भारतीय अर्थव्यवस्था
अमेरिका-इज़रायल-ईरान संघर्ष का भारत पर भू-आर्थिक प्रभाव
- 12 Mar 2026
- 119 min read
प्रिलिम्स के लिये: द्रवीकृत प्राकृतिक गैस, होर्मुज़ जलडमरूमध्य, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, चालू खाता घाटा, संपीड़ित प्राकृतिक गैस, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन
मेन्स के लिये: पश्चिम एशियाई भू-राजनीति का भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों पर प्रभाव, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, वैश्विक संघर्षों का भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता पर प्रभाव
चर्चा में क्यों?
ईरान के साथ अमेरिका-इज़रायल संघर्ष ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित कर दिया है और ऊर्जा, व्यापार व मुद्रास्फीति के मोर्चे पर भारत की कमज़ोरियों को उजागर किया है। यह भारत के 'गोल्डीलॉक्स' संतुलन—यानी उच्च विकास दर और निम्न मुद्रास्फीति के सामंजस्य के लिये खतरा उत्पन्न करता है। साथ ही, यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिये एक विदेश नीति संबंधी दुविधा भी उत्पन्न करता है, क्योंकि भारत को अमेरिका, इज़रायल और ईरान तीनों के साथ अपने संबंध बनाए रखने हैं।
सारांश
- अमेरिका-इज़रायल-ईरान संघर्ष भारत की अर्थव्यवस्था को आयातित मुद्रास्फीति, रुपये पर दबाव और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान के खतरे से उजागर करता है। यह खतरा विशेष रूप से भारत की ऊर्जा सुरक्षा, उर्वरक आपूर्ति और व्यापार के लिये है, जिसका मुख्य कारण खाड़ी के तेल, LNG और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के माध्यम से उर्वरक आगत पर भारी निर्भरता है।
- भारत को ऊर्जा विविधीकरण, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण, घरेलू गैस उत्पादन और वैकल्पिक उर्वरक उपयोग को मज़बूत करना चाहिये, साथ ही भू-राजनीतिक जोखिमों को कम करने के लिये व्यापारिक सुगमता और समुद्री मार्गों में सुधार करना चाहिये।
अमेरिका और इज़रायल के बीच ईरान को लेकर चल रहे संघर्ष का भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
- ऊर्जा सुरक्षा गंभीर खतरे में: भारत अपने कच्चे तेल का 85% से अधिक और अपने द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा आयात करता है, जिसका अधिकांश भाग सऊदी अरब, इराक, यूएई और कतर से आता है।
- होर्मुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान के कारण इन खाड़ी देशों से तेल और LNG का बहिर्वाह प्रभावित हो गया है।
- यह संकट भारत की सीमित बफर क्षमता को दर्शाता है। उदाहरण के लिये, चीन के पास 110-140 दिनों के आयात के लिये पर्याप्त पेट्रोलियम भंडार है। इसके विपरीत, भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) में केवल 53 लाख मीट्रिक टन पेट्रोलियम है, जो मात्र कुछ दिनों की खपत के लिये ही पर्याप्त है।
- कच्चे तेल की कीमतों में 15% की वृद्धि के कारण 'आयातित मुद्रास्फीति' और चालू खाता घाटा बढ़ रहा है। यह स्थिति भारत की 7% से अधिक अपेक्षित आर्थिक वृद्धि को प्रभावित कर सकती है।
- भारत की LPG संबंधी संवेदनशीलता: प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत स्वच्छ खाना पकाने की सुविधा के विस्तार के कारण भारत विश्व में LPG का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है।
- भारत की LPG की लगभग 60% मांग आयात के माध्यम से पूरी होती है, क्योंकि घरेलू उत्पादन सीमित है।
- LPG का प्रमुख आयात संयुक्त अरब अमीरात, कतर, सऊदी अरब और कुवैत से होता है। अधिकांश खेप होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रती है, जिसके कारण क्षेत्रीय संघर्ष या नाकाबंदी की स्थिति में आपूर्ति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है।
