शासन व्यवस्था
गोपनीयता और जवाबदेही में सामंजस्य (RTI बनाम DPDP)
- 21 Feb 2026
- 225 min read
यह लेख 20/02/2026 को द हिंदू में प्रकाशित " Privacy and transparency: On the RTI Act amendment, petitions” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख सूचना के अधिकार और नवीन डेटा संरक्षण व्यवस्था के बीच उत्पन्न संवैधानिक तनाव का विश्लेषण करता है तथा रेखांकित करता है कि विधायी संशोधन किस प्रकार राज्य की जवाबदेही को कमज़ोर कर सकते हैं।
प्रिलिम्स के लिये: RTI अधिनियम, ULPIN, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड, ई-सांख्यिकी, DPDP अधिनियम
मेन्स के लिये: पारदर्शिता अवसंरचना को सुदृढ़ करने के लिये उठाए गए उपाय, पारदर्शिता से संबंधित प्रमुख मुद्दे और अवसंरचना को बेहतर करने के लिये आवश्यक उपाय।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम में ऐसे प्रावधानों की समीक्षा, जो इसके प्रभाव को कमज़ोर करते हैं, ने शासन में घटती पारदर्शिता को लेकर चिंताओं को पुनः उजागर किया है। संवैधानिक लोकतंत्र में सूचना ही जवाबदेही की कुंजी है। जब राज्य जनता को पारस्परिक पहुँच प्रदान किये बिना सूचना का संग्रह करता है तो शासन में अपारदर्शिता की ओर अग्रसर होने का खतरा रहता है। इसलिये पारदर्शिता विश्वास, सहभागिता और उत्तरदायी प्रशासन के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
पारदर्शिता बढ़ाने के लिये भारत ने कौन-कौन से उपाय किये हैं?
- डिजिटल कल्याणकारी मध्यस्थता (DBT): प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) ढाँचा कल्याणकारी राज्य की संरचना को मौलिक रूप से पुनर्गठित करता है, इसे मध्यस्थता-मुक्त, लक्षित वितरण मैट्रिक्स में परिवर्तित कर प्रणालीगत कमियों को कम करता है।
- सरकार ने JAM ट्रिनिटी (जन धन, आधार और मोबाइल) का उपयोग कर उन मध्यस्थ नेटवर्कों को समाप्त किया है, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से सब्सिडी वितरण में बाधा उत्पन्न की।
- यह लक्षित डिजिटल संरचना लाभार्थियों का सटीक मानचित्रण सुनिश्चित करती है और एक ऑडिट योग्य, वास्तविक समय वित्तीय ट्रेल तैयार करती है, जो राज्य की पूर्ण जवाबदेही को मज़बूत करती है।
- वित्त वर्ष 2025-26 में 56 मंत्रालयों के 327 सक्रिय योजनाओं के तहत DBT अंतरण की कुल राशि ₹5.62 लाख करोड़ रही।
- परिणामस्वरूप, इस प्रणालीगत पारदर्शिता ने फर्जी लाभार्थियों को व्यवस्थित रूप से बाहर निकालकर फरवरी 2026 तक अनुमानित ₹4.31 लाख करोड़ की संचयी बचत की है।
- एल्गोरिदम आधारित सार्वजनिक खरीद: सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) एक केंद्रीकृत, एल्गोरिदम आधारित ओपन-सोर्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से अपारदर्शी और एकाधिकारवादी विक्रेता प्रणालियों को समाप्त करके सार्वजनिक खरीद को लोकतंत्रीकृत करता है।
- यह AI-संचालित विसंगति पहचान और मानकीकृत मूल्य निर्धारण तंत्र का उपयोग कर संरचनात्मक पारदर्शिता बढ़ाता है, जिससे हाशिये पर पड़े MSME के लिये समान अवसर सुनिश्चित होते हैं।
- यह डिजिटल परिवर्तन मनमाने रूप से निविदा आवंटन और प्रशासनिक पक्षपात को समाप्त करता है, प्रतिस्पर्द्धी, योग्यता-आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है तथा राजकोषीय लागत को अनुकूलित करता है।
- उदाहरण के रूप में, वर्ष 2025 के अंत तक GeM ने ₹15 लाख करोड़ के ऐतिहासिक संचयी सकल व्यापार मूल्य (GMV) को पार कर लिया, जिससे लाखों सूक्ष्म विक्रेताओं को औपचारिक अर्थव्यवस्था में एकीकृत किया गया।
- डेटा-आधारित कर प्रशासन: फेसलेस टैक्स असेसमेंट प्रणाली ने कर प्रशासन में क्रांति ला दी है, क्योंकि यह करदाता और असेसिंग अधिकारी के बीच भौतिक संपर्क को समाप्त करती है।
- डायनेमिक क्षेत्राधिकार, डेटा एनालिटिक्स और स्वचालित यादृच्छिक केस आवंटन के माध्यम से यह प्रणाली क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों तथा व्यक्तिपरक रिश्वतखोरी को प्रभावी ढंग से समाप्त करती है।
- यह संरचनात्मक सुधार टीम-आधारित समीक्षा तंत्र लागू करता है, जो नौकरशाही उत्पीड़न को कम करता है और नागरिकों को स्वैच्छिक अनुपालन के लिये प्रोत्साहित करता है।
