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निर्यात प्रोत्साहन मिशन के तहत 7 अतिरिक्त उपायों का शुभारंभ

  • 21 Feb 2026
  • 58 min read

स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों?

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने निर्यात प्रोत्साहन मिशन (EPM) के तहत सूक्ष्म, लघु तथा मध्यम उद्यमों (MSMEs) को सशक्त बनाने और भारत की वैश्विक निर्यात प्रतिस्पर्द्धा को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से 7 अतिरिक्त उपायों का शुभारंभ किया

  • इन अतिरिक्त उपायों के शुभारंभ के साथ ही EPM के तहत प्रस्तावित 11 उपायों में से 10 अब प्रचालनगत हैं, जिनमें पहले से लागू तीन उपायबाज़ार पहुँच सहायता, निर्यात ऋण के लिये पूर्व और पश्चात शिपमेंट पर ब्याज सब्सिडी तथा निर्यात ऋण हेतु संपार्श्विक सहायता—भी शामिल हैं।

निर्यात प्रोत्साहन मिशन के तहत किये गए 7 नए उपाय क्या हैं?

निर्यात संवर्द्धन हेतु उपाय (वित्तीय सहायता)

  • वैकल्पिक व्यापार साधनों (एक्सपोर्ट फैक्टरिंग) हेतु सहायता: यह उपाय MSME के लिये वहनीय कार्यशील पूंजी समाधान के रूप में एक्सपोर्ट फैक्टरिंग को बढ़ावा देता है, जिसके तहत पात्र लेनदेन की फैक्टरिंग लागत पर 2.75 प्रतिशत की ब्याज सब्सिडी प्रदान की जाएगी। सहायता की अधिकतम सीमा प्रति MSME वार्षिक 50 लाख रुपये है।
    • एक्सपोर्ट फैक्टरिंग एक व्यापार वित्त तंत्र है जिसमें एक निर्यातक अपनी विदेशी देय प्राप्य राशियों (इनवॉइस) को एक विशेष वित्तीय संस्था, जिसे फैक्टर कहा जाता है, को छूट पर बेच देता है। इसका उद्देश्य तुरंत नकदी प्रवाह प्राप्त करना होता है, ताकि निर्यातक को विदेशी खरीदार के भुगतान की प्रतीक्षा न करनी पड़े
  • ई-कॉमर्स निर्यातकों के लिये ऋण सहायता: डायरेक्ट ई-कॉमर्स क्रेडिट फैसिलिटी के तहत 50 लाख रुपये तक समर्थन मिलेगा, जिसमें 90% गारंटी कवरेज शामिल है। ओवरसीज इन्वेंटरी क्रेडिट फैसिलिटी के तहत 5 करोड़ रुपये तक समर्थन मिलेगा, जिसमें 75% गारंटी कवरेज शामिल है।
    • 2.75% का ब्याज सब्सिडी उपलब्ध होगा, जो प्रति आवेदक वार्षिक 15 लाख रुपये की सीमा तक सीमित है।
  • उभरते निर्यात अवसरों के लिये सहायता: यह उपाय निर्यातकों को विभिन्न साझा जोखिम और ऋण साधनों के माध्यम से नए या उच्च जोखिम वाले बाज़ारों तक पहुँच बनाने में सक्षम बनाता है। इन संरचित तंत्रों का उद्देश्य निर्यातकों के आत्मविश्वास तथा नकदी प्रवाह को सुदृढ़ करना है।

निर्यात दिशा हेतु उपाय (गैर-वित्तीय सहायता )

  • व्यापार विनियम, प्रत्यायन एवं अनुपालन सक्षमीकरण (TRACE): निर्यातकों को अंतर्राष्ट्रीय परीक्षण, निरीक्षण और प्रमाणन (TIC) आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता करता है। पात्र व्यय के लिये सकारात्मक सूची के तहत 60% और प्राथमिकता सकारात्मक सूची के तहत 75% का आंशिक प्रतिपूर्ति प्रदान करता है, जिसमें प्रति इंपोर्ट-एक्सपोर्ट कोड (IEC) 25 लाख रुपये की वार्षिक सीमा रखी गई है।
  • लॉजिस्टिक्स, ओवरसीज वेयरहाउसिंग एंड फुलफिलमेंट की सुविधा प्रदान करना (FLOW): यह ई-कॉमर्स एक्सपोर्ट हब सहित ओवरसीज वेयरहाउसिंग एंड फुलफिलमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुँच बनाने में सहायता करता है। अधिकतम 3 वर्षों के लिये स्वीकृत परियोजना लागत का 30% तक प्रदान करता है।
  • माल ढुलाई एवं परिवहन हेतु लॉजिस्टिक्स उपाय (LIFT): निम्न निर्यात तीव्रता वाले ज़िलों में निर्यातकों के समक्ष आने वाली विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों को कम करता है। माल ढुलाई व्यय का 30% तक आंशिक प्रतिपूर्ति प्रदान करता है, जो प्रत्येक IEC पर प्रति वित्तीय वर्ष 20 लाख रुपये की सीमा के अधीन है।
  • व्यापार बुद्धिमत्ता एवं सुविधा हेतु एकीकृत सहायता (INSIGHT): यह उपाय निर्यातकों की क्षमता निर्माण को सुदृढ़ करता है, 'जिलों को निर्यात केंद्र' पहल के तहत जिलों और क्लस्टर स्तर पर सुविधा प्रदान करता है।
  • वित्तीय सहायता परियोजना लागत का 50% तक है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकार के संस्थानों तथा विदेशों में भारतीय मिशनों के प्रस्तावों के लिये 100% तक समर्थन प्राप्त है।

निर्यात प्रोत्साहन मिशन (EPM) क्या है?

