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अपशिष्ट प्रबंधन: पाँच सूत्रीय कार्य-योजना की आवश्यकता

  • 29 Aug 2020
  • 17 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में अपशिष्ट प्रबंधन व उससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

वर्षों की उपेक्षा, दूरदर्शिता की कमी और शहरी नियोजन की पूर्ण अनुपस्थिति ने भारत को अपशिष्ट लैंडफिल, अपशिष्ट-चोक नालियों, जल निकायों और नदियों को अपशिष्ट के ढेर में बदल दिया है। पूरे भारत में लगभग 48 मान्यता प्राप्त लैंडफिल हैं, जिसने लगभग 5,000 एकड़ भूमि को कवर किया हुआ है, जिसका कुल भूमि मूल्य लगभग 100,000 करोड़ रुपये है। भारत में प्रति वर्ष लगभग 275 मिलियन टन अपशिष्ट उत्पन्न होता है। लगभग 20-25 प्रतिशत की वर्तमान अपशिष्ट उपचार दर के साथ इस अपशिष्ट का अधिकांश हिस्सा अनुपचारित रहता है।

वस्तुतः भारत में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों व निष्कर्षों के आधार पर एक ऐसे धारणीय तंत्र के निर्माण की कवायद चल रही है जहाँ आम व्यक्ति, उद्योग एवं सरकार तीनों के हितों को ध्यान में रखते हुए संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा की जा सके। अतः मूल लक्ष्य एक धारणीय व अनुक्रियाशील प्रबंधन तंत्र को विकसित करना है जो अपशिष्ट निर्माण, संग्रहण एवं निस्तारण में सभी पक्षकारों की भूमिका तय करते हुए उनके कर्त्तव्यों व ज़िम्मेदारियों को परिभाषित कर एक सक्षम व अनुक्रियाशील तंत्र का निर्माण करे।

भारत में अपशिष्ट प्रबंधन तंत्र के कार्यकरण में पाँच सूत्रीय कार्य-योजना (वहनीय तकनीक, त्वरित खरीद, नई नीति, कुशल मानव संसाधन, शून्य अपशिष्ट समाज) को अपनाने की आवश्यकता है। इस आलेख में अपशिष्ट प्रबंधन, अपशिष्ट के प्रकार, भारत में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की स्थिति, अपशिष्ट प्रबंधन के उदाहरण तथा पाँच सूत्रीय कार्य-योजना के बारे में विचार-विमर्श किया जाएगा।

अपशिष्ट क्या है?

  • शहरीकरण, औद्योगीकरण और जनसंख्या में विस्फोट के साथ ठोस अपशिष्ट प्रबंधन 21वीं सदी में राज्य सरकारों तथा स्थानीय नगर निकायों के लिये एक महत्त्वपूर्ण चुनौती बन गई है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, अपशिष्ट का आशय हमारे प्रयोग के पश्चात् शेष बचे हुए अनुपयोगी पदार्थ से होता है। यदि शाब्दिक अर्थ की बात करें तो अपशिष्ट ‘अवांछित’ और ‘अनुपयोगी सामग्री’ को इंगित करता है।

अपशिष्ट के विभिन्न प्रकार

  • ठोस अपशिष्ट (Solid Waste): ठोस अपशिष्ट के तहत घरों, कारखानों या अस्पतालों से निकलने वाला अपशिष्ट शामिल किया जाता है।
  • तरल अपशिष्ट (Wet Waste): अपशिष्ट जल संयंत्रों और घरों आदि से आने वाला कोई भी द्रव आधारित अपशिष्ट को तरल अपशिष्ट के तहत वर्गीकृत किया जाता है।
  • सूखा अपशिष्ट (Dry waste): अपशिष्ट जो किसी भी रूप में तरल या द्रव नहीं होता है, सूखे अपशिष्ट के अंतर्गत आता है।
  • बायोडिग्रेडेबल अपशिष्ट (Biodegradable Waste): कोई भी कार्बनिक द्रव्य जिसे मिट्टी में जीवों द्वारा कार्बन-डाइऑक्साइड, पानी और मीथेन में संश्लेषित किया जा सकता है।
  • नॉनबायोडिग्रेडेबल अपशिष्ट (Nonbiodegradable Waste:): कोई कार्बनिक द्रव्य जिसे कार्बन-डाइऑक्साइड, पानी और मीथेन में संश्लेषित नहीं किया जा सकता।