- इस सुधारित अनुपालन के परिणामस्वरूप, वित्त वर्ष 2024-25 में सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह ₹27.02 लाख करोड़ तक पहुँच गया, जो पाँच वर्षों के भीतर दोगुना हो गया।
- साथ ही इस अवधि में 9.19 करोड़ से अधिक इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल किये गए, जिन्हें पहले से भरे हुए वार्षिक सूचना विवरण (AIS) द्वारा समर्थित किया गया।
- चुनावी वित्त जवाबदेही: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चुनावी बॉण्ड योजना को अमान्य घोषित करना लोकतांत्रिक समानता बहाल करने और अपारदर्शी कॉर्पोरेट प्रभुत्व पर अंकुश लगाने में महत्त्वपूर्ण संवैधानिक क्षण है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दाता की पूर्ण गुमनामी मौलिक रूप से अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षित नागरिक के सूचना के अंतर्निहित अधिकार का उल्लंघन करती है।
- इस कानूनी पर्दे को हटाकर, न्यायिक जनादेश राज्य तंत्र को राजनीतिक वित्त को भाई-भतीजावाद-विरोधी सिद्धांतों और जागरूक मतदाता वर्ग के साथ पुनर्गठित करने के लिये बाध्य करता है।
- वर्ष 2024 के ऐतिहासिक निर्णय (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया) के बाद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को सभी ऐतिहासिक बॉण्ड खरीद डेटा निर्वाचन आयोग को डिजिटल रूप में सार्वजनिक जाँच के लिये प्रस्तुत करना पड़ा।
- ज़मीनी स्तर पर सक्रिय प्रकटीकरण: राज्य स्तरीय जन सूचना पोर्टल प्रतिक्रियात्मक RTI याचिकाओं की बजाय सक्रिय, स्वतःस्फूर्त डेटा प्रकटीकरण की ओर बढ़ते हुए शासन को विकेंद्रीकृत करते हैं। ये ओपन-डेटा डैशबोर्ड स्थानीय व्यय, लेखापरीक्षा रिपोर्ट और कल्याणकारी लाभार्थियों की सूचियों की वास्तविक समय में सार्वजनिक जानकारी को ग्राम पंचायत स्तर तक प्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध कराते हैं।
- यह स्थानीयकृत पारदर्शिता संरचना सबसे गरीब नागरिकों को निरंतर सामाजिक लेखापरीक्षा करने का अधिकार देती है, जिससे ज़मीनी स्तर पर प्रणालीगत सूचना विषमता को प्रभावी ढंग से समाप्त किया जा सकता है।
- उदाहरण के लिये, अग्रणी राजस्थान जन सूचना पोर्टल वर्तमान में 115 से अधिक सरकारी विभागों की 200 से अधिक सार्वजनिक योजनाओं से संबंधित विस्तृत, वास्तविक समय का डेटा प्रकाशित करता है।
- यह स्थानीयकृत पारदर्शिता संरचना सबसे गरीब नागरिकों को निरंतर सामाजिक लेखापरीक्षा करने का अधिकार देती है, जिससे ज़मीनी स्तर पर प्रणालीगत सूचना विषमता को प्रभावी ढंग से समाप्त किया जा सकता है।
- ई-कोर्ट्स के माध्यम से न्यायिक पारदर्शिता– चरण III: ई-कोर्ट्स मिशन मोड परियोजना (चरण III) न्यायपालिका को अपारदर्शी, कागज़ी आधारित प्रणाली से डिजिटल रूप से खोज योग्य, ‘खुली न्याय प्रणाली’ में परिवर्तित करती है।
- लाइव स्ट्रीमिंग को संस्थागत रूप देकर और ई-फाइलिंग को सार्वभौमिक बनाकर, यह न्यायालय की कार्यवाही के अस्पष्ट दायरे को समाप्त करती है तथा कानूनी विशेषज्ञों एवं सामान्य वादकारियों के बीच सूचना-असमानता को कम करती है।
- यह सुधार सिस्टेमिक जवाबदेही लागू करता है, जिससे मामले की पूरी जानकारी, आदेश और न्यायाधीश-वार प्रदर्शन मेट्रिक्स सार्वजनिक रूप से वास्तविक समय में उपलब्ध होते हैं।
- दिसंबर 2025 तक राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) में 25 करोड़ से अधिक मामलों को ट्रैक किया गया, जबकि ई-कोर्ट पोर्टल पर प्रतिदिन 35 लाख प्रविष्टियाँ दर्ज की जाती हैं।
- इस डिजिटल अवसंरचना ने 29 वर्चुअल कोर्ट के माध्यम से 8.74 करोड़ ट्रैफिक चालान निपटाने में मदद की, जिससे बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के 973 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व एकत्र किया गया।
- भू-स्थानिक स्पष्टता एवं भूमि पारदर्शिता (ULPIN एवं NAKSHA): भूमि-आधार (ULPIN) और NAKSHA परियोजना के कार्यान्वयन से उच्च परिशुद्धता भू-स्थानिक मानचित्रण के माध्यम से बेनामी लेन-देन तथा अपारदर्शी भूमि स्वामित्व की पुरानी प्रथा का अंत हुआ है।
