हिंदी साहित्य: पेन ड्राइव कोर्स
ध्यान दें:

डेली न्यूज़

  • 12 Aug, 2022
  • 53 min read
सामाजिक न्याय

स्माइल-75 पहल

प्रिलिम्स के लिये:

स्माइल योजना, केंद्रीय क्षेत्र की योजनाएँ, राष्ट्रीय सामाजिक रक्षा संस्थान, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त और विकास निगम

मेन्स के लिये:

भिखारियों के लिये स्माइल योजना और उनकी आजीविका बढ़ाने में इसका महत्त्व, भारत में भीख मांगने का अपराधीकरण, भिखारियों की स्थिति।

चर्चा में क्यों?

भारत सरकार ने निराश्रयता और भिक्षावृत्ति की समस्या को दूर करने के लिये "स्माइल- आजीविका और उद्यम के लिये सीमांत व्यक्तियों हेतु समर्थन" नामक एक व्यापक योजना बनाई है।

  • स्माइल-75 पहल के अंतर्गत भीख मांगने में लगे लोगों के समग्र पुनर्वास को लागू करने के लिये 75 नगर निगमों की पहचान की है।

स्माइल 75-पहल:

  • उद्देश्य:
    • नगर निगम, गैर सरकारी संगठनों (NGOs) और अन्य हितधारकों के सहयोग से सरकारी कल्याण कार्यक्रमों के अंतर्गत भिक्षावृत्ति में संलग्न व्यक्तियों के लिये कई व्यापक कल्याणकारी उपायों को शामिल किया गया है, जिसमें उनके पुनर्वास, चिकित्सा सुविधाओं के प्रावधान, परामर्श, जागरूकता, शिक्षा, कौशल विकास, आर्थिक सशक्तीकरण और अभिसरण पर व्यापक रूप से ध्यान दिया जाएगा।
      • सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने वर्ष 2025-26 की अवधि के लिये स्माइल परियोजना हेतु कुल 100 करोड़ रुपए का बजट भी आवंटित किया है।
    • इसके अंतर्गत भिक्षावृत्ति में संलग्न लोगों के समग्र पुनर्वास हेतु एक समर्थन तंत्र विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।
  • कार्यान्वयन मंत्रालय:
    • सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय।
  • अवयव:
    • इसमें निम्नलिखित की उप-योजना शामिल है:
      • भिक्षावृत्ति के कार्य में संलग्न व्यक्तियों का व्यापक पुनर्वास।
  • उद्देश्य:
    • नगरों/कस्बों तथा नगरपालिका क्षेत्रों को भिक्षावृत्ति से मुक्त करना।
    • विभिन्न हितधारकों की समन्वित कार्रवाई के माध्यम से भीख मांगने के कार्य में लगे व्यक्तियों के व्यापक पुनर्वास के लिये रणनीति तैयार करना।

भारत में भिक्षावृत्ति में संलग्न आबादी की स्थिति:

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में भिखारियों की कुल संख्या 4,13,670 (2,21,673 पुरुषों और 1,91,997 महिलाओं सहित) है और पिछली जनगणना की तुलना में इनकी संख्या में वृद्धि हुई है।
  • पश्चिम बंगाल इसमें सबसे ऊपर है, उसके बाद क्रमश: दूसरे और तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश और बिहार का स्थान है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार लक्षद्वीप में केवल दो भिखारी हैं।
  • केंद्रशासित प्रदेश नई दिल्ली में सबसे अधिक 2,187 भिखारी थे, उसके बाद चंडीगढ़ में 121 थे।
  • पूर्वोत्तर राज्यों में असम 22,116 भिखारियों के साथ शीर्ष पर है, जबकि मिज़ोरम 53 भिखारियों के साथ निम्न स्थान पर है।

स्रोत: पी.आई.बी.


जैवविविधता और पर्यावरण

कच्छल द्वीप पर मैंग्रोव आवरण में कमी

प्रिलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय वैमानिकी और अंतरिक्ष प्रशासन (नासा), निकोबार द्वीपसमूह, मैंग्रोव आवरण।

मेन्स के लिये:

मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र का महत्त्व।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में राष्ट्रीय वैमानिकी और अंतरिक्ष प्रशासन (नासा) के एक अध्ययन में भारत के निकोबार द्वीपसमूह के कच्छल द्वीप पर मैंग्रोव आवरण में आने वाली कमी पर प्रकाश डाला गया है।

  • इस अध्ययन से यह पता चलता है कि पिछले दो दशकों में वैश्विक स्तर पर मैंग्रोव किस हद तक नष्ट हो गए हैं।

मैंग्रोव:

  • परिचय:
    • मैंग्रोव उष्णकटिबंधीय पौधे हैं जो दलदल, खारे समुद्री जल और समय-समय पर आने वाले ज्वार से जलमग्न होने के अनुकूलित होते हैं।
  • विशेषताएँ:
    • लवणीय वातावरण: ये अत्यधिक प्रतिकूल वातावरण, जैसे उच्च लवण और निम्न ऑक्सीजन की स्थिति में भी जीवित रह सकते हैं।
    • ऑक्सीजन की निम्न मात्रा: किसी भी पौधे के भूमिगत ऊतक को श्वसन के लिये ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। लेकिन मैंग्रोव वातावरण मिट्टी में ऑक्सीजन की मात्रा सीमित रूप में या शून्य होती है।
      • साँस लेने के उद्देश्य से वे न्यूमेटोफोर नामक विशेष जड़ें विकसित करते हैं।
    • चरम स्थितियों में उत्तरजीविता: जलमग्न रहने के कारण मैंग्रोव के पेड़ गर्म, कीचड़युक्त और लवणीय परिस्थितियों में विकसित होते हैं, जिसमें दूसरे पौधों जीवित नहीं रह पाते हैं।
    • विवियोपोरस: उनके बीज मूल वृक्ष से जुड़े रहते हुए अंकुरित होते हैं। एक बार अंकुरित होने के बाद ये बढ़ने लगते है।
      • परिपक्व अंकुर जल या कीचड़-युक्त स्थान में गिर जाता है और किसी अलग स्थान पर पहुँच कर ठोस ज़मीन में जड़ें जमा लेता है।
  • महत्त्व:
    • मैंग्रोव तटीय पारिस्थितिकी तंत्र में विभिन्न कार्बनिक पदार्थों, रासायनिक तत्त्वों और महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्वों को बाँधते हैं।
    • वे समुद्री जीवों के लिये एक बुनियादी आहार शृंखला संसाधन प्रदान करते हैं।
    • वे समुद्री जीवों की एक विस्तृत विविधता के लिये भौतिक आवास और नर्सरी मैदान प्रदान करते हैं, जिनमें से कई महत्त्वपूर्ण मनोरंजक या वाणिज्यिक मूल्य रखते हैं।
    • मैंग्रोव उथले तटरेखा क्षेत्रों में हवा और लहर की क्रिया को कम करके तूफान बफर के रूप में भी कार्य करते हैं।

