आंतरिक सुरक्षा
भारत के लिये बहु-क्षेत्रीय निवारण
प्रिलिम्स के लिये: मल्टी-डोमेन डेटरेंस, ड्रोन स्वार्म, क्वांटम एंक्रिप्शन, C4ISR, सशस्त्र बलों का थिएटराइज़ेशन
मेन्स के लिये: मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस और आधुनिक वॉर, एकीकृत थिएटर कमांड और रक्षा सुधार, राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ावा देने में AI का उपयोग, AI के शस्त्रीकरण से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को होने वाले खतरे
चर्चा में क्यों?
रणनीतिक आकलन भारत और चीन के बीच बढ़ती सैन्य कमी को उजागर करते हैं, जो चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के तीव्र आधुनिकीकरण से प्रेरित है। इसने भारत की निवारण क्षमताओं पर चिंताएँ बढ़ा दी हैं, जिससे उभरती सुरक्षा चुनौतियों का समाधान करने के लिये मल्टी-डोमेन डेटरेंस (MDD) स्ट्रेटजी की ओर बदलाव को बढ़ावा मिला है।
सारांश
- भारत चीन के साथ बढ़ते सैन्य अंतर का सामना कर रहा है, जो PLA के तीव्र आधुनिकीकरण का परिणाम है, जिससे मज़बूत और एकीकृत निवारण आवश्यक हो गया है।
- मल्टी-डोमेन डेटरेंस सभी क्षेत्रों में क्षमताओं के संयोजन और एक विश्वसनीय सैन्य प्रतिक्रिया के निर्माण के लिये रक्षा-औद्योगिक आधार को सुदृढ़ करने पर केंद्रित है।
मल्टी-डोमेन डेटरेंस (MDD) क्या है?
- परिचय: मल्टी-डोमेन डेटरेंस एक व्यापक सामरिक ढाँचा है, जिसमें एक राष्ट्र अपनी सैन्य और गैर-सैन्य क्षमताओं को कई क्षेत्रों ज़मीन, हवा, समुद्र, साइबर, अंतरिक्ष और संज्ञानात्मक (सूचना) में एकीकृत करता है, ताकि विरोधियों को रोका जा सके।
- साइलो से सिनर्जी तक: यह पृथक्, सेवा-विशिष्ट वॉरफेयर (सेना, नौसेना, वायु सेना अलग-अलग लड़ना) से आगे बढ़कर "सिस्टम-ऑफ-सिस्टम्स" आर्किटेक्चर में बदल जाता है जहाँ सेंसर, शूटर और निर्णय-निर्माता डिजिटल रूप से परस्पर संबंधित होते हैं।
- निषेध द्वारा निवारण: इसका उद्देश्य एक प्रतिद्वंद्वी को यह विश्वास दिलाना है कि आक्रामकता का कदम परिचालन स्तर पर विफल हो जाएगी (जैसे– एयर और साइबर डिनायल के माध्यम से) और विभिन्न मोर्चों पर एक साथ अस्वीकार्य लागत वहन करनी पड़ेगी।
- ARADO ढाँचा: MDD भारत की सक्रिय रूप से ऑल रियल्म ऑल डोमेन ऑपरेशन (ARADO) की ओर विकसित होने की रणनीति के साथ संरेखित है, जो "इंटेलिजेंट वॉरफेयर" और गैर-परमाणु सामरिक निरोध पर ध्यान केंद्रित करता है, ताकि एस्केलेशन लेडर के प्रत्येक स्तर पर जीत हासिल की जा सके।
- भारत में मल्टी-डोमेन डेटरेंस की आवश्यकता:
- चीन की चुनौती: चीन का "इंटेलिजेंटाइज़्ड" वॉर फेयर उपग्रहों, AI और प्रिसीजन मिसाइलों के सघन नेटवर्क का उपयोग करता है। भारत पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के खिलाफ एक बढ़ती क्षमता अंतर का सामना करता है।
- टू-फ्रंट थ्रेट: चीन और पाकिस्तान दोनों से लगातार खतरा, जिसमें संभावित मिलीभगत भी शामिल है, रक्षा योजना को जटिल बनाता है और क्रॉस-डोमेन फोर्स मल्टीफिकेशन की आवश्यकता होती है।
- ग्रे-ज़ोन वॉरफेयर का उदय: आधुनिक संघर्षों में साइबर हमले, दुष्प्रचार और आर्थिक दबाव तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं। MDD भारत को इन नॉन-काइनेटिक थ्रेट का पता लगाने और जवाब देने में सक्षम बनाता है।
- संवेदनशील समुद्री मार्ग: भारत का 90% से अधिक व्यापार हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) से होकर गुज़रता है।
- MDD नौसेना, एयर, साइबर और अंतरिक्ष संपत्तियों के एकीकरण के माध्यम से स्तरित समुद्री सुरक्षा प्रदान करता है।
MDD के लिये भारत के पास कौन-से रणनीतिक विकल्प उपलब्ध हैं?
