प्रारंभिक परीक्षा
सम्राट संप्रति
चर्चा में क्यों?
महावीर जयंती (31 मार्च, 2026) के अवसर पर प्रधानमंत्री ने कोबा, गांधीनगर में सम्राट संप्रति संग्रहालय का उद्घाटन किया।
- यह संग्रहालय जैन इतिहास को संरक्षित करने और सम्राट संप्रति की विरासत का सम्मान करने के लिये एक समर्पित स्थान के रूप में कार्य करता है, जो अशोक महान के पोते थे।
- उन्होंने जैन धर्म के प्रसार में वैसी ही भूमिका निभाई जैसी अशोक ने बौद्ध धर्म के वैश्विक प्रसार में निभाई थी।
सम्राट संप्रति कौन थे?
- परिचय: ये मौर्य साम्राज्य के पाँचवें सम्राट थे, जिन्होंने लगभग 224 से 215 ईसा पूर्व तक शासन किया। ये पौराणिक सम्राट अशोक के पोते और कुणाल के पुत्र थे।
- 232 ईसा पूर्व में अशोक की मृत्यु के बाद, ऐतिहासिक अभिलेख से जानकारी मिलती है कि मौर्य साम्राज्य उनके पोतों दशरथ और संप्रति के बीच विभाजित हो गया था।
- धार्मिक संबद्धता: जहाँ मौर्य वंश में विविध धर्म देखने को मिलते थे, चंद्रगुप्त मौर्य (जैन धर्म), अशोक (बौद्ध धर्म) और दशरथ (आजीविक) के साथ, संप्रति श्वेतांबर जैन परंपरा के लिये प्रमुख व्यक्ति हैं।
- प्रायः "जैन अशोक" के रूप में संदर्भित संप्रति जैन धर्म के वैश्विक प्रसार में अपनी भूमिका के लिये इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं।
सम्राट संप्रति ने जैन धर्म के प्रसार में किस प्रकार योगदान दिया?
- मंदिर निर्माण और प्रतिमा विज्ञान: संप्रति ने मंदिर पूजा की "अनुष्ठान संस्कृति" स्थापित की, जिसने जैन धर्म को संपूर्ण उपमहाद्वीप में एक भौतिक और स्थायी उपस्थिति प्रदान की।
- पारंपरिक जैन ग्रंथ उन्हें 125,000 नए मंदिरों (देरासर) के निर्माण और 36,000 पुराने मंदिरों के जीर्णोद्धार का श्रेय देते हैं। पश्चिमी भारत में कई प्राचीन जैन मंदिर, जिनमें विशिष्ट शिलालेख शामिल हैं, को पारंपरिक रूप से संप्रति के शासनकाल में स्थापना का श्रेय दिया जाता है।
- ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने पत्थर और धातु से बनी तीर्थंकरों की 12.5 मिलियन से अधिक मूर्तियों का निर्माण और अभिषेक करवाया था।
- मिशनरी अभियान: संप्रति ने अहिंसा के सिद्धांतों को मौर्य साम्राज्य से बहुत दूर तक फैलाने के लिये मिशनरी भेजे।
- ऐतिहासिक आख्यानों के अनुसार, उन्होंने पहले मौर्य सैनिकों को जैन भिक्षुओं के वेश में "गैर-आर्य" (अजेय या जनजातीय) क्षेत्रों में भेजा। विवरण बताते हैं कि उन्होंने अफगानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, म्याँमार (बर्मा) और यहाँ तक कि मध्य एशिया के कुछ हिस्सों में दूत भेजे, जिससे जैन धर्म एक अंतर्राष्ट्रीय धर्म बन गया।
- उन्होंने जैन धर्म को आंध्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, सौराष्ट्र (गुजरात) और राजपूताना (राजस्थान) जैसे क्षेत्रों में सफलतापूर्वक स्थापित किया।
- राज्य संरक्षण और नैतिक शासन: उज्जैन और पाटलिपुत्र जैसे प्रमुख केंद्रों से शासन करके उन्होंने सुनिश्चित किया कि जैन संस्थानों को शाही संरक्षण और सुरक्षा प्राप्त हो।
- संप्रति ने राज्य के कल्याण कार्यक्रमों को जैन सिद्धांत करुणा के साथ संरेखित किया।
- उन्होंने संपूर्ण साम्राज्य में लगभग 700 सदा-वर्त (धर्मशालाएँ) स्थापित कीं। ये केंद्र गरीबों, यात्रियों और तपस्वी समुदाय को मुफ्त भोजन, आश्रय और चिकित्सा देखभाल प्रदान करते थे।