आच्छादित क्षेत्र

  • वैश्विक मैंग्रोव कवर
    • विश्व में कुल 1,50,000 वर्ग किलोमीटर मैंग्रोव आच्छादित क्षेत्र है।
    • विश्व भर में मैंग्रोव की सबसे बड़ी संख्या एशिया में है।
      • दक्षिण एशिया में दुनिया के मैंग्रोव कवर का 6.8% हिस्सा शामिल है।
  • भारतीय मैंग्रोव कवर:
    • दक्षिण एशिया में कुल मैंग्रोव कवर में भारत का योगदान 45.8% है।
    • भारतीय राज्य वन स्थिति रिपोर्ट, 2021 के अनुसार, भारत में मैंग्रोव कवर 4992 वर्ग किलोमीटर है जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 0.15% है।
    • सबसे बड़ा मैंग्रोव वन: पश्चिम बंगाल में सुंदरवन दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन क्षेत्र है। यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध है।
    • भितरकनिका मैंग्रोव: भारत में दूसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव वन ओडिशा में भितरकनिका है, जो ब्राह्मणी और बैतरनी नदी के दो नदी डेल्टाओं द्वारा बनाया गया है।
      • यह भारत में सबसे महत्त्वपूर्ण रामसर आर्द्रभूमि में से एक है।
    • गोदावरी-कृष्णा मैंग्रोव, आंध्र प्रदेश: गोदावरी-कृष्णा मैंग्रोव ओडिशा से तमिलनाडु तक फैले हुये हैं।

top-ten-mangrove-state-cover

प्रमुख बिंदु

  • अध्ययन पूर्वी हिंद महासागर में निकोबार द्वीप समूह के कच्छल द्वीप पर वर्ष 1992 और 2019 के बीच विलुप्त ज्वारीय आर्द्रभूमि की वास्तविक सीमा को दर्शाता है।
  • अध्ययन में पाया गया कि तीन प्रकार की ज्वारीय आर्द्रभूमियों में से मैंग्रोव की क्षति का अनुपात सबसे अधिक था।
    • अन्य दो ज्वारीय आर्द्रभूमियों में ज्वारीय मडफ्लैट्स और दलदल थे।
  • मैंग्रोव वन में वर्ष 1999 और 2019 के बीच 3,700 वर्ग किलोमीटर की अनुमानित शुद्ध कमी आई है।
    • क्षति के बावजूद 2,100 वर्ग किलोमीटर का लाभ हुआ है जो इन वनों की गतिशीलता को दर्शाता है।
  • क्षति के कारण:
    • प्राकृतिक कारण:
      • वर्ष 2004 की सुनामी के दौरान 9.2 की तीव्रता वाला भूकंप आया था, जिसके दौरान द्वीपों की भूमि 3 मीटर (10 फीट) तक नीचे धंस गई थी। 
        • इसने कई मैंग्रोव पारिस्थितिक तंत्रों को जलमग्न कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों में 90% से अधिक मैंग्रोव का नुकसान हुआ।
    • अन्य कारक:
  • मानव प्रेरित:
    • लगभग 27% नुकसान और लाभ सीधे मानव गतिविधि के कारण हुए हैं।
      • मानव आर्द्रभूमि को विकास, जल परिवर्तन परियोजनाओं के माध्यम से या भूमि को कृषि या जलीय कृषि में परिवर्तित कर नष्ट कर देते हैं।
  • वर्तमान स्थिति:
    • मैंग्रोव कवर नष्ट होने के बाद दोबारा उत्पन्न होना बहुत कठिन है हालाँकि अन्य जगहों पर उनकी संख्या में वृद्धि हुई है क्योंकि वे स्वतः उत्पन्न होकर आगे विकसित होतें हैं।

आगे की राह

  • संरक्षण को सक्रिय सामुदायिक भागीदारी, पर्यावरण सुरक्षा, और प्राकृतिक आपदाओं से किसी भी जोखिम को कम करने के साथ व्यापक परिप्रेक्ष्य से जोड़ने की आवश्यकता है।
    • ऐसे उपायों को अग्रिम अनुकूलन उपायों के तौर पर अधिक समग्र रूप से अपनाने की आवश्यकता है जो सफल और प्रभावी प्रबंधन कर चुके हैं।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पिछले वर्ष के प्रश्न:

प्रारंभिक परीक्षा:

प्रश्न. भारत के निम्नलिखित क्षेत्रों में से किस एक में मैंग्रोव वन, सदापर्णी वन और पर्णपाती वनों का संयोजन है?

(a) उत्तर तटीय आंध्र प्रदेश
(b) दक्षिण-पश्चिम बंगाल
(c) दक्षिणी सौराष्ट्र
(d) अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह

उत्तर: (d)

व्याख्या:

उत्तर तटीय आंध्र प्रदेश में मैंग्रोव और शुष्क सदाबहार वन हैं।

  • दक्षिण पश्चिम बंगाल में मैंग्रोव और सदाबहार वन हैं।
  • दक्षिणी सौराष्ट्र में मैंग्रोव, शुष्क पर्णपाती, उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन आदि हैं।
  • अंडमान और निकोबार के उष्णकटिबंधीय द्वीपों में मैंग्रोव वन, सदाबहार वन और पर्णपाती वन का संयोजन है।

अतः विकल्प (d) सही उत्तर है।


प्रश्न. मैंग्रोवों के रिक्तीकरण के कारणों पर चर्चा कीजिये और तटीय पारिस्थितिकी का अनुरक्षण करने में इनके महत्त्व को स्पष्ट कीजिये। (मुख्य परीक्षा-2019)

स्रोत: डाउन टू अर्थ


शासन व्यवस्था

आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022

प्रिलिम्स के लिये:

लोकसभा, भारतीय दंड संहिता, निवारक निरोध, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो, नागरिकों के मौलिक अधिकार, गोपनीयता का अधिकार, आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) विधेयक, 2022।