- प्रत्येक भूमि खंड को 14 अंकों की अल्फान्यूमेरिक आईडी आवंटित करके राज्य ने ‘सिंगल वर्ज़न ऑफ ट्रूथ’ स्थापित किया है, जो धोखाधड़ीपूर्ण बहु-बिक्री और नौकरशाही हेराफेरी को रोकता है।
- यह पारदर्शिता वित्तीय समावेशन के लिये उत्प्रेरक का कार्य करती है, जिससे हाशिये पर रहने वाले किसान बिचौलियों के शोषण के बिना संस्थागत ऋण के लिये सत्यापन योग्य डिजिटल दस्तावेज़ को संपार्श्विक के रूप में उपयोग कर सकते हैं।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2026 की शुरुआत तक ULPIN को 36 करोड़ से अधिक भूमि खंडों को आवंटित किया जा चुका है और ग्रामीण भारत में भूमि अभिलेख का कंप्यूटरीकरण 97.27% तक पहुँच गया है।
- शहरी क्षेत्रों में 157 शहरों में चल रही NAKSHA पायलट परियोजना से पारदर्शी, ड्रोन-आधारित सीमांकन के माध्यम से नगरपालिका संपत्ति कर अनुपालन में 25-40% की वृद्धि होने की संभावना है।
- राष्ट्रीय सांख्यिकी प्रणालियों का आधुनिकीकरण: भारत अपने आधिकारिक डेटा ढाँचे में संरचनात्मक सुधार कर रहा है, ताकि राष्ट्रीय संकेतक (GDP, CPI, IIP) पद्धतिगत अस्पष्टता से मुक्त रहें और वास्तविक आर्थिक परिवर्तनों को प्रतिबिंबित कर सकें।
- ई-सांख्यिकी पोर्टल तथा संशोधित माइक्रोडाटा पोर्टल ‘डिज़ाइन द्वारा पारदर्शिता’ को लागू करते हैं जिससे शोधकर्त्ता और नागरिक सरकारी दावों के पीछे उपलब्ध वास्तविक आँकड़ों की जाँच-परख कर सकते हैं।
- आर्थिक सूचकांकों को 2022-23 के आधार पर पुनर्व्यवस्थित करके और वर्ष 2025 से मासिक श्रम संकेतक (PLFS) शुरू करके, राज्य अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के अधिक विस्तृत, नियमित तथा वास्तविक समय डेटा प्रदान कर रहा है।
- जनवरी 2025 से, माइक्रोडाटा पोर्टल पर 88 लाख से अधिक प्रविष्टियाँ दर्ज की गई हैं, जो सत्यापन योग्य आधिकारिक आँकड़ों के लिये जनता की उच्च रुचि को दर्शाता है।
- डेटा के लोकतंत्रीकरण की दिशा में उठाया गया यह कदम सुनिश्चित करता है कि नीतिगत बहसें प्रशासनिक विवेक या राजनीतिक आख्यान के बजाय साक्ष्यों पर आधारित हों।
- शिक्षा और कल्याण में संस्थागत सामाजिक लेखापरीक्षा: अनिवार्य सामाजिक लेखा परीक्षा से पारदर्शिता को ऊपर से नीचे की रिपोर्टिंग से बदलकर स्थानीय, समुदाय-नेतृत्व वाली सत्यापन प्रक्रिया में परिवर्तित किया गया।
- यह मॉडल स्थानीय हितधारकों (अभिभावक, श्रमिक और ग्रामसभा) को सशक्त बनाता है कि वे यह सत्यापित करें कि स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर या ग्रामीण मज़दूरी के लिये आवंटित धन वास्तविकता के अनुरूप है या नहीं।
- कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग और उस पर की गयी कार्रवाई की रिपोर्ट (ATR) को ऑनलाइन अपलोड करने से पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक हो जाती है । इससे अच्छा काम करने वालों की सराहना और गलत काम करने वालों की पहचान सामने आती है, जिसके कारण स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार करने से लोग हतोत्साहित होते हैं।
- उदाहरण के लिये, 2025 में उत्तर प्रदेश ने 1.33 लाख सरकारी स्कूलों का सामाजिक लेखापरीक्षा करने के लिये एक विशाल योजना शुरू की, जिसमें संसाधन वितरण का मूल्यांकन करने के लिये 1.6 लाख से अधिक सामुदायिक सुविधाकर्त्ताओं को शामिल किया गया।
- इसके अतिरिक्त, वर्ष 2026 तक कई राज्यों ने 'हित संघर्ष' को समाप्त करने के लिये सामाजिक लेखापरीक्षा इकाइयों को कार्यान्वयन एजेंसियों से सख्ती से अलग कर दिया,जैसा कि केरल में हाल ही में उच्च न्यायालय के आदेशों में देखा गया।
भारत के पारदर्शिता ढाँचे से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- DPDP अधिनियम के माध्यम से RTI का क्षरण ('लोकहित अपवाद' की समाप्ति): डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 के माध्यम से RTI ढाँचे को कमज़ोर किया गया है। इस अधिनियम ने ढाँचे कानून की धारा 8(1)(j) में संशोधन करके ‘सार्वजनिक हित’ के आधार पर जानकारी देने का प्रावधान ही हटा दिया है। पहले इस प्रावधान के तहत सार्वजनिक पदों पर बैठे अधिकारियों से जुड़ी कुछ जानकारियाँ सार्वजनिक हित में दी जा सकती थीं लेकिन अब ऐसा करना विधिक रूप से संभव नहीं रहा।