  • परिचय: EPM एक निर्यात-संवर्द्धन पहल है, जिसे खंडित निर्यात समर्थन तंत्रों को एकल, डिजिटल रूप से निगरानी किये जाने वाले ढाँचे में समेकित करने के लिये डिज़ाइन किया गया है, ताकि भारतीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों और श्रम-गहन क्षेत्रों की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाई जा सके। 
    • EPM 6 वर्षों तक चलेगा, जिसमें वित्त वर्ष 2025-26 से वित्त वर्ष 2030-31 तक कुल 25,060 करोड़ रुपये का परिव्यय शामिल है।
  • शासन संरचना: यह मिशन वाणिज्य विभाग द्वारा संचालित है, जिसमें विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) नोडल कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में कार्य करता है। 
    • इसमें सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, निर्यात संवर्द्धन परिषदों और राज्य सरकारों के बीच समन्वय शामिल है।
  • एकीकृत उप-योजनाएँ: EPM दो पूरक धाराओं के माध्यम से कार्य करता है:
    • निर्यात प्रोत्साहन: वित्तीय सक्षमकों पर केंद्रित है, जिसमें सस्ते व्यापार वित्तपोषण, ब्याज अनुदान, एक्सपोर्ट फैक्टरिंग और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिये ऋण संवर्द्धन शामिल है।
    • निर्यात दिशा: गैर-वित्तीय सक्षमकों पर केंद्रित है, जैसे– गुणवत्ता अनुपालन, ब्रांडिंग, व्यापार मेलों में भागीदारी, लॉजिस्टिक्स और ज़िला-स्तरीय क्षमता निर्माण के लिये समर्थन।
  • क्षेत्रीय फोकस: वस्त्र, चमड़ा, रत्न एवं आभूषण, इंजीनियरिंग वस्तुएँ और समुद्री उत्पाद जैसे टैरिफ-प्रभावित क्षेत्रों को प्राथमिकता देता है। 
    • निर्यात दिशा के तहत यह आंतरिक और निम्न-निर्यात वाले ज़िलों को लक्षित समर्थन प्रदान करता है ताकि भारत के निर्यात आधार को व्यापक बनाया जा सके और समावेशी भागीदारी को बढ़ावा दिया जा सके।
  • महत्त्व: भारत के मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के बढ़ते नेटवर्क ने लगभग 70% वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद और दो-तिहाई वैश्विक व्यापार तक पहुँच योग्य बना दिया है। मिशन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम और स्टार्टअप वास्तव में इन तरजीही पहुँच अवसरों का उपयोग कर सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. निर्यात प्रोत्साहन मिशन (EPM) क्या है?
EPM एक केंद्र प्रायोजित अंब्रेला योजना है, जिसका उद्देश्य MSMEs के लिये बिखरी हुई निर्यात सहायता योजनाओं को एकीकृत कर एक डिजिटल रूप से निगरानी योग्य ढाँचे में समाहित करना है।

2. EPM के अंतर्गत दो प्रमुख उप-योजनाएँ कौन-सी हैं?
EPM दो उप-योजनाओं के माध्यम से संचालित होता है: निर्यात प्रोत्साहन (इसमें ब्याज सब्सिडी और ऋण जैसी वित्तीय सुविधाओं पर ध्यान दिया जाता है), निर्यात दिशा (इसमें अनुपालन, लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग जैसी गैर-वित्तीय सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है)।

3. FTA के संदर्भ में EPM का क्या महत्त्व है?
FTA के माध्यम से लगभग 70% वैश्विक GDP तक पहुँच बनाई जा सकती है। इस संदर्भ में, EPM (निर्यात प्रोत्साहन योजना) MSMEs को बाज़ार पहुँच का प्रभावी ढंग से उपयोग करने में सहायता करता है, जिसके लिये यह वित्त, ऋण, लॉजिस्टिक्स और अनुपालन से संबंधित बाधाओं को दूर करता है।

 

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. भारत के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2023) 

  1. 'सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (एमएसएमईडी) अधिनियम, 2006’ के अनुसार, जिनका संयंत्र और मशीनरी में निवेश 15 करोड़ से 25 करोड़ रुपए के बीच है, वे 'मध्यम उद्यम' हैं। 
  2. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को दिये गए सभी बैंक ऋण प्राथमिकता क्षेत्रक के अधीन अर्ह हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 

(b) केवल 2 

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही  2 

उत्तर: (b)


प्रश्न 2. फरवरी 2006 से प्रभावी हुआ SEZ एक्ट, 2005 के कुछ उद्देश्य हैं। इस संदर्भ में निम्नलिखित पर विचार कीजिये:

  1. अवसंरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) सुविधाओं का विकास 
  2. विदेशी स्रोतों से निवेश को प्रोत्साहन  
  3. केवल सेवा क्षेत्र में निर्यात को प्रोत्साहन  

 उपर्युक्त में से कौन-सा/से अधिनियम का/के उद्देश्य है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 3

(c) केवल 2 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a) 

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