- साहसिक दृष्टिकोण (प्रौद्योगिकीय छलाँग): पूरी तरह से विघटनकारी नई युद्ध-प्रौद्योगिकियों, जैसे– कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वायत्त ड्रोन झुंड और क्वांटम एंक्रिप्शन पर दाँव लगाना।
- हालाँकि भारत में औद्योगिक पैमाने की कमी के कारण कार्यान्वयन में विफलता गंभीर क्षमता अंतर पैदा कर सकती है।
- संरक्षात्मक दृष्टिकोण (क्रमिक एकीकरण): उभरती हुई प्रौद्योगिकियों (साइबर, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध) को मौजूदा पारंपरिक प्रणालियों के साथ जोड़ना।
- यह दक्षता में सुधार करता है और पाकिस्तान जैसे छोटे संघर्षों के लिये उपयुक्त है, लेकिन चीन के साथ दीर्घकालिक शक्ति संतुलन को बदलने में असफल रहता है।
- मध्यम मार्ग दृष्टिकोण: पारंपरिक प्रणालियों पर निर्भरता बनाए रखते हुए साथ ही साथ महत्त्वपूर्ण सहायक प्रणालियों (कमांड एंड कंट्रोल, खुफिया, निगरानी एवं टोही, गहरे हमले, निकट युद्ध, रसद और अवसंरचना) में निवेश जारी रखना।
- समय के साथ यह भारत की सेना को एक समन्वित, बहु-क्षेत्रीय बल के रूप में विकसित करता है।
- वर्तमान सीमाओं को देखते हुए इसे सबसे व्यावहारिक और प्राप्त करने योग्य विकल्प माना जाता है।
भारत की निवारण मुद्रा में प्रणालीगत चुनौतियाँ क्या हैं?
- कमज़ोर रक्षा-औद्योगिक आधार: भारत का रक्षा-औद्योगिक आधार उस गति और पैमाने पर उत्पादन करने के लिये संरचित नहीं है जो चीन की सैन्य उत्पादन क्षमता के बराबर हो सके।
- सैन्य आवश्यकताओं को औद्योगिक लक्ष्यों में बदलने की क्षमता अभी भी संदिग्ध बनी हुई है। सार्वजनिक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता ने दक्षता, नवाचार और प्रतिस्पर्द्धा को सीमित कर दिया है।
- दोषपूर्ण खरीद प्रणाली: खरीद प्रणाली लड़ाकू बल के विकास के बजाय उसे सीमित करती है। लंबी प्रक्रिया, लालफीताशाही और बजट की अस्थिरता के कारण महत्त्वपूर्ण प्लेटफॉर्म का शामिल होना (इंडक्शन) विलंबित हो जाता है।
- ध्यान अभी भी सेवा-विशिष्ट खरीद पर केंद्रित है, बजाय इसके कि प्रतिरोध क्षमता की आधारभूत प्रणालियों को मज़बूत किया जाए।
- व्यय अधिक है, लेकिन यह स्मार्ट नहीं है, क्योंकि इसमें प्रमुख प्रतिरोध क्षमताओं की स्पष्ट प्राथमिकता का अभाव है।
- अविकसित C4ISR संरचना: भारत की C4ISR प्रणाली अभी प्रारंभिक अवस्था में है और तीनों सेनाओं के बीच खंडित रूप में फैली हुई है।
- साइबर, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में मौजूद कमियाँ भारत की प्रतिद्वंद्वी प्रणालियों को भ्रमित करने और उन्हें निष्क्रिय करने की क्षमता को और अधिक कमज़ोर कर देती हैं।
- सैद्धांतिक अस्पष्टता और सेवाओं के बीच अंतर: बहु-क्षेत्रीय संचालन (MDO) की अवधारणा को भारत के संदर्भ में परिभाषित करना कठिन है और इसे व्यावहारिक रूप से लागू करना और भी अधिक चुनौतीपूर्ण है।
