प्रारंभिक परीक्षा
पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर शुल्क में छूट
चर्चा में क्यों?
भारत सरकार ने चल रहे पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण उत्पन्न लागत दबाव और आपूर्ति शृंखला की अस्थिरता से निपटने के लिये 40 महत्त्वपूर्ण पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर 30 जून, 2026 तक पूर्ण कस्टम ड्यूटी छूट की घोषणा की है।
पेट्रोकेमिकल उत्पाद क्या हैं?
- परिचय: पेट्रोकेमिकल उत्पाद पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस से प्राप्त मूलभूत रासायनिक ‘बिल्डिंग ब्लॉक्स’ होते हैं। ये चिकित्सा उपकरणों से लेकर नवीकरणीय ऊर्जा के घटकों तक सभी निर्मित वस्तुओं के 95% हिस्से के लिये प्रारंभिक बिंदु (आधार) के रूप में कार्य करते हैं।
- वर्गीकरण: इन्हें उनकी रासायनिक संरचना के आधार पर तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।
- ओलेफिंस (एल्केंस): ओलेफिंस सबसे अधिक उत्पादित पेट्रोकेमिकल्स में से हैं और मुख्य रूप से प्लास्टिक तथा सिंथेटिक रबर बनाने में उपयोग किये जाते हैं। उदाहरण:
- एथिलीन: पॉलीएथिलीन (PE) के निर्माण का मुख्य आधार—यह प्लास्टिक पैकेजिंग, बोतलों और पतली फिल्मों में सबसे अधिक इस्तेमाल होता है।
- प्रोपिलीन: पॉलीप्रोपिलीन (PP) बनाने के लिए आवश्यक—जिसका उपयोग वाहन के हिस्सों, कपड़ों और गर्मी सहने वाले खाद्य कंटेनरों में किया जाता है।
- ब्यूटाडाइन: सिंथेटिक रबर का प्रमुख घटक—जिसका उपयोग बड़े पैमाने पर टायर और अन्य रबर उत्पादों के निर्माण में होता है।
- BTX एरोमैटिक्स: ये रिंग-आकार के हाइड्रोकार्बन होते हैं, जो उच्च-शक्ति वाले प्लास्टिक, डिटर्जेंट और सिंथेटिक फाइबर बनाने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं। उदाहरण:
- बेंज़ीन: वस्त्र उद्योग और औद्योगिक पैकेजिंग में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
- टोल्यून: मुख्य रूप से उच्च-ऑक्टेन ईंधन के एडिटिव और पेंट्स में सॉल्वेंट के रूप में उपयोग होता है।
- ज़ाइलीन: PET (पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट) बनाने के लिये प्रमुख कच्चा माल—जिसका उपयोग पानी की बोतलों और पॉलिएस्टर वस्त्रों में किया जाता है।
- सिंथेसिस गैस (सिनगैस): यह कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन का मिश्रण होता है, जिसका उपयोग उर्वरकों तथा विभिन्न रसायनों के निर्माण के लिये आधारभूत कच्चे माल के रूप में किया जाता है।
- अमोनिया: वैश्विक खाद्य उत्पादन की रीढ़– यह यूरिया जैसे नाइट्रोजन-आधारित उर्वरकों का प्रमुख स्रोत है।
- मेथनॉल: एक बहु-उद्देशीय सॉल्वेंट और ईंधन में मिलाने वाला पदार्थ, जिसका उपयोग फॉर्मेल्डिहाइड बनाने में भी होता है, जो आगे प्लाईवुड रेज़िन और कई प्रकार के प्लास्टिक के निर्माण में काम आता है।
- ओलेफिंस (एल्केंस): ओलेफिंस सबसे अधिक उत्पादित पेट्रोकेमिकल्स में से हैं और मुख्य रूप से प्लास्टिक तथा सिंथेटिक रबर बनाने में उपयोग किये जाते हैं। उदाहरण:
