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राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2026

  • 10 Feb 2026
  • 15 min read

स्रोत: द हिंदू
कार्य-जीवन संतुलन में बढ़ती अस्थिरता एवं मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को संबोधित करने हेतु संसद में एक निजी सदस्य विधेयक के रूप में राइट टू डिस्कनेक्ट बिल पेश किया गया, जो वर्ष 2019 और 2025 में हुए पूर्व प्रयासों का परिणाम है।

  • उद्देश्य: यह बिल कर्मचारियों को आधिकारिक कार्यावधि की समाप्ति के उपरांत कार्य-संबंधी संचार (ई-मेल, कॉल, संदेश) से स्वयं को पृथक् रखने का अधिकार प्रदान करता है तथा इस अधिकार के प्रयोग पर किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण सुनिश्चित करता है।
    • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, वर्ष 2024 में भारतीयों ने वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक औसत कार्य घंटे (56.2 घंटे प्रति सप्ताह) काम किया, जबकि कार्यावधि के उपरांत निरंतर आधिकारिक संपर्क बनाए रखना ‘टेलीप्रेशर’ (कार्य संदेशों का तुरंत उत्तर देने की मनोवैज्ञानिक विवशता) उत्पन्न करता है, जिससे तनाव, नींद की कमी और निम्नस्तरीय कार्य-जीवन संतुलन जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
  • प्रावधान: राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2026 प्रस्तावित करता है कि कार्यावधि के  उपरांत उत्तर देने से मना करने पर कर्मचारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई, निम्नस्तरीय प्रदर्शन मूल्यांकन या कॅरियर अवसरों से वंचित करने जैसे प्रतिकूल परिणाम नहीं होने चाहिये।
    • राइट टू डिस्कनेक्ट बिल कंपनियों के लिये ट्रेड यूनियनों या कर्मचारी प्रतिनिधियों से परामर्श के माध्यम से एक व्यापक नीति तैयार करने को विधिक रूप से अनिवार्य बनाता है। तैयार नीति के अंतर्गत निम्नलिखित पहलुओं को समाहित किया जाएगा:
      • कार्यावधि और कार्यावधि के उपरांत स्वीकार्य संचार।
      • आपातकालीन प्रोटोकॉल और शिकायत निवारण तंत्र।
      • डिजिटल वेलनेस सुनिश्चित करने के उपाय।
  • वैश्विक उदाहरण: यह बिल फ्राँस, बेल्जियम, पुर्तगाल और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से प्रेरणा लेता है, जिन्होंने व्यक्तिगत समय की रक्षा के लिये ऐसे विधानों को अपनाया है।

और पढ़ें: राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2025

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