अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भारत-फ्राँस संबंधों का रणनीतिक विकास
- 20 Feb 2026
- 227 min read
यह एडिटोरियल 18/02/2026 को द हिंदू में प्रकाशित “With Emmanuel Macron’s visit, Delhi and Paris chart a ‘third way’, across traditional divides” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत–फ्राँस संबंधों के उपनिवेशोत्तर व्यावहारिकता से लेकर एक समग्र रणनीतिक साझेदारी तक के विकास की समीक्षा करता है। यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि रक्षा, प्रौद्योगिकी, हिंद-प्रशांत सहयोग और वैश्विक शासन ने किस प्रकार फ्राँस को भारत के सबसे विश्वसनीय यूरोपीय साझेदार के रूप में स्थापित किया है।
प्रिलिम्स के लिये: स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR), डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, तृष्णा उपग्रह मिशन, स्कॉर्पीन पनडुब्बी परियोजना
मेन्स के लिये: भारत-फ्राँस संबंधों का विकास, सहयोग के क्षेत्र, प्रमुख मुद्दे और उपाय।
फ्राँस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन की वर्ष 2026 में भारत यात्रा केवल एक राजनयिक पहल नहीं, बल्कि पश्चिम के साथ भारत के संबंधों में एक रणनीतिक बदलाव का संकेत है। जैसे-जैसे वैश्विक शक्ति अमेरिका और चीन के इर्द-गिर्द केंद्रित हो रही है, भारत और फ्राँस रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय सहयोग पर आधारित एक व्यावहारिक ‘थर्ड वे’ को विकसित कर रहे हैं। रक्षा, प्रौद्योगिकी और हिंद–प्रशांत क्षेत्र में फ्राँस भारत के सबसे विश्वसनीय यूरोपीय साझेदार के रूप में उभरा है। यह साझेदारी भारत की विकसित होती विदेश नीति को प्रतिबिंबित करती है, जो पारंपरिक शक्ति-संतुलन से आगे बढ़कर खंडित वैश्विक व्यवस्था में परिणामों को सक्रिय रूप से आकार देने की दिशा में अग्रसर है।
समय के साथ भारत-फ्राँस संबंधों का विकास कैसे हुआ है?
- चरण 1: स्वतंत्रता के बाद और उपनिवेशवाद से मुक्ति (1947-1962): भारत की स्वतंत्रता के बाद प्राथमिक ध्यान फ्राँस के औपनिवेशिक क्षेत्रों का शांतिपूर्ण रूप से भारत में विलय कराने पर केंद्रित रहा।
- राजनयिक संबंध: दोनों देशों के औपचारिक राजनयिक संबंध वर्ष 1947 में स्थापित हुए।
- क्षेत्रों का हस्तांतरण: गोवा में पुर्तगालियों के विपरीत फ्राँस ने अपने परिक्षेत्रों के लिये कूटनीतिक मार्ग चुना। वर्ष 1956 में एक संधि पर हस्ताक्षर किये गए और वर्ष 1962 तक पुदुचेरी, कराईकल, माहे और यानम जैसे क्षेत्र आधिकारिक तौर पर भारत को सौंप दिये गए।
- प्रारंभिक रक्षा संबंध: 1950 के दशक में भारत ने सैन्य उपकरणों के लिये फ्राँस की ओर रुख किया और उसने आवरगन (Ouragan) और मिस्टेरे (Mystère) विमान प्राप्त किये थे।
- चरण 2: रणनीतिक व्यावहारिकता और शीत युद्ध (1963-1997)
- शीत युद्ध के दौरान, जब विश्व ध्रुवीकृत था, तब फ्राँस और भारत ने ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की साझा आकांक्षा के आधार पर समानता पाई अर्थात महाशक्तियों (अमेरिका और सोवियत संघ) से स्वतंत्र रूप से कार्य करने की क्षमता।
- अंतरिक्ष सहयोग (1960-70 का दशक): यह साझेदारी 1960 के दशक की शुरुआत में प्रारंभ हुई जब भारत के पहले साउंडिंग रॉकेट प्रक्षेपण में फ्राँसीसी पेलोड ले जाया गया। शीघ्र ही भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) ने फ्राँसीसी अंतरिक्ष एजेंसी सेंटर नेशनल डी'एट्यूड्स स्पैटियल्स (CNES) के साथ ISRO वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण के लिये एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किये।