- मठवासी रसद: उन्होंने सुनिश्चित किया कि जैन भिक्षु, जो विशेष रूप से पैदल यात्रा करते हैं और भिक्षा पर निर्भर रहते हैं, उनके पास साम्राज्य भर में अपनी लंबी यात्राओं के दौरान सुरक्षित मार्ग और शुद्ध भोजन तक पहुँच हो।
जैन धर्म के प्रमुख संप्रदाय
- श्वेतांबर संप्रदाय (‘श्वेत वस्त्रधारी’): यह परंपरा पश्चिम और उत्तर भारत, विशेषकर गुजरात और राजस्थान में अधिक प्रचलित है।
- यह नाम उनके द्वारा अपनाए गए 'श्वेत वस्त्र' के आचरण को प्रतिबिंबित करता है, जो इस धार्मिक परंपरा में संन्यासियों के लिए निर्धारित वेशभूषा है।
- वे मानते हैं कि सफेद वस्त्र पहनना आध्यात्मिक प्रगति में बाधा नहीं डालता, क्योंकि सच्ची मुक्ति बाहरी रूप-रंग पर नहीं, बल्कि आंतरिक वैराग्य पर निर्भर करती है।
- श्वेतांबर संप्रदाय आगम ग्रंथों को भगवान महावीर की प्रामाणिक शिक्षाएँ मानता है। एक प्रमुख मान्यता यह है कि महिलाएँ वर्तमान जीवन में मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं तथा वे 19वें तीर्थंकर मल्लिनाथ को भी स्त्री रूप में स्वीकार करते हैं।
- यह संप्रदाय आगे तीन उप-संप्रदायों में विभाजित है—मूर्तिपूजक (मूर्ति उपासक), स्थानकवासी (मूर्ति-पूजा का विरोध करने वाले) और तेरापंथी (सुधारवादी एवं अत्यंत अनुशासित समूह)।
- दिगंबर संप्रदाय (‘आकाशवस्त्रधारी’): इस संप्रदाय की व्याप्ति मुख्य रूप से दक्षिण भारत, विशेषकर कर्नाटक, और मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों में देखी जाती है।
- दिगंबर साधु पूर्ण अपरिग्रह और त्याग का मार्ग अपनाते हुए वस्त्रों का परित्याग करते हैं, जो समस्त सांसारिक और भौतिक बंधनों से उनके पूर्ण वैराग्य को दर्शाता है।
- दिगंबर संप्रदाय की मान्यता है कि मूल जैन आगम समय के साथ लुप्त हो गए थे। इसी कारण वे इन मूल शास्त्रों के स्थान पर महान आचार्यों और विद्वान मुनियों द्वारा रचित ग्रंथों को प्रमाण मानते हैं।
- श्वेतांबरों के विपरीत वे मानते हैं कि महिलाएँ सीधे मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकतीं और उन्हें पहले पुरुष रूप में पुनर्जन्म लेना पड़ता है।
- उनके प्रमुख उप-संप्रदायों में बीसपंथ, तेरापंथ और तारणपंथ या समयपंथ आते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. सम्राट संप्रति कौन थे?
ये एक मौर्य सम्राट (224–215 ईसा पूर्व) थे, अशोक के पौत्र, जो जैन धर्म के प्रचार के लिये जाने जाते हैं।
2. संप्रति को "जैन अशोक" क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उन्होंने राज्य समर्थन, मंदिरों और मिशनों के माध्यम से जैन धर्म के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो बौद्ध धर्म के लिये अशोक की भूमिका के समान थी।
3. जैन धर्म में संप्रति का प्रमुख योगदान क्या था?
उन्होंने हज़ारों मंदिरों का निर्माण कराया, लाखों मूर्तियाँ स्थापित कराईं और जैन धर्म के प्रचार हेतु विभिन्न क्षेत्रों में मिशनरियों को भेजा।
4. संप्रति के शासनकाल में किन क्षेत्रों में जैन धर्म का प्रसार हुआ?
जैन धर्म का विस्तार गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु और भारत से बाहर अफगानिस्तान तथा म्याँमार तक हुआ।
5. संप्रति ने जन-कल्याण और शासन-प्रशासन को किस प्रकार समर्थन दिया?
