प्रारंभिक परीक्षा
CAR T-सेल थेरैपी में उल्लेखनीय प्रगति
चर्चा में क्यों?
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे द्वारा बायोमटेरियल साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक नवीन अध्ययन ने प्रयोगशाला में विकसित T-सेल (T-कोशिकाओं) को पुनः प्राप्त करने की एक विधि को प्रदर्शित किया है।
- कैंसर प्रतिरक्षा-चिकित्सा, विशेषतः CAR T-सेल थेरैपी, में यह प्रगति भारत में उन्नत कैंसर उपचार को अधिक विश्वसनीय और किफायती बनाने की क्षमता रखती है।
T-सेल और CAR T-सेल थेरैपी क्या हैं?
- T-सेल: ये श्वेत रक्त कोशिकाओं का एक प्रकार हैं, जो शरीर में अग्रिम प्रतिरक्षा के रूप में भूमिका निभाती हैं। ये रक्त परिसंचरण में संयुग्मित होती हैं ताकि संक्रमणों या कैंसर जैसी असामान्य कोशिकाओं का पता लगाया जा सके।
- किसी खतरे के डिटेक्ट होने पर ये या तो प्रत्यक्ष रूप से आगामी खतरे को रोक देती हैं अथवा अन्य प्रतिरक्षा कोशिकाओं को सहायता हेतु संकेत देती हैं।
- CAR T-सेल थेरैपी: यह एक आधुनिक उपचार पद्धति है, जिसमें रोगी की T-सेल को एकत्र कर प्रयोगशाला में आनुवंशिक रूप से परिवर्तित किया जाता है।
- वैज्ञानिक इन कोशिकाओं में काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर (CAR) से युक्त एक जीन को जोड़ते हैं।
- ये रिसेप्टर ट्रैकर की भाँति कार्य करते हैं, जो T-सेल को विशिष्ट कैंसर सेल की पहचान कर उन्हें नष्ट करने हेतु निर्देशित करते हैं।
- वर्तमान में यह उपचार ल्यूकेमिया और लिंफोमा जैसे कुछ रक्त कैंसरों के लिये स्वीकृत है।
- नेक्सCAR19: वर्ष 2023 में नेक्सCAR19 भारत की पहली स्वदेशी रूप से स्वीकृत CAR T-सेल थेरैपी बनी। इसका विकास IIT बॉम्बे, टाटा मेमोरियल सेंटर और इम्यूनो ACT (IIT बॉम्बे में इनक्यूबेटेड एक कंपनी) के सहयोग से किया गया।
- विश्व की सर्वाधिक किफायती CAR T-थेरैपी होने के कारण यह भारत को उन्नत कोशिका एवं जीन उपचार के वैश्विक मानचित्र पर एक उचित स्थान प्रदान करती है।
IIT बॉम्बे के CAR T-सेल थेरैपी अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष क्या हैं?