मेन्स के लिये:

आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) विधेयक, 2022 और मुद्दे, निर्णय और मामले, मौलिक अधिकार।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में अप्रैल 2022 में संसद में पारित होने के बाद आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022 लागू हुआ है।

  • यह एक औपनिवेशिक युग के कानून, कैदियों की पहचान अधिनियम, 1920 की जगह लाया गया है, और पुलिस अधिकारियों को आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए गए, गिरफ्तार किये गए या मुकदमे का सामना करने वाले लोगों की पहचान करने के लिये अधिकृत करता है।

identification-acts-comparison

आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022

  • यह पुलिस को अपराधियों के साथ-साथ अपराधों के आरोपियों के शारीरिक और जैविक नमूने लेने के लिये कानूनी मंज़ूरी प्रदान करता है।
  • दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 53 या धारा 53A के तहत पुलिस डेटा एकत्र कर सकती है।
    • डेटा जो एकत्र किया जा सकता है: फिंगर-इंप्रेशन, हथेली-प्रिंट इंप्रेशन, फुटप्रिंट इंप्रेशन, फोटोग्राफ, आईरिस और रेटिना स्कैन, भौतिक, जैविक नमूने और उनका विश्लेषण, हस्ताक्षर, हस्तलेखन या किसी अन्य परीक्षा सहित व्यवहारिक गुण।
    • CrPC आपराधिक कानून के प्रक्रियात्मक पहलुओं के संबंध में प्राथमिक कानून है।
  • किसी भी निवारक निरोध कानून के तहत दोषी ठहराए गए , गिरफ्तार या हिरासत में लिये गए किसी भी व्यक्ति को पुलिस अधिकारी या जेल अधिकारी को "माप" प्रदान करने की आवश्यकता होगी।
  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) भौतिक और जैविक नमूनों, हस्ताक्षर तथा हस्तलेखन डेटा के रिपॉज़िटरी के रूप में कार्य करेगा जहाँ इन्हें कम-से-कम 75 वर्षों तक संरक्षित किया जा सकता है।
  • इसका उद्देश्य अपराध में शामिल लोगों की विशिष्ट पहचान सुनिश्चित करना और जाँच एजेंसियों की मामलों को सुलझाने में मदद करना है।

पिछले अधिनियम को बदलने की आवश्यकता:

  • इस विधेयक का उद्देश्य ‘बंदी पहचान अधिनियम, 1920’ (Identification of Prisoners Act,1920) को प्रतिस्थापित करना है।
    • जिसमें संशोधन का प्रस्ताव वर्ष 1980 के दशक में भारत के विधि आयोग की 87वीं रिपोर्ट में और ‘उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राम बाबू मिश्र’ मामले (1980) में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में किया गया था।
  • सिफारिशों के पहले समूह में "हथेली के निशान", "हस्ताक्षर या लेखन का नमूना" और "आवाज का नमूना" शामिल करने एवं माप के दायरे का विस्तार करने हेतु अधिनियम में संशोधन करने की आवश्यकता है।
  • सिफारिशों के दूसरे समूह में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत कार्रवाई के अलावा अन्य कार्यवाही हेतु सैंपल लेने की अनुमति देने की आवश्यकता की मांग की है।
  • विधि आयोग की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि संशोधन की आवश्यकता कई राज्यों द्वारा अधिनियम में किये गए कई संशोधनों से परिलक्षित होती है।
  • यह महसूस किया गया कि फोरेंसिक में प्रगति के साथ अधिक प्रकार के "मापों" को पहचानने की आवश्यकता है जिनका उपयोग कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा जाँच के लिये किया जा सकता है।

अधिनियम का महत्त्व:

  • आधुनिक तकनीक:
    • यह अधिनियम उपयुक्त शरीर मापों को दर्ज करने के लिये आधुनिक तकनीकों के उपयोग का प्रावधान करता है।.
      • मौजूदा कानून सीमित श्रेणी के दोषी व्यक्तियों के केवल ‘फिंगरप्रिंट’ और ‘फुटप्रिंट’ लेने की ही अनुमति देता है।
  • जाँच एजेंसियों की मदद करें:
    • ‘व्यक्तियों’ (जिनकी सैंपल ली जा सकती है) के दायरे का विस्तार जाँच एजेंसियों को कानूनी रूप से स्वीकार्य पर्याप्त सबूत इकट्ठा करने और आरोपी व्यक्ति के अपराध को साबित करने में मदद करेगा।
  • जाँच को और अधिक सक्षम बनाना:
    • यह उन व्यक्तियों के शरीर से उपयुक्त सैंपल लेने के लिये कानूनी स्वीकृति प्रदान करता है, जिन्हें इस तरह के सैंपल देने की आवश्यकता होती है और अपराध की जाँच को अधिक कुशल और त्वरित करने तथा सज़ा दर को बढ़ाने में भी मदद करेगा।

कानूनी मुद्दे:

  • निजता के अधिकार को कमज़ोर करना:
    • यह विधायी प्रस्ताव न केवल अपराध के दोषी व्यक्तियों के बल्कि प्रत्येक सामान्य भारतीय नागरिक के निजता के अधिकार को कमज़ोर करता है।
    • यह विधेयक राजनीतिक विरोध से संलग्न प्रदर्शनकारियों तक के जैविक नमूने एकत्र कर सकने का प्रस्ताव करता है।
  • अस्पष्ट प्रावधान:
    • प्रस्तावित कानून ‘बंदी पहचान अधिनियम, 1920’ को प्रतिस्थापित करने का लक्ष्य रखता है, साथ ही काफी हद तक इसके दायरे और पहुँच का विस्तार करता है।
    • ‘जैविक नमूने’ जैसे पदों का अधिक वर्णन नहीं किया गया है, इसलिये रक्त और बाल के नमूने लेने या डीएनए नमूनों के संग्रह जैसा कोई भी दैहिक हस्तक्षेप किया जा सकता है।
    • वर्तमान में ऐसे हस्तक्षेपों के लिये एक मजिस्ट्रेट की लिखित स्वीकृति की आवश्यकता होती है।
  • अनुच्छेद 20 का उल्लंघन:
    • आशंकाएँ जताई गई हैं कि विधेयक ने नमूनों के मनमाने संग्रह को सक्षम किया है और इसमें अनुच्छेद 20 (3) के उल्लंघन की क्षमता है जो आत्म-अभिशंसन के विरुद्ध संरक्षण का अधिकार देता है।
    • विधेयक में जैविक सूचना के संग्रह में बल प्रयोग निहित है, जिससे ‘नार्को परीक्षण’ और ‘ब्रेन मैपिंग’ को बढ़ावा मिल सकता है।
  • डेटा का प्रबंधन:
    • यह विधेयक 75 वर्षों के लिये रिकॉर्ड को संरक्षित करने की अनुमति देता है। अन्य चिंताओं में वे साधन शामिल हैं जिनके द्वारा एकत्र किये गए डेटा को संरक्षित, साझा, प्रसारित और नष्ट किया जाएगा।
    • संग्रह के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर निगरानी भी हो सकती है, इस कानून के तहत डेटाबेस को अन्य डेटाबेस जैसे कि अपराध और आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क और प्रणाली (CCTNS) के साथ जोड़ा जा सकता है।
      • अपराध और आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क और प्रणाली (CCTNS) की कल्पना कॉमन इंटीग्रेटेड पुलिस एप्लीकेशन (CIPA) के अनुभव से की गई है।
  • बंदियों के बीच जागरूकता की कमी:
  • यद्यपि विधेयक में यह प्रावधान है कि कोई गिरफ्तार व्यक्ति (जो महिला या बच्चे के विरुद्ध अपराध का आरोपी नहीं हो) नमूने देने से इनकार कर सकता है, लेकिन जागरूकता के अभाव में सभी बंदी इस अधिकार का प्रयोग कर सकने में सफल नहीं होंगे।
  • पुलिस के लिये इस तरह के इनकार की अनदेखी करना भी अधिक कठिन नहीं होगा और बाद में वे दावा कर सकते हैं कि उन्होंने बंदी की सहमति से नमूने एकत्र किये हैं।

आगे की राह:

  • गोपनीयता और डेटा की सुरक्षा पर चिंता निःस्संदेह रूप से महत्त्वपूर्ण है। ऐसे कार्य जिनमें व्यक्तिगत प्रकृति के महत्त्वपूर्ण विवरणों का संग्रह, भंडारण और विनाश शामिल है, उन्हें एक मज़बूत डेटा संरक्षण कानून को लागू करने के पश्चात ही किया जाना चाहिये और इन कानूनों का उल्लंघन करने पर सख्त सजा का प्रावधान करना चाहिये।
  • कानून प्रवर्तन एजेंसियों को नवीनतम तकनीकों के उपयोग से वंचित करना अपराधों के शिकार लोगों और बड़े पैमाने पर राष्ट्र के लिये एक गंभीर नुकसान होगा। बेहतर जाँच और डेटा संरक्षण कानून के अलावा, कानून के बेहतर क्रियान्वयन के लिये भी उपाय किये जाने की जरूरत है।
  • अपराध स्थल से नमूने एकत्र करने के लिये अधिक कुशल विशेषज्ञों, फोरेंसिक प्रयोगशालाओं और किसी आपराधिक मामले में शामिल संभावित अभियुक्तों की पहचान एवं विश्लेषण के लिये उन्नत उपकरणों की आवश्यकता को भी पूरा किया जाना चाहिये।

स्रोत: द हिंदू


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

बूस्टर डोज़: कॉर्बेवैक्स

प्रिलिम्स के लिये:

वैक्सीन और प्रकार, कॉर्बेवैक्स, स्पाइक प्रोटीन।

मेन्स के लिये:

वायरल संक्रमण के इलाज में वैक्सीन की क्रियाविधि , वैक्सीन के प्रकार

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत सरकार ने घोषणा की कि जिन लोगों को कोविड–19 के लिये पहली या दूसरी खुराक के रूप में कोविशील्ड या कोवैक्सिन मिला है, वे तीसरे बूस्टर शॉट/डोज़ के रूप में कॉर्बेवैक्स ले सकते हैं।

  • कॉर्बेवैक्स अभी भी विश्व स्वास्थ्य संगठन की आपातकालीन उपयोग सूची (EUL) में शामिल होने की प्रतीक्षा कर रहा है।
  • अब तक तीसरी डोज़ वही वैक्सीन होनी चाहिये थी, जिसका उपयोग पहली और दूसरी डोज़ के लिये किया जाता था।
  • यह निर्णय भारत के दवा नियामक द्वारा 18 वर्ष की आयु के व्यक्तियों के लिये विषम कोविड बूस्टर खुराक के रूप में कॉर्बेवैक्स को मंज़ूरी देने के बाद लिया गया है।

WHO की आपातकालीन उपयोग सूची (EUL):

  • EUL सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल से प्रभावित लोगों के लिये उत्पादों की उपलब्धता में तेज़ी लाने के अंतिम उद्देश्य के साथ बिना लाइसेंस वाले टीकों, चिकित्सीय और इन-विट्रो डायग्नोस्टिक्स का आकलन और सूचीबद्ध करने हेतु जोखिम-आधारित प्रक्रिया है।
  • कई देशों में अंतर्राष्ट्रीय यात्रा के लिये लोगों को वैक्सीन प्राप्त करने की आवश्यकता होती है जो WHO की अनुमोदित सूची में है।

कॉर्बेवैक्स वैक्सीन

  • परिचय:
    • कॉर्बेवैक्स भारत का पहला स्वदेशी रूप से विकसित रिसेप्टर बाइंडिंग डोमेन (RBD) प्रोटीन सब-यूनिट वैक्सीन है, 28 दिन के अंदर इसकी 2 डोज़ लेनी होंगी।
    • इसे 2-8 डिग्री सेल्सियस पर भंडारित किया जा सकता है, जो भारत की आवश्यकताओं के लिये सबसे उपयुक्त है।
  • कार्यविधि:
    • यह एक ’रिकॉम्बिनेंट प्रोटीन सब-यूनिट’ वैक्सीन है। इसका अर्थ है कि यह ‘SARS-CoV-2’ के एक विशिष्ट भाग यानी वायरस की सतह पर मौजूद स्पाइक प्रोटीन से बना है।
      • स्पाइक प्रोटीन वायरस को शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश करने की अनुमति देता है, जिससे वह रेप्लिकेट होता है यानी उसकी संख्या में वृद्धि होती है और बीमारी का कारण बनता है।
      • हालाँकि जब अकेले स्पाइक प्रोटीन शरीर में प्रवेश करता है तो इसके हानिकारक होने की उम्मीद नहीं होती है, क्योंकि वायरस के शेष हिस्से अनुपस्थित होते हैं।
        • इस तरह जब स्पाइक प्रोटीन को मानव शरीर में इंजेक्ट किया जाता है तो शरीर में एक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया विकसित होने की उम्मीद होती है।
          • एक बार जब मानव प्रतिरक्षा प्रणाली प्रोटीन को पहचान लेती है तो यह संक्रमण से लड़ने के लिये श्वेत रक्त कणिकाओं के रूप में एंटीबॉडी का उत्पादन करती है।
        • इसके पश्चात् जब वास्तविक वायरस शरीर को संक्रमित करने का प्रयास करता है, तो शरीर के पास पहले से ही एक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया तैयार होती है, जिससे उस व्यक्ति के गंभीर रूप से बीमार पड़ने की संभावना कम हो जाती है।

