आंतरिक सुरक्षा
भारत के लिये बहु-क्षेत्रीय निवारण
- 02 Apr 2026
- 80 min read
प्रिलिम्स के लिये: मल्टी-डोमेन डेटरेंस, ड्रोन स्वार्म, क्वांटम एंक्रिप्शन, C4ISR, सशस्त्र बलों का थिएटराइज़ेशन
मेन्स के लिये: मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस और आधुनिक वॉर, एकीकृत थिएटर कमांड और रक्षा सुधार, राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ावा देने में AI का उपयोग, AI के शस्त्रीकरण से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को होने वाले खतरे
चर्चा में क्यों?
रणनीतिक आकलन भारत और चीन के बीच बढ़ती सैन्य कमी को उजागर करते हैं, जो चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के तीव्र आधुनिकीकरण से प्रेरित है। इसने भारत की निवारण क्षमताओं पर चिंताएँ बढ़ा दी हैं, जिससे उभरती सुरक्षा चुनौतियों का समाधान करने के लिये मल्टी-डोमेन डेटरेंस (MDD) स्ट्रेटजी की ओर बदलाव को बढ़ावा मिला है।
सारांश
- भारत चीन के साथ बढ़ते सैन्य अंतर का सामना कर रहा है, जो PLA के तीव्र आधुनिकीकरण का परिणाम है, जिससे मज़बूत और एकीकृत निवारण आवश्यक हो गया है।
- मल्टी-डोमेन डेटरेंस सभी क्षेत्रों में क्षमताओं के संयोजन और एक विश्वसनीय सैन्य प्रतिक्रिया के निर्माण के लिये रक्षा-औद्योगिक आधार को सुदृढ़ करने पर केंद्रित है।
मल्टी-डोमेन डेटरेंस (MDD) क्या है?
- परिचय: मल्टी-डोमेन डेटरेंस एक व्यापक सामरिक ढाँचा है, जिसमें एक राष्ट्र अपनी सैन्य और गैर-सैन्य क्षमताओं को कई क्षेत्रों ज़मीन, हवा, समुद्र, साइबर, अंतरिक्ष और संज्ञानात्मक (सूचना) में एकीकृत करता है, ताकि विरोधियों को रोका जा सके।
- साइलो से सिनर्जी तक: यह पृथक्, सेवा-विशिष्ट वॉरफेयर (सेना, नौसेना, वायु सेना अलग-अलग लड़ना) से आगे बढ़कर "सिस्टम-ऑफ-सिस्टम्स" आर्किटेक्चर में बदल जाता है जहाँ सेंसर, शूटर और निर्णय-निर्माता डिजिटल रूप से परस्पर संबंधित होते हैं।
- निषेध द्वारा निवारण: इसका उद्देश्य एक प्रतिद्वंद्वी को यह विश्वास दिलाना है कि आक्रामकता का कदम परिचालन स्तर पर विफल हो जाएगी (जैसे– एयर और साइबर डिनायल के माध्यम से) और विभिन्न मोर्चों पर एक साथ अस्वीकार्य लागत वहन करनी पड़ेगी।
- ARADO ढाँचा: MDD भारत की सक्रिय रूप से ऑल रियल्म ऑल डोमेन ऑपरेशन (ARADO) की ओर विकसित होने की रणनीति के साथ संरेखित है, जो "इंटेलिजेंट वॉरफेयर" और गैर-परमाणु सामरिक निरोध पर ध्यान केंद्रित करता है, ताकि एस्केलेशन लेडर के प्रत्येक स्तर पर जीत हासिल की जा सके।
- भारत में मल्टी-डोमेन डेटरेंस की आवश्यकता:
- चीन की चुनौती: चीन का "इंटेलिजेंटाइज़्ड" वॉर फेयर उपग्रहों, AI और प्रिसीजन मिसाइलों के सघन नेटवर्क का उपयोग करता है। भारत पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के खिलाफ एक बढ़ती क्षमता अंतर का सामना करता है।
- टू-फ्रंट थ्रेट: चीन और पाकिस्तान दोनों से लगातार खतरा, जिसमें संभावित मिलीभगत भी शामिल है, रक्षा योजना को जटिल बनाता है और क्रॉस-डोमेन फोर्स मल्टीफिकेशन की आवश्यकता होती है।
- ग्रे-ज़ोन वॉरफेयर का उदय: आधुनिक संघर्षों में साइबर हमले, दुष्प्रचार और आर्थिक दबाव तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं। MDD भारत को इन नॉन-काइनेटिक थ्रेट का पता लगाने और जवाब देने में सक्षम बनाता है।
- संवेदनशील समुद्री मार्ग: भारत का 90% से अधिक व्यापार हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) से होकर गुज़रता है।
- MDD नौसेना, एयर, साइबर और अंतरिक्ष संपत्तियों के एकीकरण के माध्यम से स्तरित समुद्री सुरक्षा प्रदान करता है।
MDD के लिये भारत के पास कौन-से रणनीतिक विकल्प उपलब्ध हैं?