- भारत में, भूमिगत LPG भंडारण लगभग 1.4 लाख टन है। यह मात्रा, जिसकी दैनिक मांग लगभग 80,000 टन है, दो दिनों से भी कम की खपत के लिये पर्याप्त है। इस दैनिक मांग का 85% से अधिक हिस्सा घरेलू उपयोग के लिये होता है।
- आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 को लागू करने के बाद सरकार ने रिफाइनरियों को प्रोपेन और ब्यूटेन प्रवाह को परिवर्तित कर LPG उत्पादन को अधिकतम करने का निर्देश दिया, जिससे घरेलू उत्पादन में लगभग 25% की वृद्धि हुई, जिसमें घरेलू खपत के लिये आपूर्ति को प्राथमिकता दी गई तथा वाणिज्यिक उपयोगकर्त्ताओं के लिये गैस की आपूर्ति को प्रतिबंधित कर दिया गया।
- इसके परिणामस्वरूप, बड़े शहरों में होटल और रेस्तराँ जैसे व्यावसायिक उपयोगकर्त्ताओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इनमें LPG की कमी, इसकी उच्च कीमतें और नई बुकिंग के लिये 25 दिनों तक की लंबी प्रतीक्षा अवधि शामिल है।
- आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955: भारत की प्राकृतिक गैस की खपत लगभग 195 मिलियन मीट्रिक मानक घन मीटर (MMSCMD) प्रतिदिन है। इस खपत का लगभग आधा हिस्सा आयात किया जाता है, जिसके कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य में किसी भी व्यवधान से आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है, जैसा कि आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के संदर्भ में उल्लेख किया गया है।
- LNG शिपमेंट में व्यवधान के बाद प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को प्राथमिकता देने के लिये भारत ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 लागू किया है।
- नई आवंटन योजना के तहत घरेलू पाइप वाली प्राकृतिक गैस (PNG), संपीड़ित प्राकृतिक गैस (CNG) और LPG उत्पादन को 100% आपूर्ति प्राप्त होगी। वहीं, उर्वरक संयंत्रों को 70% और उद्योगों को 80% आपूर्ति प्राप्त होगी। इसके अतिरिक्त, रिफाइनरियों को उनकी पिछली खपत का लगभग 65% हिस्सा प्राप्त हो सकता है।
- उर्वरक का खतरा: भारत के पास जटिल उर्वरकों के लिये खनन योग्य भंडार की कमी है। यह मर्चेंट अमोनिया के लिये ओमान, सऊदी अरब और कतर, सल्फर (गंधक) के लिये ओमान, यूएई, कतर, कुवैत और सऊदी अरब तथा फॉस्फोरिक एसिड और रॉक फॉस्फेट (जो डायमोनियम फॉस्फेट - DAP के लिये महत्त्वपूर्ण हैं) के लिये जॉर्डन पर निर्भर है।
- इसके अतिरिक्त, घरेलू यूरिया संयंत्र कतर और यूएई से आयात LNG पर निर्भर हैं।
- देश के यूरिया संयंत्र अपनी उत्पादन प्रक्रिया के लिये कतर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से आयात की जाने वाली LNG पर निर्भर हैं।
- वर्तमान में भारत के पास पर्याप्त भंडार है (जैसे– फरवरी 2026 के अंत तक लगभग 5.5 मिलियन टन यूरिया), क्योंकि रबी मौसम समाप्त हो रहा है और खरीफ मौसम अभी कई महीनों दूर (जून से अक्तूबर) है।
- यदि यह नाकाबंदी इस बफर अवधि से अधिक समय तक जारी रहती है, तो सरकार को मजबूरन औद्योगिक और बिजली क्षेत्रों से प्राकृतिक गैस को हटाकर घरेलू उर्वरक उत्पादन और सिटी गैस वितरण को प्राथमिकता देनी पड़ेगी। यह कदम कृषि उत्पादन को बनाए रखने तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण होगा।
- खाद्य और कृषि निर्यात: वैश्विक व्यापार अनुसंधान पहल (GTRI) के अनुसार, पश्चिम एशिया को होने वाला लगभग 11.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य का भारतीय खाद्य और कृषि निर्यात जोखिम में है।
- सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ईरान भारतीय बासमती चावल के प्राथमिक खरीदार हैं। वर्तमान में, 3,000 से अधिक शिपिंग कंटेनर घरेलू बंदरगाहों (जैसे– कांडला और मुंद्रा) पर फँसे हुए हैं या पारगमन में अटके हुए हैं।