- सभी प्रकार की 'व्यक्तिगत जानकारी' पर व्यापक वैधानिक अपवाद लागू करके यह एक अभेद्य कानूनी कवच निर्मित करता है, जिससे नौकरशाह अपनी संपत्ति, शैक्षणिक योग्यताओं और अनुशासनात्मक अभिलेखों को छिपा सकते हैं।
- परिणामस्वरूप, लोकतांत्रिक संतुलन स्पष्ट रूप से प्रशासनिक अपारदर्शिता की ओर झुक गया है, जहाँ नागरिक सशक्तीकरण की अपेक्षा राज्य-संरक्षण को प्राथमिकता दी जा रही है।
- सूचना आयोगों में लंबित कार्य और संस्थागत गतिरोध: देश का पारदर्शिता तंत्र गंभीर मानव-संसाधन कमी के कारण लगभग निष्क्रिय स्थिति में पहुँच चुका है, जिसके परिणामस्वरूप त्वरित वैधानिक निवारण व्यवस्था एक लंबी और जटिल नौकरशाही प्रक्रिया में बदल गई है।
- सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में दीर्घकालिक विलंब विधायी उद्देश्यों का उल्लंघन करता है तथा RTI के निवारक प्रभाव को क्षीण करता है, क्योंकि विलंबित सूचना अपनी व्यावहारिक प्रासंगिकता खो देती है।
- जनवरी 2026 तक, अकेले केंद्रीय सूचना आयोग 32,200 से अधिक लंबित मामलों के भारी बैकलॉग से जूझ रहा है, जिनके निस्तारण में अनुमानित 40 माह का समय लग सकता है।
- इसके अतिरिक्त, वर्ष 2024 के उत्तरार्द्ध में सर्वोच्च न्यायालय की समीक्षा में यह उल्लेख किया गया कि राज्य सूचना आयोगों में सम्मिलित रूप से लगभग 4.1 लाख अपीलें लंबित हैं (सतर्क नागरिक संगठन की रिपोर्ट के अनुसार), जिससे नागरिकों का जानने का अधिकार लगभग निष्क्रिय हो गया है।
- कॉरपोरेट राजनीतिक वित्तपोषण में अपारदर्शिता: यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2024 में चुनावी बॉण्ड योजना को निरस्त किया जाना एक संवैधानिक विजय थी, तथापि विशाल कॉरपोरेट वित्तपोषण अब भी वैकल्पिक और अर्द्ध-अपारदर्शी माध्यमों, जैसे 'इलेक्टोरल ट्रस्ट्स' के द्वारा प्रवाहित हो रहा है।
- ये ट्रस्ट, यद्यपि निर्वाचन आयोग को नाममात्र का प्रकटीकरण करते हैं, तथापि किसी विशिष्ट कॉरपोरेट दाता और किसी विशिष्ट सरकारी नीति-लाभ के प्रत्यक्ष एक-से-एक संबंध को प्रभावी रूप से छिपा लेते हैं।
- वर्ष 2025 के उपलब्ध आँकड़े दर्शाते हैं कि प्रमुख कॉरपोरेट समूहों के समर्थन से संचालित प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट ने आम चुनावों से पूर्व 110 मिलियन डॉलर से अधिक की निधि वितरित की, जिसमें से लगभग 82 प्रतिशत हिस्सा एकमात्र सत्तारूढ़ दल को प्राप्त हुआ, जिससे राजनीतिक वित्तपोषण में बढ़ते संकेंद्रण की प्रवृत्ति परिलक्षित होती है।
- सक्रिय प्रकटीकरण की दयनीय स्थिति और धारा 4 का अनुपालन न होना: RTI अधिनियम का मूल दर्शन यह था कि अनिवार्य, स्वप्रेरित (suo-motu) डिजिटल प्रकटीकरण के माध्यम से पारदर्शिता का भार राज्य पर डाला जाए, किंतु इस दायित्व की व्यवस्थित रूप से उपेक्षा की जा रही है।
- सार्वजनिक खरीद तथा प्रशासनिक निर्णयों से संबंधित अद्यतन खुले डेटा डैशबोर्ड बनाए रखने के स्थान पर, प्राधिकरण नागरिकों को साधारण सूचनाओं के लिये भी प्रतिकूल RTI आवेदनों के लिये बाध्य करते हैं।
- यह नौकरशाही जड़ता सूचना आयोगों पर कृत्रिम रूप से भार बढ़ाती है तथा पारदर्शिता को एक संस्थागत मानक के स्थान पर संघर्षपूर्ण प्रक्रिया बना देती है।
- वर्ष 2025 के नागरिक समाज आधारित आकलनों से यह संकेत मिलता है कि अधिकांश केंद्रीय एवं राज्य विभाग सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4 के अंतर्गत अनिवार्य स्वप्रकटीकरण संबंधी पुस्तिकाओं को नियमित रूप से ऑनलाइन अद्यतन करने के दायित्व का प्रभावी रूप से निर्वहन नहीं कर पा रहे हैं।
- परिणामस्वरूप, नागरिकों को कल्याणकारी योजनाओं की निगरानी हेतु भी RTI तंत्र का सहारा लेना पड़ता है, जिससे न्यायिक व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
- 'मंत्रालयी वीटो' और विचार-विमर्श प्रक्रियाओं से छूट के प्रस्ताव: हालिया आर्थिक सर्वेक्षण (2025-26) में यह विवादास्पद तर्क प्रस्तुत किया गया कि वर्तमान RTI ढाँचा नौकरशाही दक्षता में बाधक है और 'अनुचित जिज्ञासाओं' को प्रोत्साहित करता है।
- इसमें 'मंत्रालयी वीटो' लागू करने तथा आंतरिक विचार-विमर्श दस्तावेज़ों (मसौदा नोट्स, कार्यपत्र) को सार्वजनिक जाँच से मुक्त करने का सुझाव दिया गया है।