- सेल रिकवरी (कोशिका पुनर्प्राप्ति): 3D स्कैफोल्ड्स (जो मानव शरीर की नकल करते हैं) में T-सेल्स को विकसित करना कोशिकाओं की वृद्धि के लिये प्रभावी होता है, लेकिन उनसे कोशिकाओं को वापस निकालना कठिन हो जाता है।
- T-सेल्स रेशेदार स्कैफोल्ड्स को मज़बूती से पकड़ लेती हैं और उन्हें निकालने के कठोर तरीके (जैसे– ट्रिप्सिन का उपयोग) उन्हें क्षतिग्रस्त कर देते हैं।
- पारंपरिक निष्कर्षण विधियों में ट्रिप्सिन (Trypsin) या ट्रिपएल (TrypLE) जैसे कठोर एंज़ाइमों का उपयोग किया जाता है, जो कोशिकाओं से आवश्यक प्रोटीन हटा देते हैं, जिससे उनकी प्रभावशीलता कम हो जाती है या वे नष्ट हो जाती हैं।
- कुशल पुनर्प्राप्ति: IIT बॉम्बे की टीम ने पाया कि ट्रिप्सिन (Trypsin) के बजाय 'एक्यूटेस' (Accutase) नामक व्यावसायिक रूप से उपलब्ध एंज़ाइम का उपयोग करने से कोशिकाओं को सौम्य तरीके से अलग किया जा सकता है।
- एक्यूटेस (Accutase) कोशिकाओं की बाहरी झिल्ली को नुकसान पहुँचाए बिना उन्हें 3D स्कैफोल्ड से प्रभावी ढंग से मुक्त कर देता है।
- एक्यूटेस (Accutase) द्वारा प्राप्त कोशिकाओं ने उच्च उत्तरजीविता, संरक्षित प्रतिरक्षा कार्य और स्वस्थ समूहों का निर्माण प्रदर्शित किया, जो कैंसर थेरैपी के लिये उनकी बेहतर तत्परता का संकेत है।
महत्त्व
- वर्तमान में वैश्विक स्तर पर CAR T-सेल थेरैपी की लागत ₹3-4 करोड़ तक होती है। लैब में तैयार की गई महंगी कोशिकाओं की बर्बादी को कम करके और दक्षता में सुधार करके यह विधि भारतीय पहलों (जैसे– ImmunoACT) को वैश्विक कीमत के एक छोटे से हिस्से तक लागत कम करने में मदद करती है।
- स्वस्थ T-सेल्स की अधिक सुसंगत आपूर्ति का अर्थ है कि रोगी में वापस प्रविष्ट (इन्फ्यूज़) किये जाने पर इस थेरैपी की सफलता की संभावना अधिक होती है।
- यह भारत की बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में बढ़ती क्षमता को रेखांकित करता है, जहाँ देश जेनेरिक दवा निर्माण से आगे बढ़कर जटिल उपचारों में नवीन प्रक्रिया नवाचार की ओर अग्रसर हो रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. T-सेल क्या हैं?
T-सेल श्वेत रक्त कोशिकाओं का एक प्रकार हैं, जो संक्रमित या कैंसरग्रस्त कोशिकाओं की पहचान कर उन्हें नष्ट करने के माध्यम से प्रतिरक्षा रक्षा में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
2. CAR T-सेल थेरैपी क्या है?
CAR T-सेल थेरैपी कैंसर इम्यूनोथेरैपी का एक रूप है, जिसमें रोगी की T-सेल्स को आनुवंशिक रूप से संशोधित किया जाता है ताकि वे काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर (CAR) व्यक्त करें, जो विशिष्ट कैंसर कोशिकाओं को लक्षित करते हैं।
3. वर्तमान में किन कैंसरों में CAR T-सेल थेरैपी का उपयोग किया जाता है?
CAR T-सेल थेरैपी को मुख्य रूप से कुछ रक्त कैंसरों, विशेषकर ल्यूकेमिया और लिंफोमा के उपचार के लिये अनुमोदित किया गया है।
4. CAR T-सेल थेरैपी में T-सेल रिकवरी क्यों महत्त्वपूर्ण है?
क्षतिग्रस्त या गैर-कार्यात्मक T-सेल्स उपचार की प्रभावशीलता को कम कर देती हैं, इसलिये प्रयोगशाला में विकसित कोशिकाओं की सुरक्षित और प्रभावी पुनर्प्राप्ति अत्यंत आवश्यक होती है।
5. NexCAR19 क्या है?
NexCAR19 भारत की पहली स्वदेशी CAR T-सेल थेरैपी है, जिसे 2023 में मंज़ूरी मिली। इसे IIT बॉम्बे, टाटा मेमोरियल सेंटर और ImmunoACT द्वारा विकसित किया गया है।