- आर्थिक और रणनीतिक महत्त्व: पेट्रोकेमिकल्स वैश्विक तेल और प्राकृतिक गैस की मांग (वर्तमान में लगभग 12–14% तेल खपत) का एक बढ़ता हुआ हिस्सा हैं। इनका उत्पादन मुख्यतः उन क्षेत्रों में केंद्रित होता है जहाँ सस्ता कच्चा माल (फीडस्टॉक) उपलब्ध होता है, जैसे– प्राकृतिक गैस से प्राप्त एथेन या तेल रिफाइनिंग से मिलने वाला नैफ्था।
छूट का उद्देश्य एवं कवरेज
- रणनीतिक उद्देश्य: यह उपाय ‘अस्थायी और लक्षित राहत’ प्रदान करता है, जिससे डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों को एनहाइड्रस अमोनिया, टोल्यून, स्टाइरीन और मेथनॉल जैसे इनपुट्स की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके, जिनकी कीमतों में इज़रायल-अमेरिका द्वारा ईरान पर हमलों के कारण वृद्धि हुई है।
- प्रभावित क्षेत्र: यह छूट विशेष रूप से प्लास्टिक, वस्त्र, औषधि, ऑटोमोबाइल घटक और रसायन क्षेत्रों को समर्थन देती है, जिससे विनिर्माण क्षेत्र को स्थिर करने और उपभोक्ताओं के लिये अंतिम कीमतों को कम करने में सहायता मिलती है।
सीमा शुल्क
- परिचय: सीमा शुल्क वह अनिवार्य कर है जो सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के पार वस्तुओं के आवागमन पर लगाया जाता है। भारत में यह सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 तथा सीमा शुल्क टैरिफ अधिनियम, 1975 द्वारा विनियमित होता है।
- उद्देश्य: राजस्व संग्रह के अतिरिक्त सीमा शुल्क का उपयोग घरेलू उद्योगों के संरक्षण (आयात को महंगा बनाकर), व्यापार के विनियमन तथा यह सुनिश्चित करने के लिये किया जाता है कि आयातित वस्तुएँ राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप हों।
- सीमा शुल्क के प्रकार: सामान्यतः सीमा शुल्क को निम्न प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:
- एड वैलोरेम शुल्क: वस्तुओं के मूल्य के एक निश्चित प्रतिशत के रूप में लगाया जाता है (वैश्विक स्तर पर सबसे सामान्य)।
- विशिष्ट शुल्क: माप की प्रति इकाई (जैसे- प्रति किलोग्राम, प्रति लीटर या प्रति वस्तु) पर एक निश्चित राशि के रूप में लगाया जाता है।
- संयुक्त शुल्क: एड वैलोरेम और विशिष्ट शुल्क का संयोजन होता है।
- अतिरिक्त शुल्क: जैसे एंटी-डंपिंग शुल्क (अनुचित रूप से कम कीमत वाले आयात के विरुद्ध), काउंटरवेलिंग शुल्क (सब्सिडी प्राप्त आयात के विरुद्ध), संरक्षक शुल्क तथा सामाजिक कल्याण उपकर आदि।
- मूल्यांकन पद्धति: शुल्क केवल वस्तु के अंकित मूल्य (स्टिकर प्राइस) पर नहीं लगाया जाता। इसे आकलनीय मूल्य के आधार पर निर्धारित किया जाता है, जो सामान्यतः CIF (लागत, बीमा और माल भाड़ा) मूल्य पर आधारित होता है।
(आकलनीय मूल्य = वस्तु की लागत + बीमा + मालभाड़ा)- सीमा शुल्क = आकलनीय मूल्य × लागू शुल्क दर
- हालिया सुधार: केंद्रीय बजट 2026-27 में व्यक्तिगत उपयोग के लिये आयातित वस्तुओं पर सीमा शुल्क को 20% से घटाकर 10% कर दिया गया है। साथ ही, 17 कैंसर दवाओं तथा 7 दुर्लभ रोगों के लिये दवाओं/खाद्य पदार्थों पर सीमा शुल्क पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. सीमा शुल्क क्या है?
सीमा शुल्क वह अनिवार्य कर है जो सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के पार वस्तुओं के आवागमन पर लगाया जाता है।
2. सीमा शुल्क की गणना के लिये ‘आकलनीय मूल्य’ क्या होता है?