- यदि इसे विधायी रूप दिया जाता है, तो यह राज्य गोपनीयता संस्कृति को सुदृढ़ करेगा और नीति-निर्माण में निहित पैरवी प्रभावों एवं समझौतों को छिपाने का मार्ग प्रशस्त करेगा। आलोचकों का मत है कि ऐसा कोई अनुभवजन्य प्रमाण उपलब्ध नहीं है जो यह दर्शाए कि पारदर्शिता से प्रशासन कमज़ोर होता है।
- इन विचार-विमर्श संबंधी टिप्पणियों को गोपनीय बनाना, सार्वजनिक धन आवंटन की प्रक्रिया पर लोकतांत्रिक निगरानी की आवश्यकता के प्रतिकूल है।
- अन्वेषणात्मक रिपोर्टिंग पर निरोधात्मक प्रभाव: हाल में लागू DPDP नियमों के अंतर्गत अन्वेषणात्मक पत्रकारों को 'डेटा न्यासी (Data Fiduciary)' की श्रेणी में रखकर समाचार-संग्रह को कॉर्पोरेट डेटा प्रोसेसिंग के समकक्ष माना गया है।
- जाँच कर रहे पत्रकारों के लिये उन्हीं व्यक्तियों या भ्रष्ट अधिकारियों से स्पष्ट सहमति प्राप्त करना अनिवार्य बनाकर, यह ढाँचा स्वतंत्र समाचार रिपोर्टों के सत्यापन को कानूनी रूप से जोखिम भरा बना देता है। रिपोर्टिंग हेतु वैधानिक छूटों के अभाव में यह नियमन स्वतंत्र मीडिया को सरकारी वक्तव्यों का माध्यम भर बना देने की आशंका उत्पन्न करता है।
- इस सख्त DPDP ढाँचे के तहत अनुपालन न करने पर स्वतंत्र मीडिया घरानों को 250 करोड़ रुपये तक का वित्तीय जुर्माना भरना पड़ सकता है।
- साथ ही धारा 12 के तहत डेटा मिटाने के अधिकार का प्रावधान भ्रष्ट तत्त्वों को अन्वेषणात्मक साक्ष्य नष्ट कराने का प्रत्यक्ष कानूनी साधन उपलब्ध कराता है।
- राज्य की निगरानी और संस्थाओं के लिये असममित छूट: जहाँ भारत की नवीन डिजिटल निजता संरचना निजी प्रौद्योगिकी उद्यमों पर कठोर अनुपालन दायित्व आरोपित करती है, वहीं यह ‘राज्य की साधन संस्थाओं’ (State instrumentalities) को व्यापक एवं लगभग निरंकुश छूट प्रदान करती है।
- केंद्र सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक आवरण में अपने विधि प्रवर्तन एवं खुफिया एजेंसियों को मौलिक गोपनीयता प्रोटोकॉल से मुक्त करने की मनमानी शक्ति प्राप्त है।
- यह असममित विधिक ढाँचा व्यापक डिजिटल निगरानी को संस्थागत रूप देने का जोखिम उत्पन्न करता है, जिसमें नागरिक राज्य के समक्ष पूर्णतः पारदर्शी हो जाता है, जबकि राज्य नागरिक के प्रति अपारदर्शी बना रहता है।
- इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) ने चेतावनी दी है कि वर्ष 2025 के ये नियम राज्य द्वारा डेटा-संग्रह की समीक्षा हेतु किसी भी स्वतंत्र न्यायिक पर्यवेक्षण तंत्र का प्रावधान नहीं करते।
- फलस्वरूप, सरकार को दिये गए व्यापक अपवाद के.एस. पुट्टास्वामी निर्णय की भावना को क्षीण करते हैं, क्योंकि वे राज्य एजेंसियों द्वारा अनियंत्रित और अपारदर्शी डेटा-प्रसंस्करण को सक्षम बनाते हैं।
- सामाजिक लेखापरीक्षाओं का त्रुटिपूर्ण कार्यान्वयन और व्हिसलब्लोअर्स की असुरक्षा: यद्यपि प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं में सामाजिक लेखापरीक्षा को वैधानिक रूप से समाहित किया गया है, तथापि व्यावहारिक स्तर पर गंभीर हित संघर्ष की स्थिति विद्यमान है, क्योंकि स्थानीय क्रियान्वयन एजेंसियाँ प्रायः अंकेक्षण निकायों को ही नियंत्रित करती हैं।
- ये विकृत स्थानीय शक्ति-संतुलन, तथा सशक्त और पूर्णतः क्रियाशील व्हिसलब्लोअर्स संरक्षण अधिनियम के अभाव के साथ मिलकर, ग्रामीण अंकेक्षकों को अत्यधिक भयभीत करते हैं।
- भौतिक और विधिक सुरक्षा के बिना, ज़मीनी स्तर के पारदर्शिता कार्यकर्त्ता लक्षित हिंसा के प्रति अत्यंत संवेदनशील बने रहते हैं, जिससे सूचना का सैद्धांतिक अधिकार व्यावहारिक रूप से जोखिमपूर्ण हो जाता है।
- कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव के नागरिक अधिकार आँकड़े दर्शाते हैं कि अधिनियम के लागू होने के बाद से अब तक 67 RTI कार्यकर्त्ताओं की हत्या हो चुकी है।
- राज्य सरकारें बार-बार सामाजिक लेखापरीक्षा इकाइयों को अपने प्रशासनिक विभागों से पृथक करने में विफल रही हैं, जिससे अरबों रुपये के सार्वजनिक व्यय की स्वतंत्र पुष्टि की प्रक्रिया गंभीर रूप से कमजोर हो जाती है।