- भारत ने 2025 में पश्चिम एशिया को लगभग 11.8 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के कृषि और खाद्य उत्पादों का निर्यात किया, जो भारत के कुल कृषि निर्यात के पाँचवे भाग से अधिक (लगभग 21–22%) हिस्सा है।
- मुख्य निर्यात वस्तुओं में अनाज, फल, सब्ज़ियाँ, मसाले, डेयरी उत्पाद और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ शामिल हैं।
- निर्यात में बाधा आने से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के किसानों और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग पर प्रभाव पड़ सकता है।
- निर्यातकों को समुद्री ईंधन की बढ़ती कीमतों, उच्च मालभाड़ा लागत और बढ़ते डिमरेज शुल्क के कारण दबाव का सामना करना पड़ रहा है। इसलिये वे सरकार से आग्रह कर रहे हैं कि संकट के कारण होने वाली शिपमेंट में देरी पर दंड से बचने के लिये फोर्स मेज्योर घोषित किया जाए।
- मुख्य औद्योगिक क्षेत्र:
- निर्माण और सीमेंट: भारत अपने आयातित चूना पत्थर का 68.5% और आयातित जिप्सम का 62.1% हिस्सा बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों से प्राप्त करता है।
- यहाँ आपूर्ति में लगने वाले झटके सीधे तौर पर घरेलू सीमेंट की कीमतों में वृद्धि करेंगे और बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को ठप कर देंगे।
- यहाँ आपूर्ति में बाधा आने से घरेलू सीमेंट की कीमतों में वृद्धि हो सकती है और बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ रुक सकती हैं या धीमी पड़ सकती हैं।
- स्टील उत्पादन: भारत के स्टील उद्योग का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI) प्रक्रिया का उपयोग करता है, जो प्राकृतिक गैस पर आधारित होती है।
- कतर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से होने वाली LNG शिपमेंट में व्यवधान आने से घरेलू स्टील उत्पादन में कटौती होगी।
- विनिर्माण और रत्न उद्योग: भारत अपने कॉपर वायर (तांबे के तार) का 50% से अधिक हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है, जो बिजली पारेषण के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- इसके अतिरिक्त सूरत स्थित भारत का हीरा प्रसंस्करण हब कच्चे माल की कमी का सामना कर रहा है, क्योंकि इसके 40% से अधिक कच्चे हीरे संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और इज़रायल से आयात किये जाते हैं।
- निर्माण और सीमेंट: भारत अपने आयातित चूना पत्थर का 68.5% और आयातित जिप्सम का 62.1% हिस्सा बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों से प्राप्त करता है।
- रुपये का अवमूल्यन: भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर तक कमज़ोर हो गया है, जिसके कारण भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को मुद्रा को स्थिर करने के लिये अपने 730 बिलियन अमेरिकी डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार में से 15–20 बिलियन डॉलर का उपयोग करके हस्तक्षेप करना पड़ा है।
- पश्चिम एशिया में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा: खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों में लगभग 1 करोड़ भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो वार्षिक 51 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की प्रेषण राशि भारत भेजते हैं। उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत के लिये एक सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है।
- व्यापारिक जहाज़ों पर हुए हमलों से भारतीय नागरिक प्रभावित हुए। फँसे हुए पर्यटकों और पारगमन यात्रियों को मस्कट, रियाद तथा जेद्दा से उड़ानों के माध्यम से वापस लौटने में सहायता प्रदान की गई।
पश्चिम एशिया संघर्ष के प्रभाव को कम करने हेतु भारत कौन-से कदम उठा सकता है?
