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डेली न्यूज़

  • 13 Aug, 2022
  • 62 min read
इन्फोग्राफिक्स

भारत में रामसर स्थल

Ramsar


सामाजिक न्याय

युवाओं हेतु वैश्विक रोज़गार रुझान: ILO

प्रिलिम्स के लिये:

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO), नीली अर्थव्यवस्था, जेंडर गैप, वेस्ट मैनेजमेंट, वेज गैप, लर्निंग रिग्रेशन।

मेन्स के लिये:

भारत से संबंधित युवाओं के लिये वैश्विक रोजगार रुझानों के निष्कर्ष।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने "युवाओं हेतु वैश्विक रोज़गार रुझान 2022: युवाओं के भविष्य परिवर्तन में निवेश" शीर्षक से रिपोर्ट जारी की है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन

वैश्विक स्तर पर

  • EPR में लैंगिक असमानता:
    • युवा महिलाओं ने रोज़गार-से-जनसंख्या अनुपात (EPR) में बहुत कम प्रदर्शन किया, जो यह दर्शाता है कि युवा पुरुषों की तुलना में युवा महिलाओं के रोज़गार की संभावना लगभग 1.5 गुना अधिक है।
      • वर्ष 2022 में 40.3% युवा पुरुषों की तुलना में वैश्विक स्तर पर युवा महिलाओं हेतु 27.4% रोज़गार के अवसर होने का अनुमान है।
  • महामारी से प्रभावित युवा रोज़गार:
    • कोविड–19 महामारी ने 15 से 24 वर्ष की आयु के लोगों के सामने कई श्रम बाज़ार चुनौतियों को और बद्तर कर दिया है, जिन्होंने वर्ष 2020 की शुरुआत से वयस्कों की तुलना में रोज़गार में बहुत अधिक प्रतिशत नुकसान का अनुभव किया है।
      • बेरोज़गार युवाओं की कुल वैश्विक संख्या वर्ष 2022 में 73 मिलियन तक पहुँचने का अनुमान है, वर्ष 2021 से कुछ सुधार हुआ है लेकिन यह अभी भी वर्ष 2019 के पूर्व-महामारी स्तर से छह मिलियन अधिक है।
  • क्षेत्रीय अंतर:
    • युवा बेरोज़गारी में सुधार एक ओर निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों और दूसरी ओर उच्च आय वाले देशों के बीच विचलन का अनुमान है।
    • उच्च आय वाले देश वर्ष 2022 के अंत तक वर्ष 2019 के सामान युवा बेरोजगारी दर हासिल करने की अपेक्षा कर रहे हैं।
    • इस बीच दूसरे देश के आय समूहों में दरें उनके पूर्व-संकट मूल्यों से 1% से अधिक रहने का अनुमान है।
  • हरित और नीली अर्थव्यवस्थाओं के लाभ:
    • हरित और नीली अर्थव्यवस्थाओं के विस्तार (जो क्रमशः पर्यावरण और स्थायी महासागर संसाधनों के आसपास केंद्रित थे) से लाभान्वित होने के लिये युवा लोगों को उचित अवसर प्रदान किया गया था।
  • ब्रॉडबैंड कवरेज और रोज़गार:
    • वर्ष 2030 तक सार्वभौमिक ब्रॉडबैंड कवरेज प्राप्त करने से वैश्विक स्तर पर 24 मिलियन से अधिक रोज़गार सृजन की संभावना है।
      • देखभाल क्षेत्रों में निवेश से 2030 तक युवाओं के लिये 17.9 मिलियन अधिक रोज़गार सृजित होंगे।

भारत से संबंधित निष्कर्ष:

  • युवा रोज़गार में गिरावट:
    • वर्ष 2020 में इसके मूल्य के सापेक्ष वर्ष 2021 के पहले नौ महीनों में युवा रोज़गार भागीदारी दर में 0.9% की गिरावट आई, जबकि इसी अवधि में वयस्कों के लिये इसमें 2% की वृद्धि हुई।
      • 15-20 वर्ष की आयु-वर्ग के लिये यह स्थिति विशेष रूप से गंभीर है।
  • महिलाओं की रोज़गार क्षेत्र में निम्न-भागीदारी:
    • युवा भारतीय महिलाओं ने वर्ष 2021 और वर्ष 2022 में युवा भारतीय पुरुषों की तुलना में सापेक्ष रोज़गार में कमी का अनुभव किया है।
    • सामान्य तौर पर भारत में उच्च युवा रोज़गार में गिरावट वैश्विक स्तर पर औसत रोज़गार में आने वाली कमी को दर्शाती हैं।
      • वैश्विक श्रम बाज़ार में युवा भारतीय पुरुषों की भागीदारी 16% जबकि युवा भारतीय महिलाओं की भागीदारी मात्र 5% है।
  • ऑनलाइन शिक्षा में अंतराल:
    • सभी विद्यालय लगभग 18 महीने तक बंद रहे और 24 % बच्चों में ग्रामीण क्षेत्र में केवल 8% और शहरी क्षेत्रों में 23% बच्चों की ऑनलाइन शिक्षा तक पर्याप्त पहुँच थी।
    • विकासशील देशों में ऑनलाइन संसाधनों तक अत्यधिक असमान पहुँच को देखते हुए, सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित परिवारों के बच्चों की शिक्षा तक पहुँच लगभग नहीं के बराबर थी।
  • सीखने की प्रक्रिया का प्रतिगमन:
    • विद्यालयों के बंद होने से न केवल नई शिक्षा नीति बाधित हुई, बल्कि "सीखने की प्रक्रिया का प्रतिगमन" की घटना भी हुई, यानी बच्चे ये भूल गए कि उन्होंने पहले क्या सीखा था।
    • भारत में, औसतन 92% बच्चों ने कम-से-कम एक भाषा में मूलभूत क्षमता खो दी और 82% ने गणित में मूलभूत क्षमता खो दी।
  • शिक्षकों को कम वेतन का भुगतान:
    • अध्ययन में पाया गया कि गैर-सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों को अक्सर सरकारी विद्यालयों की तुलना में काफी कम वेतन का भुगतान किया जाता है।
    • भारत, केन्या, नाइजीरिया और पाकिस्तान में कम-शुल्क वाले निजी विद्यालयों के शिक्षकों को राज्य क्षेत्र में उनके समकक्षों को मिलने वाले वेतन के आठवें भाग या 50 प्रतिशत के बीच भुगतान किया जाता है।
  • घरेलू-कार्य का अत्यधिक अनौपचारिक होना:
    • भारत में घरेलू-कार्य को अत्यधिक अनौपचारिक कार्य के रूप में देखा जाता है, जिसका पारिश्रमिक अत्यंत कम है और साथ ही महिलाओं और लड़कियों को दुर्व्यवहार का सामना भी करना पड़ता हैं।
    • युवा घरेलू कामगारों के साथ दुर्व्यवहार की रिपोर्ट आम हैं, जिनमें मौखिक, शारीरिक और यौन शोषण शामिल हैं।