- फ्राँस ने वाइकिंग इंजन प्रौद्योगिकी प्रदान की, जो आगे चलकर भारत के विकास इंजन का आधार बनी, जिसका उपयोग PSLV और GSLV प्रक्षेपण यानों में किया गया।
- परमाणु समर्थन (1980 का दशक): वर्ष 1982 में अप्रसार कानूनों के कारण अमेरिका द्वारा तारापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र की ईंधन आपूर्ति रोक दिये जाने पर फ्राँस ने समृद्ध यूरेनियम की आपूर्ति कर भारत का समर्थन किया।
- रक्षा क्षेत्र में विविधीकरण: भारत ने 1980 के दशक में मिराज 2000 लड़ाकू विमानों की खरीद की, जो आज भी भारतीय वायुसेना का आधार बने हुए हैं।
- चरण 3: रणनीतिक साझेदारी (1998-2022): इस चरण में संबंध एक संरचित और गहरे रणनीतिक ढाँचे में परिवर्तित हुए।
- 1998 के परमाणु परीक्षण: पोखरण-II परीक्षणों के बाद अधिकांश पश्चिमी देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिये, किंतु फ्राँस ने ऐसा करने से इनकार किया और भारत की सुरक्षा चिंताओं को स्वीकार किया।
- प्रथम रणनीतिक साझेदार: वर्ष 1998 में फ्राँस वह पहला पश्चिमी देश बना, जिसके साथ भारत ने औपचारिक रणनीतिक साझेदारी समझौता किया।
- प्रमुख सौदे: इस काल में 36 राफेल लड़ाकू विमानों का ऐतिहासिक सौदा तथा P-75 स्कॉर्पीन पनडुब्बी परियोजना (मुंबई में 6 पनडुब्बियों का निर्माण) संपन्न हुई।
- वर्ष 2015 में, पेरिस में आयोजित COP21 के दौरान भारत और फ्राँस ने संयुक्त रूप से अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) की शुरुआत की, जिससे वे वैश्विक जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने लगे।
- चरण 4: होराइज़न 2047 एवं हिंद-प्रशांत (2023–2025): साझेदारी के 25 वर्ष पूर्ण होने पर ध्यान ‘क्रेता-विक्रेता’ संबंध से हटकर ‘सह-विकासकर्ता (co-developer)’ की ओर स्थानांतरित हुआ।
- होराइज़न 2047 रोडमैप: वर्ष 2023 में प्रारंभ की गई इस 25 वर्षीय योजना का उद्देश्य हरित ऊर्जा तथा उन्नत सैन्य प्रौद्योगिकी में पूर्ण संप्रभुता प्राप्त करना है।
- हिंद–प्रशांत आयाम: दोनों देश, हिंद महासागर के निवासी होने के नाते (फ्राँस के लिये रीयूनियन जैसे क्षेत्रों के माध्यम से), ‘मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत’ को सुनिश्चित करने हेतु संयुक्त नौसैनिक गश्त शुरू की।
- औद्योगिक सहयोग: ‘मेक इन इंडिया’ के अनुरूप लड़ाकू विमान इंजनों का सह-विकास और भारतीय विमानवाहक पोतों हेतु 26 राफेल-एम जेट की खरीद जैसे कदम उठाए गए।
- चरण 5: विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी (2026-वर्तमान): 17 फरवरी, 2026 को राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रोन की मुंबई यात्रा के बाद इन संबंधों को आधिकारिक तौर पर उन्नत कर दिया गया है।
- विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी: यह नया दर्जा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) शासन तथा जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों पर संयुक्त समाधान खोजने की दिशा में परिवर्तन को दर्शाता है।
- 2026 की प्रमुख उपलब्धियाँ:
- कर्नाटक में H125 हेलीकॉप्टर असेंबली लाइन का शुभारंभ (विश्व में ‘मेड इन इंडिया’ हेलीकॉप्टरों का निर्यात)
- भारत-फ्राँस नवाचार वर्ष 2026 की शुरुआत।
- भारत में हैमर मिसाइलों का संयुक्त उत्पादन।
- स्वच्छ परमाणु ऊर्जा के लिये स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) पर ध्यान केंद्रित करना।
भारत-फ्राँस संबंधों में प्रमुख समानता के क्षेत्र कौन-से हैं?