उन्होंने सदा-वर्त नामक परोपकारी केंद्र स्थापित किये, जहाँ भोजन, आश्रय और चिकित्सा सेवा प्रदान की जाती थी, जो जैन धर्म के अहिंसा और करुणा के सिद्धांतों को दर्शाता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. भारत की धार्मिक प्रथाओं के संदर्भ में “स्थानकवासी” संप्रदाय का संबंध किससे है? (2018)
(a) बौद्ध मत
(b) जैन मत
(c) वैष्णव मत
(d) शैव मत
उत्तर: (b)
प्रश्न. भारत के धार्मिक इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)
- सौत्रांतिका और सम्मितीय जैन मत के संप्रदाय थे।
- सर्वास्तिवादियों की मान्यता थी कि दृग्विषय (फिनोमिना) के अवयव पूर्णतः क्षणिक नहीं हैं, अपितु अव्यक्त रूप में सदैव विद्यमान रहते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (b)
प्रश्न. प्राचीन भारत के इतिहास के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों के लिये सामान्य था? (2012)
- तपस्या और भोग के अतिवाद से बचाव
- वेदों के अधिकार के प्रति उदासीन
- अनुष्ठानों की प्रभावकारिता से इनकार
नीचे दिये गए कोड का उपयोग करके सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
प्रश्न. अनेकांतवाद निम्नलिखित में से किसका एक मूल सिद्धांत और दर्शन है? (2009)
(a) बौद्ध धर्म
(b) जैन धर्म
(c) सिख धर्म
(d) वैष्णव धर्म
उत्तर: (b)
प्रारंभिक परीक्षा
भारत का LPG से PNG की ओर हस्तांतरण
चर्चा में क्यों?
भारत रणनीतिक रूप से घरेलू खाना पकाने के लिये लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) को पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) से बदलने के लिये आगे बढ़ रहा है, ताकि आयात पर निर्भरता को कम किया जा सके, विशेष रूप से हॉर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी के बाद जिसने LPG आपूर्ति शृंखलाओं में भेद्यता को उजागर किया।
LPG और PNG से संबंधित मुख्य तथ्य क्या हैं?
- परिचय: LPG को प्रोपेन और ब्यूटेन के मिश्रण से बनाया जाता है। यह मॉडरेट प्रेशर में लिक्विफाइड होती है, इसे सिलेंडरों में संगृहीत किया जाता है जो हवा की तुलना में भारी होती है।
- PNG मीथेन का अपररूप है, इसे कम दाब पर पाइपलाइनों के माध्यम से सीधे घरों/उद्योगों में वितरित किया जाता है। यह हवा की तुलना में हल्की होती है।
- आपूर्ति और रसद: LPG को दाबयुक्त सिलेंडरों में वितरित किया जाता है। इसमें बॉटलिंग प्लांट, डिस्ट्रीब्यूटर और डिलीवरी कर्मियों की एक जटिल आपूर्ति शृंखला शामिल होती है। इसके लिये मैन्युअल बुकिंग की आवश्यकता होती है।
- जबकि PNG की सप्लाई एक जालीदार पाइपलाइन नेटवर्क (सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन) के माध्यम से की जाती है। यह जल या बिजली के समान, एक अबाधित 24/7 की आपूर्ति प्रदान करता है, जिससे "अंतिम समय पर बुकिंग" की चिंता समाप्त हो जाती है।
- दक्षता: हालाँकि LPG का कैलोरी मान अधिक होता है (यह तेज़ी से गर्म करता है), PNG निरंतर प्रवाह प्रणाली में अधिक कुशल है। हालाँकि, PNG के साथ LPG स्टोव का उपयोग करने के लिये नोज़ल परिवर्तन (रेट्रोफिटिंग) की आवश्यकता होती है, जो यदि सही ढंग से नहीं किया जाता है तो थर्मल दक्षता कम कर सकता है।
- भारत में LPG और PNG:
- भारत में LPG और PNG का इतिहास: LPG को पहली बार वर्ष 1955 में मुंबई में बर्मा शेल ऑयल कंपनी द्वारा ब्रैंड बर्शेन के तहत पेश किया गया था, इसके बाद वर्ष 1965 में पहला संगठित वितरण हुआ जब इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने कोलकाता में अपना इंडेन कनेक्शन लॉन्च किया।
- इसकी शुरुआत बलिया में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के साथ हुई, जिसने महिलाओं के स्वास्थ्य और ग्रामीण सशक्तीकरण के लिये LPG पहुँच को बढ़ाया।
- इसी दौरान PNG के संदर्भ में वडोदरा एक अग्रणी शहर के रूप में सामने आया, जिसने 1970 के दशक में ही घरेलू उपयोग के लिये शहर-स्तरीय पाइप्ड प्राकृतिक गैस नेटवर्क लागू करने की शुरुआत की।
- वर्तमान स्थिति: भारत में लगभग 33 करोड़ LPG कनेक्शन हैं, जबकि यदि पूर्ण रूप से बदलाव किया जाए तो घरेलू प्राकृतिक गैस उत्पादन लगभग 30 करोड़ PNG कनेक्शनों का समर्थन करने की क्षमता रखता है।
