुक या असमर्थ हों।
    • यह घरेलू न्यायालयों द्वारा दिये गए फैसलों की समीक्षा या उन्हें बदलने का अपीलीय संस्थान नहीं है।
  • कानूनी आधार और स्थापना: इसकी स्थापना रोम संधि के माध्यम से की गई, जिसे 17 जुलाई, 1998 को अपनाया गया और यह 1 जुलाई, 2002 से लागू हुई। इसका मुख्यालय द हेग, नीदरलैंड्स में स्थित है।
  • अधिकार क्षेत्र और मुख्य अपराध: यह राज्यों पर नहीं बल्कि व्यक्तियों पर अभियोजन करता है तथा इसके तहत चार मुख्य अपराध आते हैं—विनाशक नरसंहार, मानवता के खिलाफ अपराध, युद्ध अपराध और आक्रमण का अपराध (आक्रमण के अपराध के लिये अधिकार क्षेत्र 2018 में सक्रिय हुआ)। इसके पास 1 जुलाई, 2002 के बाद किये गए अपराधों पर अधिकार क्षेत्र है, जब रोम संधि लागू हुई थी।
  • अधिकार क्षेत्र सक्रिय होने के आधार: किसी सदस्य राज्य के क्षेत्र में अपराध होना या उसके नागरिक द्वारा अपराध किया जाना।
    • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) द्वारा संदर्भित किया जाना, चाहे संबंधित राज्य सदस्य हो या नहीं।
    • अभियोजक द्वारा स्वप्रेरणा से (Proprio Motu) जाँच शुरू करना, जिसे प्री-ट्रायल चैंबर की अनुमति प्राप्त हो।
  • सदस्यता और भारत का रुख: फरवरी 2026 तक अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) के रोम कानून का अनुसमर्थन करने वाले देशों की संख्या 125 है। भारत, अमेरिका, चीन और इज़रायल रोम कानून के पक्षकार नहीं हैं।
    • भारत ने राष्ट्रीय संप्रभुता और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संदर्भ शक्तियों को लेकर चिंताओं के कारण आपत्ति जताई है, जिसे वह राजनीतिक रूप से प्रेरित मानता है।
  • संरचना: इसके चार मुख्य अंग हैं—प्रेसीडेंसी, न्यायिक प्रभाग, अभियोजक कार्यालय (Office of the Prosecutor) और रजिस्ट्री।
    • असेंबली ऑफ स्टेट्स पार्टीज़ (ASP) विधायी और प्रबंधन संबंधी निगरानी प्रदान करती है।
  • कार्यान्वयन/प्रवर्तन: इसके पास कोई पुलिस शक्ति नहीं है। यह गिरफ्तारी करने, संदिग्धों को सौंपने और दंड देने हेतु सदस्य देशों के स्वेच्छिक सहयोग पर निर्भर करता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में अंतर: ICC व्यक्तियों द्वारा किये गए आपराधिक कृत्यों पर मुकदमा चलाता है, जबकि ICJ इसके विपरीत राज्यों के बीच विवादों का समाधान करता है।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय बनाम अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय

आधार

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ)

अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC)

स्थापना वर्ष

1946

2002

संयुक्त राष्ट्र से संबंध

संयुक्त राष्ट्र का आधिकारिक न्यायालय; प्रायः “विश्व न्यायालय” के रूप में संदर्भित

स्वतंत्र न्यायालय; संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मामलों के संदर्भ (referral) प्राप्त कर सकता है

स्थान

हेग, नीदरलैंड

हेग, नीदरलैंड

मामलों का प्रकार

राष्ट्रों के मध्य विवाद (Contentious Cases) एवं परामर्शात्मक अभिमत (Advisory Opinions)

व्यक्तियों के विरुद्ध आपराधिक अभियोजन

विषय-वस्तु (Subject Matter)

संप्रभुता, सीमा विवाद, समुद्री विवाद, व्यापार, प्राकृतिक संसाधन, मानवाधिकार, संधि उल्लंघन, संधियों की व्याख्या आदि

नरसंहार, मानवता के विरुद्ध अपराध, युद्ध अपराध, आक्रमण का अपराध

वित्त पोषण

संयुक्त राष्ट्र द्वारा वित्तपोषित

रोम संधि के पक्षकार राष्ट्रों का आकलित अंशदान; संयुक्त राष्ट्र से स्वैच्छिक अंशदान; सरकारों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, व्यक्तियों, निगमों तथा अन्य संस्थाओं से स्वैच्छिक योगदान

और पढ़ें: अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय और अमेरिका


रैपिड फायर

ओटावा कन्वेंशन से पोलैंड बाहर

स्रोत: द हिंदू  

पोलैंड ने वर्ष 1997 के एंटी‑पर्सनल माइन बैन ट्रीटी (ओटावा कन्वेंशन) से आधिकारिक रूप से हटते हुए वर्ष 2012 में हुई ट्रीटी का अनुसमर्थन करने और वर्ष 2016 में अपने भंडार नष्ट कर देने के बाद की गई अपनी पूर्व प्रतिबद्धताओं को उलट दिया है।