- रक्षा औद्योगिक एकीकरण और रणनीतिक स्वायत्तता: भारत और फ्राँस बहुध्रुवीय रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति गहन प्रतिबद्धता साझा करते हैं तथा गहन रक्षा औद्योगिक एकीकरण के माध्यम से कठोर वैश्विक गुटीय राजनीति का सक्रिय विरोध करते हैं।
- यह सहयोग मौलिक रूप से पारंपरिक क्रेता-विक्रेता गतिशीलता से हटकर उन्नत, दोहरे उपयोग वाली सैन्य प्रौद्योगिकियों के सह-विकास और सह-उत्पादन की दिशा में अग्रसर हुआ है।
- फरवरी 2026 में टाटा-एयरबस H125 हेलीकॉप्टर की अंतिम असेंबली लाइन के उद्घाटन के साथ इस साझेदारी को ‘विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ के रूप में उन्नत किया गया।
- इसके अलावा, 26 राफेल-मरीन जेट की चल रही खरीद और भारत में हैमर वायु से सतह मिसाइलों के निर्माण के लिये नए बेल-सफ्रान संयुक्त उद्यम इस मज़बूत तकनीकी हस्तांतरण का उदाहरण हैं।
- अंतरिक्ष सुरक्षा और उपग्रह प्रौद्योगिकी: अंतरिक्ष सहयोग द्विपक्षीय संबंधों का आधार बना हुआ है, जो अंतरिक्ष तक संप्रभु पहुँच बनाए रखने और अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता बढ़ाने की पारस्परिक अनिवार्यता से प्रेरित है।
- ISRO-CNES साझेदारी अत्यधिक सहक्रियात्मक मॉडल पर कार्य करती है, जो पृथ्वी अवलोकन, जलवायु निगरानी और उन्नत उपग्रह नेविगेशन प्रणालियों पर केंद्रित है।
- हाल ही में हुए रक्षा अंतरिक्ष समझौते के आधार पर दोनों देश संयुक्त तृष्णा थर्मल इन्फ्रारेड पृथ्वी अवलोकन उपग्रह मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसे इस वर्ष लॉन्च किया जाना निर्धारित है।
- इसके अतिरिक्त, CNES भारत के आगामी गगनयान मिशन 2027 के लिये मानव अंतरिक्ष उड़ान में महत्त्वपूर्ण विशेषज्ञता प्रदान करना जारी रखे हुए है, जो गहरे, उच्च-विश्वास वाले तकनीकी भरोसे को रेखांकित करता है।
- डिजिटल सॉवरेनिटी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता: डिजिटल सॉवरेनिटी और तकनीकी नवाचार का प्रतिच्छेदन अभिसरण की एक नई सीमा रचता है, जो सुरक्षित, समावेशी और विश्वसनीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन पर ज़ोर देता है।
- दोनों लोकतांत्रिक देश वैश्विक स्तर पर AI संसाधनों के लोकतंत्रीकरण की तत्काल आवश्यकता को पहचानते हैं, ताकि उभरती तकनीकें सार्वजनिक हित की सेवा करें, न कि निरंकुश निगरानी के लिये।
- यह साझा दृष्टिकोण भारत और फ्राँस को अमेरिका-चीन के प्रमुख तकनीकी प्रतिमान से परे कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिये अंतर्राष्ट्रीय नियामक ढाँचे को आकार देने में अग्रणी नेता के रूप में स्थापित करता है।
- भारतीय प्रधानमंत्री और फ्राँसीसी राष्ट्रपति ने मुंबई में संयुक्त रूप से ‘भारत-फ्राँस नवाचार वर्ष 2026’ का उद्घाटन किया, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के स्टार्टअप और अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्रों को गहराई से जोड़ना है।
- इसके तुरंत बाद फ्राँस ने नई दिल्ली में आयोजित AI इम्पैक्ट समिट 2026 में सक्रिय भागीदारी की, जो सीधे तौर पर पेरिस में आयोजित 2025 AI एक्शन समिट की नींव पर आधारित था।
- स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और नागरिक परमाणु विस्तार: कम कार्बन आधारित बिजली की ओर व्यावहारिक संक्रमण के माध्यम से जलवायु परिवर्तन का सामना करना नई दिल्ली और पेरिस के बीच गहन ऊर्जा सहयोग को गति प्रदान करता है।