- अस्पष्ट सहमति तंत्र और डिजिटल साक्षरता की बाधाएँ: नव-प्रवर्तित DPDP नियम (2025) के अंतर्गत 'कंसेंट मैनेजर्स' की व्यवस्था की गई है और डिजिटल अनुमतियों के प्रबंधन का जटिल भार सामान्य नागरिकों पर डाल दिया गया है, जिनमें से अनेक को मूलभूत डिजिटल साक्षरता भी प्राप्त नहीं है।
- नियामकीय भाषा में भ्रामक डिज़ाइन पद्धतियों अथवा 'डार्क पैटर्न्स' को स्पष्टतः निषिद्ध नहीं किया गया है, जिनका प्रयोग बड़े तकनीकी मंच व्यापक डेटा-सहमति प्राप्त करने के लिये करते हैं।
- इसके परिणामस्वरूप, 'सूचित सहमति' एक विधिक कल्पना मात्र बनकर रह जाती है, जिससे विशाल कॉरपोरेट संस्थाएँ वैधानिक अनुपालन के आवरण में उपयोगकर्त्ता डेटा का दोहन करती रहती हैं।
- हालाँकि नियमों में 2026 में समाप्त होने वाले 18 महीने के चरणबद्ध कार्यान्वयन के भीतर स्पष्ट सहमति नोटिस अनिवार्य किये गए हैं, लेकिन सरकार द्वारा निर्धारित मानकीकृत टेम्पलेट्स की कमी कॉर्पोरेट हेरफेर के लिये व्यापक अवसर छोड़ती है।
- लाखों ग्रामीण नागरिक 'सहमति भार’ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बने रहते हैं, जिससे DPDP ढाँचे द्वारा प्रत्याशित गोपनीयता संरक्षण स्वयं कमज़ोर पड़ जाता है।
भारत में पारदर्शिता ढाँचे को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- DPDP ढाँचे में सार्वजनिक हित का संहिताकरण: सूचना के अधिकार की प्रधानता पुनर्स्थापित करने हेतु सरकार को डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) नियमों में एक विधिक 'हानि-लाभ संतुलन परीक्षण' का प्रावधान करना चाहिये।
- लोक सेवकों की संपत्ति, अधिकारियों की शैक्षणिक अर्हताएँ तथा विभागीय फाइल-नोटिंग जैसी 'सार्वजनिक प्रकृति की व्यक्तिगत सूचनाओं' की श्रेणियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर, कानून गोपनीयता के नाम पर होने वाले प्रशासनिक दुरुपयोग को रोक सकता है।
- यह व्यवस्था वर्तमान पूर्ण छूट मॉडल को आनुपातिक प्रकटीकरण ढाँचे से प्रतिस्थापित करेगी, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि निजता का अधिकार कभी भी जवाबदेही से पलायन का साधन न बन सके।
- 'एल्गोरिदम पारदर्शिता' एवं ओपन-सोर्स ऑडिट का संस्थानीकरण: कल्याणकारी वितरण एवं सार्वजनिक खरीद में एआई-आधारित निर्णय-प्रक्रियाओं के बढ़ते प्रयोग को देखते हुए, भारत को एक 'राष्ट्रीय एल्गोरिदमिक जवाबदेही प्रोटोकॉल' स्थापित करना चाहिये, जो स्वचालित प्रणालियों के तर्क और निर्णय के प्रकटीकरण को अनिवार्य बनाए।
- इसके अंतर्गत GeM पोर्टल तथा DBT मैचिंग इंजन जैसे प्रमुख प्लेटफार्मों के सोर्स कोड और प्रशिक्षण डेटासेट को तृतीय-पक्ष 'व्हाइट-बॉक्स ऑडिट' हेतु उपलब्ध कराया जाना आवश्यक होगा, जिससे प्रणालीगत पूर्वाग्रह अथवा बहिष्करण की पहचान हो सके। यह उपाय सुनिश्चित करेगा कि प्रौद्योगिकी का 'ब्लैक बॉक्स' नौकरशाही की लालफीताशाही का विकल्प न बने तथा प्रत्येक स्वचालित शासकीय निर्णय हेतु डिजिटल जवाबदेही का स्पष्ट अभिलेख निर्मित हो।
- विकेंद्रीकृत 'सूचना स्वयं-सेवा' कियोस्कों की स्थापना: डिजिटल पोर्टलों तक सीमित रहने के स्थान पर, राज्य को डिजिटल विभाजन को पाटने के लिये पंचायत एवं प्रखंड स्तर पर भौतिक, ब्लॉकचेन-सक्षम 'सूचना स्वयं-सेवा कियोस्क' स्थापित करने चाहिये।
- इन कियोस्कों के माध्यम से औपचारिक RTI आवेदन अथवा किसी मध्यस्थ सहायता के बिना, स्थानीय हाजिरी रजिस्टरों, इन्वेंट्री अभिलेखों तथा सामाजिक लेखापरीक्षा रिपोर्टों तक वास्तविक-समय, केवल-पठन योग्य पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिये।
- 'ट्रांसपेरेंसी बाय डिज़ाइन' (Transparency by Design) को ज़मीनी स्तर पर संस्थागत करने से यह ढाँचा सूचना की खोज को नागरिक से हटाकर संपूर्ण प्रणाली पर डाल देता है, जिससे सतत सामाजिक निगरानी का वातावरण सृजित होता है।
- सामाजिक लेखा परीक्षा इकाइयों का रणनीतिक पृथक्करण: ज़मीनी स्तर पर निगरानी की सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करने के लिये, सामाजिक लेखा परीक्षा इकाइयों को पूर्ण वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता प्रदान की जानी चाहिये, जिससे वे उन क्रियान्वयनकारी विभागों से स्वतंत्र हो जाएँ जिनकी वे निगरानी करने के लिये नियुक्त हैं।