यह मुख्यतः वस्तुओं का CIF (लागत, बीमा और माल भाड़ा) मूल्य होता है, जो भारतीय बंदरगाह तक पहुँचने तक उत्पाद की कुल लागत को दर्शाता है।
3. ओलेफिंस और एरोमैटिक्स के औद्योगिक उपयोग में क्या अंतर है?
ओलेफिंस (जैसे– एथिलीन) बहु-उपयोगी प्लास्टिक और पैकेजिंग के प्रमुख कच्चे पदार्थ होते हैं, जबकि एरोमैटिक्स (जैसे– बेंज़ीन) उच्च-शक्ति वाले सिंथेटिक फाइबर और डिटर्जेंट के लिये आवश्यक होते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न 1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)
- पिछले पाँच वर्षों में आयातित खाद्य तेलों की मात्रा, खाद्य तेलों के घरेलू उत्पादन से अधिक रही है।
- सरकार विशेष स्थिति के तौर पर भी सभी आयातित खाद्य तेलों पर किसी प्रकार का सीमा शुल्क नहीं लगाती।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
रैपिड फायर
भारत ने SSBN INS अरिदमन पनडुब्बी को नौसेना में शामिल किया
भारत ने अपनी तीसरी परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी INS अरिदमन को शामिल किया, जो एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है, क्योंकि अब देश पहली बार समुद्र में 3 परिचालन SSBN बनाए रख सकेगा।
- साथ ही, भारत ने हाल ही में स्टील्थ फ्रिगेट INS तारागिरि को भी कमीशन किया है, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में देश के हितों की सुरक्षा करने की भारतीय नौसेना की क्षमता और सुदृढ़ होगी।
INS अरिदमन
- परिचय: INS अरिदमन भारत की तीसरी परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) है, जो अरिहंत-श्रेणी की है और INS अरिहंत (2016) तथा INS अरिघाट (2024) के बाद शामिल की गई है। इसे एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल (ATV) प्रोजेक्ट के तहत विकसित किया गया है।
- INS अरिहंत: वर्ष 2016 में शामिल की गई 6,000-टन INS अरिहंत ने भारत के परमाणु त्रय (Nuclear Triad) का समुद्री पक्ष स्थापित किया और वर्ष 2018 में अपनी पहली निरोधक गश्त (Deterrence Patrol) पूरी की।
- INS अरिघाट: INS अरिहंत की सफलता पर आधारित, दूसरी SSBN, INS अरिघाट, वर्ष 2024 में शामिल की गई, जिससे भारत की गहरे जल क्षेत्रों में निरंतर उपस्थिति और सुदृढ़ हुई।
- वर्द्धित मिसाइल क्षमता: 7,000-टन INS अरिदमन में 8 वर्टिकल लॉन्चिंग सिस्टम (VLS) ट्यूबें हैं, जो इसे K-15 (700 किमी. सीमा) और K-4 (3,500 किमी. सीमा) सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल्स (SLBM) का बड़ा पेलोड ले जाने में सक्षम बनाती हैं।
- परमाणु त्रय और द्वितीय प्रहार क्षमता: INS अरिदमन के शामिल होने से भारत का परमाणु त्रय सुदृढ़ हुआ- भूमि से (अग्नि मिसाइल), वायु से (राफेल, Su-30MKI) और समुद्र से परमाणु हथियार लॉन्च करने की क्षमता, जो ‘नो फर्स्ट यूज़’ परमाणु सिद्धांत के अनुरूप विश्वसनीय द्वितीय प्रहार क्षमता सुनिश्चित करता है।
- संचालन संबंधी उपलब्धि: इस कमीशन के साथ भारत उन चयनित देशों, जैसे– अमेरिका, रूस, यूनाइटेड किंगडम, फ्राँस और चीन में शामिल हो गया है, जो समुद्र के भीतर परमाणु निरोधक क्षमता संचालित करने में सक्षम हैं।