- हालाँकि PNG की पहुँच अभी लगभग 1.5 करोड़ कनेक्शनों तक सीमित है, जिसे वर्ष 2034 तक बढ़ाकर 12 करोड़ करने का लक्ष्य रखा गया है।
- आपूर्ति और उत्पादन परिदृश्य: भारत अपनी LPG खपत का लगभग 60% आयात करता है, और उन आयातों का लगभग 90 प्रतिशत सामान्यतः होर्मुज़़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है जो वर्तमान परिस्थितियों के कारण प्रभावित हुआ है। वहीं, सरकारी उपायों के परिणामस्वरूप घरेलू LPG उत्पादन में लगभग 25% की वृद्धि हुई है।
- दूसरी ओर भारत की घरेलू PNG की आपूर्ति मुख्य रूप से कृष्णा-गोदावरी बेसिन, असम और त्रिपुरा के गैस क्षेत्रों से होती है।
- पूर्वी तट के समीप स्थित गहरे समुद्री कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन को प्रमुख और सबसे बड़े योगदानकर्त्ता के रूप में माना जाता है।
- दूसरी ओर भारत की घरेलू PNG की आपूर्ति मुख्य रूप से कृष्णा-गोदावरी बेसिन, असम और त्रिपुरा के गैस क्षेत्रों से होती है।
- भारत में LPG और PNG का इतिहास: LPG को पहली बार वर्ष 1955 में मुंबई में बर्मा शेल ऑयल कंपनी द्वारा ब्रैंड बर्शेन के तहत पेश किया गया था, इसके बाद वर्ष 1965 में पहला संगठित वितरण हुआ जब इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने कोलकाता में अपना इंडेन कनेक्शन लॉन्च किया।
प्राकृतिक गैस के अन्य रूप
PNG के अलावा प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल और सप्लाई कई अन्य तरीकों से भी की जाती है, जो अलग-अलग औद्योगिक और परिवहन ज़रूरतों पर आधारित होते हैं।
- CNG (संपीडित प्राकृतिक गैस):
- निर्माण: प्राकृतिक गैस (मीथेन) को मानक वायुमंडलीय दबाव पर उसके आयतन के 1% से भी कम तक संपीडितकिया जाता है।
- मुख्य उपयोग: परिवहन के लिये ईंधन (बस, कार और ऑटो में)।
- LNG (तरलीकृत प्राकृतिक गैस):
- निर्माण: प्राकृतिक गैस को लगभग -162°C (-260°F) तक ठंडा करके इसे साफ, रंगहीन तरल में परिवर्तित किया जाता है।
- मुख्य उपयोग: विशेष टैंकरों के माध्यम से समुद्र के पार लंबी दूरी तक परिवहन।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. घरेलू सेटिंग्स में PNG पर LPG का प्रमुख सुरक्षा लाभ क्या है?
PNG हवा से हल्का होने के कारण रिसाव होने पर तेज़ी से फैल जाता है, जबकि LPG हवा से भारी होने के कारण फर्श के स्तर पर जमता है, जिससे इसके संचय और विस्फोट का जोखिम अधिक होता है।
2. LPG का उत्पादन प्राकृतिक गैस से मूलतः कैसे भिन्न है?
LPG कच्चे तेल की रिफाइनिंग और प्राकृतिक गैस प्रसंस्करण दोनों से प्राप्त सह-उत्पाद है, जबकि PNG मुख्यतः गैस क्षेत्रों या कोल बेड मीथेन (CBM) से सीधे प्राप्त मीथेन है।
3. होर्मुज़ जलडमरूमध्य भारत की LPG आपूर्ति शृंखला के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
भारत का लगभग 90% LPG आयात इस संकीर्ण मार्ग के माध्यम से होता है; यहाँ कोई भी क्षेत्रीय संघर्ष या नाकेबंदी सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और मुद्रास्फीति के लिये जोखिम उत्पन्न करती है।
4. KG-DWN 98/2 ब्लॉक भारत के ऊर्जा लक्ष्यों के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह ब्लॉक कृष्णा-गोदावरी बेसिन में स्थित है और इससे ONGC का गैस उत्पादन लगभग 15% बढ़ने की संभावना है, जो महंगे आयातों की जगह घरेलू उत्पादन से पूर्ति करके चालू खाता घाटे को कम करेगा।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी लिमिटेड (IREDA) के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? (2015)
- यह एक पब्लिक लिमिटेड सरकारी कंपनी है।
- यह एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी है।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. ‘सतत, विश्वसनीय, टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को प्राप्त करने के लिये अनिवार्य है।’ इस संबंध में भारत में हुई प्रगति पर टिप्पणी कीजिये। (2018)
प्रारंभिक परीक्षा
हीलियम संकट और भारत की आयात निर्भरता
चर्चा में क्यों?