- केवल अक्षय ऊर्जा पर निर्भर रहकर भारत के विशाल औद्योगिकीकरण को स्थापित रखना संभव नहीं है, इसलिये दोनों देश अगली पीढ़ी की असैनिक परमाणु तकनीक को ऊर्जा सुरक्षा के रणनीतिक स्तंभ के रूप में प्राथमिकता देते हैं।
- वर्ष 2025 के डिक्लेरेशन ऑफ इंटेंट के पश्चात, दोनों देश स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) के संयुक्त अनुसंधान और सह-विकास को तीव्रता से आगे बढ़ा रहे हैं।
- यह महत्त्वपूर्ण तकनीकी आदान-प्रदान भारत के 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता प्राप्त करने के नवनिर्धारित लक्ष्य का प्रत्यक्ष समर्थन करता है।
- हिंद-प्रशांत सुरक्षा और समुद्री जागरूकता: हिंद महासागर में स्थित शक्तियों के रूप में भारत और फ्राँस एक स्वतंत्र, मुक्त और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत ढाँचे को बनाए रखने की महत्त्वपूर्ण रणनीतिक अनिवार्यता साझा करते हैं।
- उनकी भू-राजनीतिक समानता विस्तारवादी समुद्री आक्रामकता के प्रति स्थिर प्रति संतुलन के रूप में कार्य करती है, जिससे संचार के महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
- इंडो-पैसिफिक रोडमैप के मार्गदर्शन में भारतीय और फ्राँसीसी नौसेनाओं ने मार्च 2025 में अरब सागर में वरुण द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास का 23वाँ संस्करण आयोजित किया।
- साथ ही फ्राँस ने भारतीय नौसेना को छठी स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बी सौंप दी।
- द्विपक्षीय व्यापार, जो वित्त वर्ष 2024-25 में 11.68 बिलियन डॉलर पर लगभग संतुलित बना हुआ है, मज़बूत समुद्री आर्थिक सुरक्षा के माध्यम से इस भू-राजनीतिक तालमेल को और सुदृढ़ करता है।
- वित्त वर्ष 2024-25 में 11.68 बिलियन डॉलर के व्यापक रूप से संतुलित द्विपक्षीय व्यापार ने इस भू-राजनीतिक समन्वय को मज़बूत समुद्री आर्थिक सुरक्षा के माध्यम से समर्थन प्रदान किया।
- आतंकवाद रोध एवं खुफिया साझेदारी: भारत और फ्राँस कट्टरता और राज्य प्रायोजित उग्रवाद के प्रति शून्य-सहिष्णुता का दृष्टिकोण साझा करते हैं तथा मज़बूत आंतरिक सुरक्षा को लोकतांत्रिक स्थिरता के लिये सर्वोपरि मानते हैं।
- यह सहयोग खुफिया जानकारी साझा करने वाले ढाँचे और संयुक्त क्षमता निर्माण तंत्रों के माध्यम से संस्थागत रूप ग्रहण करता है, जो साइबर आतंकवाद और ऑनलाइन दुष्प्रचार सहित मिश्रित खतरों की विकसित होती प्रकृति को संबोधित करता है।
- संयुक्त राष्ट्र और वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (FATF) जैसे बहुपक्षीय मंचों में सक्रिय सहयोग द्वारा, दोनों देश लगातार वैश्विक समुदाय पर आतंकवादी सुरक्षित ठिकानों और वित्तीय नेटवर्क को समाप्त करने हेतु दबाव डालते हैं।
- फरवरी 2026 में आयोजित द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के दौरान, राष्ट्रपति मैक्रोन ने भारत में हाल ही में हुए आतंकवादी हमलों की स्पष्ट निंदा की और सीमा-पार आतंकवाद के खिलाफ न्यू दिल्ली के आत्मरक्षा अधिकार के प्रति पूर्ण समर्थन दोहराया।
- रणनीतिक गठबंधन फ्राँस द्वारा आगामी 'नो मनी फॉर टेरर (NMFТ)' सम्मेलन की मेज़बानी हेतु भारत के स्पष्ट समर्थन से और भी मज़बूत हुआ है, जो मई 2026 में पेरिस में आयोजित होने वाला है।