अपशिष्ट प्रबंधन से तात्पर्य

  • अपशिष्ट प्रबंधन से तात्पर्य उस संपूर्ण श्रृंखला से है जिसके अंतर्गत अपशिष्ट के निर्माण से लेकर उसके संग्रहण (Collection) व परिवहन (Transport) के साथ प्रसंस्करण (Processing) एवं निस्तारण (Disposal) तक की संपूर्ण प्रक्रिया को शामिल किया जाता है।
  • उक्त प्रबंधन तंत्र के अंतर्गत विभिन्न चरणों यथा संग्रहण (Collection), परिवहन (Transport), उपचार (Treatment) और निगरानी (Monitoring) के साथ निस्तारण को भी शामिल किया जाता है।
  • अपशिष्ट पदानुक्रम तीन- आर (3-r’s) का अनुसरण करता है- जो न्यूनीकरण (reduce), पुन: उपयोग (Reuse) और पुनर्चक्रण (Recycle) के रूप में संदर्भित किये जाते हैं। ये तीनों R अपशिष्ट प्रबंधन रणनीति को अपशिष्ट न्यूनीकरण के संदर्भ में उनकी वांछनीयता के अनुसार वर्गीकृत करते हैं।

अपशिष्ट प्रबंधन की प्रचलित विधियाँ

  • लैंडफिल (Landfill): यह वर्तमान में अपशिष्ट प्रबंधन हेतु प्रयोग होने वाली सबसे प्रचलित विधि है। इस विधि में शहरों के आसपास के खाली स्थानों में अपशिष्ट को एकत्रित किया जाता है। ऐसा करते हुए यह ध्यान रखा जाता है कि वह क्षेत्र जहाँ अपशिष्ट एकत्रित किया जा रहा है, मिट्टी से ढका हो ताकि संदूषण (Contamination) से बचाव किया जा सके। जानकारों का मानना है कि यदि इस विधि को सही ढंग से डिज़ाइन किया जाए तो यह किफायती साबित हो सकती है।
  • इंसीनरेशन (Incineration): इस विधि में अपशिष्ट को उच्च तापमान पर तब तक जलाया जाता है जब तक वह राख में न बदल जाए। अपशिष्ट प्रबंधन की विधि को व्यक्तिगत, नगरपालिका और संस्थानों के स्तर पर किया जा सकता है। इस विधि की सबसे अच्छी बात यह है कि यह अपशिष्ट की मात्रा को 20-30 प्रतिशत तक कम कर देता है। हालाँकि यह विधि अपेक्षाकृत काफी महँगी मानी जाती है।
  • यरोलिसिस (Pyrolysis): अपशिष्ट प्रबंधन की इस विधि के अंतर्गत ठोस अपशिष्ट को ऑक्सीजन की उपस्थिति के बिना रासायनिक रूप से विघटित किया जाता है।

चुनौतियाँ

  • भारत में अधिकांश शहरी स्थानीय निकाय वित्त, बुनियादी ढाँचे और प्रौद्योगिकी की कमी के कारण कुशल अपशिष्ट प्रबंधन सेवाएँ प्रदान करने के लिये संघर्ष करते हैं।
  • शहरीकरण में तीव्रता के साथ ही ठोस अपशिष्ट उत्पादन में भी वृद्धि हुई है जिसने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को काफी हद तक बाधित किया है।
  • हालाँकि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2016 में अपशिष्ट के अलगाव को अनिवार्य किया गया है, परंतु अक्सर बड़े पैमाने पर इस नियम का पालन नहीं किया जाता है।
  • अधिकांश नगरपालिकाएँ बिना किसी विशेष उपचार के ही ठोस अपशिष्ट को खुले डंप स्थलों पर एकत्रित करती हैं। अक्सर इस प्रकार के स्थलों से काफी बड़े पैमाने पर रोगों के जीवाणु पैदा होते हैं और आस-पास रहने वाले रोग भी इससे काफी प्रभावित होते हैं। इस प्रकार के स्थलों से जो दूषित रसायन भूजल में मिलता है वह आम लोगों के जन-जीवन को काफी नुकसान पहुँचाता है।
  • कई विशेषज्ञ इन स्थलों को वायु प्रदूषण के लिये भी ज़िम्मेदार मानते हैं।
  • एक अन्य समस्या यह है कि अपशिष्ट प्रबंधन के लिये जो वित्त आवंटित किया जाता है उसका अधिकांश हिस्सा संग्रहण और परिवहन को मिलता है, वहीं प्रसंस्करण तथा निपटान हेतु बहुत कम हिस्सा बचता है।
  • भारत में अपशिष्ट प्रबंधन क्षेत्र का गठन मुख्यतः अनौपचारिक श्रमिकों द्वारा किया जाता है जिनमें से अधिकांश शहरों में रहने वाले गरीब होते हैं। अनौपचारिक श्रमिक होने के कारण इन लोगों को कार्यात्मक और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल पाती है।