वर्ष 2026 के पश्चिम एशिया में उत्पन्न भू-राजनीतिक संकट ने वैश्विक हीलियम आपूर्ति को बाधित किया है, इस स्थिति ने भारत की उच्च आयात-निर्भरता को उजागर किया है तथा स्वास्थ्य सेवा, सेमीकंडक्टर और उन्नत प्रौद्योगिकी उद्योगों जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के लिये जोखिम उत्पन्न किया है।
हीलियम के मुख्य उपयोग क्या हैं?
- परिचय: हीलियम एक रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, अक्रिय और अज्वलनशील नोबल गैस है, जिसका क्वथनांक और गलनांक सभी तत्त्वों में सबसे कम है। यह परम शून्य के करीब भी तरल अवस्था में रह सकती है और आधुनिक तकनीक में इसकी अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
- यह ब्रह्मांड में दूसरा सबसे हल्का और दूसरा सबसे अधिक प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला तत्त्व है।
- ब्रह्मांड में प्रचुर मात्रा में होने के बावजूद, हीलियम पृथ्वी पर अपेक्षाकृत दुर्लभ है क्योंकि कम घनत्वता के कारण यह पृथ्वी विसरित हो जाती है और इसे कृत्रिम रूप से निर्मित नहीं किया जा सकता; बल्कि यह प्राकृतिक गैस को तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) में बदलने की क्रायोजेनिक प्रक्रिया के दौरान एक उप-उत्पाद (by-product) के रूप में प्राप्त होती है।
- अनुप्रयोग:
- क्रायोजेनिक्स एवं स्वास्थ्य देखभाल: हीलियम का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपयोग मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (MRI) मशीनों के लिये शीतलक के रूप में होता है।
- द्रव हीलियम MRI में उपयोग होने वाले अतिचालक चुंबकों को परम शून्य के निकट तापमान तक ठंडा करती है, जिससे वे बिना किसी विद्युत प्रतिरोध के कार्य कर सकते हैं और आंतरिक इमेजिंग के लिये आवश्यक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होते हैं।
- अंतरिक्ष एवं रॉकेट प्रौद्योगिकी: हीलियम अंतरिक्ष अन्वेषण तथा उपग्रह प्रक्षेपण के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- ईंधन टैंकों में दाब बनाए रखना: द्रव ईंधन वाले रॉकेटों में हीलियम का उपयोग ईंधन टैंकों में रिक्त स्थान को भरने के लिये किया जाता है। जैसे-जैसे ईंधन की खपत होती है, हीलियम दाब बनाए रखती है जिससे इंजन तक ईंधन का सतत प्रवाह सुनिश्चित होता है।
- प्रणालियों का परिशोधन: इसकी अक्रिय प्रकृति के कारण इसका उपयोग ईंधन लाइनों से संभावित विस्फोटक वाष्पों को हटाने हेतु किया जाता है।
- उच्च-प्रौद्योगिकी निर्माण: हीलियम उन उपकरणों में एक 'पर्दे के पीछे' (behind-the-scenes) की भूमिका निभाती है, जिनका हम प्रतिदिन उपयोग करते हैं।
- अर्द्धचालक: कंप्यूटर चिप्स के निर्माण के दौरान यह अक्रिय वातावरण प्रदान करती है तथा तीव्र शीतलन में सहायक होती है।
- फाइबर ऑप्टिक्स: वैश्विक इंटरनेट केबलों में प्रयुक्त प्रकाशीय तंतुओं के उच्च-गति ड्रॉइंग (निर्माण) के दौरान हीलियम का उपयोग शीतलक माध्यम के रूप में किया जाता है।
- डीप-सी डाइविंग: पेशेवर और व्यावसायिक गोताखोर हेलिओक्स (हीलियम और ऑक्सीजन का मिश्रण) का उपयोग करते हैं।
- नार्कोसिस की रोकथाम: नाइट्रोजन के विपरीत, हीलियम उच्च दबाव में नशा देने वाला प्रभाव नहीं डालती, जिससे ‘नाइट्रोजन नार्कोसिस’ से बचाव होता है।