अन्य प्रकार के वैक्सीन:

  • निष्क्रिय वैक्सीन:
    • निष्क्रिय वैक्सीन में मृत रोगाणु का उपयोग होता है जो एक बीमारी का कारण बनता है।
    • इस प्रकार की वैक्सीन एक रोगज़नक़ को निष्क्रिय करके बनाए जाते हैं, आमतौर पर ऊष्मा या रसायनों जैसे कि फॉर्मलाडेहाइड या फॉर्मेलिन का उपयोग करके।
      • यद्यपि रोगजनक को निष्क्रिय कर दिया जाता है या इनकी प्रजनन क्षमता को समाप्त कर दिया जाता है, रोगजनक के विभिन्न हिस्से बरकरार रहते हैं, जैसे-एंटीजन (रासायनिक संरचना) जिसकी पहचान प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा की जाती है, को अछूता रखा जाता है।
  • सक्रिय वैक्सीन:
    • इसमें किसी रोगाणु के कमज़ोर (अथवा क्षीण) रूप का उपयोग किया जाता है।
    • यह वैक्सीन प्राकृतिक संक्रमण से इतनी मिलती-जुलती है कि एक शक्तिशाली एवं दीर्घकालीन प्रतिरक्षा प्रदान करती है।
  • मैसेंजर (एम) आरएनए वैक्सीन:
    • एमआरएनए वैक्सीन प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को बढ़ाने के लिये प्रोटीन का निर्माण करते हैं। एमआरएनए वैक्सीन अन्य प्रकार के वैक्सीन की अपेक्षा अधिक प्रभावी हैं, जिसमें कम समय में इसका निर्माण भी शामिल है, क्योंकि इनमें एक जीवित वायरस नहीं होता है, अतः टीकाकरण करने वाले व्यक्ति में बीमारी पैदा होने का जोखिम नहीं होता है।
    • टीकों का उपयोग कोविड–19 से बचाव के लिये किया जाता है।
  • टॉक्सोइड वैक्सीन:
    • ये रोग का कारण बनने वाले रोगाणु के विष द्वारा (हानिकारक उत्पाद) द्वारा बनाए जाते हैं।
      • वे रोगाणु के उन हिस्सों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पैदा करते हैं जो रोगाणु के बजाय रोग का कारण बनते हैं। इसका अर्थ है कि प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पूरे रोगाणु के बजाय सिर्फ विष को लक्षित करती है।
  • वायरल वेक्टर वैक्सीन:
    • वायरल वेक्टर वैक्सीन सुरक्षा प्रदान करने के लिये एक वेक्टर के रूप में एक अलग वायरस के संशोधित संस्करण का उपयोग करते हैं।
    • कई अलग-अलग वायरस को वैक्टर के रूप में इस्तेमाल किया गया है, जिनमें इन्फ्लूएंजा, वेसिकुलर स्टामाटाइटिस वायरस (VSV), खसरा वायरस और एडेनोवायरस शामिल हैं, जो सामान्य सर्दी का कारण बनते हैं।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs):

प्रारंभिक परीक्षा:

प्रश्न. 'रिकॉम्बिनेंट वेक्टर वैक्सीन' के संबंध में हाल के घटनाक्रमों के संदर्भ मे निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)

  1. इन वैक्सीन के विकास में जेनेटिक इंजीनियरिंग का प्रयोग किया जाता है।
  2. इसमें जीवाणु और विषाणु वेक्टर के रूप में उपयोग किये जाते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)

व्याख्या:

  • रिकॉम्बिनेंट वेक्टर वैक्सीन आनुवंशिक इंजीनियरिंग के माध्यम से निर्मित की जाती हैं। बैक्टीरिया या वायरस के लिये प्रोटीन निर्मित करने वाले जीन को अलग कर दूसरी कोशिका के जीन के अंदर प्रविष्ट कराया जाता है। जब वह कोशिका पुनरुत्पादित (Reproduces) करती है, तो यह वैक्सीन प्रोटीन का उत्पादन करती है जिसका अर्थ है कि प्रतिरक्षा प्रणाली प्रोटीन को पहचान कर शरीर को इससे सुरक्षा प्रदान करेगी। अत: कथन 1 सही है।
  • जीवित पुनः संयोजक बैक्टीरिया (Live Recombinant Bacteria) या वायरल वैक्टर प्राकृतिक संक्रमणों की तरह प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावी ढंग से उत्तेजित करते हैं तथा इसमें आंतरिक सहायक गुण होते हैं। उन्हें मेज़बान जीव में प्रवेश करने हेतु एक माध्यम की तरह उपयोग किया जाता है।
    • कई जीवाणुओं को वैक्टर के रूप में इस्तेमाल किया गया है, जैसे- माइकोबैक्टीरियम बोविस बीसीजी (Mycobacterium bovis BCG), लिस्टेरिया मोनोसाइटोजेन्स (Listeria monocytogenes), साल्मोनेला एसपीपी (Salmonella spp) और शिगेला एसपीपी (Shigella spp)।
    • वैक्सीन के विकास हेतु कई वायरल वैक्टर उपलब्ध हैं, जैसे- वैक्सीनिया, मोडिफाइड वैक्सीनिया वायरस अंकारा, एडेनोवायरस, एडेनो संबंद्ध वायरस, रेट्रोवायरस/लेंटवायरस, अल्फावायरस, हर्पीज़ वायरस आदि। अत: कथन 2 सही है।
  • अतः विकल्प (c) सही है।

प्रश्न. COVID-19 महामारी ने दुनिया भर में अभूतपूर्व तबाही मचाई है। हालाँकि संकट पर विजय प्राप्त करने के लिये तकनीकी प्रगति का आसानी से लाभ उठाया जा रहा है। महामारी के प्रबंधन में सहायता हेतु प्रौद्योगिकी की मांग कैसे की गई, इसका विवरण दीजिये। (मुख्य परीक्षा 2020)

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

भारत और पाकिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह

प्रिलिम्स के लिये:

UNMOGIP, यूएनएससी, यूएनसीआईपी, कराची समझौता, शिमला समझौता।

मेन्स के लिये:

UNMOGIP पर विवाद का मुद्दाा

चर्चा में क्यों?