- भविष्य की रणनीतिक रूपरेखा: भारत वर्तमान में चौथी SSBN (कोडनाम S-4*, संभवतः वर्ष 2027 में सेवा में प्रवेश) का निर्माण कर रहा है और परमाणु-संचालित अटैक सबमरीन (SSN) कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है, साथ ही प्रोजेक्ट-75I के तहत एडवांस्ड कॉन्शनल सबमरीन विकसित की जा रही हैं, जो AIP (एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन) तकनीक से सुसज्जित होंगी।
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रैपिड फायर
वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित ज़िले
केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने वामपंथी उग्रवाद (LWE) से प्रभावित ज़िलों के वर्गीकरण में व्यापक रूप से संशोधन किया है, ताकि नक्सल विरोधी रणनीतियों को वर्तमान ज़मीनी वास्तविकताओं के अनुरूप बनाया जा सके, जो रेड कॉरिडोर (भारत के वे ज़िले जहाँ नक्सलियों की उपस्थिति और प्रभाव है) के ऐतिहासिक संकुचन को चिह्नित करता है।
- नया वर्गीकरण: "सर्वाधिक प्रभावित ज़िलों" की पूर्व की श्रेणी को LWE प्रभावित ज़िलों के रूप में अधिक सूक्ष्म वर्गीकरण द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है, जो उग्रवाद की तीव्रता के बेहतर मूल्यांकन की अनुमति देता है।
- वर्तमान वर्गीकरण (2026): वर्तमान में केवल बीजापुर (छत्तीसगढ़) और पश्चिमी सिंहभूम (झारखंड) को LWE प्रभावित ज़िलों के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जबकि कांकेर (छत्तीसगढ़) को अत्यधिक प्रभावित ज़िला की श्रेणी में रखा गया है और शेष नौ राज्यों में 35 ज़िले कम प्रभावित श्रेणी के अंतर्गत आते हैं।
- पहले छत्तीसगढ़ के बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर जैसे ज़िले वर्ष 2025 तक "सर्वाधिक प्रभावित" श्रेणी का हिस्सा थे, जहाँ महत्त्वपूर्ण सुधार देखने को मिलते हैं।
- रेड कॉरिडोर का पतन: रेड कॉरिडोर वर्ष 2005 के 200 से अधिक ज़िलों से घटकर वर्ष 2026 में मात्र 2 ज़िलों में आ गया है, जो निरंतर सुरक्षा और विकासात्मक हस्तक्षेपों की सफलता को दर्शाता है, जो मार्च 2026 तक LWE को समाप्त करने के भारत के लक्ष्य के अनुरूप है।
- पुनर्वर्गीकरण का उद्देश्य: संशोधित वर्गीकरण का उद्देश्य संसाधनों के बेहतर आवंटन और बदलती वास्तविकताओं के साथ LWE-विरोधी प्रयासों के संरेखण को सुनिश्चित करना है, जिससे हस्तक्षेप अधिक लक्षित और प्रभावी बन सकें।
- नीतिगत ढाँचा: ये परिवर्तन वर्ष 2015 की LWE से निपटने के लिये राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना में निहित हैं, जो उग्रवाद से व्यापक रूप से निपटने के लिये सुरक्षा उपायों को विकास पहलों के साथ जोड़ती है।
- सुरक्षा संबंधी व्यय (SRE) योजना: संशोधित वर्गीकरण SRE योजना के तहत संसाधनों की तैनाती को निर्धारित करेगा, जहाँ केंद्र सुरक्षा बल अभियानों, अनुग्रह भुगतान और आत्मसमर्पण करने वाले LWE कैडरों के पुनर्वास तथा सामुदायिक पुलिसिंग के लिये राज्यों को धन की प्रतिपूर्ति करता है।
- SRE योजना के तहत वर्ष 2023–24 तक कुल 1,685 करोड़ रुपये जारी किये गए हैं, जो LWE का सामना करने के लिये निरंतर वित्तीय प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