6. CAR T-सेल थेरैपी महंगी क्यों है?
इसकी उच्च लागत का कारण जटिल कोशिका इंजीनियरिंग, विशेषीकृत प्रयोगशाला अवसंरचना और जीवित व कार्यक्षम T-सेल्स की कम पुनर्प्राप्ति दर है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों में कौन-सा एक, मानव शरीर में B कोशिकाओं और T कोशिकाओं की भूमिका का सर्वोत्तम वर्णन है? (2022)
(a) वे शरीर को पर्यावरणीय प्रत्यूर्जकों (एलर्जनों) से संरक्षित करती हैं।
(b) वे शरीर के दर्द और सूजन का अपशमन करती हैं।
(c) वे शरीर के प्रतिरक्षा-निरोधकों की तरह काम करती हैं।
(d) वे शरीर को रोगजनकों द्वारा होने वाले रोगों से बचाती हैं।
उत्तर: (d)
प्रारंभिक परीक्षा
भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0
चर्चा में क्यों?
केंद्रीय बजट 2026–27 ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0 की घोषणा के साथ भारत की प्रौद्योगिकी रणनीति में एक निर्णायक कदम को चिह्नित किया। ISM 1.0 के तहत विकसित पारिस्थितिक तंत्र पर आगे बढ़ते हुए, यह नया चरण नीति निर्माण और क्षमता सृजन से आगे बढ़कर संघनन, तकनीकी गहराई और वैश्विक एकीकरण की ओर संक्रमण को दर्शाता है।
भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 क्या है?
- परिचय: ISM 2.0 का लक्ष्य भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य शृंखला में एक विश्वसनीय और प्रतिस्पर्द्धी भागीदार के रूप में स्थापित करना है, साथ ही आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया–मेक फॉर द वर्ल्ड के उद्देश्यों को आगे बढ़ाना है। इस लक्ष्य के समर्थन के लिये वित्त वर्ष 2026–27 में ₹1,000 करोड़ का बजटीय प्रावधान किया गया है।
- मुख्य फोकस क्षेत्र:
- स्वदेशी विनिर्माण: आयात पर निर्भरता और आपूर्ति व्यवधानों को कम करने के लिये भारत में ही सेमीकंडक्टर उपकरण, रसायन, गैसें और सामग्री का उत्पादन।
- फुल-स्टैक IP विकास: सुरक्षित और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी चिप समाधानों के लिये एंड-टू-एंड भारतीय सेमीकंडक्टर बौद्धिक संपदा के विकास को बढ़ावा देना।
- अनुसंधान एवं कौशल विकास: अनुप्रयुक्त अनुसंधान और उन्नत विनिर्माण कौशल को समर्थन देने के लिये उद्योग-नेतृत्व वाले अनुसंधान और प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना।
- आपूर्ति शृंखला सुदृढ़ता: भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच घरेलू और वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखलाओं को मज़बूत करना।
- विनिर्माण: दिसंबर 2021 में स्वीकृत ISM 1.0 के तहत भारत पहले ही एक मज़बूत आधार तैयार कर चुका है, जिसमें ₹76,000 करोड़ के प्रोत्साहन परिव्यय के साथ 50% तक वित्तीय सहायता प्रदान की गई है।
- दिसंबर 2025 तक छह राज्यों में ₹1.60 लाख करोड़ के निवेश वाली दस परियोजनाओं को मंज़ूरी दी जा चुकी है, जिनमें सिलिकॉन फैब्स, कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स, उन्नत पैकेजिंग और परीक्षण (टेस्टिंग) सुविधाएँ शामिल हैं।
- बाज़ार का आकार: भारत का सेमीकंडक्टर बाज़ार वर्ष 2023 में 38 अरब डॉलर से बढ़कर वर्ष 2024–25 में 45–50 अरब डॉलर हो गया है और वर्ष 2030 तक इसके 100–110 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