प्रभाव

  • यदि अपशिष्ट का उचित प्रबंधन न किया जाए तो ये समुद्री और तटीय जैसे विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्रों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता हैं। समुद्री अपशिष्ट को बीते कुछ वर्षों से एक गंभीर चिंता के रूप में देखा जा रहा है। इससे न केवल समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की उत्पादकता पर प्रभाव पड़ता है, बल्कि इससे कई समुद्री प्रजातियों का जीवन भी प्रभावित होता है।
  • प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दोनों रूपों से अपशिष्ट हमारे स्वास्थ्य एवं कल्याण को भी कई तरह से प्रभावित करता है। जैसे- मीथेन गैस जलवायु परिवर्तन में योगदान करती है, स्वच्छ जल स्रोत दूषित हो जाते हैं।
  • अपशिष्ट से न केवल पारिस्थितिकी तंत्र और स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है, बल्कि यह समाज पर आर्थिक बोझ को भी बढ़ाता है। इसके अलावा अपशिष्ट प्रबंधन में भी काफी धन खर्च होता है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization-WHO) के अनुसार, भारत में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में सुधार करके 22 प्रकार की बीमारियों को नियंत्रित किया जा सकता है।

अपशिष्ट प्रबंधन हेतु वैधानिक प्रयास

  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2016 (Solid Waste Management Rules, 2016)
    • नियमों के अनुसार, प्रदूषणकर्त्ता संपूर्ण अपशिष्ट को तीन प्रकारों यथा जैव निम्नीकरणीय, गैर-जैव निम्नीकरणीय एवं घरेलू खतरनाक अपशिष्टों के रूप में वर्गीकृत करके इन्हें अलग-अलग डिब्बों में रखकर स्थानीय निकाय द्वारा निर्धारित अपशिष्ट संग्रहकर्त्ता को ही देंगे।
    • इसके साथ ही स्थानीय निकायों द्वारा निर्धारित प्रयोग शुल्क का भुगतान प्रदूषणकर्त्ता द्वारा किया जाएगा। ये शुल्क स्थानीय निकायों द्वारा निर्मित विनियमों से निर्धारित किये जाएंगे।
    • इस नियम के अंतर्गत विभिन्न पक्षकारों यथा– भारत सरकार के विभिन मंत्रालयों जैसे पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, शहरी विकास मंत्रालय, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय, कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्रालय, ज़िला मजिस्ट्रेट, ग्राम पंचायत, स्थानीय निकाय, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड आदि के कर्तव्यों का उल्लेख भी किया गया है।
  • कंस्ट्रक्शन एवं डेमोलिशन अपशिष्ट प्रबंधन नियम
    • ये नियम भवन निर्माण व उससे संबंधित सभी गतिविधियों पर लागू होते हैं, जहाँ से अपशिष्ट निर्माण होता है।
    • इस नियम के अंतर्गत ये प्रावधान हैं कि जो अपशिष्ट उत्पादनकर्त्ता 20 टन प्रतिदिन व 300 टन प्रति महीने समान या उससे अधिक अपशिष्ट का निर्माण करेगा, उसे प्रत्येक निर्माण व तोड़-फोड़ के लिये स्थानीय निकाय से उपयुक्त स्वीकृति प्राप्त करनी होगी।
  • ई-कचरा प्रबंधन नियम
    • ई-कचरा प्रबंधन नियम (E-waste Management Rules), 2016 अक्तूबर 2016 से प्रभाव में आया है।
    • ये नियम प्रत्येक निर्माता, उत्पादनकर्त्ता, उपभोक्ता, विक्रेता, अपशिष्ट संग्रहकर्त्ता, उपचारकर्त्ता व उपयोग- कर्त्ताओं आदि सभी पर लागू होता है।
    • अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों को औपचारिक रूप दिया जाएगा और श्रमिकों को ई-कचरे के प्रबंधन हेतु प्रशिक्षित किया जाएगा।