अनुसंशाएँ:

  • विभिन्न क्षेत्रों में निवेश के साथ-साथ सभी युवा कामगारों के लिये कार्य करने की अच्छी परिस्थितियों को बढ़ावा देना चाहिये।
  • युवा श्रमिकों हेतु यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि वे मौलिक अधिकारों और सुरक्षा का आनंद ले सकें, जिसमें संघ की स्वतंत्रता, सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार, समान कार्य के लिये समान वेतन तथा कार्यस्थल पर हिंसा और उत्पीड़न से मुक्ति शामिल हो।
  • युवा लोगों को अच्छी तरह से काम करने वाले श्रम बाज़ार के साथ श्रम बाज़ार में पहले से ही भाग लेने वालों के लिये अच्छे रोज़गार के अवसर प्रदान किये जाने चाहिये, साथ ही उन लोगों के लिये गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रशिक्षण के अवसर जो अभी तक इसमें प्रवेश नहीं कर पाए हैं।

विगत वर्ष के प्रश्न:

प्रश्न. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन कन्वेंशन 138 और 182 किससे संबंधित हैं?

(a) बाल श्रम, (2018)
(b) वैश्विक जलवायु परिवर्तन के लिये कृषि प्रथाओं का अनुकूलन
(c) खाद्य कीमतों और खाद्य सुरक्षा का विनियमन
(d) कार्यस्थल पर लिंग समानता

उत्तर: a

व्याख्या:

  • वर्ष 2017 में केंद्रीय मंत्रिमंडल, भारत सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के न्यूनतम आयु सम्मेलन, 1973 (नंबर 138) और बाल श्रम कन्वेंशन के सबसे खराब रूप, 1999 (संख्या 182) के अनुसमर्थन को मंज़ूरी दी।
  • कन्वेंशन 138: भारत कन्वेंशन 138 की पुष्टि करने वाला 170वाँ ILO सदस्य राज्य है, जिसके लिये राज्य पार्टियों को न्यूनतम आयु निर्धारित करने की आवश्यकता होती है, इसके तहत किसी को भी रोज़गार या किसी भी व्यवसाय में काम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, सिवाय हल्के काम और कलात्मक प्रदर्शन के।
  • कन्वेंशन 182: कन्वेंशन 182 की पुष्टि करने के लिये भारत ILO का 181वाँ सदस्य राज्य भी बन गया है। यह गुलामी, जबरन श्रम और तस्करी सहित बाल श्रम के सबसे खराब रूपों के निषेध तथा उन्मूलन का आह्वान करता है; सशस्त्र संघर्ष में बच्चों का उपयोग; वेश्यावृत्ति, अश्लील साहित्य एवं अवैध गतिविधियों (जैसे मादक पदार्थों की तस्करी) के लिये किसी बच्चे का उपयोग और खतरनाक काम आदि।
  • ये सभी बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 के अनुरूप हैं, जो किसी भी व्यवसाय या प्रक्रिया में 14 साल से कम उम्र के बच्चों के रोज़गार या काम करने को पूरी तरह से प्रतिबंधित करता है तथा खतरनाक व्यवसायों व प्रक्रियाओं में किशोरों (14 से 18 वर्ष) के रोज़गार को भी प्रतिबंधित करता है।
  • इसके अतिरिक्त बाल श्रम (निषेध और विनियमन) केंद्रीय नियम, जैसा कि हाल ही में संशोधित किया गया है, पहली बार बाल एवं किशोर श्रमिकों की रोकथाम, निषेध, बचाव तथा पुनर्वास के लिये एक व्यापक और विशिष्ट रूपरेखा प्रदान करता है।
  • दो प्रमुख ILO सम्मेलनों के अनुसमर्थन के साथ भारत ने आठ प्रमुख ILO सम्मेलनों में से छह की पुष्टि की है। चार अन्य सम्मेलन- जबरन श्रम के उन्मूलन, समान पारिश्रमिक और रोज़गार तथा व्यवसाय में पुरुषों एवं महिलाओं के बीच कोई भेदभाव नहीं करने से संबंधित हैं। अतः विकल्प (a) सही उत्तर है।

स्रोत: द हिंदू


शासन व्यवस्था

राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा जागरूकता मिशन (NIPAM)

प्रिलिम्स के लिये:

एनआइपीएम, आईपीआर, अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ, राष्ट्रीय पहलें

मेन्स के लिये:

एनआइपीएम, आईपीआर की आवश्यकता, संधियाँ, आईपीआर का विनियमन, राष्ट्रीय पहलें

चर्चा में क्यों?

वर्ष 2021 में शुरू किये गए राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा जागरूकता मिशन (NIPAM) ने 10 लाख छात्रों को बौद्धिक संपदा (IP) जागरूकता और बुनियादी प्रशिक्षण देने का लक्ष्य हासिल कर लिया है।

  • यह लक्ष्य 15 अगस्त, 2022 की समय-सीमा से पहले हासिल कर लिया गया है।

राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा जागरूकता मिशन (NIPAM):

  • परिचय:
    • इस मिशन का उद्देश्य 10 लाख छात्रों को बौद्धिक संपदा और उसके अधिकारों के बारे में जागरूकता प्रदान करना है।
    • इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा (कक्षा 8 से 12) के छात्रों में रचनात्मकता और नवाचार की भावना का विकास करना तथा कॉलेज/विश्वविद्यालयों के छात्रों को उनके नवाचार की रक्षा करने के लिये प्रेरित करना है।
  • क्रियान्वयन एजेंसी:
    • यह कार्यक्रम बौद्धिक संपदा कार्यालय, पेटेंट, डिज़ाइन और व्यापार चिह्न महानियंत्रक कार्यालय (CGPDTM), वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है।
  • प्राप्त लक्ष्य:
    • 08 दिसंबर 2021 से 31 जुलाई 2022 की अवधि के दौरान, निम्नलिखित लक्ष्य हासिल किये गए:
      • बौद्धिक संपदा पर प्रशिक्षित प्रतिभागियों (छात्रों/संकाय) की संख्या: 10,05,272
      • कवर किये गए शैक्षणिक संस्थान: 3,662
      • भौगोलिक कवरेज: 28 राज्य और 7 केंद्रशासित प्रदेश

बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR):