- भारत एक वैश्विक सेमीकंडक्टर हब के रूप में उभर रहा है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2029 तक घरेलू चिप मांग में 70–75% आत्मनिर्भरता हासिल करना है और वर्ष 2035 तक 3 नैनोमीटर तथा 2 नैनोमीटर विनिर्माण क्षमताओं के साथ एक अग्रणी सेमीकंडक्टर राष्ट्र बनना है।
- पारिस्थितिक तंत्र: इस मिशन को सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले विनिर्माण पारिस्थितिक तंत्र के विकास हेतु संशोधित कार्यक्रम द्वारा पूरा किया गया है, जिसके लिये वर्ष 2026–27 में ₹8,000 करोड़ का वित्तीय परिव्यय प्रस्तावित है।
- यह कार्यक्रम निवेश को तेज़ी से बढ़ाने, फैब्रिकेशन और पैकेजिंग क्षमताओं का विस्तार करने तथा उच्च गुणवत्ता वाले रोज़गार के अवसर सृजित करने का लक्ष्य रखता है।
सेमीकंडक्टर के लिये प्रमुख पहलें
- डिज़ाइन आधारित इंसेंटिव (DLI) योजना: फैबलेस कंपनियों को समर्थन प्रदान करती है तथा सेमीकंडक्टर आईपी (IP) डेवलपमेंट और मानव संसाधन के विस्तार को प्रोत्साहित करती है।
- डिजिटल इंडिया RISC-V कार्यक्रम: लाइसेंस के बनने में लगने वाले शुल्क के बिना ओपन-सोर्स प्रोसेसर के विकास को बढ़ावा देता है।
- चिप्स टू स्टार्टअप कार्यक्रम: विश्वविद्यालयों और स्टार्टअप्स को उन्नत डिज़ाइन टूल्स एवं फैब्रिकेशन सुविधाओं तक पहुँच सक्षम करता है।
- स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर का विकास: आयातित चिप्स पर निर्भरता कम करने हेतु DHRUV64 जैसे प्रोसेसरों का विकास।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. वर्ष 2026–27 में ISM 2.0 के लिये बजट आवंटन क्या है?
वित्त वर्ष 2026–27 के लिये इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0 हेतु ₹1,000 करोड़ का आवंटन किया गया है।
2. ISM 1.0 से ISM 2.0 में प्रमुख परिवर्तन क्या है?
ISM 2.0 का फोकस इनिशियल ईकोसिस्टम की स्थापना से परे समेकन, उन्नत विनिर्माण, स्वदेशी बौद्धिक संपदा (IP) तथा वैश्विक एकीकरण पर केंद्रित है।
3. भारत के लिये सेमीकंडक्टर में आत्मनिर्भरता क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह आपूर्ति-शृंखला सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता, प्रौद्योगिकीय संप्रभुता तथा वैश्विक व्यवधानों के प्रति लचीलापन सुनिश्चित करती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा:
प्रश्न. भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन के संदर्भ में, नीचे दिये गए कथनों पर विचार कीजिये: (2018)
- भारत प्रकाश-वोल्टीय इकाइयों में प्रयोग में आने वाले सिलिकॉन वेफर्स का दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है।
- सौर ऊर्जा शुल्क का निर्धारण भारतीय सौर ऊर्जा निगम के द्वारा किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (d)
रैपिड फायर
कोलंबो सिक्योरिटी कॉन्क्लेव
भारत–सेशेल्स द्विपक्षीय बैठक में भारत ने सेशेल्स कोलंबो सिक्योरिटी कॉन्क्लेव (CSC) में शामिल होने के रणनीतिक महत्त्व को रेखांकित किया और इसे भारत की क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा संरचना का एक प्रमुख विस्तार बताया।
- परिचय: कोलंबो सिक्योरिटी कॉन्क्लेव, भारतीय महासागर क्षेत्र (IOR) के देशों का एक क्षेत्रीय सुरक्षा समूह है, जो भारतीय महासागर क्षेत्र में सामान्य सुरक्षा चुनौतियों का समाधान करने पर केंद्रित है।