हाल ही में, संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने अर्जेंटीना के रियर एडमिरल गुइलेर्मो पाब्लो रियोस को भारत और पाकिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह (UNMOGIP) के मिशन प्रमुख और मुख्य सैन्य पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्त किया है।

संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह (UNMOGIP):

  • इसकी स्थापना जनवरी 1949 में हुई थी।
  • कश्मीर में प्रथम युद्ध (1947-1948) के बाद, भारत ने कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों का ध्यान आकर्षित करने के लिये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) से संपर्क किया।
  • इसी क्रम में जनवरी 1948 में, UNSC ने विवाद की जाँच और मध्यस्थता हेतु भारत और पाकिस्तान (UNCIP) के लिये तीन सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र आयोग की स्थापना करते हुए, संकल्प 39 को अपनाया।
  • अप्रैल 1948 में, इसके संकल्प 47 द्वारा, UNCIP को UNMOGIP के रूप में पुनर्गठित किया गया था।

संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह के कार्य:

  • जुलाई 1949 के कराची समझौते ने संयुक्त राष्ट्र स्तर के सैन्य पर्यवेक्षकों की भूमिका को मज़बूत किया और जम्मू और कश्मीर में स्थापित युद्धविराम रेखा के पर्यवेक्षण की अनुमति दी।
    • वर्ष 1948 में UNCIP की देखरेख में पहले भारत-पाक सशस्त्र संघर्ष के बाद, पाकिस्तान और भारत दोनों के सैन्य प्रतिनिधियों ने कराची में मुलाकात की और 27 जुलाई 1949 को कराची समझौते पर हस्ताक्षर किये।
    • इसने कश्मीर में एक संघर्ष-विराम रेखा (CFL) की स्थापना की।
  • युद्धविराम की निगरानी हेतु UNMOGIP के पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर (PAK) में छह फील्ड स्टेशन और भारतीय प्रशासित कश्मीर (IAK) में चार फील्ड स्टेशन हैं।
  • UNMOGIP 17 दिसंबर, 1971 के युद्धविराम समझौते के सख्त पालन से संबंधित घटनाओं का निरीक्षण करने और संयुक्त राष्ट्र महासचिव को रिपोर्ट करने के लिये इस क्षेत्र में बना हुआ है।

UNMOGIP भारत के लिये विवादास्पद

  • भारत आधिकारिक तौर पर कहता है कि UNMOGIP की भूमिका वर्ष 1972 के शिमला समझौते से आगे निकल गई है जिसने नियंत्रण रेखा (LoC) की स्थापना की थी।
    • शिमला समझौते में भारत और पाकिस्तान युद्धविराम रेखा को नियंत्रित करने और किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप के बिना अपने विवादों को द्विपक्षीय रूप से हल करने के लिये सहमत हुए।
    • कश्मीर और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद अब काफी हद तक भारत का आंतरिक मामला है।
  • वर्ष 1972 के बाद से भारत पाकिस्तान के खिलाफ शिकायतों के साथ UNMOGIP में नहीं गया है।
  • वर्ष 2014 में भारत ने अनुरोध किया कि UNMOGIP कश्मीर में संचालन बंद कर दे और विदेश मंत्रालय (MEA) ने वर्ष 2017 में दोहराया कि UNMOGIP के पास कश्मीर की स्थिति की निगरानी करने का कोई अधिकार नहीं है।
  • दूसरी ओर पाकिस्तान भारतीय तर्क को स्वीकार नहीं करता है और UNMOGIP से सहयोग चाहता है।
  • इन भिन्न नीतियों के परिणामस्वरूप पाकिस्तान ने UNMOGIP के पास कथित भारतीय संघर्ष विराम उल्लंघनों के खिलाफ शिकायतें दर्ज करना जारी रखा है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद संकल्प 47

  • परिचय:
    • यह कश्मीर विवाद के समाधान से संबंधित है।
    • इसके अनुसार, पाकिस्तान को अपने उन नागरिकों को वापस लेना था जो लड़ाई के उद्देश्य से और भविष्य में घुसपैठ को रोकने के लिये राज्य में प्रवेश कर चुके थे।
    • इस प्रस्ताव के माध्यम से पुनर्गठित पाँच सदस्यीय UNMOGIP ने भारत और पाकिस्तान से कानून व्यवस्था की बहाली के बाद जनमत संग्रह कराने का आग्रह किया।
    • भारत और पाकिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह (UNMOGIP) का उद्देश्य कराची समझौते के तहत जुलाई 1949 में जम्मू-कश्मीर में स्थापित संघर्ष विराम रेखा (CFL) की निगरानी करना था।
    • UNMOGIP को UN के नियमित बजट के माध्यम से वित्त पोषित किया जाता है।
  • भारत ने प्रस्ताव 47 को नकार दिया।
    • भारत का तर्क था कि प्रस्ताव में पाकिस्तान द्वारा किये गए सैन्य आक्रमण को नज़रअंदाज़ किया गया, साथ ही दोनों देशों को एक समान राजनयिक आधार पर रखना पाकिस्तान के आक्रामक रवैये को खारिज़ करता है।
    • कश्मीर के महाराजा द्वारा हस्ताक्षरित विलय पत्र (IoA) को प्रस्ताव में नज़रअंदाज कर दिया गया था।
  • संकल्प 47 पर पाकिस्तान का रुख:
    • इसने कश्मीर में भारतीय बलों की न्यूनतम उपस्थिति पर भी आपत्ति जताई, जैसा कि संकल्प द्वारा अनिवार्य है।
    • यह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में प्रभावी पार्टी के लिये राज्य सरकार में समान प्रतिनिधित्व चाहता था।

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

डिजिटल मुद्रा

प्रिलिम्स के लिये:

संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास निकाय (UNCTAD), डिजिटल मुद्रा, बिटकॉइन, एथेरियम, ब्लॉकचैन, सेंट्रल बैंक डिजिटल मुद्राएँ, आभासी मुद्राएँ।

मेन्स के लिये:

डिजिटल मुद्राओं का महत्त्व और चुनौतियाांँ।

चर्चा में क्यों?

संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास निकाय (UNCTAD) के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2021 में सात प्रतिशत से अधिक भारतीयों के पास क्रिप्टोकरेंसी के रूप में डिजिटल मुद्रा थी।

  • साथ ही जनसंख्या के हिस्से के रूप में डिजिटल मुद्रा स्वामित्व के लिये शीर्ष 20 वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की सूची में भारत सातवें स्थान पर था।

अध्ययन की अन्य मुख्य विशेषताएँ:

  • विकासशील देश शीर्ष 20 अर्थव्यवस्थाओं में से 15 के लिये ज़िम्मेदार है, जिनकी आबादी क्रिप्टोकरेंसी में भागीदारी रखती हैं।
  • यूक्रेन इस सूची में सबसे ऊपर है जिसके बाद रूस, वेनेज़ुएला, सिंगापुर, केन्या और अमेरिका का स्थान है।
  • विकासशील देशों सहित कोविड -19 महामारी के दौरान क्रिप्टोकरेंसी का वैश्विक उपयोग तेज़ी से बढ़ा है।

अध्ययन में शामिल किये गये मुद्दे:

  • अस्थिर वित्तीय संपत्ति:
    • निजी डिजिटल मुद्राओं ने कुछ को पुरस्कृत किया है और प्रेषण की सुविधा दी है, लेकिन वे एक अस्थिर वित्तीय संपत्ति हैं जो सामाजिक जोखिम और लागत भी ला सकती हैं।
  • अनियंत्रित:
    • चूँकि इन डिजिटल मुद्राओं को विनियमित नहीं किया जाता है, विकासशील देशों में उनकी मांग में तेज़ी से वृद्धि हुई है क्योंकि यह प्रेषण की सुविधा में मदद करता है और मुद्रास्फीति के खिलाफ बचाव के रूप में कार्य करता है।
  • अस्थिर प्रणाली:
    • बाज़ार में हालिया डिजिटल मुद्रा की समस्या से पता चलता है कि क्रिप्टोकरेंसी रखना निजी जोखिम हैं, लेकिन अगर केंद्रीय बैंक वित्तीय स्थिरता की रक्षा के लिये कदम उठाता है, तो यह समस्या सार्वजनिक हो जाती है।
  • मौद्रिक संप्रभुता को खतरा:
    • यदि क्रिप्टोकरेंसी भुगतान का एक व्यापक साधन बन जाती है और यहाँ तक कि घरेलू मुद्राओं को अनौपचारिक रूप से बदल देती है (एक प्रक्रिया जिसे क्रिप्टोकरण कहा जाता है), तो यह देशों की मौद्रिक संप्रभुता को खतरे में डाल सकता है।
  • घरेलू नीतियों पर प्रतिकूल प्रभाव:
    • विकासशील देशों में क्रिप्टोकरेंसी घरेलू संसाधन जुटाने की गतिविधि को धीमा कर सकती है।

अध्ययन द्वारा रेखांकित सुझाव:

  • सरकार को प्रेषण की सुविधा प्रदान करनी चाहिये, क्योंकि इसके अवैध प्रवाह के माध्यम से कर अपवंचन और परिहार को बढ़ावा मिल सकता है।
  • अध्ययन ने अधिकारियों से विकासशील देशों में क्रिप्टोकरेंसी के विस्तार को रोकने के लिये कदम उठाने का आग्रह किया, जिसमें क्रिप्टो एक्सचेंजों, डिजिटल वॉलेट और विकेंद्रीकृत वित्त को विनियमित करके क्रिप्टोकरेंसी के व्यापक वित्तीय विनियमन को सुनिश्चित करना और विनियमित वित्तीय संस्थानों को क्रिप्टोकरेंसी (स्थिर स्टॉक सहित) रखने या ग्राहकों को संबंधित उत्पादों की पेशकश करने से रोकना शामिल है।
  • इसने अन्य उच्च जोखिम वाली वित्तीय परिसंपत्तियों की तरह डिजिटल मुद्राओं से संबंधित विज्ञापनों पर भी प्रतिबंध लगाने का आह्वान किया।
  • इसके अलावा एक सुरक्षित, विश्वसनीय और लागत प्रभावी सार्वजनिक भुगतान प्रणाली प्रदान करना जो डिजिटल युग के लिये उपयुक्त हो; डिजिटल मुद्रा कर उपायों, विनियमों और सूचना साझाकरण पर वैश्विक कर सामंजस्य को लागू कर डिजिटल मुद्राओं की विकेंद्रीकृत प्रकृति, सीमाहीन और छद्म नाम की विशेषताओं को समायोजित करने के लिये पूंजी नियंत्रण को नया स्वरूप प्रदान किया जाना चाहिये।

डिजिटल मुद्रा:

  • परिचय:
    • यह एक भुगतान विधि है जो केवल इलेक्ट्रॉनिक रूप में मौजूद है और मूर्त नहीं है।
    • इसे कंप्यूटर, स्मार्टफोन और इंटरनेट जैसी तकनीक की मदद से संस्थाओं या उपयोगकर्त्ताओं के बीच स्थानांतरित किया जा सकता है।
    • यद्यपि यह भौतिक मुद्राओं के समान है, डिजिटल मुद्रा स्वामित्व के सीमाहीन हस्तांतरण के साथ-साथ तात्कालिक लेनदेन की अनुमति देती है।
    • डिजिटल करेंसी को डिजिटल मनी और साइबर कैश के नाम से भी जाना जाता है।
      • जबकि भौतिक मुद्राएँ, जैसे कि बैंक नोट और ढाले हुए सिक्के मूर्त हैं, जिसका अर्थ है कि उनकी निश्चित भौतिक विशेषताएँ और प्रकार्य हैं।
  • विशेषताएँ:
    • डिजिटल मुद्राओं को केंद्रीकृत या विकेंद्रीकृत किया जा सकता है।
      • फिएट मुद्रा, यह भौतिक रूप में मौजूद होती है, जो एक केंद्रीय बैंक और सरकारी एजेंसियों द्वारा उत्पादन और वितरण की एक केंद्रीकृत प्रणाली है।
        • प्रमुख क्रिप्टोकरेंसी, जैसे कि- बिटकॉइन और एथेरियम, विकेंद्रीकृत डिजिटल मुद्रा प्रणाली के उदाहरण हैं।
  • प्रकार: इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की मुद्राएँ मौजूद हैं। मोटे तौर पर, तीन अलग-अलग प्रकार की मुद्राएँ हैं:

क्रिप्टोकरेंसी:

  • क्रिप्टोकरेंसी डिजिटल मुद्राएँ हैं जो नेटवर्क में लेनदेन को सुरक्षित और सत्यापित करने हेतु क्रिप्टोग्राफी का उपयोग करती हैं।
    • क्रिप्टोग्राफी का उपयोग ऐसी मुद्राओं के निर्माण को प्रबंधित और नियंत्रित करने के लिये भी किया जाता है।
      • बिटकॉइन और एथेरियम क्रिप्टोकरेंसी के उदाहरण हैं।

आभासी मुद्राएँ (Virtual Currencies):

  • आभासी मुद्राएँ डेवलपर्स या प्रक्रिया में शामिल विभिन्न हितधारकों से मिलकर संस्थापक संगठन द्वारा नियंत्रित अनियमित डिजिटल मुद्राएँ हैं।
  • आभासी मुद्राओं को परिभाषित नेटवर्क प्रोटोकॉल द्वारा एल्गोरिथम रूप से नियंत्रित किया जा सकता है।
    • आभासी मुद्रा का उदाहरण गेमिंग नेटवर्क टोकन है जिसका अर्थशास्त्र डेवलपर्स द्वारा परिभाषित और नियंत्रित किया जाता है।

सेंट्रल बैंक डिजिटल मुद्राएँ:

  • केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राएँ (CBDC) किसी देश के केंद्रीय बैंक द्वारा जारी की गई विनियमित डिजिटल मुद्राएँ हैं।
    • CBDC पारंपरिक फिएट मुद्रा का पूरक या प्रतिस्थापन हो सकता है।
    • फिएट मुद्रा के विपरीत (जो भौतिक और डिजिटल दोनों रूपों में मौजूद है) CBDC विशुद्ध रूप से डिजिटल रूप में मौजूद है।
      • इंग्लैंड, स्वीडन और उरुग्वे कुछ ऐसे देश हैं जो अपनी मूल फिएट मुद्राओं का डिजिटल संस्करण लॉन्च करने की योजना पर विचार कर रहे हैं।
डिजिटल मुद्रा आभासी मुद्रा क्रिप्टोकरेंसी
विनियमित या अनियमित मुद्रा जो केवल डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध है। एक अनियमित डिजिटल मुद्रा जो उसके विकासकर्त्ता/विकासकर्त्ताओं, उसके संस्थापक संगठन, या उसके परिभाषित नेटवर्क प्रोटोकॉल द्वारा नियंत्रित होती है। एक आभासी मुद्रा जो लेनदेन को सुरक्षित और सत्यापित करने के साथ-साथ नई मुद्रा इकाइयों के निर्माण को प्रबंधित एवं नियंत्रित करने हेतु क्रिप्टोग्राफी का उपयोग करती है।
  • लाभ:
    • इसका तेज़ी से आहरण किया जा सकता है,
    • साथ ही भौतिक निर्माण की आवश्यकता नहीं है अतः लागत बचाता है।
    • इसके अलावा मौद्रिक और राजकोषीय नीति के कार्यान्वयन में आसानी एवं लेनदेन की लागत को सस्ता बनाते हैं।
  • हानि:
    • हैकिंग के लिये अतिसंवेदनशील।
    • अस्थिर मूल्य।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:

प्रश्न: "ब्लॉकचैन टेक्नोलॉजी" के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:

  1. यह एक सार्वजनिक खाता बही है जिसका हर कोई निरीक्षण कर सकता है, लेकिन कोई एकल उपयोगकर्त्ता नियंत्रित नहीं करता है।
  2. ब्लॉकचेन की संरचना और डिज़ाइन ऐसी है कि इसमें मौजूद सभी डेटा केवल क्रिप्टोकरेंसी के बारे में है।
  3. अनुप्रयोग जो कि बुनियादी सुविधाओं पर निर्भर करते हैं, ब्लॉकचेन को बिना किसी अनुमति के विकसित किया जा सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 2
(d) केवल 1 और 3

उत्तर: (d)

  • ब्लॉकचैन सार्वजनिक बही खाता का एक रूप है, जो ब्लॉकों की एक शृंखला है, जिस पर निर्दिष्ट नेटवर्क प्रतिभागियों द्वारा उपयुक्त प्रमाणीकरण और सत्यापन के बाद लेन-देन के विवरण दर्ज किये जाते हैं तथा सार्वजनिक डेटाबेस पर संग्रहीत किये जाते हैं। एक सार्वजनिक खाता बही को देखा जा सकता है लेकिन किसी एक उपयोगकर्ता द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। अत: कथन 1 सही है।
  • ब्लॉकचेन न केवल क्रिप्टोकरेंसी के बारे में है, बल्कि यह पता चला है कि ब्लॉकचेन वास्तव में अन्य प्रकार के लेन-देन के बारे में डेटा संग्रहीत करने का एक बहुत ही विश्वसनीय तरीका है।
  • वास्तव में ब्लॉकचेन तकनीक का उपयोग संपत्ति के आदान-प्रदान, बैंक लेनदेन, स्वास्थ्य सेवा, स्मार्ट अनुबंध, आपूर्ति शृंखला और यहाँ तक कि एक उम्मीदवार के लिये मतदान में भी किया जा सकता है। अतः कथन 2 सही नहीं है।
  • हालाँकि क्रिप्टोकरेंसी को विनियमित किया जाता है और केंद्रीय अधिकारियों के अनुमोदन की आवश्यकता होती है, लेकिन ब्लॉकचेन तकनीक केवल क्रिप्टोकुरेंसी के बारे में नहीं है। इसके विभिन्न उपयोग हो सकते हैं और प्रौद्योगिकी की बुनियादी विशेषताओं के आधार पर अनुप्रयोगों को बिना किसी अनुमोदन के विकसित किया जा सकता है। अत: कथन 3 सही है। अतः विकल्प (d) सही उत्तर है।

स्रोत: बिज़नेस स्टैंडर्ड


एसएमएस अलर्ट
Share Page