  • परिचय:
    • IPR व्यक्तियों को उनके बौद्धिक रचना पर दिये गए अधिकार हैं:
      • इसमें आविष्कार, साहित्यिक, कलात्मक कार्य और वाणिज्य में उपयोग किये जाने वाले प्रतीक, नाम तथा चित्र शामिल होते हैं।
      • ये आमतौर पर निर्माता को एक निश्चित अवधि के लिये उसकी रचना के उपयोग पर एक विशेष अधिकार प्रदान करते हैं।
    • इन अधिकारों को मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद-27 में उल्लिखित किया गया है, जो वैज्ञानिक साहित्यिक या कलात्मक प्रस्तुतियों के लेखक होने के परिणामस्वरूप नैतिक और भौतिक हितों की सुरक्षा से लाभ का अधिकार प्रदान करता है।
    • बौद्धिक संपदा के महत्त्व को पहली बार औद्योगिक संपदा के संरक्षण के लिये पेरिस कन्वेंशन (1883) और साहित्यिक तथा कलात्मक कार्यों के संरक्षण के लिये बर्न कन्वेंशन (1886) में मान्यता दी गई थी।
  • बौद्धिक संपदा अधिकारों के प्रकार:
    • कॉपीराइट:
      • साहित्यिक और कलात्मक कार्यों (जैसे किताबें और अन्य लेखन, संगीत रचनाएँ, पेंटिंग, मूर्तिकला, कंप्यूटर प्रोग्राम और फिल्में) के लेखकों के अधिकारों को लेखक की मृत्यु के बाद कम-से-कम 50 साल की अवधि के लिये कॉपीराइट द्वारा संरक्षित किया जाता है।
    • औद्योगिक संपदा:
      • विशिष्ट चिह्नों का संरक्षण, विशेष रूप से ट्रेडमार्क और भौगोलिक संकेतों में:
        • ट्रेडमार्क
        • भौगोलिक संकेत (GI)
      • औद्योगिक डिज़ाइन और व्यापार रहस्य:
        • अन्य प्रकार की औद्योगिक संपत्ति को मुख्य रूप से नवाचार, डिज़ाइन और प्रौद्योगिकी के निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिये संरक्षित किया जाता है।
  • IPR की आवश्यकता:
    • नवाचार को प्रोत्साहित करना:
      • नई रचनाओं का कानूनी संरक्षण आगे के नवाचार के लिये अतिरिक्त संसाधनों की प्रतिबद्धता को प्रोत्साहित करता है।
    • आर्थिक वृद्धि:
      • बौद्धिक संपदा का प्रचार और संरक्षण आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देता है, नए रोज़गार तथा उद्योग उत्पन्न करता है एवं जीवन की गुणवत्ता और खुशहाली को बढ़ाता है।
    • रचनाकारों के अधिकारों की सुरक्षा:
      • IPR को निर्माताओं और उनके बौद्धिक कमोडिटी, वस्तुओं और सेवाओं के अन्य उत्पादकों को विनिर्मित वस्तुओं के उपयोग को नियंत्रित करने के लिये कुछ समय-सीमित अधिकार प्रदान करके सुरक्षित रखने की आवश्यकता है।
    • ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस:
      • यह नवाचार और रचनात्मकता को बढ़ावा देता है और व्यापार करने में आसानी सुनिश्चित करता है।
    • प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण:
      • यह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, संयुक्त उद्यम और लाइसेंसिंग के रूप में प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण की सुविधा प्रदान करता है।

IPR से संबंधित संधियाँ और कन्वेंशन:

  • वैश्विक:
    • भारत विश्व व्यापार संगठन का सदस्य है और बौद्धिक संपदा के व्यापार संबंधी पहलुओं (ट्रिप्स समझौते) पर समझौते के लिये प्रतिबद्ध है।
    • भारत विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (World Intellectual Property Organisation–WIPO) का भी सदस्य है, जो पूरे विश्व में बौद्धिक संपदा अधिकारों के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिये जिम्मेदार निकाय है।
    • भारत IPR से संबंधित निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण WIPO-प्रशासित अंतर्राष्ट्रीय संधियों और कन्वेंशन का भी सदस्य है:
      • पेटेंट प्रक्रिया के प्रयोजनों के लिये सूक्ष्मजीवों के डिपोजिट की अंतर्राष्ट्रीय मान्यता पर बुडापेस्ट संधि।
      • औद्योगिक संपत्ति के संरक्षण के लिये पेरिस कन्वेंशन।
      • विश्व बौद्धिक संपदा संगठन की स्थापना करने वाला कन्वेंशन।
      • साहित्यिक और कलात्मक कार्यों के संरक्षण के लिये बर्न कन्वेंशन।
      • पेटेंट सहयोग संधि।
  • राष्ट्रीय:
    • भारतीय पेटेंट अधिनियम 1970:
      • भारत में पेटेंट प्रणाली के लिए यह प्रमुख कानून वर्ष 1972 में लागू हुआ। इसने भारतीय पेटेंट और डिज़ाइन अधिनियम 1911 का स्थान लिया।
      • अधिनियम को पेटेंट (संशोधन) अधिनियम, 2005 द्वारा संशोधित किया गया था, जिसमें उत्पाद पेटेंट को भोजन, दवाओं, रसायनों और सूक्ष्मजीवों सहित प्रौद्योगिकी के सभी क्षेत्रों तक विस्तारित किया गया था।
    • राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) नीति 2016:
      • राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) नीति 2016 को मई 2016 में देश में IPR के भविष्य के विकास के मार्गदर्शन के लिये एक विज़न दस्तावेज़ के रूप में अपनाया गया था।
      • इसका स्पष्ट आह्वान है "रचनात्मक भारत; अभिनव भारत"
      • यह कार्यान्वयन, निगरानी और समीक्षा के लिये एक संस्थागत तंत्र की स्थापना करता है।
      • इसका उद्देश्य भारतीय परिदृश्य में वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को शामिल करना और उन्हें अनुकूलित करना है।

यूविगत वर्ष के प्रश्न (PYQs):

प्रारंभिक परीक्षा

प्रश्न. 'राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार नीति' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)

  1. यह दोहा विकास एजेंडा और ट्रिप्स समझौते के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराता है।
  2. औद्योगिक नीति और संवर्द्धन विभाग भारत में बौद्धिक संपदा अधिकारों को विनियमित करने के लिये नोडल एजेंसी है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)

व्याख्या:

  • राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) नीति यह मानती है कि भारत के पास IPR की सुरक्षा के लिये स्थापित ट्रिप्स अनुपालन विधायी, प्रशासनिक और न्यायिक ढाँचा है, जो अपनी विकास संबंधी चिंताओं को दूर करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय शासन के लचीलेपन का उपयोग करते हुए अपने अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करता है। यह दोहा विकास एजेंडा और ट्रिप्स समझौते के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराता है। अत: कथन 1 सही है।
  • DPIIT (अब DPIIT यानी उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग) को भारत में IPR के कार्यान्वयन और भविष्य के विकास के समन्वय, मार्गदर्शन और निगरानी हेतु नोडल विभाग के रूप में मान्यता प्राप्त है। DIPP वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आता है। अत: कथन 2 सही है।

अतः विकल्प (c) सही उत्तर है।


प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2019)

  1. भारतीय पेटेंट अधिनियम के अनुसार, किसी बीज को बनाने की जैव प्रक्रिया को भारत में पेटेंट कराया जा सकता है।
  2. भारत में कोई बौद्धिक संपदा अपील बोर्ड नहीं है।
  3. पादप किस्में भारत में पेटेंट कराए जाने की पात्र नहीं हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