- सशस्त्र बलों का थिएटराइज़ेशन अकेले सक्षम करने वाली आधारभूत प्रणालियाँ नहीं बना सकता, जब तक कि सेवाओं के बीच गहरा सैद्धांतिक सामंजस्य न हो। प्रौद्योगिकी सिद्धांतों से तेज़ी से विकसित हो रही है, जिससे सटीक रणनीतिक निर्णय लेना लगातार अधिक कठिन होता जा रहा है।
- राजनीतिक और संस्थागत अंतर: प्रतिरोध (डिटरेंस) के लक्ष्यों और उन्हें प्राप्त करने के लिये आवश्यक औद्योगिक रणनीति पर कोई व्यापक राष्ट्रीय सहमति मौजूद नहीं है।
- औद्योगिक और सैद्धांतिक सुधार के लिये उपलब्ध समय सीमित होता जा रहा है, फिर भी इस आवश्यकता की तात्कालिकता को पर्याप्त रूप से समझा नहीं जा रहा है।
आगे की राह
- व्यवस्था-स्तरीय क्षमता की ओर बदलाव: केवल सेवा-विशिष्ट प्लेटफॉर्म (जैसे– लड़ाकू विमान या टैंक खरीद) तक सीमित रहने के बजाय एकीकृत और संपूर्ण प्रणाली-आधारित क्षमताओं का विकास करना।
- निजी क्षेत्र को सशक्त बनाना: सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों (PSUs) पर अत्यधिक निर्भरता को समाप्त करना और iDEX जैसी पहलों तथा दीर्घकालिक विशेष अनुबंधों के माध्यम से निजी उद्योगों तथा स्टार्टअप्स की गतिशील क्षमता का उपयोग करना।
- संस्थागत समन्वय: अनुसंधान संस्थानों, निजी उद्योग, सशस्त्र बलों और राजनीतिक नेतृत्व के बीच घनिष्ठ तालमेल सुनिश्चित करना, जो परिणाम-आधारित योजना और स्थिर वित्तपोषण के माध्यम से हो।
- उदाहरण के लिये, मिसाइल प्रणालियों और ड्रोन में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग जैसी पहलें प्रौद्योगिकी विकास को सैन्य आवश्यकताओं और रणनीतिक प्राथमिकताओं के साथ समन्वित करने के प्रयासों को दर्शाती हैं।
- थिएटर कमांड्स का क्रियान्वयन करना: युद्ध के सभी क्षेत्रों में सिद्धांतगत समन्वय और एकीकृत, त्वरित निर्णय-निर्माण सुनिश्चित करने के लिये एकीकृत थिएटर कमांड्स की स्थापना में तेज़ी लाएँ।
- क्रिटिकल इनेबलिंग लेयर्स को ठीक करना:
- C4ISR: बड़ी संख्या में किफायती और क्षति-सहनशील ISR प्लेटफॉर्म में निवेश करना; बहु-स्तरीय C4ISR विकसित करना जो अपनी क्षमता को बढ़ाए और प्रतिद्वंद्वी की क्षमता को कमज़ोर करे।
- स्ट्राइक लेयर: गहन प्रहार अभियानों के लिये मिसाइल, विमान और ड्रोन का एकीकरण करना, ताकि दुश्मन को असंतुलित किया जा सके।
- क्लोज़-बैटल लेयर: भूमि-आधारित प्लेटफॉर्म-टैंक, तोपखाना और इन्फैंट्री फाइटिंग व्हीकल का आधुनिकीकरण करना।
- लॉजिस्टिक्स लेयर: एक सुदृढ़ रियर ज़ोन आपूर्ति शृंखला विकसित करना, जो लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष को बनाए रखने में सक्षम हो।
निष्कर्ष
चीन के विरुद्ध भारत की प्रतिरोधक क्षमता किसी एक निर्णायक हथियार से नहीं आएगी। यह एक समन्वित क्षमताओं की प्रणाली से विकसित होगी, जिसे सुदृढ़ औद्योगिक आधार, समझदारीपूर्ण नीतिगत निर्णयों और एकीकृत सैन्य सोच के माध्यम से समय के साथ निर्मित किया जाएगा। सुधार का अवसर अभी भी उपलब्ध है, लेकिन यह तेज़ी से संकीर्ण होता जा रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. बहु-क्षेत्रीय निवारण (MDD) क्या है?