पाँच सूत्रीय कार्य-योजना

वर्तमान में अपशिष्ट प्रबंधन के लिये राष्ट्रीय मिशन के रूप में कार्य करने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों ने इसके लिये पाँच सूत्रीय कार्य-योजना प्रस्तुत की है, जो इस प्रकार है-

  • वहनीय तकनीक: सर्वप्रथम नगरपालिकाओं को वहनीय तकनीक तक पहुँच सुनिश्चित करने की आवश्यकता है जो कि भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल हो। वर्तमान में अपशिष्ट प्रबंधन के लिये आवश्यक अधिकांश प्रौद्योगिकी/उपकरण आयातित, महंगे हैं और अक्सर हमारी विभिन्न स्थानीय स्थितियों में अनुकूल नहीं होते हैं। भारत को अपनी जटिल शहरी संरचना के लिये सस्ती, विकेंद्रीकृत, अनुकूलित समाधान की आवश्यकता है। उदाहरण के लिये जल निकायों को साफ़ करने के लिये रोबोट्स का प्रयोग किया जा सकता है।
  • त्वरित खरीद प्रक्रिया: अपशिष्ट प्रबंधन में तकनीकी उन्नयन हेतु त्वरित खरीद प्रक्रिया को अपनाने की आवश्यकता है। लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण प्रौद्योगिकी और उपकरणों की खरीद में अत्यधिक समय लग जाता है। बंबई नगरपालिका को उर्जा संयंत्र के अपशिष्ट प्रबंधन के लिये आवश्यक उपकरणों की खरीद करने में लगभग सात वर्ष का समय लग गया था।
  • एकीकृत नीति: अपशिष्ट प्रबंधन हेतु एक एकीकृत नीति की आवश्यकता है। जिससे अपशिष्ट के विभिन्न प्रकारों का निस्तारण करने में सहूलियत होगी। इसके माध्यम से हजारों एकड़ भूमि लैंडफिल से मुक्त कराई जा सकती है।
  • कुशल मानव संसाधन: अपशिष्ट प्रबंधन संयंत्रों के संग्रह, संचालन, रखरखाव और अपशिष्ट प्रबंधन श्रृंखला को संचालित करने तथा बनाए रखने के लिये कुशल और प्रशिक्षित पेशेवर कर्मियों की नियुक्ति पर ध्यान देना होगा।
  • शून्य अपशिष्ट समाज: भारत पारंपरिक रूप से एक ऐसा समाज है जहाँ वस्तुओं की बर्बादी बहुत कम है और सब कुछ पुन: उपयोग और पुनर्नवीनीकरण किया जा सकता है। हमें ऐसे समाज के विकास को बढ़ावा देने की ज़रुरत है।

आगे की राह

  • देश को एक व्यापक अपशिष्ट प्रबंधन नीति की आवश्यकता है जो विकेंद्रीकृत अपशिष्ट निपटान प्रथाओं की आवश्यकता पर बल देती है ताकि इस क्षेत्र में निजी प्रतिभागियों को हिस्सा लेने का प्रोत्साहन मिल सके।
  • अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली को सुदृढ़ करने के लिये अनुसंधान और विकास को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। नीति निर्माण के समय हमारा ध्यान और अधिक लैंडफिल के निर्माण के बजाय पुनर्चक्रण तथा पुनर्प्राप्ति पर होना चाहिये।

प्रश्न- अपशिष्ट प्रबंधन से आप क्या समझते हैं? अपशिष्ट प्रबंधन में आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण करते हुए पाँच सूत्रीय कार्य-योजना के बारे में बताएँ।

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