व्याख्या:

  • भारतीय पेटेंट अधिनियम की धारा 3 (J) "बीज, किस्मों, प्रजातियों, पौधों और पशुओं के उत्पादन या प्रसार के लिये अनिवार्य रूप से जैविक प्रक्रियाओं सहित सूक्ष्मजीवों के अलावा पौधों एवं पशुओं को पूरी तरह से या उसके किसी भी हिस्से में पेटेंट योग्यता से बाहर रखती है"। अतः कथन 1 सही नहीं है।
  • बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड (IPAB) का गठन वर्ष 2003 में भारत सरकार द्वारा भारतीय ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 और माल के भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 के तहत रजिस्ट्रार के निर्णयों के खिलाफ अपीलों को सुनने और हल करने के लिये किया गया था। अतः कथन 2 सही नहीं है।
  • पौध किस्म संरक्षण, पादप प्रजनकों के अधिकारों (PBR) के रूप में एक प्रजनक को पौधे की किस्म का कानूनी संरक्षण प्रदान करता है। भारत में पौधों की किस्मों और किसानों के अधिकारों का संरक्षण (PPVFR) अधिनियम, 2001, एक सुई पीढ़ी प्रणाली है जिसका उद्देश्य पौधों की किस्मों और पौधों के प्रजनकों और किसानों के अधिकारों के संरक्षण के लिए एक प्रभावी प्रणाली की स्थापना करना है। एक सुई जेनेरिस प्रणाली पेटेंट प्रणाली का एक विकल्प है। अत: कथन 3 सही है।

अतः विकल्प (c) सही उत्तर है।


मैन्स:

प्रश्न. वैश्वीकृत दुनिया में बौद्धिक संपदा अधिकार महत्त्व रखते हैं और मुकदमेबाजी का एक स्रोत हैं। कॉपीराइट, पेटेंट और ट्रेड सीक्रेट्स के बीच व्यापक रूप से अंतर कीजिये। (मुख्य परीक्षा 2014)

स्रोत: पी.आई.बी.


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

भारत-यूके संबंध

प्रिलिम्स के लिये:

भारत-यूके संबंध, भारत-यूके व्यापक रणनीतिक साझेदारी 2021, भारत-यूके संबंधों के लिये रोडमैप 2030, भारत की इंडो-पैसिफिक ओशन इनिशिएटिव, भारत-यूके एफटीए

मेन्स के लिये:

यूके, भारत-यूके एफटीए के साथ भारत के द्विपक्षीय संबंध और इसका महत्त्व

चर्चा में क्यों?

ग्रांटथॉर्टन की ब्रिटेन मीट्स इंडिया (बीएमआई) रिपोर्ट के अनुसार भारत और यूके के बीच व्यापार वर्ष 2030 तक दोगुना होने की उम्मीद है, यह लक्ष्य वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के प्रौद्योगिकी विविधीकरण में प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते में निवेश और भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के साथ व्यापार साझेदारी में आसानी से प्राप्त किया जा सकेगा।

  • व्यावसायिक सेवाएँ भारत में यूके की कंपनियों द्वारा शीर्ष क्षेत्र है, जिसमें महाराष्ट्र प्रमुख निवेश गंतव्य है, जिसके बाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और कर्नाटक का स्थान आता है।

united-kingdom

प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता:

  • परिचय:
    • प्रस्तावित एफटीए से चमड़ा, वस्त्र, आभूषण, प्रसंस्कृत कृषि उत्पाद और समुद्री उत्पाद, शिक्षा, फार्मा तथा स्वास्थ्य देखभाल जैसे श्रम प्रधान क्षेत्रों में भारतीय निर्यात को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
    • यूके सेब, यूके-निर्मित चिकित्सा उपकरणों और मशीनरी जैसे उत्पादों पर शुल्क कम करने पर विचार कर सकता है।
      • यूके की कंपनियाँ भी भारत से डेटा गोपनीयता को मज़बूत करने और अनुबंधों को लागू करने की अपेक्षा करती हैं।
  • यूके-भारत व्यापार:
    • वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान लगभग 31.92 बिलियन अमेरिकी डाॅलर के संचयी निवेश के साथ यूके भारत में छठाँ सबसे बड़ा निवेशक बना रहा।
    • वित्त वर्ष 2022 में UK के साथ वस्तुओं और सेवाओं में भारत का व्यापार 31.34 बिलियन अमरीकी डॉलर हुआ, जो 2015 में 19.51 बिलियन अमरीकी डॉलर था।
    • भारत में 618 UK की कंपनियों की पहचान की गई है, वे एक साथ लगभग 4.66 लाख लोगों को रोजगार देती हैं और उनका कुल कारोबार 3,634.9 बिलियन रुपये है।

भारत-यूके संबंधों में नये घटनाक्रम:

  • यूक्रेन संकट से उत्पन्न चुनौती के बावजूद, भारत-यूके संबंध एक ऊर्ध्वगामी प्रक्षेपवक्र पर रहा है, जिसका उदाहरण वर्ष 2021 में एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी के समापन द्वारा दिया गया है।
    • इस समझौते ने भारत-यूके संबंधों के लिये वर्ष 2030 रोडमैप भी स्थापित किया, जो मुख्य रूप से द्विपक्षीय संबंधों के लिये साझेदारी योजनाओं की रूपरेखा तैयार करता है।
  • दोनों देशों ने रक्षा संबंधी व्यापार और साइबर सुरक्षा और रक्षा सहयोग को गहरा करने पर विमर्श किया गया।
    • भारत और यूके में ऑनलाइन अवसंरचना की सुरक्षा के लिये एक नये संयुक्त साइबर सुरक्षा कार्यक्रम की घोषणा की जानी है।
    • भारत और यूके की पहली स्ट्रैटेजिक टेक डायलॉग आयोजित करने की भी योजना है, जो उभरती प्रौद्योगिकियों पर एक मंत्रिस्तरीय शिखर सम्मेलन है।
  • इसके अतिरिक्त, यूके और भारत समुद्री क्षेत्र में अपने सहयोग को मजबूत करने के लिये सहमत हुये हैं क्योंकि यूके भारत की इंडो-पैसिफिक ओशन इनिशिएटिव में शामिल होगा और दक्षिण पूर्व एशिया में समुद्री सुरक्षा मुद्दों पर एक प्रमुख भागीदार बन जाएगा।
  • जनवरी 2022 में, भारत और यूके ने भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौते के लिये पहले दौर की बातचीत का समापन किया।
    • वार्ता ने दुनिया की पाँचवीं (UK) और छठी (भारत) सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक व्यापक सौदे को संपन्न की साझा महत्त्वाकांक्षाओं को दर्शाया।

मुक्त व्यापार समझौता (FTA)