यह एक ऐसी रणनीति है, जो भूमि, वायु, समुद्र, साइबर, अंतरिक्ष और सूचना क्षेत्रों में क्षमताओं को एकीकृत करके समन्वित कार्रवाई के माध्यम से प्रतिद्वंद्वियों को निरुत्साहित करती है।
2. C4ISR क्या है और यह क्यों महत्त्वपूर्ण है?
C4ISR का अर्थ है कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन, कंप्यूटर, इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकोनिसेंस; यह वास्तविक समय में युद्धक्षेत्र की जानकारी और निर्णय-निर्माण को सक्षम बनाता है।
3. भारत के रक्षा-औद्योगिक आधार में मुख्य चुनौती क्या है?
गति, पैमाने और निजी क्षेत्र की भागीदारी की कमी उन्नत सैन्य प्रणालियों के कुशल उत्पादन को सीमित करती है।
4. भारत के लिये ग्रे-ज़ोन युद्ध क्यों महत्त्वपूर्ण है?
इसमें साइबर हमले, दुष्प्रचार और आर्थिक दबाव जैसे उपाय शामिल होते हैं, जो युद्ध की औपचारिक सीमा से नीचे होते हैं और बहु-क्षेत्रीय प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है।
5. इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स की भूमिका क्या है?
ये विभिन्न सेवाओं के बीच संयुक्तता और एकीकृत संचालन सुनिश्चित करते हैं, जिससे तेज़ और समन्वित सैन्य प्रतिक्रिया संभव होती है।
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दृष्टि मुख्य परीक्षा प्रश्न: प्रश्न: ‘नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर के युग में, भारत की प्रतिरोधक क्षमता की विश्वसनीयता केवल सैन्य प्लेटफॉर्म के अधिग्रहण पर नहीं, बल्कि उसके रक्षा-औद्योगिक आधार पर अधिक निर्भर करती है।’ चर्चा कीजिये। |
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न. ‘भारत में बढ़ते हुए सीमापारीय आतंकी हमले और अनेक सदस्य-राज्यों के आंतरिक मामलों में पाकिस्तान द्वारा बढ़ता हुआ हस्तक्षेप सार्क (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) के भविष्य के लिये सहायक नहीं है।’ उपयुक्त उदाहरणों के साथ स्पष्ट कीजिये। (2016)
प्रश्न. ‘उग्र अनुसरण’ एवं ‘शल्यक प्रहार’ पदों का प्रयोग प्रायः आतंकी हमलों के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही के लिये किया जाता है। इस प्रकार की कार्यवाहियों के युद्धनीतिक प्रभाव की विवेचना कीजिये। (2016)

कृषि
भारत के कपास क्षेत्र का संवर्द्धन
प्रिलिम्स के लिये: कपास, धान, पिंक बॉलवर्म, Bt कपास, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY), सिंधु घाटी सभ्यता, काली कपास मिट्टी, दक्कन का पठार, कस्तूरी ब्रांड, पीएम मित्र योजना, ब्लॉकचेन
मेन्स के लिये: भारत में कपास से संबंधित प्रमुख तथ्य, इससे जुड़ी समस्याएँ तथा आगे की राह।
चर्चा में क्यों?