- वर्ष 2011 में यह भारत, श्रीलंका और मालदीव के बीच त्रिपक्षीय समुद्री सुरक्षा सहयोग के रूप में शुरू हुआ था।
- वर्ष 2014 के बाद भारत और मालदीव के बीच तनावपूर्ण संबंधों के कारण यह समूह निष्क्रिय हो गया।
- इसे वर्ष 2020 में पुनर्जीवित किया गया और कोलंबो सिक्योरिटी कॉन्क्लेव (CSC) के रूप में नामांकित किया गया।
- सदस्यता का विस्तार मॉरीशस (2022), बांग्लादेश (2024) और सेशेल्स (2025) के शामिल होने के साथ हुआ।
- सचिवालय: स्थायी सचिवालय कोलंबो, श्रीलंका में स्थित है। यह समूह सदस्य देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSAs) और उप-NSAs को समन्वित सुरक्षा सहयोग के लिये एकत्र करता है।
- सहयोग के पांच स्तंभ:
- समुद्री सुरक्षा और सुरक्षा उपाय (मुख्य फोकस)
- आतंकवाद और कट्टरवाद का मुकाबला
- तस्करी और अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध का सामना
- साइबर सुरक्षा और महत्वपूर्ण अवसंरचना की सुरक्षा
- मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR)
- भारत के लिये रणनीतिक महत्त्व: CSC भारत की SAGAR (क्षेत्र में सभी के लिये सुरक्षा एवं विकास) की परिकल्पना तथा नई MAHASAGAR पहल का एक क्रियात्मक प्रतिरूप है।
- यह हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारत का ‘फर्स्ट रेस्पॉन्डर’ एवं शुद्ध सुरक्षा प्रदाता (Net Security Provider) की भूमिका को सुदृढ़ करता है तथा छोटे द्वीपीय देशों की बाह्य-क्षेत्रीय शक्तियों (जैसे चीन) पर निर्भरता को कम करता है।
- इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन (IORA), जो एक व्यापक संवाद मंच है, के विपरीत CSC अधिक सुरक्षा-केंद्रित और संचालनात्मक (ऑपरेशनल) प्रकृति का है।
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रैपिड फायर
RBI द्वारा MSE के लिये कोलैटरल-फ्री लोन की सीमा में वृद्धि
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 'MSME क्षेत्र को ऋण (संशोधन) निर्देश, 2026' के माध्यम से बैंकों को यह निर्देश दिया है कि सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों (MSE) को प्रदान किये जाने वाले ₹20 लाख तक के ऋणों के लिये कोलैटरल-सुरक्षा (ज़मानत) का आग्रह न किया जाए।
- लागू होने की सीमा: संशोधित निर्देश 1 अप्रैल, 2026 से या उसके बाद स्वीकृत अथवा नवीकृत सभी MSE ऋणकर्त्ताओं के ऋणों पर लागू होंगे।
- कोलैटरल-फ्री लोन की सीमा में वृद्धि: कोलैटरल-फ्री लोन की सीमा को ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹20 लाख कर दिया गया है, जिसका उद्देश्य सीमित परिसंपत्तियों वाले छोटे व्यवसायों के लिये लास्ट-माइल क्रेडिट उपलब्धता को सुदृढ़ करना है।
- PMEGP के अंतर्गत कवरेज: यह प्रावधान प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) के अंतर्गत वित्तपोषित सभी इकाइयों पर लागू होगा। PMEGP का कार्यान्वयन खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) द्वारा किया जाता है।
- PMEGP भारत सरकार की ऋण-आधारित सब्सिडी योजना है, जिसे वर्ष 2008 में प्रारंभ किया गया था, और इसका उद्देश्य ग्रामीण एवं शहरी दोनों क्षेत्रों में सूक्ष्म उद्यमों और लघु इकाइयों की स्थापना को प्रोत्साहित कर स्वरोज़गार को बढ़ावा देना है।