  • परिचय:
    • यह दो या दो से अधिक देशों के बीच आयात और निर्यात में बाधाओं को कम करने हेतु किया गया एक समझौता है।
    • एक मुक्त व्यापार नीति के तहत वस्तुओं और सेवाओं को अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के पार खरीदा एवं बेचा जा सकता है, जिसके लिये बहुत कम या न्यून सरकारी शुल्क, कोटा तथा सब्सिडी जैसे प्रावधान किये जाते हैं।
    • मुक्त व्यापार की अवधारणा व्यापार संरक्षणवाद या आर्थिक अलगाववाद (Economic Isolationism) के विपरीत है।
  • भारत और FTA:
    • भारत-ऑस्ट्रेलिया ECTA:
      • भारत को ऑस्ट्रेलिया द्वारा उसकी 100% टैरिफ लाइनों पर प्रदान की जाने वाली तरजीही बाज़ार पहुँच से लाभ होगा।
      • भारत अपनी 70% से अधिक टैरिफ लाइनों पर ऑस्ट्रेलिया को तरजीही पहुँच प्रदान करेगा।
    • दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा):
      • यह मुक्त व्यापार समझौता, सूचना प्रौद्योगिकी जैसी सभी सेवाओं को छोड़कर, वस्तुओं तक ही सीमित है।
      • वर्ष 2016 तक सभी व्यापारिक वस्तुओं के सीमा शुल्क को शून्य करने के लिये समझौते पर हस्ताक्षर किये गए थे।

भारत द्वारा हस्ताक्षरित अन्य व्यापार समझौते

  • भारत-UAE व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता:
    • व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (CEPA) दोनों देशों के बीच व्यापार को प्रोत्साहित करने हेतु एक संस्थागत तंत्र प्रदान करता है।
  • भारत और मॉरीशस के बीच व्यापक आर्थिक सहयोग और भागीदारी समझौता (CECPA)
    • यह एक तरह का मुक्त व्यापार समझौता है जिसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार को प्रोत्साहित करने और बेहतर बनाने के लिये एक संस्थागत तंत्र प्रदान करना है।
    • इस समझौते के तहत देश उत्पादों पर शुल्क कम या खत्म करते हैं। सेवा व्यापार को बढ़ावा देने के लिये देश मानदंडों में भी ढील देते हैं।
  • दक्षिण एशिया अधिमान्य व्यापार समझौता (SAPTA):
    • यह वर्ष 1995 में लागू हुए सदस्य देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने के लिये है।
  • एशिया प्रशांत व्यापार समझौता (APTA):
    • पहले बैंकाक समझौता, यह अधिमान्य टैरिफ व्यवस्था है जिसका उद्देश्य सदस्य देशों द्वारा पारस्परिक रूप से सहमत रियायतों के आदान-प्रदान के माध्यम से अंतर-क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देना है।

विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

प्रश्न. निम्नलिखित देशों पर विचार कीजिये: (2018)

  1. ऑस्ट्रेलिया
  2. कनाडा
  3. चीन
  4. भारत
  5. जापान
  6. अमेरिका

उपर्युक्त में से कौन आसियान के 'मुक्त व्यापार भागीदारों' में शामिल हैं?

(a) केवल 1, 2, 4 और 5
(b) केवल 3, 4, 5 और 6
(c) केवल 1, 3, 4 और 5
(d) केवल 2, 3, 4 और 6

उत्तर: (c)

व्याख्या:

  • दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों के संघ (ASEAN /आसियान) के छह भागीदारों के साथ मुक्त व्यापार समझौते हैं, जिसमें है- पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना, कोरिया गणराज्य, जापान, भारत के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड। अतः 1, 3, 4 और 5 सही हैं।
  • आसियान की स्थापना 8 अगस्त, 1967 को बैंकॉक, थाईलैंड में आसियान के संस्थापक सदस्यों, अर्थात् इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर और थाईलैंड द्वारा आसियान घोषणा (बैंकॉक घोषणा) पर हस्ताक्षर के साथ की गई थी। ब्रुनेई दारुस्सलाम 7 जनवरी, वर्ष 1984 को वियतनाम 28 जुलाई, 1995 को, लाओस पीडीआर और म्याँमार 23 जुलाई, 1997 को और कंबोडिया 30 अप्रैल, 1999 को शामिल हुए, जिससे आसियान में 10 सदस्य देश बन गए हैं।

अतः विकल्प (c) सही है।


प्रश्न. 'क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी' शब्द अक्सर किन देशों के समूह के मामलों के संदर्भ में समाचारों में आता है? (2016)

(a) जी20
(b) आसियान
(c) शंघाई सहयोग संगठन
(d) सार्क

उत्तर: (b)

व्याख्या:

  • क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP), आसियान के दस सदस्य देशों तथा पाँच अन्य देशों (ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और न्यूज़ीलैंड) द्वारा अपनाया गया एक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) है।
  • अतः विकल्प (b) सही है।

स्रोत: बिज़नेस स्टैण्डर्ड


भारतीय अर्थव्यवस्था

डिजिटल लेंडिंग को विनियमित करने के लिये दिशा-निर्देश

प्रिलिम्स के लिये:

भारतीय रिज़र्व बैंक, डिजिटल ऋण, आरबीआई की एकीकृत लोकपाल योजना

मेन्स के लिये:

डिजिटल ऋण से संबंधित चिंताएंँ और इस दिशा में सरकार द्वारा उठाए गए कदम

चर्चा में क्यों?

हाल ही में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कुछ संस्थाओं द्वारा की जा रही अवैध गतिविधियों को विनियमित करने के लिये डिजिटल ऋण देने के दिशानिर्देशों का पहला सेट जारी किया।

  • इस प्रकार की चिंताओं को दूर करने के लिये,आरबीआई ने जनवरी, 2021 में 'ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और मोबाइल ऐप के माध्यम से उधार देने सहित डिजिटल उधार' (WGDL) पर एक कार्य समूह का गठन किया था।
  • समूह ने नवंबर 2021 में डिजिटल ऋणदाताओं के लिये कड़े मानदंड प्रस्तावित किये, जिनमें से कुछ को स्वीकार कर लिया गया और नये मानदंडों में शामिल कर लिया गया है जबकि अन्य जांँच के अधीन हैं।

डिजिटल ऋण:

  • परिचय:
    • इसमें प्रमाणीकरण और क्रेडिट मूल्यांकन के लिये तकनीक का लाभ उठाकर वेब प्लेटफॉर्म या मोबाइल ऐप के माध्यम से उधार देना शामिल है।
    • बैंकों ने पारंपरिक उधार में मौजूदा क्षमताओं का लाभ उठाने के बाद डिजिटल ऋण बाज़ार में प्रवेश करने के लिये अपने स्वतंत्र डिजिटल ऋण देने वाले प्लेटफॉर्म लॉन्च किये हैं।
  • महत्त्व:
    • वित्तीय समावेशन: यह भारत में लघु उद्योग और कम आय वाले उपभोक्ताओं की व्यापक ऋण आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता करता है।
    • अनौपचारिक क्षेत्र के ऋण में कमी: उधार लेने की प्रकिया को सरल और सुगम बनाकर यह अनौपचारिक क्षेत्र से लिये जाने वाले ऋण को कम करने में मदद करता है।
    • कम समय: यह बैंकों में जाकर पारंपरिक माध्यम से ऋण लेने में लगने वाले समय को कम करता है। इसके कारण 30-35 प्रतिशत अतिरिक्त लागत को बचाया जा सकता है।