- सुविधाजनक श्वसन: इसका कम घनत्व गहराई में सांस लेने में शारीरिक प्रयास को कम करता है।
- वैज्ञानिक अनुसंधान और अन्वेषण
- कण त्वरक: लार्ज हेड्रॉन कोलाइडर (LHC) जैसे संस्थान अपने चुंबकों को कार्यशील तापमान पर बनाए रखने के लिये तरल/लिक्विड हीलियम का उपयोग करते हैं।
- लीक/रिसाव का अन्वेषण: चूँकि हीलियम के अणु अत्यंत सूक्ष्म और तेज़ी से गतिशील होते हैं, इसलिये उन्हें उच्च-वैक्यूम उपकरणों और गैस पाइपलाइनों में सूक्ष्म रिसाव की जाँच के लिये उपयोग किया जाता है।
- क्रायोजेनिक्स एवं स्वास्थ्य देखभाल: हीलियम का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपयोग मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (MRI) मशीनों के लिये शीतलक के रूप में होता है।
वैश्विक हीलियम आपूर्ति शृंखला में व्यवधान
- अमेरिका, कतर और अल्जीरिया हीलियम के प्रमुख उत्पादक देश हैं। पश्चिम एशिया संकट ने वैश्विक आपूर्ति को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, विशेष रूप से कतर में व्यवधान के कारण, जो वैश्विक हीलियम निर्यात का लगभग 34% प्रदान करता है।
- कतर के रास लफान कॉम्प्लेक्स में हुए नुकसान और संचालन संबंधी समस्याओं ने निर्यात क्षमता को काफी कम कर दिया।
- हीलियम की ‘उपयोग करो या खो दो’ (use-it-or-lose-it) अस्थिरता के कारण लंबी अवधि के भंडारण में कठिनाई होती है, जिसका अर्थ है कि वैश्विक भंडारण प्राकृतिक रूप से कम और आपूर्ति आघातों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है।
भारत की संवेदनशीलता
- भारत हीलियम के लिये 100% आयात-निर्भर है और इसकी अनुमानित मांग वर्ष 2025 में 3.4 मिलियन क्यूबिक मीटर है।
- भारत के हीलियम आयात का 50% से अधिक कतर से आता है, इसलिये ऐसे व्यवधानों का तत्काल और गंभीर प्रभाव पड़ता है।
- देश के पास केवल 7-10 दिनों का स्टॉक होता है, जिससे यह आपूर्ति आघातों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
- हालाँकि पश्चिम बंगाल और झारखंड के प्राकृतिक गैस क्षेत्रों में हीलियम के संकेत पाए जाते हैं, लेकिन उनकी सांद्रता अभी भी 0.2% की आर्थिक निष्कर्षण सीमा से कम है।
- S&P Global Energy के अनुसार, इसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता अभी भी कम-से-कम 5-10 वर्षों के भीतर ही दूर होने का अनुमान है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. हीलियम को महत्त्वपूर्ण संसाधन क्यों माना जाता है?
इसके अद्वितीय शीतलन गुण और कोई व्यावहारिक विकल्प न होने के कारण, यह MRI, सेमीकंडक्टर्स और एयरोस्पेस के लिये आवश्यक है।
2. पृथ्वी पर हीलियम दुर्लभ क्यों है?
हीलियम की कम घनत्वता के कारण यह पृथ्वी विसरित हो जाती है और इसे कृत्रिम रूप से निर्मित नहीं किया जा सकता।
3. भारत हीलियम की कमी के प्रति संवेदनशील क्यों है?
भारत हीलियम के लिये100% आयात-निर्भर है और केवल 7-10 दिनों का स्टॉक रखता है, जिससे यह वैश्विक व्यवधानों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
4. पश्चिम एशिया संकट ने हीलियम आपूर्ति को कैसे प्रभावित किया है?
कतर में व्यवधान (≈34% वैश्विक आपूर्ति) और LNG अवसंरचना के कारण वैश्विक उपलब्धता कम हुई है और कीमतें बढ़ गई हैं।
5. हीलियम की कमी से कौन-से क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हैं?