- अतिरिक्त ऋण सुविधा: ऋणकर्त्ता के संतोषजनक ट्रैक रिकॉर्ड और वित्तीय सुदृढ़ता के आधार पर बैंक अपनी आंतरिक नीतियों के अनुसार क्रेडिट गारंटी कवरेज के साथ ₹25 लाख तक कोलैटरल-फ्री लोन की अनुमति दे सकते हैं।
- अपवाद: कोलैटरल-फ्री लिमिट के भीतर लोन के लिये ऋणकर्त्ताओं द्वारा स्वेच्छा से सोना या चांदी गिरवी रखना RBI के निर्देशों का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।
रैपिड फायर
नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स रिपोर्ट 2025
वॉशिंगटन डी.सी. स्थित गैर-लाभकारी अनुसंधान संस्थान पोर्टुलांस इंस्टिट्यूट द्वारा जारी नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स (NRI) 2025 में भारत ने अपनी डिजिटल रेडीनेस में सुधार करते हुए चार स्थान की उन्नति कर 45वाँ स्थान प्राप्त किया है।
- कार्यप्रणाली: यह सूचकांक 127 अर्थव्यवस्थाओं की नेटवर्क-आधारित रेडीनेस को 53 संकेतकों के माध्यम से मापता है, जिन्हें चार स्तंभों में वर्गीकृत किया गया है: प्रौद्योगिकी, जनसामान्य, शासन एवं प्रभाव।
- भारत का स्कोर: भारत ने वर्ष 2024 के 53.63 के कुल स्कोर में सुधार करते हुए वर्ष 2025 में 54.43 स्कोर प्राप्त किया।
- वैश्विक नेतृत्व: भारत ने दूरसंचार सेवाओं में वार्षिक निवेश, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से संबंधित वैज्ञानिक प्रकाशनों, ICT सेवा निर्यात और ई-कॉमर्स कानून जैसे प्रमुख संकेतकों में वैश्विक स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त किया।
- भारत ने फाइबर-टू-द-होम (FTTH)/भवन इंटरनेट सब्सक्रिप्शन, मोबाइल ब्रॉडबैंड इंटरनेट ट्रैफिक और अंतर्राष्ट्रीय इंटरनेट बैंडविड्थ जैसे संकेतकों में दूसरा स्थान प्राप्त किया, जबकि घरेलू बाज़ार के आकार और आय असमानता से जुड़े संकेतकों में तीसरा स्थान प्राप्त किया।
- आय-समूह के अनुसार प्रदर्शन: भारत निम्न-मध्यम आय वाले देशों में वियतनाम के बाद दूसरे स्थान पर रहा और अपने आय-स्तर के अनुपात में नेटवर्क रेडीनेस के मामले में अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया।
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रैपिड फायर
भारत की अगली पीढ़ी की सुनामी चेतावनी प्रणाली
भारत सुनामी निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को सुदृढ़ करने के लिये अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में ₹300 करोड़ की लागत से एक क्षेत्रीय सेवा केंद्र (RSC) स्थापित करने की योजना बना रहा है।
- स्थान एवं क्षेत्रीय भूमिका: प्रस्तावित क्षेत्रीय सेवा केंद्र (RSC) अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के स्वराज द्वीप स्थित विजय नगर में स्थापित किया जाएगा और यह श्रीलंका जैसे हिंद महासागर क्षेत्र के देशों को भी सुनामी चेतावनी सेवाएँ प्रदान करेगा।
- वर्तमान प्रणाली की सीमाएँ: भारत की मौजूदा सुनामी चेतावनी प्रणाली मुख्यतः भूकंप-जनित सुनामियों का पता लगाने तक सीमित है, जबकि वैश्विक स्तर पर घटित कुल सुनामियों का लगभग पाँचवाँ हिस्सा समुद्रतलीय भूस्खलन तथा ज्वालामुखीय गतिविधियों जैसी गैर-भूकंपीय घटनाओं का परिणाम है।
- अगली पीढ़ी की क्षमता: उन्नत प्रणाली भूकंपीय तथा गैर-भूकंपीय दोनों प्रकार की सुनामियों का पता लगाने में सक्षम होगी, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में चेतावनियों की गति, सटीकता और विश्वसनीयता में उल्लेखनीय सुधार होगा।