दिशा-निर्देशों की मुख्य विशेषताएँ

  • ऋण वितरण और चुकौती के लिये:
    • सभी ऋण संवितरण और पुनर्भुगतान केवल उधारकर्त्ता के बैंक खातों और विनियमित संस्थाओं (RE) के बीच उधार सेवा प्रदाताओं (LSP) या किसी तीसरी पार्टी के पास-थ्रू/पूल खाते के बिना निष्पादित किये जाने की आवश्यकता है।
      • विनियमित संस्थाओं में एक बैंक या एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी शामिल है।
  • भुगतान के संबंध में:
    • नए नियमों में कहा गया है कि क्रेडिट मध्यस्थता प्रक्रिया में LSP को देय शुल्क या शुल्क का भुगतान सीधे बैंक या गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) द्वारा किया जाएगा, न कि उधारकर्त्ता द्वारा।
  • ऋण प्रकटीकरण के संबंध में:
    • उधारकर्त्ताओं को वार्षिक प्रतिशत दर (APR) के रूप में डिजिटल ऋणों की समावेशी लागत का खुलासा करना आवश्यक है।
  • क्रेडिट /ऋण सीमा में वृद्धि के संबंध में:
    • नया मानदंड उधारकर्त्ता की स्पष्ट सहमति के बिना क्रेडिट सीमा में किसी भी स्वचालित वृद्धि को प्रतिबंधित करता है।
  • डिजिटल ऋण से बाहर निकलने के संबंध में:
    • यह ऋण अनुबंध के हिस्से के रूप में कूलिंग-ऑफ/लुक-अप अवधि भी प्रदान करता है, जिसके दौरान उधारकर्त्ता बिना किसी शुल्क के मूलधन और आनुपातिक वार्षिक प्रतिशत दर का भुगतान करके डिजिटल ऋण से बाहर निकल सकते हैं।
  • डेटा गोपनीयता की रक्षा हेतु:
    • डेटा गोपनीयता की रक्षा के लिये डिजिटल लेंडिंग ऐप्स द्वारा एकत्र किये गए डेटा को ग्राहक की पूर्व सहमति से आवश्यकता-आधारित होना चाहिये और यदि आवश्यक हो तो इसका ऑडिट किया जा सकता है।
  • शिकायत निवारण अधिकारी:
    • बैंकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके और उनके द्वारा नियुक्त LSPs के पास फिनटेक- या डिजिटल ऋण संबंधी शिकायतों से निपटने के लिये उपयुक्त नोडल शिकायत निवारण अधिकारी होना चाहिये।
    • यह अधिकारी अपने संबंधित डिजिटल लेंडिंग ऐप्स (DLA) के खिलाफ शिकायतों से भी निपटेगा।
    • वर्तमान दिशानिर्देश उधारकर्त्ता को RBI की एकीकृत लोकपाल योजना में शिकायत करने की अनुमति देते हैं यदि बैंक द्वारा 30 दिनों के भीतर उनकी शिकायत का समाधान नहीं किया जाता है।
  • ऋण की रिपोर्टिंग:
    • विनियमित संस्थाओं को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि DLAs के माध्यम से किये गए किसी भी उधार को क्रेडिट सूचना कंपनियों (CIC) को सूचित किया जाना चाहिये, चाहे इसकी प्रकृति या अवधि कुछ भी हो।
    • इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ‘बाय नाउ पे लेटर’ (BNPL) मॉडल के माध्यम से ऋण देने की भी CICको सूचना दी जानी चाहिये।

आरबीआई के नए दायरे में आने वाले घटक:

  • नए मानदंडों की घोषणा करते हुए, आरबीआई ने डिजिटल उधारदाताओं को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया।
    • आरबीआई द्वारा विनियमित संस्थाएँ और ऋण कारोबार करने की अनुमति प्रदान करते हैं।
    • ये संस्थाएँ अन्य वैधानिक या नियामक प्रावधानों के अनुसार उधार देने के लिये अधिकृत हैं लेकिन आरबीआई द्वारा विनियमित नहीं हैं।
    • किसी वैधानिक या नियामक प्रावधानों के दायरे से बाहर उधार देने वाली संस्थाएँ ।
  • केंद्रीय बैंक का नियामक ढाँचा विभिन्न अनुमेय ऋण सुविधा सेवाओं का विस्तार करने के लिये विनियमित संस्थाओं और उनके द्वारा लगे LSPs के डिजिटल उधार पारिस्थितिकी तंत्र पर केंद्रित है।
    • हालाँकि अन्य श्रेणियों के ऋणदाता नए दिशानिर्देशों के तहत नहीं आते हैं और कार्य समूह की सिफारिशों के आधार पर डिजिटल ऋण पर उचित नियम और विनियम तैयार करने पर विचार कर सकते हैं।

ऐसे दिशा-निर्देशों की आवश्यकता:

  • तकनीकी नवाचार के आगमन के साथ, डिजिटल उधार पारिस्थितिकी तंत्र में अत्यधिक विकास हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप कई फिनटेक फर्म साख सेवाओं का विस्तार कर रही हैं।
  • हालाँकि इस वृद्धि ने ग्राहकों को गलत बिक्री, डिजिटल उधारदाताओं द्वारा अनैतिक व्यापार आचरण और तीसरे पक्ष की अत्यधिक व्यस्तता, एवं उधारकर्त्ता की डेटा गोपनीयता पर चिंताओं को जन्म दिया है।
  • उपभोक्ताओं द्वारा कई शिकायतें भी की गई हैं कि डिजिटल ऋण देने वाले ऐप अत्यधिक ब्याज दर वसूल रहे हैं या वे धोखाधड़ी कर रहे हैं।

आगे की राह

  • भारत एक डिजिटल ऋण महत्त्वपूर्ण स्थिति में हैं इसलिये यह सुनिश्चित करके इसके परिणामों को बेहतर बनाना चाहिये।
  • डिजिटल ऋणदाताओं को सक्रिय रूप से एक आचार संहिता विकसित और प्रतिबद्ध करनी चाहिये जो प्रकटीकरण और शिकायत निवारण के स्पष्ट मानकों के साथ एकनिष्ठता, पारदर्शिता और उपभोक्ता संरक्षण के सिद्धांतों की रूपरेखा तैयार करती है।
  • तकनीकी सुरक्षा उपायों को स्थापित करने के अलावा, डिजिटल उधार के बारे में जागरूकता फैलाने के लिये ग्राहकों को शिक्षित और प्रशिक्षित करना भी महत्वपूर्ण है।