हेल्थकेयर (MRI), सेमीकंडक्टर्स, एयरोस्पेस, अनुसंधान और टेलीकॉम (फाइबर ऑप्टिक्स) क्षेत्र हीलियम पर निर्भरता के कारण प्रमुख जोखिमों का सामना कर रहे हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. ब्रुकहेवन नेशनल लेबोरेटरी के वैज्ञानिक दल, जिसमें भारतीय वैज्ञानिक भी सम्मिलित थे, ने ऐंटि-हीलियम केंद्रक के रूप में सबसे भारी ऐंटि-द्रव्य उत्पन्न किया। ऐंटि-द्रव्य उत्पन्न करने की क्या/क्या-क्या विवक्षा/विवकाएँ है/हैं? (2012)
1. यह खनिज पूर्वक्षण और तेल की खोज को अधिक आसान और कम महंगा बना देगा।
2. यह ऐंटि-द्रव्य से निर्मित तारों और आकाशगंगाओं के होने की संभावना की जाँच करने में सहायक होगा।
3. यह ब्रह्मांड के विकास की समझ विकसित करने में सहायक होगा।
निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सा/से, मृदा में नाइट्रोजन को बढ़ाता है/बढ़ाते हैं? (2013)
1. जंतुओं द्वारा यूरिया का उत्सर्जन
2. मनुष्य द्वारा कोयले को जलाना
3. वनस्पति की मृत्यु
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (c)
रैपिड फायर
डेंगू के लिये क्यूडेंगा वैक्सीन
भारत ने टेकडा के TAK-003 (Qdenga) को स्वीकृति प्रदान की है, जो इसका पहला डेंगू वैक्सीन है, जिसे भारत के औषधि महानियंत्रक (DCGI) के अधीन विषय विशेषज्ञ समिति (SEC) द्वारा 4 से 60 वर्ष के व्यक्तियों के लिये स्वीकृति प्रदान की गई है, जो प्रतिक्रियाशील वेक्टर कंट्रोल से निवारक सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति की ओर एक ऐतिहासिक बदलाव का प्रतीक है।
- क्यूडेंगा: यह एक टेट्रावैलेंट डेंगू वैक्सीन है जिसका 28,000+ प्रतिभागियों पर परीक्षण किया गया है, इसको 40+ देशों में अनुमोदित किया गया है।
- TAK-003 एक डिज़ीज़-मॉडिफाइंग वैक्सीन है, न कि संचरण-अवरोधक। यह नैदानिक गंभीरता को कम करता है लेकिन संक्रमण को नहीं रोकता है या प्रकोप को समाप्त नहीं करता है।
- पिछले वैक्सीन के विपरीत, इसके लिये पूर्व डेंगू संक्रमण परीक्षण की आवश्यकता नहीं होती है, जिससे रोलआउट आसान हो जाता है।
- SEC ने भारत में वास्तविक विश्व की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिये क्षेत्रों और सेरोटाइप पैटर्न में बाज़ार-पश्चात अध्ययन अनिवार्य किया है।
- प्रमुख सीमाएँ: डेंगू चार सेरोटाइप (DENV-1 से DENV-4) के कारण होता है। जबकि TAK-003 DENV-2 (इसका आनुवंशिक आधार) के खिलाफ अत्यधिक प्रभावी है, DENV-3 और DENV-4 के खिलाफ इसकी प्रभावकारिता काफी कम है, विशेष रूप से "सेरोनिगेटिव" व्यक्तियों (जो पहले कभी संक्रमित नहीं हुए हैं) में।
- भारत की डेंगू एपिडेमोलॉजी बदल रही है, जबकि DENV-3 कई क्षेत्रों में बढ़ रही है (मामलों का 20-30% योगदान), जो संभावित रूप से जनसंख्या पर वैक्सीन के प्रभाव को कम कर सकता है।
- लागत चिंता: पूर्ण दो-खुराक वाले कोर्स का अनुमान 6,000 रुपये से 12,000 रुपये के बीच है, जो ग्रामीण और कम आय वाली आबादी के लिये महत्त्वपूर्ण वहन क्षमता और अनुपालन संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न करता है।
- स्वदेशी पाइपलाइन: भारत 'डेंगीऑल' (पैनेसिया बायोटेक और ICMR द्वारा विकसित) विकसित कर रहा है, जिसका उद्देश्य सभी चार सेरोटाइपों में अधिक संतुलित सुरक्षा प्रदान करना है, जो संभावित रूप से वर्ष 2027 तक उपलब्ध हो सकता है।
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रैपिड फायर
डैनेब्रोग और कोपेनहेगन का युद्ध
समुद्री पुरातत्त्वविदों ने 19वीं सदी के प्रसिद्ध डेनिश युद्धपोत 'डैनेब्रोग' के मलबे को सफलतापूर्वक खोज निकाला है। दो शताब्दियों पहले ब्रिटिश नौसेना द्वारा डुबोए गए इस जहाज़ की अब वैज्ञानिक रूप से खुदाई शुरू कर दी गई है।