- प्रौद्योगिकी एवं अवसंरचना: इस परियोजना के अंतर्गत टेक्टोनिक सबडक्शन क्षेत्रों में समुद्र-तल के नीचे लगभग 270 किमी. लंबी केबल बिछाई जाएँगी, जिससे ध्वनिक संकेतों का तीव्रता से पता लगाया जा सकेगा तथा सर्फेस बॉय के क्षतिग्रस्त होने या उपग्रह की सीमितता के कारण उत्पन्न डेटा अंतराल को प्रभावी रूप से कम किया जा सकेगा।
- नोडल एजेंसी: इस परियोजना का नेतृत्व भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS) कर रहा है, जो भारतीय सुनामी प्रारंभिक चेतावनी केंद्र (ITEWC) का संचालन करता है।
रैपिड फायर
राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2026
स्रोत: द हिंदू
कार्य-जीवन संतुलन में बढ़ती अस्थिरता एवं मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को संबोधित करने हेतु संसद में एक निजी सदस्य विधेयक के रूप में राइट टू डिस्कनेक्ट बिल पेश किया गया, जो वर्ष 2019 और 2025 में हुए पूर्व प्रयासों का परिणाम है।
- उद्देश्य: यह बिल कर्मचारियों को आधिकारिक कार्यावधि की समाप्ति के उपरांत कार्य-संबंधी संचार (ई-मेल, कॉल, संदेश) से स्वयं को पृथक् रखने का अधिकार प्रदान करता है तथा इस अधिकार के प्रयोग पर किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण सुनिश्चित करता है।
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, वर्ष 2024 में भारतीयों ने वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक औसत कार्य घंटे (56.2 घंटे प्रति सप्ताह) काम किया, जबकि कार्यावधि के उपरांत निरंतर आधिकारिक संपर्क बनाए रखना ‘टेलीप्रेशर’ (कार्य संदेशों का तुरंत उत्तर देने की मनोवैज्ञानिक विवशता) उत्पन्न करता है, जिससे तनाव, नींद की कमी और निम्नस्तरीय कार्य-जीवन संतुलन जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
- प्रावधान: राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2026 प्रस्तावित करता है कि कार्यावधि के उपरांत उत्तर देने से मना करने पर कर्मचारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई, निम्नस्तरीय प्रदर्शन मूल्यांकन या कॅरियर अवसरों से वंचित करने जैसे प्रतिकूल परिणाम नहीं होने चाहिये।
- राइट टू डिस्कनेक्ट बिल कंपनियों के लिये ट्रेड यूनियनों या कर्मचारी प्रतिनिधियों से परामर्श के माध्यम से एक व्यापक नीति तैयार करने को विधिक रूप से अनिवार्य बनाता है। तैयार नीति के अंतर्गत निम्नलिखित पहलुओं को समाहित किया जाएगा:
- कार्यावधि और कार्यावधि के उपरांत स्वीकार्य संचार।
- आपातकालीन प्रोटोकॉल और शिकायत निवारण तंत्र।
- डिजिटल वेलनेस सुनिश्चित करने के उपाय।
- राइट टू डिस्कनेक्ट बिल कंपनियों के लिये ट्रेड यूनियनों या कर्मचारी प्रतिनिधियों से परामर्श के माध्यम से एक व्यापक नीति तैयार करने को विधिक रूप से अनिवार्य बनाता है। तैयार नीति के अंतर्गत निम्नलिखित पहलुओं को समाहित किया जाएगा:
- वैश्विक उदाहरण: यह बिल फ्राँस, बेल्जियम, पुर्तगाल और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से प्रेरणा लेता है, जिन्होंने व्यक्तिगत समय की रक्षा के लिये ऐसे विधानों को अपनाया है।
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