- त्वरित विविधीकरण: हालाँकि भारत ने रूस से आयात करके अपनी कच्चे तेल की टोकरी में विविधता लाई है, लेकिन इसे 'होर्मुज़ जलडमरूमध्य' पर अपनी अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिये लैटिन अमेरिका (ब्राज़ील, गुयाना), पश्चिम अफ्रीका और संयुक्त राज्य अमेरिका के आपूर्तिकर्त्ताओं के साथ दीर्घकालिक अनुबंधों का और विस्तार करना चाहिये।
- सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) का विस्तार: भारत अपने सामरिक पेट्रोलियम भंडार को तेल आयात के 90 दिनों के वैश्विक बेंचमार्क (मानक) तक बढ़ाने के लिये कदम उठा सकता है, क्योंकि वर्तमान में संयुक्त भंडार लगभग 70–75 दिनों की आवश्यकताओं को ही पूरा कर पाता है।
- बड़े भूमिगत भंडारण केंद्र भू-राजनीतिक व्यवधानों या आपूर्ति में होने वाली नाकेबंदी के दौरान एक सुरक्षा कवच प्रदान करेंगे।
- हरित परिवर्तन में तेज़ी लाना: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाना और घरेलू नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का विस्तार करना आयातित जीवाश्म ईंधन की बुनियादी मांग को संरचनात्मक रूप से कम करेगा।
- चूँकि भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के प्रमुख लक्ष्यों को पहले ही प्राप्त कर लिया है, इसलिये अब ध्यान नियामक, ग्रिड और भंडारण संबंधी बाधाओं को दूर करने तथा मौजूदा नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों के पूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करने पर केंद्रित होना चाहिये।
- घरेलू गैस उत्पादन का विस्तार: घरेलू प्राकृतिक गैस उत्पादन बढ़ाने के लिये ‘हाइड्रोकार्बन अन्वेषण और लाइसेंसिंग नीति’ (HELP) के तहत अन्वेषण गतिविधियों को तेज़ किया जाए, ताकि देश में गैस के नए भंडार खोजे जा सकें और आयात पर निर्भरता कम हो सके।
- वैकल्पिक उर्वरकों का विस्तार: खाड़ी से आयातित अमोनिया और LNG पर निर्भरता को कम करने के लिये सरकार को नैनो यूरिया और नैनो DAP के घरेलू उत्पादन और देशव्यापी स्तर पर अपनाने को सख्ती से बढ़ावा देना चाहिये।
- PM प्रणाम (धरती माँ की बहाली, जागरूकता पैदा करना, पोषण और सुधार के लिये पीएम कार्यक्रम) का उपयोग राज्यों को आयातित रासायनिक उर्वरकों की उनकी समग्र खपत को कम करने और जैव-उर्वरकों एवं जैविक खेती की ओर स्थानांतरित करने के लिये वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करने के लिये किया जाना चाहिये।
- फोर्स मेजेर के रूप में मान्यता: वाणिज्य मंत्रालय को संघर्ष और उसके बाद होने वाले पोर्ट कंजेशन को आधिकारिक तौर पर एक फोर्स मेजेर घटना के रूप में मान्यता देनी चाहिये।
- यह विधिक संरक्षण भारतीय निर्यातकों को विदेशी खरीदारों द्वारा लगाए गए गंभीर वित्तीय दंड और अनुबंध के रद्द होने से बचाएगा।
- एक ECGC 'वॉर-रिस्क' इंश्योरेंस पूल का निर्माण: लाल सागर और होर्मुज़़ जलडमरूमध्य के लिये समुद्री बीमा प्रीमियम में अत्यधिक वृद्धि MSME निर्यातकों को दिवालिया करने की स्थिति में पहुँचा रही है। निर्यात ऋण गारंटी निगम (ECGC) को तुरंत एक संप्रभु-समर्थित “वार-रिस्क इंश्योरेंस पूल” स्थापित करना चाहिये, ताकि इन प्रीमियमों को सब्सिडी दी जा सके और भारतीय निर्यात को प्रतिस्पर्द्धी बनाए रखा जा सके।
- ईस्टर्न मेरीटाइम कॉरिडोर (EMC) की ओर रुख करना: अस्थिर मध्य पूर्वी संकीर्ण मार्गों (चोकप्वाइंट्स) को पूरी तरह से दरकिनार करने के लिये भारत को चेन्नई-व्लादिवोस्तोक ईस्टर्न मेरीटाइम कॉरिडोर (EMC) को सख्ती के साथ चालू करना चाहिये।
- यह मार्ग अपेक्षाकृत स्थिर हिंद-प्रशांत और दक्षिण चीन सागर के जल क्षेत्रों के माध्यम से रूसी कच्चे तेल, कोयला और उर्वरकों को सुरक्षित रूप से प्राप्त कर सकता है।
निष्कर्ष
भारत को एक संवेदनशील आयातक से एक सुदृढ़ आर्थिक शक्ति में रूपांतरित होने के लिये ‘जस्ट-इन-टाइम’ सप्लाई चैन से आगे बढ़कर ‘जस्ट-इन-केस’ स्ट्रेटजिक बफर की ओर संक्रमण करना होगा, जिसमें समुद्री स्वायत्तता, विदेशों में स्वामित्व वाली परिसंपत्तियों तथा रुपये में मूल्यांकित व्यापार व्यवस्थाओं का उपयोग किया जाएगा।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. "पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव ऊर्जा और कृषि आपूर्ति शृंखलाओं में भारत की ढाँचागत कमज़ोरियों को उजागर करता है।" चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिये होर्मुज़ जलडमरूमध्य क्यों महत्त्वपूर्ण है?