कीटों में विकसित होती प्रतिरोधक क्षमता, बाज़ार की अनिश्चितता और बढ़ती इनपुट लागतों के सम्मिलित प्रभाव ने हरियाणा में कपास की खेती को उच्च-मूल्य खरीफ फसल से घटाकर किसानों के लिये एक अलाभकारी उपक्रम बना दिया है। फलस्वरूप किसान ऋण के जाल में फँसते जा रहे हैं और जल-गहन धान की खेती की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे गंभीर पर्यावरणीय दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।
सारांश
- भारत का कपास क्षेत्र बढ़ती इनपुट लागतों तथा पिंक बॉलवर्म (गुलाबी सुंडी) द्वारा Bt तकनीक के प्रति विकसित प्रतिरोध के कारण गंभीर संकट का सामना कर रहा है।
- यह आर्थिक रूप से अलाभकारी स्थिति किसानों को पारिस्थितिक दृष्टि से प्रतिकूल तथा अत्यधिक जल-आधारित धान की खेती की ओर प्रेरित कर रही है।
- इस ‘सफेद सोना’ क्षेत्र के संवर्द्धन हेतु त्वरित एवं लक्षित नीतिगत हस्तक्षेप आवश्यक हैं, जिनमें अगली पीढ़ी के बीजों का विकास, उच्च-घनत्व रोपण प्रणाली का विस्तार तथा ‘कस्तूरी कॉटन’ के वैश्विक ब्रांड को सुदृढ़ करना सम्मिलित है।
भारत में कपास की खेती से जुड़ी चुनौतियाँ क्या हैं?
- कीट-जनित उत्पादन में गिरावट: पिंक बॉलवर्म ने वर्ष 2014 के बाद से Bt कपास (आनुवंशिक रूप से परिवर्तित) के प्रति उल्लेखनीय प्रतिरोध विकसित कर लिया है। इसके परिणामस्वरूप उत्पादन 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ से घटकर मात्र 3-4 क्विंटल रह गया है, जिससे यह तकनीक काफी हद तक अप्रभावी हो गई है।
- आर्थिक अलाभकारिता: चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (CCSHAU) की ‘इकोनॉमिक्स ऑफ खरीफ क्रॉप्स 2025’ रिपोर्ट के अनुसार, कपास किसानों को प्रति एकड़ औसतन ₹15,143 का शुद्ध नुकसान हो रहा है। कुल खेती लागत (लगभग ₹40,024) अब सकल आय (लगभग ₹24,882) से कहीं अधिक हो गई है।
- कृषि क्षेत्र में तीव्र कमी: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, कपास के तहत खेती का क्षेत्र वर्ष 2019-20 में 0.72 मिलियन हेक्टेयर से घटकर वर्ष 2024-25 में 0.40 मिलियन हेक्टेयर रह गया है। यह गिरावट हरियाणा की राष्ट्रीय हिस्सेदारी में भी कमी को दर्शाती है, जो 5.36% से घटकर 3.47% हो गई है।
- बाज़ार एवं MSP असमानता (Market & MSP Disparity): किसान अक्सर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से काफी कम दरों पर निजी खरीदारों को अपनी उपज बेचने के लिये विवश होते हैं, कभी-कभी प्रति क्विंटल ₹1,600 तक कम जिसका कारण कथित ‘गुणवत्ता संबंधी मुद्दे’ तथा प्रभावी सरकारी खरीद व्यवस्था का अभाव है।
- धान की ओर झुकाव एवं पारिस्थितिक जोखिम: हरियाणा सरकार की ‘मेरा पानी-मेरी विरासत’ योजना (धान से हटने पर ₹8,000 प्रति एकड़ प्रोत्साहन) के बावजूद, कपास संकट किसानों को पुनः जल-गहन धान की खेती की ओर प्रेरित कर रहा है। इससे सिरसा और हिसार जैसे अर्द्ध-शुष्क ज़िलों में भूजल संरक्षण पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है।
- व्यापार की शर्तों (Terms of Trade- ToT) में असंतुलन: किसान इनपुट लागतों (डीज़ल, बीज, उर्वरक) और उत्पादन मूल्य के बीच महत्त्वपूर्ण अंतर की ओर संकेत करते हैं। उदाहरणतः पिछले दो दशकों में एक क्विंटल अनाज की सोना या ईंधन के सापेक्ष क्रय शक्ति में भारी गिरावट आई है।
- सामाजिक-आर्थिक विस्थापन: कपास उत्पादन अत्यधिक श्रम-प्रधान है, जिसमें विशेष रूप से महिलाओं और स्थानीय अनुसूचित जाति (SC) के श्रमिकों की कपास चुनाई में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। धान की यंत्रीकृत कटाई की ओर बदलाव प्रवासी श्रमिकों को अधिक प्राथमिकता देता है, जिससे स्थानीय लोगों के लिये मौसमी रोज़गार के अवसर घटते हैं और ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन बढ़ता है।
- बीमा एवं नीतिगत कमियाँ: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के अंतर्गत प्रीमियम का भुगतान करने के बावजूद, किसान बताते हैं कि कीट-जनित फसल हानि के मामलों में बीमा दावों के निपटान में लगातार विलंब होता है या कई बार दावे अस्वीकृत कर दिये जाते हैं।
भारत में कपास से संबंधित मुख्य तथ्य क्या हैं?