स्रोत: द हिंदू


कृषि

आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955

प्रिलिम्स के लिये:

आवश्यक वस्तु, आवश्यक वस्तु अधिनियम

मेन्स के लिये:

आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

हाल ही में उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने अरहर दाल की कीमतों में वृद्धि को रोकने के लिये आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 लागू किया है।

  • राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को साप्ताहिक आधार पर उपभोक्ता मामलों के विभाग के ऑनलाइन निगरानी पोर्टल पर 'स्टॉकहोल्डर संस्थाओं को उनके द्वारा रखे गए स्टॉक का डेटा अपलोड करने' का निर्देश दिया गया है।

अधिनियम की आवश्यकता

  • कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के प्रमुख तूर उत्पादक राज्यों के कुछ हिस्सों में अधिक वर्षा और जलभराव की स्थिति के कारण पिछले वर्ष 2021 की तुलना में खरीफ बुवाई में धीमी प्रगति के बीच जुलाई 2022 के मध्य से तूर की कीमतों में वृद्धि हुई है।
  • आगामी त्यौहारों के महीनों में उच्च मांग की वजह से अनुचित मूल्य वृद्धि को नियंत्रित करने हेतु, सरकार घरेलू और विदेशी बाजारों में दालों की समग्र उपलब्धता और नियंत्रित कीमतों को सुनिश्चित करने के लिये पूर्व-खाली कदम उठा रही है।
  • व्यापारियों और जमाखोरों के कुछ वर्गों द्वारा अरहर दाल की कीमतों को बढ़ाने के प्रयासों को सीमित करने के लिये, 'प्रतिबंधित बिक्री' का सहारा लेकर एक कृत्रिम कमी पैदा करना शामिल है।
    • कृत्रिम कमी कीमतों और/अथवा मांग को बढ़ाने के लिये विशेष उत्पादों (या सेवाओं) के उत्पादन की उद्देश्यपूर्ण सीमा है।

आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955:

  • पृष्ठभूमि:
    • ECA अधिनियम, 1955 ऐसे समय में बनाया गया था जब देश खाद्यान्न उत्पादन के लगातार निम्न स्तर के कारण खाद्य पदार्थों की कमी का सामना कर रहा था।
    • तत्कालीन भारत अपनी खाद्य ज़रूरतों की पूर्ति के लिये आयात और सहायता (जैसे पीएल-480 के तहत अमेरिका से गेहूँ का आयात) पर निर्भर था।
    • खाद्य पदार्थों की ज़माखोरी और कालाबाज़ारी को रोकने के लिये वर्ष 1955 में आवश्यक वस्तु अधिनियम लाया गया था।
  • आवश्यक वस्तु:
    • आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में आवश्यक वस्तुओं की कोई विशिष्ट परिभाषा नहीं है।
    • धारा 2 (ए) में कहा गया है कि "आवश्यक वस्तु" का अर्थ अधिनियम की अनुसूची में निर्दिष्ट वस्तु है।
  • कानूनी क्षेत्राधिकार:
    • अधिनियम केंद्र सरकार को अनुसूची में किसी वस्तु को जोड़ने या हटाने का अधिकार देता है।
    • केंद्र, यदि संतुष्ट है कि जनहित में ऐसा करना आवश्यक है, तो राज्य सरकारों के परामर्श से किसी वस्तु को आवश्यक रूप में अधिसूचित कर सकता है।
  • उद्देश्य:
    • ECA 1955 का उपयोग केंद्र को विभिन्न प्रकार की वस्तुओं में व्यापार के राज्य सरकारों द्वारा नियंत्रण को सक्षम करने की अनुमति देकर मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिये किया जाता है।
  • प्रभाव:
    • किसी वस्तु को आवश्यक घोषित करके, सरकार उस वस्तु के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित कर सकती है और स्टॉक सीमा लगा सकती है।

आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955

  • आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि ECA 1955 के तहत सरकारी हस्तक्षेप ने अक्सर कृषि व्यापार को विकृत किया है, जबकि यह मुद्रास्फीति को रोकने में पूरी तरह से अप्रभावी रहा।
  • इस तरह के हस्तक्षेप से रेंट सीकिंग और कुप्रबंधन के अवसर बढ़ते’ हैं।
    • रेंट सीकिंग अर्थशास्त्रियों द्वारा भ्रष्टाचार सहित अनुत्पादक आय का वर्णन करने के लिये इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है।
  • व्यापारी अपनी सामान्य क्षमता से बहुत कम खरीदारी करते हैं और किसानों को अक्सर खराब होने वाली फसलों के अतिरिक्त उत्पादन के दौरान भारी नुकसान होता है।
  • इसकी वजह से कोल्ड स्टोरेज, गोदामों, प्रसंस्करण और निर्यात में निवेश की कमी के कारण किसानों को बेहतर मूल्य नहीं मिल पा रहा था।
  • इन मुद्दों के चलते संसद ने आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 पारित किया।
  • हालाँकि किसानों के विरोध के कारण सरकार को इस कानून को रद्द करना पड़ा।

आगे की राह

  • ECA 1955 तब लाया गया था जब भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं था। हालाँकि अब भारत में अधिकांश कृषि-वस्तुओं में अधिशेष की स्थिति है और ECA 1955 में संशोधन सरकार द्वारा किसानों की आय को दोगुना करने तथा व्यवसाय करने में आसानी के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

स्रोत: द हिंदू


जैवविविधता और पर्यावरण

विश्व हाथी दिवस

प्रिलिम्स के लिये:

विश्व हाथी दिवस, प्रवासी प्रजातियों का सम्मेलन (CMS), प्रकृति के संरक्षण के लिये अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN), हाथी रिजर्व (ERs), हाथियों की अवैध हत्या की निगरानी (MIKE) कार्यक्रम।

मेन्स के लिये:

हाथियों के संरक्षण का महत्त्व और हाथी की प्रजातियों से संबंधित मुद्दे।

चर्चा में क्यों?