- इसमें नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा प्रबंधित एक समर्पित, अपरिवर्तनीय 'पारदर्शिता कोष' का निर्माण शामिल है, जिसका उपयोग लेखा परीक्षकों के वेतन और व्यवस्था संबंधी खर्चों के लिये किया जाएगा। स्थानीय नौकरशाहों से वित्तीय नियंत्रण छीनकर, सामाजिक लेखापरीक्षाएँ निडर स्वतंत्र निगरानी संस्थाओं के रूप में कार्य कर सकती हैं, जिससे सामाजिक लेखापरीक्षाएँ केवल औपचारिक प्रक्रिया न रहकर सार्वजनिक जाँच का एक सशक्त साधन बन जाएंगी।
- डिजिटल सुरक्षा उपायों के साथ व्हिसलब्लोअर संरक्षण का सामंजस्य स्थापित करना: व्हिसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम को एंक्रिप्टेड, अनाम 'डिजिटल रिपोर्टिंग चैनलों' के साथ एकीकृत करके इसे लागू करने की तत्काल आवश्यकता है, जो उन्नत शून्य-ज्ञान प्रमाणों के माध्यम से संलग्न लोगों की पहचान की रक्षा करते हैं।
- यह उपाय उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करने के लिये जोखिमपूर्ण RTI मार्ग के स्थान पर एक सुरक्षित, राज्य-स्वीकृत वैकल्पिक तंत्र प्रदान करेगा, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि सूचना उपलब्ध कराने वाली एजेंसी के समक्ष भी 'स्रोत' की पहचान पूरी तरह गोपनीय बनी रहे।
- 'सद्भावनापूर्ण प्रकटीकरण' के लिये विधिक प्रतिरक्षा का कठोरतापूर्वक अनुपालन किया जाना आवश्यक है, ताकि कठोर डाटा संरक्षण संबंधी दंडात्मक प्रावधानों तथा संभावित निगरानी अतिक्रमण से उत्पन्न निरुत्साहक प्रभाव का प्रभावी प्रतिरोध किया जा सके।
- सभी सार्वजनिक परियोजनाओं के लिये 'रीयल-टाइम वित्तीय डैशबोर्ड' का सार्वभौमीकरण: वित्त मंत्रालय को यह अनिवार्य करना चाहिये कि एक निश्चित सीमा से अधिक की प्रत्येक सार्वजनिक अवसंरचना परियोजना को भू-स्थानिक (GIS) और IoT सेंसर का उपयोग करके 'लाइव प्रोजेक्ट ट्रांसपेरेंसी डैशबोर्ड' पर मानचित्रित किया जाए।
- ये डैशबोर्ड वास्तविक समय में भौतिक प्रगति, ठेकेदार भुगतान चक्र तथा गुणवत्ता-परीक्षण प्रमाणपत्रों को मूल निविदा विनिर्देशों के साथ प्रदर्शित करेंगे।
- इस प्रकार की सूक्ष्म एवं सक्रिय पारदर्शिता सार्वजनिक क्षेत्र तथा नागरिक समाज को यह अनुश्रवण करने में सक्षम बनाएगी कि करदाताओं की राशि किस प्रकार भौतिक परिसंपत्तियों में रूपांतरित हो रही है। परिणामस्वरूप, 'लीकेज' को परियोजना की पूर्णता से पूर्व ही दृष्टिगोचर किया जा सकेगा तथा उन्हें समय रहते सुधारात्मक कार्रवाई द्वारा ठीक किया जा सकेगा।
- विधायी पारदर्शिता सूचकांक (LTI) का निर्माण: लोकतंत्र की गुणवत्ता को सशक्त बनाने हेतु भारत को एक विधायी पारदर्शिता सूचकांक अपनाना चाहिये, जो निम्नलिखित पहलुओं का मूल्यांकन करे: पूर्व-विधायी परामर्श की प्रक्रियाओं की पारदर्शिता, संसदीय समितियों द्वारा विधेयकों के संदर्भित किये जाने की आवृत्ति, तथा लॉबिंग प्रभावों के प्रकटीकरण की सुनिश्चितता।
- यह प्रावधान यह अनिवार्य करेगा कि प्रत्येक प्रारूप विधेयक के साथ एक ‘परामर्श सारांश प्रतिवेदन’ संलग्न किया जाये, जिसमें स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया हो कि किन हितधारकों के सुझावों को स्वीकार किया गया तथा किन सुझावों को अस्वीकार किया गया और इसके पीछे के तर्क एवं कारण क्या रहे।
- विधि-निर्माण की प्रक्रिया के दौरान ‘जानने के अधिकार’ (Right to Information) को औपचारिक रूप देना, राज्य को ‘नीति अधिग्रहण’ (Captured Policy) के जोखिम को कम करने में सक्षम बनाता है। तथा यह सुनिश्चित कर सकता है कि विधियाँ अपारदर्शी कार्यपालिका के एकपक्षीय निर्णय के स्थान पर विचार-विमर्श आधारित सहमति का परिणाम हों।
- सूचना आयोग संवर्ग का व्यावसायीकरण: संस्थागत गतिरोध को समाप्त करने हेतु सूचना आयुक्तों के चयन की प्रक्रिया का विविधीकरण किया जाना आवश्यक है। इसके अंतर्गत सेवानिवृत्त नौकरशाहों पर एकमात्र निर्भरता के स्थान पर डेटा वैज्ञानिकों, विधिक विद्वानों तथा नागरिक समाज के अनुभवी प्रतिनिधियों के लिये अनिवार्य आरक्षण का प्रावधान किया जाना चाहिये।
- यह 'बहु-विषयक पीठ' आँकड़ा गोपनीयता, व्यापारिक गोपनीयता तथा उभरती प्रौद्योगिकियों से संबंधित जटिल समकालीन विवादों के न्यायनिर्णयन में अधिक सक्षम सिद्ध होगी।