- परिचय: कपास, जिसे प्रायः "व्हाइट गोल्ड" कहा जाता है, भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण वाणिज्यिक फसलों में से एक है, जो कृषि और औद्योगिक अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- भारत ने सिंधु घाटी सभ्यता के बाद से ही उच्च गुणवत्ता वाले, विश्व-प्रसिद्ध वस्त्रों का उत्पादन किया है; हालाँकि, ब्रिटिश शासन के तहत, भारत को ब्रिटिश वस्त्र उद्योगों के लिये कच्चे माल की आपूर्ति करने तक सीमित कर दिया गया था।
- भौगोलिक और जलवायु संबंधी आवश्यकताएँ:
- जलवायु: कपास एक उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय फसल है। इसे 21°C से 30°C के मध्यम तापमान की आवश्यकता होती है।
- वर्षा: इसे 50 से 100 सेमी. वर्षा की आवश्यकता होती है। हालाँकि इसे सिंचाई के माध्यम से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता है (जैसा कि हरियाणा और राजस्थान में)।
- फ्रॉस्ट-फ्री डे: कपास के लिये एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता बढ़ते मौसम के दौरान कम-से-कम 210 फ्रॉस्ट-फ्री डे हैं।
- मृदा: कपास की कृषि दक्कन के पठार की अच्छी जल अपवाह वाली काली मृदा (रेगुर मृदा) के अनुकूल है, जो अपनी उच्च आर्द्रता धारण क्षमता के लिये जानी जाती है। यह जलोढ़ मृदा (उत्तरी भारत) और लाल/लैटेराइट मृदा (दक्षिणी भारत) में भी होती है।
- उत्पादन और वितरण: भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक है, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग 20% हिस्सा है। इसके पास विश्व में सबसे बड़ा कपास उत्पादन क्षेत्र भी है (वैश्विक कपास उत्पादन क्षेत्र का लगभग 40%)।
- प्रमुख उत्पादक राज्य: कृषि को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है:
- उत्तरी क्षेत्र: पंजाब, हरियाणा और राजस्थान।
- मध्य क्षेत्र: गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश।
- दक्षिणी क्षेत्र: तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु।
- प्रमुख उत्पादक राज्य: कृषि को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है:
- वैविध्य और जैव प्रौद्योगिकी: भारत एकमात्र ऐसा देश है जहाँ कपास की सभी चार प्रकार की कृषि योग्य प्रजातियों को व्यावसायिक पैमाने पर उगाया जाता है अर्थात् जी. अर्बोरियम और जी. हर्बेसियम (एशियाई कपास), जी. बार्बाडेंस (मिस्री कपास) और जी. हिरसुटम (अमेरिकी अपलैंड कपास)।
- जी. हिरसुटम भारत में संकर कपास उत्पादन का 90% हिस्सा है और सभी मौजूदा बीटी कपास संकर जी. हिरसुटम ही हैं।
- भारत के लगभग 95% कपास क्षेत्र में Bt कपास (आनुवंशिक रूप से संशोधित) का उत्पादन होता है। इसे अमेरिकी बॉलवर्म से निपटने के लिये वर्ष 2002 में लाया गया था।
- आर्थिक महत्त्व: यह अनुमानित 6 मिलियन किसानों और संबंधित प्रसंस्करण एवं व्यापार में लगभग 40-50 मिलियन लोगों को आजीविका प्रदान करता है।
- भारत कपास का प्रमुख निर्यातक देश है (जो चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा कपास निर्यातक है), जिसके प्रमुख बाज़ार बांग्लादेश, चीन, वियतनाम और इंडोनेशिया हैं।
- यह वस्त्र उद्योग के लिये प्राथमिक कच्चा माल है, जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद और औद्योगिक उत्पादन में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