  • भू-राजनीतिक तर्क: यह कदम यूक्रेन पर आक्रमण के बाद रूस (कैलिनिनग्राद) और बेलारूस के साथ सीमाओं पर एक किलेबंदी प्रणाली, 'ईस्टर्न शील्ड' को सुरक्षित करने की आवश्यकता से प्रेरित है।
  • ओटावा कन्वेंशन (1997): यह कनाडा‑नेतृत्व वाले ओटावा प्रक्रिया से उभरी, जो वर्ष 1980 के कन्वेंशन ऑन सर्टेन कन्वेंशनल वेपंस के पहले पुनरीक्षण सम्मेलन के बाद शुरू हुई, क्योंकि वह एंटी‑पर्सनल माइन पर सख्त प्रतिबंध लगाने में विफल रहा था।
    • ओटावा कन्वेंशन नागरिकों पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभाव के कारण एंटी-पर्सनल माइंस के उपयोग, भंडारण, उत्पादन और हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाता है।
  • लैंडमाइंस के प्रकार: लैंडमाइंस मुख्य रूप से एंटी-पर्सनल और एंटी-व्हीकल (एंटी-टैंक) होती हैं; जबकि एंटी-पर्सनल माइंस ओटावा कन्वेंशन के तहत प्रतिबंधित हैं, एंटी-टैंक माइंस प्रतिबंधित नहीं हैं और 'कन्वेंशन ऑन सर्टेन कन्वेंशनल वेपंस (CCW), 1980'  – संशोधित प्रोटोकॉल II (1996) के तहत विनियमित हैं।
  • घरेलू उत्पादन: पोलैंड स्थानीय उत्पादकों के सहयोग से एंटी-पर्सनल और एंटी-टैंक दोनों प्रकार की लैंडमाइंस का घरेलू निर्माण शुरू करके आत्मनिर्भरता हासिल करना चाहता है। 
    • पोलैंड सरकार ने कहा है कि माइंस का अभी भंडारण ही रहेगा जिन्हें नागरिकों के जोखिम को कम करने के लिये केवल "आक्रमण के यथार्थवादी खतरे" की स्थिति में ही प्रयोग किया जाएगा।
  • क्षेत्रीय रुझान: यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद से पड़ोसी देशों ने इस संधि के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का पुनर्मूल्यांकन किया है। 
    • पोलैंड ने फिनलैंड, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया और यूक्रेन के साथ मिलकर संधि से हटने की घोषणा की है।
  • वैश्विक संदर्भ: भारत, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका उन लगभग तीन दर्ज़न देशों में शामिल हैं जिन्होंने कभी भी ओटावा संधि को स्वीकार नहीं किया है।

और पढ़ें: ओटावा लैंडमाइन कन्वेंशन


रैपिड फायर

भारत पर्यवेक्षक के रूप में 'बोर्ड ऑफ पीस' मीट में शामिल

स्रोत: TH

भारत ने वॉशिंगटन डी.सी. में आयोजित 'बोर्ड ऑफ पीस' की पहली बैठक में 'पर्यवेक्षक' (ऑब्ज़र्वर) के रूप में भाग लिया। इस भागीदारी के माध्यम से भारत ने इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष पर अपने पारंपरिक दृष्टिकोण को मज़बूत करते हुए 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को भी बनाए रखा।

  • 'बोर्ड ऑफ पीस’: संयुक्त राष्ट्र के संभावित प्रतिद्वंद्वी के रूप में अमेरिका द्वारा स्थापित इस बोर्ड में 27 राष्ट्र (जैसे– सऊदी अरब, यूएई, अर्जेंटीना) शामिल हैं और यह 10 अरब अमेरिकी डॉलर की अमेरिकी प्रतिबद्धता के साथ गाज़ा पट्टी के पुनर्निर्माण पर ध्यान केंद्रित करता है।
    • भारत ने बैठक में भाग तो लिया, लेकिन उसने स्वयं को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के पूर्ण सदस्य के बजाय एक पर्यवेक्षक के रूप में प्रस्तुत किया।
  • वैश्विक पहलों के साथ संतुलन: भारत की भागीदारी उसकी पश्चिम एशियाई स्थिरता में सक्रिय रूप से शामिल रहने की इच्छा को दर्शाती है, जो वैश्विक पहलों के साथ संतुलन स्थापित करती है। यह भागीदारी गाज़ा शांति योजना और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 के लिये उसके समर्थन के अनुरूप है।
    • प्रारंभिक विलंब के बावजूद भारत ने 100 से अधिक देशों के साथ एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किये, जिसमें वेस्ट बैंक में इज़रायल द्वारा बस्तियों के विस्तार की आलोचना की गई और इसे अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना गया।
  • टू-स्टेट सॉल्यूशन: भारत ने एक बार पुनः ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है, इस समाधान के तहत वर्ष 1967 की सीमाओं के आधार पर एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यवहार्य फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना की परिकल्पना की गई है, जो इज़राइल के साथ शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रहेगा।
  • राजनयिक संतुलन नीति: यह नीति भारत के राजनयिक संतुलन को दर्शाती है। ये पहलें भारत-अरब लीग संबंधों और इज़राइल के साथ संबंधों में अपनाए गए ‘डी-हाइफेनेटेड’ और सिद्धांत-आधारित दृष्टिकोण पर आधारित हैं।