- नक्सल-मुक्त भारत: केंद्र सरकार ने लोकसभा में घोषणा की है कि देश प्रभावी रूप से "नक्सल-मुक्त" है, जो आंतरिक सुरक्षा में एक प्रमुख उपलब्धि है।
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रैपिड फायर
छत्रपति शिवाजी महाराज की पुण्यतिथि
केंद्रीय गृहमंत्री एवं सहकारिता मंत्री ने छत्रपति शिवाजी महाराज की पुण्यतिथि (Death Anniversary) पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
- छत्रपति शिवाजी महाराज: 19 फरवरी, 1630 को पुणे के निकट शिवनेरी किले में जन्मे, मराठा साम्राज्य के संस्थापक और एक दूरदर्शी नेता थे जिन्होंने मुगल शासन का विरोध किया तथा स्वशासन का समर्थन किया।
- हिंदवी स्वराज का विज़न: कम आयु में ही शिवाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज (स्वशासन) की स्थापना का संकल्प लिया, जो स्वदेशी संप्रभुता, नैतिक शासन और विदेशी प्रभुत्व से मुक्त राजनीतिक स्वतंत्रता की एक प्रगतिशील अवधारणा थी।
- उन्होंने स्वधर्म (अपने धर्म/कर्त्तव्य), स्वराज (स्वशासन) और स्वभाषा (अपनी भाषा) के मूल आदर्शों के आसपास जनसमूह को सफलतापूर्वक एकजुट किया तथा प्रशासन की भाषा के रूप में फारसी के स्थान पर जानबूझकर मराठी और संस्कृत को अपनाया।
- शिवाजी महाराज द्वारा लड़ी गई प्रमुख लड़ाइयाँ: प्रतापगढ़ का युद्ध (1659), पवन खिंड का युद्ध (1660), सूरत का युद्ध (1664), पुरंदर का युद्ध (1665), सिंहगढ़ का युद्ध (1670) और संगमनेर का युद्ध (1679)।
- वाघ नख का उपयोग शिवाजी महाराज ने 1659 के प्रतापगढ़ के युद्ध में अफज़ल खान को मारने के लिये किया था।
- सैन्य एवं नौसैनिक प्रतिभा: वे अपनी नवाचारी गुरिल्ला युद्धक रणनीतियों (गनिमी कावा) के लिये विश्व भर में प्रसिद्ध हैं और एक सशक्त नौसेना तथा तटीय किलों (जैसे– सिंधुदुर्ग) के निर्माण के कारण ‘भारतीय नौसेना के जनक’ के रूप में सम्मानित किये जाते हैं, जिससे पश्चिमी तटरेखा की सुरक्षा सुनिश्चित हुई।
- प्रशासन: उन्होंने अष्टप्रधान मंडल (आठ मंत्रियों की परिषद) के आधार पर एक सुदृढ़ शासन व्यवस्था का नेतृत्व किया।
- उन्होंने उत्पादकों से सीधे राजस्व आकलन और संग्रह की एक प्रणाली पेश की, जिससे मध्यस्थों के शोषण में कमी आई।
- उपाधियाँ: उन्हें छत्रपति, शककर्त्ता, क्षत्रिय कुलावतंस और हिंदव धर्मोद्धारक जैसी उपाधियों से सम्मानित किया गया, जो उनकी संप्रभुता, वीर वंश परंपरा और धर्म के संरक्षक के रूप में उनकी भूमिका को दर्शाती हैं।
- अंतिम दिन: उनका निधन 3 अप्रैल, 1680 को रायगढ़ किले में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के कारण हुआ।
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रैपिड फायर
RBI द्वारा नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड अनुबंधों पर प्रतिबंध
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के बीच ऑफशोर करेंसी मेनीपुलेशन को रोकने और भारतीय रुपये (INR) को स्थिर करने के लिये बैंकों के नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDD) अनुबंधों में भागीदारी को प्रतिबंधित कर दिया है।
- निर्देश के बाद, काल्पनिक दबाव (सट्टे के उद्देश्य से) कम होने के कारण रुपये में तेज़ी से सुधार हुआ, जो अमेरिकी डॉलर की तुलना में 93.10 पर आ गया।