- यह जहाज़ 1801 के कोपेनहेगन के युद्ध के दौरान नष्ट हो गया था, जो एक नौसैनिक संघर्ष था जिसमें एडमिरल होरेशियो नेल्सन के नेतृत्व में ब्रिटिश नौसेना ने डेनिश नौसेना को पराजित किया था।
कोपेनहेगन का युद्ध (1801)
- परिचय: कोपेनहेगन का युद्ध एक महत्त्वपूर्ण नौसैनिक संघर्ष था, जिसमें होरेशियो नेल्सन के नेतृत्व में ब्रिटिश बेड़े ने रूस, डेनमार्क-नॉर्वे, स्वीडन और प्रशिया के रणनीतिक गठबंधन को तोड़ने के लिये डैनो-नॉर्वेजियन रक्षा को निष्क्रिय कर दिया।
- यह संघर्ष ‘सशस्त्र तटस्थता संघ’ (रूस, डेनमार्क-नॉर्वे, स्वीडन और प्रशिया) के गठन से शुरू हुआ, जिसे ब्रिटेन ने अपने बाल्टिक सागर के व्यापार मार्गों तथा नौसैनिक संसाधनों के लिये फ्राँस-समर्थित खतरे के रूप में देखा।
- रणनीतिक नेतृत्व: हालाँकि एडमिरल हाइड पार्कर ब्रिटिश सेना के समग्र कमांडर थे, लेकिन उप-एडमिरल होरेशियो नेल्सन (द्वितीय कमांडर) ने आक्रमण का नेतृत्व किया। उन्होंने पीछे हटने के आदेश को नज़रअंदाज़ करते हुए दूरबीन को अपनी अंधी आँख पर रख लिया—जिससे ‘टर्न अ ब्लाइंड आई’ (अनदेखा करना) मुहावरे की उत्पत्ति हुई।
- तत्काल परिणाम: यह एक निर्णायक ब्रिटिश विजय थी, जिसके परिणामस्वरूप युद्धविराम हुआ और डेनमार्क ने अस्थायी रूप से तटस्थ संघ से अलगाव कर लिया।
- रणनीतिक पतन: रूस के जार पॉल प्रथम की हत्या और अलेक्ज़ेंडर प्रथम के सिंहासन पर आने के बाद सशस्त्र तटस्थता संघ पूरी तरह विघटित हो गया। इस विघटन के फलस्वरूप समुद्र पर ब्रिटेन का निर्विवाद वर्चस्व स्थापित हो गया।
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रैपिड फायर
NCERT को डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा
केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) को "डीम्ड यूनिवर्सिटी" का दर्जा प्रदान किया है।
- डिग्री प्रदान करने का अधिकार: नया दर्जा NCERT को, अपने 6 क्षेत्रीय संस्थानों सहित, स्वतंत्र रूप से शैक्षणिक पाठ्यक्रम शुरू करने और डिग्री प्रदान करने की अनुमति देता है।
- नियामक अनुपालन: सभी कार्यक्रमों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा निर्धारित मानदंडों और मानकों का सख्ती से पालन करना चाहिये और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 के अनुरूप होना चाहिये।
- शैक्षणिक विस्तार: NCERT को नवीन अनुसंधान, डॉक्टोरल तथा अभिनव शैक्षणिक कार्यक्रमों की शुरुआत करने का दायित्व सौंपा गया है, साथ ही, इसे UGC के दिशानिर्देशों के अनुरूप ऑफ-कैंपस एवं ऑफशोर परिसरों की स्थापना के लिये भी अधिकृत किया गया है।
- गैर-लाभकारी अनिवार्यता: संस्थान सख्ती के साथ उन शर्तों का पालन करता है जो इसे किसी भी "वाणिज्यिक" या "लाभ कमाने" वाली गतिविधियों में संलग्न होने से रोकती हैं।
- अनिवार्य मान्यता: संस्थान को राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद (NAAC) से संस्थागत मान्यता प्राप्त करनी होगी और अपने विशिष्ट कार्यक्रमों को राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड (NBA) द्वारा मूल्यांकन कराना आवश्यक होगा।
- राष्ट्रीय रैंकिंग: NCERT को अब राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग ढाँचे (NIRF) द्वारा जारी वार्षिक रैंकिंग में भाग लेना आवश्यक है।
- डिजिटल एकीकरण: संस्थान को अनिवार्य रूप से अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट (ABC) के सिस्टम को अपनाना चाहिये, जिसमें छात्र पहचान का निर्माण और ABC पोर्टल से जुड़ना और डिजिटल लॉकर में क्रेडिट स्कोर अपलोड करना शामिल है।
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