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भारत पर्यवेक्षक के रूप में 'बोर्ड ऑफ पीस' मीट में शामिल

  • 21 Feb 2026
  • 15 min read

स्रोत: TH

भारत ने वॉशिंगटन डी.सी. में आयोजित 'बोर्ड ऑफ पीस' की पहली बैठक में 'पर्यवेक्षक' (ऑब्ज़र्वर) के रूप में भाग लिया। इस भागीदारी के माध्यम से भारत ने इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष पर अपने पारंपरिक दृष्टिकोण को मज़बूत करते हुए 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को भी बनाए रखा।

  • 'बोर्ड ऑफ पीस’: संयुक्त राष्ट्र के संभावित प्रतिद्वंद्वी के रूप में अमेरिका द्वारा स्थापित इस बोर्ड में 27 राष्ट्र (जैसे– सऊदी अरब, यूएई, अर्जेंटीना) शामिल हैं और यह 10 अरब अमेरिकी डॉलर की अमेरिकी प्रतिबद्धता के साथ गाज़ा पट्टी के पुनर्निर्माण पर ध्यान केंद्रित करता है।
    • भारत ने बैठक में भाग तो लिया, लेकिन उसने स्वयं को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के पूर्ण सदस्य के बजाय एक पर्यवेक्षक के रूप में प्रस्तुत किया।
  • वैश्विक पहलों के साथ संतुलन: भारत की भागीदारी उसकी पश्चिम एशियाई स्थिरता में सक्रिय रूप से शामिल रहने की इच्छा को दर्शाती है, जो वैश्विक पहलों के साथ संतुलन स्थापित करती है। यह भागीदारी गाज़ा शांति योजना और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 के लिये उसके समर्थन के अनुरूप है।
    • प्रारंभिक विलंब के बावजूद भारत ने 100 से अधिक देशों के साथ एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किये, जिसमें वेस्ट बैंक में इज़रायल द्वारा बस्तियों के विस्तार की आलोचना की गई और इसे अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना गया।
  • टू-स्टेट सॉल्यूशन: भारत ने एक बार पुनः ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है, इस समाधान के तहत वर्ष 1967 की सीमाओं के आधार पर एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यवहार्य फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना की परिकल्पना की गई है, जो इज़राइल के साथ शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रहेगा।
  • राजनयिक संतुलन नीति: यह नीति भारत के राजनयिक संतुलन को दर्शाती है। ये पहलें भारत-अरब लीग संबंधों और इज़राइल के साथ संबंधों में अपनाए गए ‘डी-हाइफेनेटेड’ और सिद्धांत-आधारित दृष्टिकोण पर आधारित हैं।

और पढ़ें: गाज़ा के लिये शांति बोर्ड

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