- एक अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू रिलेटेड पार्टी ट्रांजेक्शन (RPT) पर RBI का प्रतिबंध है, जो एक ऐसा कदम है जिसे इंट्रा-ग्रुप ट्रांजेक्शन को या मुनाफे और जोखिमों को क्षेत्राधिकारों में स्थानांतरित करने के लिये उपयोग किये जाने से रोकने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
नॉन-डिलीवरेबल डेरिवेटिव
- परिचय: नॉन-डिलीवरेबल डेरिवेटिव (NDD) एक वित्तीय अनुबंध है, जिसका उपयोग उन मुद्राओं पर हेजिंग या सट्टा लगाने के लिये किया जाता है जो गैर-परिवर्तनीय हैं या स्ट्रिक्ट कैपिटल कंट्रोल के अंतर्गत आते हैं।
- एक मानक डेरिवेटिव के विपरीत, जहाँ अंतर्निहित परिसंपत्ति का भौतिक रूप से आदान-प्रदान किया जाता है, NDD को सख्ती से एक स्वतंत्र रूप से परिवर्तनीय मुद्रा (आमतौर पर अमेरिकी डॉलर) का रूप दिया जाता है।
- कार्य व्यवस्था: एक NDD में दो मुद्राओं की "मूल" राशि का कोई आदान-प्रदान नहीं होता है। इसके बजाय, पक्षकार "अनुबंध दर" और "निर्धारण तिथि" पर सहमत होते हैं।
- निर्धारण तिथि पर बाज़ार विनिमय दर (स्पॉट रेट) की तुलना एग्रीड कॉन्ट्रैक्ट रेट से की जाती है।
- कॉन्ट्रैक्ट रेट और स्पॉट रेट के मध्य के अंतर का आकलन किया जाता है। इसके पश्चात घाटे में रहने वाला पक्ष लाभ प्राप्त करने वाले पक्ष को इस अंतर की राशि का भुगतान USD जैसी किसी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर परिवर्तनीय मुद्रा में करता है।
- NDDs की मुख्य विशेषताएँ:
- ऑफशोर ट्रेडिंग: इनका व्यापार आमतौर पर सिंगापुर, लंदन या दुबई जैसे विदेशी वित्तीय केंद्रों में किया जाता है, ताकि घरेलू नियमों, जैसे कि गृह देश के पूंजी खाता नियंत्रण से बचा जा सके। भारत में NDD मुख्यतः नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (Non-Deliverable Forward-NDF) के रूप में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा विनियमित किये जाते हैं।
- कोई भौतिक डिलीवरी नहीं: इसमें व्यक्ति वास्तव में ‘प्रतिबंधित’ मुद्रा (जैसे– चीनी युआन या भारतीय रुपया) को भौतिक रूप से प्राप्त या सँभालता नहीं है।
- नकद-निपटान: इसमें सभी लेन-देन का अंतिम निपटान एक प्रमुख वैश्विक मुद्रा में शुद्ध नकद भुगतान के रूप में किया जाता है।
- चिंताएँ: इन उपकरणों की लंबे समय से आलोचना की जाती रही है क्योंकि ये मूल्य खोज को विकृत करते हैं और बाज़ार में हेरफेर को संभव बनाते हैं, क्योंकि ऑफशोर बाज़ार की धारणा अक्सर घरेलू मूलभूत कारकों से अलग होती है।
- कुछ बाज़ार प्रतिभागियों ने NDF बाज़ार का दुरुपयोग किया, उन्होंने अनुबंधों को रद्द करके फिर से प्रवेश करके कीमतों में उतार-चढ़ाव का फायदा उठाया, जिससे हेजिंग के उपकरण वास्तव में सट्टेबाज़ी के साधन बन गए।
- इसके अतिरिक्त बड़े ऑफशोर ट्रेडर्स भू-राजनीतिक और व्यापारिक तनावों का लाभ उठाकर रुपये के खिलाफ बड़े पैमाने पर पोज़िशन लेते हैं, जिससे नीचे की ओर दबाव बनता है और भारत के ऑनशोर बाज़ार पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।
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