- अतिरिक्त रूप से, 'कल्पित रिक्ति’नियम का कार्यान्वयन किया जाना चाहिये, जिसके अंतर्गत किसी वर्तमान आयुक्त के सेवानिवृत्त होने से छः माह पूर्व ही नये नियुक्ति-प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाना अनिवार्य हो, ताकि पारदर्शिता तंत्र प्रशासनिक शिथिलता के कारण कभी बाधित न हो।
- न्यायिक 'ओपन डेटा' अधिदेश एवं प्रदर्शन अनुश्रवण: न्यायपालिका को उदाहरण प्रस्तुत करते हुए समस्त स्तरों की न्यायालयों में एक मानकीकृत ओपन डेटा प्रोटोकॉल अनिवार्य रूप से लागू करना चाहिये। इसका उद्देश्य केवल प्रकरण-संबंधी आँकड़ों का डिजिटलीकरण नहीं, बल्कि उन्हें मशीन-पठनीय स्वरूप में उपलब्ध कराना है, ताकि व्यापक स्तर पर विश्लेषण, प्रदर्शन मूल्यांकन एवं नीतिगत निर्णय सशक्त रूप से किये जा सकें।
- इसमें प्रत्येक न्यायाधीश के अनुसार लंबित प्रकरणों के सूक्ष्म आँकड़ों का प्रकाशन, स्थगन (adjournment) के कारणों का विश्लेषण तथा ऐतिहासिक दंडादेश प्रवृत्तियों का संकलन सम्मिलित है, जिससे न्यायिक व्यवस्था में विद्यमान अवरोधों एवं संभावित पक्षपात की पहचान की जा सके।
- "जैसे न्यायिक निर्णयों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाती है, उसी प्रकार न्याय की प्रक्रिया को भी पारदर्शी बनाने से न्यायपालिका जन-विश्वास का पुनर्निर्माण कर सकती है तथा संस्थागत विधिक सुधारों के लिये आवश्यक आँकड़ा-आधारित साक्ष्यों की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकती है।"
निष्कर्ष:
भारतीय लोकतंत्र का भविष्य नागरिक के निजता के अधिकार तथा राज्य की जवाबदेही हेतु अपेक्षित अनिवार्य पारदर्शिता के मध्य संतुलन स्थापित करने पर निर्भर करता है। यद्यपि डिजिटल साधनों ने सेवा प्रदाय तंत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन किया है, तथापि सूचना का अधिकार अधिनियम में विधायी शिथिलीकरण स्थायी सूचना-असमानता की स्थिति उत्पन्न करने का जोखिम रखता है, जो कार्यपालिका के पक्ष में झुकाव उत्पन्न कर सकता है। अतः पारदर्शिता को सुदृढ़ करने के लिये अब प्रतिक्रियात्मक प्रकटीकरण की प्रवृत्ति से आगे बढ़ते हुए एक संस्थागत, 'ओपन बाय डिफॉल्ट' शासन-व्यवस्था का निर्माण आवश्यक है, जो व्यक्ति की निजता का संरक्षण करे, किंतु संस्थागत उत्तरदायित्व को आच्छादित न करे।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न 'संवैधानिक लोकतंत्र में पारदर्शिता ही जवाबदेही की कुंजी है।' डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम 2023 के संदर्भ में भारत के सूचना के अधिकार (RTI) पर इसके संभावित प्रभाव का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. DPDP अधिनियम RTI अधिनियम को किस प्रकार प्रभावित करता है?
यह धारा 8(1)(j) में मौजूद 'जनहित में प्राथमिकता' (public interest override) को हटाता है, जिससे किसी भी अधिकारी की 'व्यक्तिगत जानकारी' साझा करने पर पूर्ण प्रतिबंध लग जाता है।
प्रश्न 2. 'वैध उपयोग' विरोधाभास क्या है?
इसका आशय है कि राज्य को नागरिकों के डेटा को सहमति के बिना संसाधित करने की अनुमति है, जबकि नागरिकों को गोपनीयता के बहाने अधिकारीगत डेटा तक पहुँचने से वंचित किया जाता है।
प्रश्न 3. ULPIN क्या है?
भूमि पार्सल की विशिष्ट पहचान संख्या (ULPIN) एक 14-अंकीय अल्फान्यूमेरिक आईडी है, जो पारदर्शी भूमि अभिलेखों के लिये 'भूमि-आधार' के रूप में कार्य करती है।
प्रश्न 4. पत्रकार DPDP अधिनियम को लेकर चिंतित क्यों हैं?
उन्हें 'डेटा फिड्यूशियरी (Data Fiduciaries)' के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिससे सख्त सहमति आवश्यकताओं और उच्च ज़ुर्मानों के कारण अन्वेषणात्मक रिपोर्टिंग (investigative reporting) कानूनी रूप से जोखिमपूर्ण हो जाती है।
प्रश्न 5. सामाजिक लेखापरीक्षा क्या है?
यह एक समुदाय-नेतृत्व वाली प्रक्रिया है जहाँ स्थानीय हितधारक ज़मीनी स्तर पर सरकारी व्यय और परियोजना कार्यान्वयन का भौतिक सत्यापन करते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
मेन्स
प्रश्न. "सूचना का अधिकार अधिनियम केवल नागरिकों के सशक्तीकरण के बारे में ही नहीं है, अपितु यह आवश्यक रूप से जवाबदेही की संकल्पना को पुनःपरिभाषित करता है।" विवेचना कीजिये। (2018)