प्रत्येक वर्ष 12 अगस्त को विश्व हाथी दिवस, मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य हमारे पारिस्थितिकी तंत्र में हाथियों के महत्त्व को स्वीकार करना है।

  • यह हाथियों के द्वारा दैनिक जीवन में सामना करने वाले खतरों के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने पर बल देता है। हाथियों के अवैध शिकार, पालतू हाथियों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार, उनके आवास को क्षति पहुँचाने जैसे कारकों को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

हाथी दिवस का महत्त्व:

  • परिचय:
    • हाथियों को कई संस्कृतियों में पवित्र पशु माना जाता है और एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिये ये अति आवश्यक होते हैं।
      • हाथी जैव विविधता को भी बढ़ावा देते हैं।
      • ये एक बुद्धिमान प्रजाति होती हैं, उनके पास किसी भी स्थल पर रहने वाले प्रजातियों की तुलना में आकार में सबसे बड़ा दिमाग पाया जाता है।
  • जनसंख्या:
    • पिछले 75 वर्षों में हाथियों की आबादी में 50% की कमी आई है।
      • वर्तमान जनसंख्या अनुमान से संकेत मिलता है कि विश्व में लगभग 50,000-60000 एशियाई हाथी हैं।
        • भारत में विश्व की हाथियों की 60% से अधिक जनसंख्या निवास करती है।
  • ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य:
    • विश्व हाथी दिवस अभियान वर्ष 2012 में अफ्रीकी और एशियाई हाथियों को होने वाली दिक्कतों के प्रति लोगों को जागरूक करने के उदेश्य से शुरू किया गया था।
      • इस अभियान का उद्देश्य एक स्थायी वातावरण का निर्माण करना है जहाँ हाथियों के साथ होने वाले शोषण को रोका जा सके और उनकी देखभाल की जा सके।
    • विश्व हाथी दिवस को पहली बार कनाडा के फिल्म निर्माता माइकल क्लार्क और पेट्रीसिया सिम्स द्वारा थाईलैंड स्थित हाथी प्रजनन फाउंडेशन के साथ मनाया गया था।
      • वर्ष 2012 में पेट्रीसिया सिम्स ने वर्ल्ड एलीफेंट सोसाइटी नामक एक संगठन की स्थापना की।
        • संगठन हाथियों के सामने आने वाले खतरों और विश्व स्तर पर उनकी रक्षा करने की अनिवार्यता के बारे में जागरूकता पैदा करने में सफल रहा है।
  • संरक्षण स्थिति:

भारत में हाथियों से संबंधित मुद्दे:

  • प्रोजेक्ट एलीफैंट द्वारा वर्ष 2017 की जनगणना के अनुसार भारत में जंगली एशियाई हाथियों की सबसे अधिक संख्या (29,964 अनुमानित) है, जो कि हाथियों की वैश्विक आबादी का लगभग 60% है।
    • मानव-हाथी संघर्ष:
      • मनुष्यों और हाथियों के बीच टकराव को मानव-हाथी संघर्ष (HEC) कहा जाता है, जो मुख्य रूप से अधिवास को लेकर होता है तथा सरकारों, संरक्षणवादियों और जंगली जानवरों के करीब रहने वाले लोगों के लिये देश भर में एक प्रमुख चिंता का विषय है।
    • प्राकृतिक आवास की क्षति:
      • प्राकृतिक आवास की क्षति और विखंडन जंगली हाथियों को मानव बस्तियों के करीब ला रहा है जो इन संघर्षों को जन्म देता है।
      • प्रत्येक वर्ष हाथियों के साथ संघर्ष में 500 से अधिक इंसानों की मृत्यु हो जाती है तथा लाखों की फसल और संपत्ति का भी नुकसान होता है।
      • संघर्ष के कारण प्रतिशोध में कई हाथी भी मारे जाते हैं।

सरकार द्वारा की गई पहल:

  • प्रोजेक्ट एलीफैंट: इसे 1991-92 में पर्यावरण और वन मंत्रालय की केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में शुरू किया गया था।
    • वर्ष 2007, 2012 और 2017 में जंगली हाथियों की आबादी का अनुमान लगाया गया जिसमें कर्नाटक में हाथियों की संख्या सबसे अधिक है, इसके बाद असम और केरल का स्थान है।
  • हाथी रिज़र्व: यह भारत सरकार की सिफारिश के अनुसार राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचित एक प्रबंधन इकाई है।
    • इसमें संरक्षित क्षेत्र, वन क्षेत्र, गलियारे और निजी/आरक्षित भूमि शामिल हैं।
    • अगस्त्यमलाई (तमिलनाडु) देश का 32वाँ हाथी अभ्यारण्य होगा।
  • हाथियों की अवैध हत्या की निगरानी (Monitoring of Illegal Killing of Elephants- MIKE) कार्यक्रम: इसे CITES के पक्षकारों का सम्मेलन (Conference Of Parties- COP) द्वारा अज्ञापित किया गया है।
    • इसकी शुरुआत दक्षिण एशिया में (वर्ष 2003) निम्नलिखित उद्देश्य के साथ की गई थी:
      • हाथी रेंज देशों के लिये उचित प्रबंधन और प्रवर्तन निर्णय लेने हेतु आवश्यक जानकारी प्रदान करने के लिये।
      • हाथी आबादी के दीर्घकालिक प्रबंधन हेतु रेंज देशों के भीतर संस्थागत क्षमता का निर्माण करने के लिये।
    • भारत में माइक स्थल:
      • चिरांग-रिपू हाथी रिज़र्व (असम)
      • देवमाली हाथी रिज़र्व (अरुणाचल प्रदेश)
      • देहिंग पटकई हाथी रिज़र्व (असम)
      • गारो हिल्स हाथी रिज़र्व (मेघालय)
      • पूर्वी दूआर हाथी रिज़र्व (पश्चिम बंगाल)
      • मयूरभंज हाथी रिज़र्व (ओडिशा)
      • शिवालिक हाथी रिज़र्व (उत्तराखंड)
      • मैसूर हाथी रिज़र्व (कर्नाटक)
      • नीलगिरी हाथी रिज़र्व (तमिलनाडु)
      • वायनाड हाथी रिज़र्व (केरल)

विगत वर्षों के प्रश्न:

प्रश्न. भारतीय हाथियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2020)

  1. हाथियों के समूह का नेतृत्व मादा करती है।
  2. इनके गर्भधारण की अधिकतम अवधि 22 महीने हो सकती है।
  3. एक मादा हाथी सामान्य रूप से केवल 40 वर्ष की आयु तक बच्चे को जन्म दे सकती है।
  4. भारतीय राज्यों में सबसे अधिक हाथी जनसंख्या केरल में है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 4
(c) केवल 3
(d) केवल 1, 3 और 4

उत्तर: (a)

व्याख्या:

  • हाथियों के झुंड का नेतृत्व सबसे पुरानी और बड़ी मादा सदस्य (झुंड की माता) द्वारा किया जाता है। इस झुंड में नर हाथी की सभी संतानें (नर और मादा) शामिल होती हैं। अतः कथन 1 सही है।
  • हाथियों में सभी स्तनधारियों की सबसे लंबी गर्भकालीन (गर्भावस्था) अवधि होती है, जो 680 दिनों (22 महीने) तक चलती है। अतः कथन 2 सही है।
  • 14 से 45 वर्ष के बीच की मादा हाथी लगभग हर चार साल में बच्चे को जन्म दे सकती हैं, जबकि औसत जन्म अंतराल 52 साल की उम्र में पांँच साल और 60 साल की उम्र में छह साल तक बढ़ जाता है। अतः कथन 3 सही नहीं है।
  • हाथी जनगणना 2017 के अनुसार, कर्नाटक में हाथियों की संख्या सबसे अधिक (6,049) है, इसके बाद असम (5,719) और केरल (3,054) का स्थान है। अतः कथन 4 सही नहीं है।

अतः विकल्प (a) सही है।

स्रोत: द हिंदू


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