- साहसिक दृष्टिकोण (प्रौद्योगिकीय छलाँग): पूरी तरह से विघटनकारी नई युद्ध-प्रौद्योगिकियों, जैसे– कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वायत्त ड्रोन झुंड और क्वांटम एंक्रिप्शन पर दाँव लगाना।
- हालाँकि भारत में औद्योगिक पैमाने की कमी के कारण कार्यान्वयन में विफलता गंभीर क्षमता अंतर पैदा कर सकती है।
- संरक्षात्मक दृष्टिकोण (क्रमिक एकीकरण): उभरती हुई प्रौद्योगिकियों (साइबर, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध) को मौजूदा पारंपरिक प्रणालियों के साथ जोड़ना।
- यह दक्षता में सुधार करता है और पाकिस्तान जैसे छोटे संघर्षों के लिये उपयुक्त है, लेकिन चीन के साथ दीर्घकालिक शक्ति संतुलन को बदलने में असफल रहता है।
- मध्यम मार्ग दृष्टिकोण: पारंपरिक प्रणालियों पर निर्भरता बनाए रखते हुए साथ ही साथ महत्त्वपूर्ण सहायक प्रणालियों (कमांड एंड कंट्रोल, खुफिया, निगरानी एवं टोही, गहरे हमले, निकट युद्ध, रसद और अवसंरचना) में निवेश जारी रखना।
- समय के साथ यह भारत की सेना को एक समन्वित, बहु-क्षेत्रीय बल के रूप में विकसित करता है।
- वर्तमान सीमाओं को देखते हुए इसे सबसे व्यावहारिक और प्राप्त करने योग्य विकल्प माना जाता है।
भारत की निवारण मुद्रा में प्रणालीगत चुनौतियाँ क्या हैं?