खाड़ी देशों से भारत के कच्चे तेल और LNG आयात का लगभग 60-65% होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुज़रता है, जो इसे एक महत्त्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्ति संकीर्ण मार्ग (चोकप्वाइंट) बनाता है।
2. वर्तमान संकट में आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 का क्या महत्त्व है?
यह अधिनियम सरकार को प्राकृतिक गैस जैसी आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को विनियमित करने की अनुमति देता है ताकि कमी के दौरान प्राथमिकता आवंटन सुनिश्चित किया जा सके।
3. पश्चिम एशिया संघर्ष के दौरान भारत उर्वरक आपूर्ति में संवेदनशील क्यों है?
भारत उर्वरक उत्पादन में उपयोग होने वाले अमोनिया, सल्फर, LNG और फॉस्फोरिक एसिड के लिये खाड़ी देशों पर अधिक निर्भर करता है।
4. ईस्टर्न मेरीटाइम कॉरिडोर (EMC) क्या है?
चेन्नई-व्लादिवोस्तोक पूर्वी समुद्री गलियारा एक प्रस्तावित शिपिंग मार्ग है जिसका उद्देश्य रूस के साथ व्यापार को मज़बूत करना और मध्य पूर्व के संकीर्ण मार्गों (चोकप्वाइंट्स) पर निर्भरता कम करना है।
5. नैनो यूरिया और नैनो DAP भारत की उर्वरक आयात निर्भरता कैसे कम कर सकते हैं?
ये उन्नत उर्वरक पोषक तत्त्वों की दक्षता में सुधार करते हैं, रासायनिक उर्वरक की खपत कम करते हैं और आयातित अमोनिया एवं LNG पर निर्भरता को कम करते हैं।
https://www.youtube.com/watch?v=IDPoDXaZByQ
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. दक्षिण-पश्चिम एशिया का निम्नलिखित में से कौन-सा एक देश भूमध्यसागर तक नहीं फैला है? (2015)
(a) सीरिया
(b) जॉर्डन
(c) लेबनान
(d) इज़रायल
उत्तर: (b)
प्रश्न. कभी-कभी समाचारों में उल्लिखित पद ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ किसकी गतिविधियों के संदर्भ में आता है? (2018)
(a) चीन
(b) इज़रायल
(c) इराक
(d) यमन
उत्तर: (b)
प्रश्न. भारत द्वारा चाबहार बंदरगाह विकसित करने का क्या महत्त्व है? (2017)
(a) अफ्रीकी देशों से भारत के व्यापार में अपार वृद्धि होगी।
(b) तेल-उत्पादक अरब देशों से भारत के संबंध सुदृढ़ होंगे।
(c) अफगानिस्तान और मध्य एशिया में पहुँच के लिये भारत को पाकिस्तान पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।
(d) पाकिस्तान, इराक और भारत के बीच गैस पाइपलाइन का संस्थापन सुकर बनाएगा और उसकी सुरक्षा करेगा।
उत्तर: C
मेन्स
प्रश्न. “भारत के इज़रायल के साथ संबंधों ने हाल ही में एक ऐसी गहराई और विविधता हासिल की है, जिसकी पुनर्वापसी नहीं की जा सकती है।” विवेचना कीजिये। (2018)