कपास को बढ़ावा देने हेतु सरकारी पहलें
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): सरकार दो प्रकार के कपास, अर्थात् मीडियम स्टेपल और लॉन्ग स्टेपल के लिये MSP तय करती है।
- भारतीय कपास निगम (CCI): केंद्रीय नोडल एजेंसी जो MSP से नीचे गिरने पर मूल्य समर्थन को संचालित करने के लिये ज़िम्मेदार है।
- ब्रांडिंग: भारत ने अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में भारतीय कपास को एक प्रीमियम पहचान देने के लिये अपना पहला ब्रांड और लोगो "कस्तूरी कॉटन इंडिया" लॉन्च किया।
- योजनाएँ:
- मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी: उत्पादकता बढ़ाने पर केंद्रित। हालाँकि भारत क्षेत्रफल और कुल उत्पादन में अग्रणी है, इसकी उपज प्रति हेक्टेयर (लगभग 450–500 किग्रा./हेक्टेयर) वैश्विक औसत (लगभग 800 किग्रा./हेक्टेयर) से काफी कम है।
- PM MITRA: मेगा इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल रीजंस एंड अपैरल पार्क्स की स्थापना ताकि "फार्म टू फैशन" मूल्य शृंखला को सुदृढ़ किया जा सके।
- अन्य: कॉट-एली मोबाइल ऐप, टेक्सटाइल एडवाइज़री ग्रुप (TAG), कॉटन डेवलपमेंट प्रोग्राम, राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन (2020)
भारत के कपास उद्योग को मज़बूत बनाने हेतु क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
- बीज प्रौद्योगिकी का तीव्रीकरण (अगली पीढ़ी का Bt): गुलाबी बॉलवर्म के प्रतिरोध से निपटने के लिये बोलगार्ड-II RRF (राउंडअप रेडी फ्लेक्स) तथा अन्य उन्नत ट्रांसजेनिक किस्मों को शीघ्र मंज़ूरी देने की तत्काल आवश्यकता है, क्योंकि पुरानी Bt तकनीक अब प्रभावी नहीं रही है।
- उच्च घनत्व रोपण प्रणाली (HDPS) को प्रोत्साहित करना: पारंपरिक रोपण दूरी की बजाय HDPS अपनाने से प्रति हेक्टेयर उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। इसमें प्रति एकड़ अधिक पौधे लगाए जा सकते हैं और यह यांत्रिक कटाई के लिये उपयुक्त होने के कारण श्रम लागत को भी कम करती है।
- लंबे रेशे वाले कपास पर ध्यान: भारत वर्तमान में मिस्र और अमेरिका से उच्च गुणवत्ता वाले एक्स्ट्रा-लॉन्ग स्टेपल (ELS) कपास का आयात करता है। दक्षिणी क्षेत्र (तमिलनाडु/कर्नाटक) में ELS कपास की खेती को प्रोत्साहन देकर आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है।।
- ‘कस्तूरी कॉटन इंडिया’ ब्रांड को सशक्त बनाना: ‘कस्तूरी’ ब्रांड के तहत भारतीय कपास की ट्रेसेबिलिटी और प्रमाणन को बेहतर बनाकर वैश्विक बाज़ार में प्रीमियम मूल्य प्राप्त करने में सहायता मिलेगी, जिससे यह अमेरिका, पेरू आदि के पिमा तथा मिस्र के गीज़ा कपास से प्रतिस्पर्द्धा कर सकेगा।
- जिनिंग और प्रेसिंग का आधुनिकीकरण: भारत में कपास का बड़ा हिस्सा जिनिंग प्रक्रिया के दौरान दूषित हो जाता है। फाइबर की गुणवत्ता बनाए रखने के लिये जिनिंग और प्रेसिंग (G&P) इकाइयों को आधुनिक प्री-क्लीनिंग मशीनों से उन्नत करने हेतु प्रोत्साहन देना आवश्यक है।
- PM MITRA योजना को तेज़ी से लागू किया जाना चाहिये ताकि पूरी मूल्य शृंखला—कताई, बुनाई, प्रसंस्करण और छपाई—को एक ही स्थान पर एकीकृत किया जा सके, जिससे लॉजिस्टिक लागत में कमी लाई जा सके।
- एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM): बीजों के अलावा किसानों को फेरोमोन ट्रैप, लाइट ट्रैप और जैविक नियंत्रण एजेंट (जैसे– ट्राइकोग्रामा) के उपयोग का प्रशिक्षण देना आवश्यक है, ताकि गुलाबी बॉलवर्म का प्रबंधन अत्यधिक रासायनिक दवाओं के बिना किया जा सके।
- डिजिटल एकीकरण: ब्लॉकचेन आधारित ट्रेसेबिलिटी और उपग्रह आधारित फसल क्षेत्र अनुमान को लागू करने से किसानों तथा वस्त्र मिल मालिकों दोनों के लिये बेहतर मूल्य निर्धारण एवं जोखिम प्रबंधन संभव हो सकेगा।
निष्कर्ष
भारतीय कपास क्षेत्र आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ तकनीकी थकान और आर्थिक अस्थिरता एक साथ मौजूद हैं। ‘व्हाइट गोल्ड’ को पुनर्जीवित करने के लिये निर्वाह-आधारित खेती से हटकर उच्च-तकनीकी तथा उच्च-घनत्व प्रणालियों (HDPS) की ओर बढ़ना आवश्यक है। उत्पादन अंतर को कम करके एवं मूल्य समानता सुनिश्चित करके भारत अपने भूजल संसाधनों की रक्षा करते हुए वैश्विक वस्त्र महाशक्ति के रूप में अपनी स्थिति को सुरक्षित रख सकता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. विश्व का सबसे बड़ा कपास उत्पादक होने के बावजूद भारत को उपज में अंतर और गुणवत्ता संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कपास की उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाने के लिये नीतिगत उपायों का सुझाव दें। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. कपास की खेती के लिये विशिष्ट जलवायु संबंधी आवश्यकताएँ क्या हैं?
कपास को 21°C से 30°C के बीच तापमान, 50–100 सेमी. वर्षा और बॉल (फल) को नुकसान से बचाने के लिये कम-से-कम 210 पाला-मुक्त दिनों की आवश्यकता होती है।
2. 'कस्तूरी कॉटन इंडिया' पहल का क्या महत्त्व है?
यह भारत का प्रीमियम कपास के लिये पहला राष्ट्रीय ब्रांड है, जिसका उद्देश्य ट्रेसेबिलिटी, रेशे की गुणवत्ता और पिमा जैसे ब्रांडों के मुकाबले वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता सुनिश्चित करना है।
3. भारत में Bt कपास को प्रभावित करने वाली मुख्य चुनौती क्या है?
वर्ष 2014 से गुलाबी बॉलवर्म ने आनुवंशिक रूप से संशोधित Bt कपास के प्रति महत्त्वपूर्ण प्रतिरोध विकसित कर लिया है, जिसके कारण उपज 10–12 क्विंटल प्रति एकड़ से घटकर केवल 3–4 क्विंटल रह गई है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. भारत में काली कपास मृदा की रचना निम्नलिखित में से किसके अपक्षयण से हुई है? (2021)
(a) भूरी वन मृदा
(b) विदरी (फिशर) ज्वालामुखीय चट्टान
(c) ग्रेनाइट और शिस्ट
(d) शेल और चूना-पत्थर
उत्तर: (b)
प्रश्न 2. निम्नलिखित विशेषताएँ भारत के एक राज्य की विशिष्टताएँ हैंः (2011)
- उसका उत्तरी भाग शुष्क एवं अर्द्धशुष्क है।
- उसके मध्य भाग में कपास का उत्पादन होता है।
- उस राज्य में खाद्य फसलों की तुलना में नकदी फसलों की खेती अधिक होती है।
उपर्युक्त सभी विशिष्टताएँ निम्नलिखित में से किस एक राज्य में पाई जाती हैं?
(a) आंध्र प्रदेश
(b) गुजरात
(c) कर्नाटक
(d) तमिलनाडु
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न. भारत में अत्यधिक विकेंद्रीकृत सूती वस्त्र उद्योग के लिये कारकों का विश्लेषण कीजिये। (2013)