- कमज़ोर रक्षा-औद्योगिक आधार: भारत का रक्षा-औद्योगिक आधार उस गति और पैमाने पर उत्पादन करने के लिये संरचित नहीं है जो चीन की सैन्य उत्पादन क्षमता के बराबर हो सके।
- सैन्य आवश्यकताओं को औद्योगिक लक्ष्यों में बदलने की क्षमता अभी भी संदिग्ध बनी हुई है। सार्वजनिक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता ने दक्षता, नवाचार और प्रतिस्पर्द्धा को सीमित कर दिया है।
- दोषपूर्ण खरीद प्रणाली: खरीद प्रणाली लड़ाकू बल के विकास के बजाय उसे सीमित करती है। लंबी प्रक्रिया, लालफीताशाही और बजट की अस्थिरता के कारण महत्त्वपूर्ण प्लेटफॉर्म का शामिल होना (इंडक्शन) विलंबित हो जाता है।
- ध्यान अभी भी सेवा-विशिष्ट खरीद पर केंद्रित है, बजाय इसके कि प्रतिरोध क्षमता की आधारभूत प्रणालियों को मज़बूत किया जाए।
- व्यय अधिक है, लेकिन यह स्मार्ट नहीं है, क्योंकि इसमें प्रमुख प्रतिरोध क्षमताओं की स्पष्ट प्राथमिकता का अभाव है।
- अविकसित C4ISR संरचना: भारत की C4ISR प्रणाली अभी प्रारंभिक अवस्था में है और तीनों सेनाओं के बीच खंडित रूप में फैली हुई है।
- साइबर, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में मौजूद कमियाँ भारत की प्रतिद्वंद्वी प्रणालियों को भ्रमित करने और उन्हें निष्क्रिय करने की क्षमता को और अधिक कमज़ोर कर देती हैं।
- सैद्धांतिक अस्पष्टता और सेवाओं के बीच अंतर: बहु-क्षेत्रीय संचालन (MDO) की अवधारणा को भारत के संदर्भ में परिभाषित करना कठिन है और इसे व्यावहारिक रूप से लागू करना और भी अधिक चुनौतीपूर्ण है।
- सशस्त्र बलों का थिएटराइज़ेशन अकेले सक्षम करने वाली आधारभूत प्रणालियाँ नहीं बना सकता, जब तक कि सेवाओं के बीच गहरा सैद्धांतिक सामंजस्य न हो। प्रौद्योगिकी सिद्धांतों से तेज़ी से विकसित हो रही है, जिससे सटीक रणनीतिक निर्णय लेना लगातार अधिक कठिन होता जा रहा है।
- राजनीतिक और संस्थागत अंतर: प्रतिरोध (डिटरेंस) के लक्ष्यों और उन्हें प्राप्त करने के लिये आवश्यक औद्योगिक रणनीति पर कोई व्यापक राष्ट्रीय सहमति मौजूद नहीं है।
- औद्योगिक और सैद्धांतिक सुधार के लिये उपलब्ध समय सीमित होता जा रहा है, फिर भी इस आवश्यकता की तात्कालिकता को पर्याप्त रूप से समझा नहीं जा रहा है।
आगे की राह
- व्यवस्था-स्तरीय क्षमता की ओर बदलाव: केवल सेवा-विशिष्ट प्लेटफॉर्म (जैसे– लड़ाकू विमान या टैंक खरीद) तक सीमित रहने के बजाय एकीकृत और संपूर्ण प्रणाली-आधारित क्षमताओं का विकास करना।
- निजी क्षेत्र को सशक्त बनाना: सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों (PSUs) पर अत्यधिक निर्भरता को समाप्त करना और iDEX जैसी पहलों तथा दीर्घकालिक विशेष अनुबंधों के माध्यम से निजी उद्योगों तथा स्टार्टअप्स की गतिशील क्षमता का उपयोग करना।
- संस्थागत समन्वय: अनुसंधान संस्थानों, निजी उद्योग, सशस्त्र बलों और राजनीतिक नेतृत्व के बीच घनिष्ठ तालमेल सुनिश्चित करना, जो परिणाम-आधारित योजना और स्थिर वित्तपोषण के माध्यम से हो।
- उदाहरण के लिये, मिसाइल प्रणालियों और ड्रोन में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग जैसी पहलें प्रौद्योगिकी विकास को सैन्य आवश्यकताओं और रणनीतिक प्राथमिकताओं के साथ समन्वित करने के प्रयासों को दर्शाती हैं।
- थिएटर कमांड्स का क्रियान्वयन करना: युद्ध के सभी क्षेत्रों में सिद्धांतगत समन्वय और एकीकृत, त्वरित निर्णय-निर्माण सुनिश्चित करने के लिये एकीकृत थिएटर कमांड्स की स्थापना में तेज़ी लाएँ।
