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मानव तथा हाथी के बीच संघर्षों को रोकने के लिये हाथियों का स्थानांतरण

  • 27 Jun 2018
  • 6 min read

चर्चा में क्यों?

असम में मानव तथा हाथी के बीच संघर्ष का दौर जारी है। असम के वन्यजीव अधिकारी मानव तथा हाथी के बीच संघर्षों को कम करने के लिये उत्तराखंड सरकार द्वारा उठाए गए कदम की तर्ज़ पर हाथियों का प्रतिस्थापन करने की योजना बना रहे हैं। लेकिन यह कार्य कहने में जितना आसान लगता है इस कार्य को करना उतना ही मुश्किल है। 

असम में हाथी गलियारों की स्थिति
उत्तर-पूर्व में 52 हाथी गलियारे हैं जो कि पूरे भारत में स्थित हाथी गलियारों का 35% हैं, ये सभी असम में स्थित हैं। इन गलियारों में से 15 से अधिक गलियारे जिनका प्रयोग अनुमानतः 9,350 हाथियों द्वारा किया जाता है, नार्थ-ईस्ट फ्रंटियर रेलवे के अंतर्गत आते हैं।

हाथियों के निकलने के लिये मार्ग नहीं

  • मानव बस्तियों और बिजली के बाड़ तथा खाइयों जैसी बाधाओं ने इन गलियारों में से कुछ को अवरुद्ध कर दिया है, जो कभी असम के गोलपाड़ा ज़िले और मेघालय के गारो हिल्स के बीच 40-50 हाथियों के दो झुंडों के आवागमन को सुगम बनाता था।
  • कहीं से भी निकलने का मार्ग न होने के कारण ये हाथी लगभग एक छोटे से क्षेत्र तक सीमित हो गए हैं। 
  • इन हाथियों की स्थिति ऐसी हो गई है कि वे एक सीमित क्षेत्र में ही एक ओर से दूसरी और विचरण करते रहते हैं। 
  • तथ्य यह है कि ज़िले में स्थित कई आरक्षित वन क्षेत्रों तथा प्रस्तावित आरक्षित वन क्षेत्रों को अलग-अलग भागों में बाँट दिया गया है। साथ ही, मछुआरों द्वारा 50 वर्ग किमी. की आर्द्र भूमि जिसे ‘उर्पद बिल’ के नाम से जाना जाता है, पर कब्ज़ा कर लिया गया है। हाथियों द्वारा इस क्षेत्र का प्रयोग आनंद लेने के लिये किया जाता था। 

मानव तथा हाथी के बीच संघर्ष की घटनाएँ

  • गोलपाड़ा में 103 आरक्षित वन क्षेत्र हैं जो ज़िले के 20% भू-भाग पर स्थित हैं। अब से लगभग 2 वर्ष पूर्व से ही अधिकांश हाथी 300 वर्गकिमी. के क्षेत्र में ही भ्रमण कर पाते हैं। अतः आवागमन के लिये पर्याप्त स्थान न होने कारण ये हाथी आक्रामक होकर गाँवों पर हमला करने लगे। इस तरह की घटनाओं में इस वर्ष अब तक 17 लोगों की मृत्यु हो चुकी है।
  • वन्यजीव अधिकारियों तथा सक्रिय भागीदारों के लिये इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि जहाँ पूर्व में ये घटनाएँ केवल सर्दियों के मौसम में होती थीं अब पूरे वर्ष होती हैं। 

ब्रह्मपुत्र घाटी

  • ब्रह्मपुत्र घाटी बहुत अधिक संकीर्ण है, यहाँ इतना स्थान नहीं है कि मानव तथा हाथी बिना किसी संघर्ष के एक साथ निवास कर सकें। 
  • यह एक दु:साध्य समस्या है क्योंकि हाथियों का आवागमन लगभग हर स्थान पर अवरुद्ध है। 

समस्या निवारण के उपाय उत्तराखंड से प्रेरित

  • वन्यजीव अधिकारियों तथा पशु चिकित्सकों द्वारा इस समस्या का हल निकालने के लिये जो रणनीति तैयार की गई है उसके अनुसार, अकेले भ्रमण करने वाले आवारा हाथियों तथा अन्य प्रकार की परेशानी उत्पन्न करने वाले हाथियों को स्थानांतरित कर दिया जाए। 
  • यह फैसला उत्तराखंड स्थित राजाजी नेशनल पार्क के समीप किये गए ऐसे प्रयास की सफलता को देखते हुए लिया गया है। 
  • यहाँ भी एक आक्रामक हाथी को प्रशमक औषधि दी गई तथा उस स्थान से 40 किमी. दूर स्थित एक नदी के पार उसे स्थानांतरित किया गया। हालाँकि यह हाथी कभी-कभी पहले की तरह आक्रामक हुआ लेकिन स्थान परिवर्तन के कारण यह काफी शांत हो गया था। 

हाथी गलियारा क्या होता है?

  • हाथी गलियारा भूमि का वह संकीर्ण भाग होता है जो दो बड़े आवासों को आपस में जोड़ता है। बहुत से ऐसे गलियारे पहले ही किसी-न-किसी सरकारी एजेंसी जैसे- वन या राजस्व विभाग के नियंत्रण में हैं। गलियारों में बड़ी वाणिज्यिक संपदाओं तथा अनाज या कृषि भूमि में अप्रयुक्त स्थानों को शामिल किया जा सकता है।

निष्कर्ष

हो सकता है कि स्थान परिवर्तन के बाद ये हाथी शांत हो जाएँ लेकिन स्थानांतरण के मार्ग में आने वाली सबसे बड़ी चुनौती है स्थानांतरण के लिये अनुकूल स्थान की तलाश। 

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