और पढ़ें: गाज़ा के लिये शांति बोर्ड


रैपिड फायर

RBI लीड बैंक स्कीम (LBS) में संशोधन

स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने लीड बैंक स्कीम (LBS) के संचालन को सुव्यवस्थित करने, समन्वय तंत्र को मज़बूत बनाने और इसकी प्रभावशीलता को बढ़ाने के उद्देश्य से इसमें संशोधन के लिये मसौदा दिशा-निर्देश जारी किये हैं।

  • संशोधन का उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य राज्य स्तरीय बैंकर्स समितियों (SLBCs) और लीड डिस्ट्रिक्ट मैनेजर (LDM) कार्यालयों को मज़बूत बनाना है, ताकि बैंकों, सरकारी निकायों और विकास एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सके।
  • क्रेडिट-डिपॉज़िट (CD) अनुपात की निगरानी: बैंकों को CD अनुपात की निगरानी करनी होगी, जिसके लिये मसौदा दिशा-निर्देशों में देश भर की ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी शाखाओं के लिये 60% का मानक निर्धारित किया गया है।

लीड बैंक स्कीम (LBS)

  • परिचय: लीड बैंक योजना (LBS), जिसे RBI द्वारा दिसंबर 1969 में शुरू किया गया था, एक महत्त्वपूर्ण संस्थागत व्यवस्था है। इसका प्राथमिक उद्देश्य ‘क्षेत्रीय दृष्टिकोण’ के माध्यम से ज़िला स्तर पर समन्वित बैंकिंग विकास, प्राथमिकता क्षेत्र ऋण को बढ़ावा देना और वित्तीय समावेशन को प्रोत्साहित करना है।
  • शुरुआत: इसकी शुरुआत वर्ष 1969 की दो समितियों की सिफारिशों के आधार पर हुई थी: गाडगिल स्टडी ग्रुप (जिसने ‘क्षेत्रीय दृष्टिकोण’ का समर्थन किया) और नरिमन समिति (जिसने इसका समर्थन किया और बैंकों को विशिष्ट ज़िलों को अपनाने की सिफारिश की)।
    • इसे ‘सामाजिक बैंकिंग’ की अवधारणा को क्रियान्वित करने के लिये शुरू किया गया था, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिये विकासात्मक भूमिकाओं को वाणिज्यिक उद्देश्यों के साथ एकीकृत किया गया था।
  • मुख्य उद्देश्य: प्राथमिकता वाले क्षेत्रों (कृषि, लघु एवं मध्यम उद्यम, कमज़ोर वर्ग) को बैंक ऋण का प्रवाह बढ़ाना, ऋण अंतराल को कम करने के लिये बैंकों और सरकारी एजेंसियों के प्रयासों में समन्वय स्थापित करना आदि।
  • प्रमुख विशेषताएँ: 
    • बुनियादी इकाई: ऋण नियोजन के लिये ज़िला प्राथमिक इकाई के रूप में कार्य करता है (प्रारंभिक कार्यान्वयन में मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे प्रमुख महानगरों को छोड़कर)
    • लीड बैंक: RBI द्वारा प्रत्येक ज़िले के लिये एक वाणिज्यिक बैंक (आमतौर पर सार्वजनिक क्षेत्र का) को लीड बैंक के रूप में नामित किया जाता है।
    • लीड डिस्ट्रिक्ट मैनेजर (LDM): लीड बैंक का एक समर्पित अधिकारी कार्यान्वयन की देखरेख करता है।
  • सर्विस एरिया अप्रोच (SAA): इसकी शुरुआत अप्रैल 1989 में की गई थी। यह ग्रामीण ऋण वितरण को सुव्यवस्थित करने के लिये एक रणनीतिक दृष्टिकोण था, इसके तहत प्रत्येक ग्रामीण/अर्द्ध-शहरी बैंक शाखा को 15-25 गाँव का एक निश्चित समूह आवंटित किया गया था। इसका उद्देश्य नियोजित विकास सुनिश्चित करना, अतिव्यापीकरण (overlapping) को रोकना और क्रेडिट (ऋण) कवरेज की अपर्याप्तता को दूर करना था।

और पढ़ें: संशोधित प्राथमिकता क्षेत्र ऋण दिशा-निर्देश


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