- क्रिटिकल इनेबलिंग लेयर्स को ठीक करना:
- C4ISR: बड़ी संख्या में किफायती और क्षति-सहनशील ISR प्लेटफॉर्म में निवेश करना; बहु-स्तरीय C4ISR विकसित करना जो अपनी क्षमता को बढ़ाए और प्रतिद्वंद्वी की क्षमता को कमज़ोर करे।
- स्ट्राइक लेयर: गहन प्रहार अभियानों के लिये मिसाइल, विमान और ड्रोन का एकीकरण करना, ताकि दुश्मन को असंतुलित किया जा सके।
- क्लोज़-बैटल लेयर: भूमि-आधारित प्लेटफॉर्म-टैंक, तोपखाना और इन्फैंट्री फाइटिंग व्हीकल का आधुनिकीकरण करना।
- लॉजिस्टिक्स लेयर: एक सुदृढ़ रियर ज़ोन आपूर्ति शृंखला विकसित करना, जो लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष को बनाए रखने में सक्षम हो।
निष्कर्ष
चीन के विरुद्ध भारत की प्रतिरोधक क्षमता किसी एक निर्णायक हथियार से नहीं आएगी। यह एक समन्वित क्षमताओं की प्रणाली से विकसित होगी, जिसे सुदृढ़ औद्योगिक आधार, समझदारीपूर्ण नीतिगत निर्णयों और एकीकृत सैन्य सोच के माध्यम से समय के साथ निर्मित किया जाएगा। सुधार का अवसर अभी भी उपलब्ध है, लेकिन यह तेज़ी से संकीर्ण होता जा रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. बहु-क्षेत्रीय निवारण (MDD) क्या है?
यह एक ऐसी रणनीति है, जो भूमि, वायु, समुद्र, साइबर, अंतरिक्ष और सूचना क्षेत्रों में क्षमताओं को एकीकृत करके समन्वित कार्रवाई के माध्यम से प्रतिद्वंद्वियों को निरुत्साहित करती है।
2. C4ISR क्या है और यह क्यों महत्त्वपूर्ण है?
C4ISR का अर्थ है कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन, कंप्यूटर, इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकोनिसेंस; यह वास्तविक समय में युद्धक्षेत्र की जानकारी और निर्णय-निर्माण को सक्षम बनाता है।
3. भारत के रक्षा-औद्योगिक आधार में मुख्य चुनौती क्या है?
गति, पैमाने और निजी क्षेत्र की भागीदारी की कमी उन्नत सैन्य प्रणालियों के कुशल उत्पादन को सीमित करती है।
4. भारत के लिये ग्रे-ज़ोन युद्ध क्यों महत्त्वपूर्ण है?
इसमें साइबर हमले, दुष्प्रचार और आर्थिक दबाव जैसे उपाय शामिल होते हैं, जो युद्ध की औपचारिक सीमा से नीचे होते हैं और बहु-क्षेत्रीय प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है।
5. इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स की भूमिका क्या है?
ये विभिन्न सेवाओं के बीच संयुक्तता और एकीकृत संचालन सुनिश्चित करते हैं, जिससे तेज़ और समन्वित सैन्य प्रतिक्रिया संभव होती है।
|
दृष्टि मुख्य परीक्षा प्रश्न: प्रश्न: ‘नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर के युग में, भारत की प्रतिरोधक क्षमता की विश्वसनीयता केवल सैन्य प्लेटफॉर्म के अधिग्रहण पर नहीं, बल्कि उसके रक्षा-औद्योगिक आधार पर अधिक निर्भर करती है।’ चर्चा कीजिये। |
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न. ‘भारत में बढ़ते हुए सीमापारीय आतंकी हमले और अनेक सदस्य-राज्यों के आंतरिक मामलों में पाकिस्तान द्वारा बढ़ता हुआ हस्तक्षेप सार्क (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) के भविष्य के लिये सहायक नहीं है।’ उपयुक्त उदाहरणों के साथ स्पष्ट कीजिये। (2016)
प्रश्न. ‘उग्र अनुसरण’ एवं ‘शल्यक प्रहार’ पदों का प्रयोग प्रायः आतंकी हमलों के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही के लिये किया जाता है। इस प्रकार की कार्यवाहियों के युद्धनीतिक प्रभाव की विवेचना कीजिये। (2016)