- ब्लू इकॉनमी एवं महासागर शासन: महासागरों को सतत आर्थिक विकास और जलवायु नियंत्रण के लिये महत्त्वपूर्ण क्षेत्र मानते हुए, नई दिल्ली और पेरिस ने ब्लू इकॉनमी पर केंद्रित व्यापक गठबंधन बनाया।
- उन्नत वैज्ञानिक अवलोकन को नीति-निर्माण के साथ जोड़कर, दोनों राष्ट्र उच्च समुद्र की सुरक्षा करने के साथ-साथ समुद्री रोज़गार सृजन और जलवायु-प्रेरित तटीय क्षरण से सामना करना चाहते हैं।
- फरवरी 2026 में नई दिल्ली में आयोजित भारत AI इम्पैक्ट समिट में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को समुद्रविज्ञान डेटा के साथ एकीकृत कर तूफान पूर्वानुमान और समुद्री आजीविका संरक्षण में क्रांति लाने पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- साथ ही, दोनों देशों ने हाल ही में इंडो-पैसिफिक त्रिकोणीय विकास सहयोग (IPTDC) की प्रगति की सराहना की, जिसका उद्देश्य तीसरे देशों की जलवायु और SDG-केंद्रित परियोजनाओं का समर्थन करना है।
- वैश्विक शासन एवं सुधारित बहुपक्षवाद: बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के कट्टर समर्थक के रूप में भारत और फ्राँस पुरानी वैश्विक शासन संरचनाओं को सुधारने के लिये सक्रिय रूप से सहयोग कर रहे हैं, जो आधुनिक भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करतीं।
- फ्राँस भारत को ग्लोबल साउथ की अपरिहार्य आवाज़ मानता है और लगातार न्यू दिल्ली की बहुपक्षीय संस्थाओं में (जैसे सुधारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) शामिल होने की वकालत करता है, ताकि वैश्विक प्रतिनिधित्व समान हो।
- यह उच्च-स्तरीय बहुपक्षीय समन्वय संयुक्त शांति पहलों को आगे बढ़ाने के लिये उनके संयुक्त वचनबद्धता में भी परिलक्षित हुआ, जिसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 (गाजा के लिये शांति योजना) को लागू करने के लिये साझा समर्थन शामिल हैं।
- शैक्षिक गतिशीलता एवं जन-संपर्क: इस रणनीतिक साझेदारी का आधार तेज़ी से राज्य-से-राज्य कूटनीति से आगे बढ़कर मज़बूत शैक्षिक गतिशीलता नेटवर्क के माध्यम से गहन जनसांख्यिकीय और बौद्धिक एकीकरण की दिशा में अग्रसर हो रहा है।
- वीजा नियमों को शैक्षणिक चक्रों के अनुरूप ढालकर और अंग्रेज़ी माध्यमों में पढ़ाए जाने वाले कार्यक्रमों का नाटकीय रूप से विस्तार करके पेरिस सक्रिय रूप से खुद को भारत के शीर्ष स्तरीय विज्ञान, प्रौद्योगिकी और प्रबंधन के छात्रों के लिये प्रमुख यूरोपीय गंतव्य के रूप में स्थापित कर रहा है।
- फरवरी 2026 में AIIMS में बोलते हुए, राष्ट्रपति मैक्रोन ने आधिकारिक तौर पर एक बड़े शैक्षिक अभियान की शुरुआत की और वर्ष 2030 तक प्रतिवर्ष 30,000 भारतीय छात्रों का स्वागत करने का ठोस लक्ष्य निर्धारित किया।
- इसके तत्काल क्रियान्वयन के लिये, फ्राँस ने भारतीय नागरिकों के लिये वीज़ा-मुक्त एयरपोर्ट ट्रांजिट के साथ एक नया पायलट कार्यक्रम शुरू किया और बहुवर्षीय, सुव्यवस्थित वीज़ा प्रणाली पेश की, जो विशेष रूप से PhD जैसी पूर्ण अवधि की डिग्री के अनुरूप है।
भारत-फ्राँस संबंधों में मतभेद के प्रमुख क्षेत्र कौन-से हैं?
- जैतापुर में परमाणु परियोजना कार्यान्वयन गतिरोध: दशकों से उच्च स्तरीय राजनीतिक समर्थन के बावजूद, जैतापुर परमाणु ऊर्जा परियोजना रिएक्टर डिज़ाइन पर तकनीकी मतभेदों और प्रति यूनिट बिजली की उच्च लागत के कारण अटकी हुई है।
- यदि फ्राँस भारत की कार्बन-न्यूट्रल ऊर्जा यात्रा में मुख्य साझेदार बने रहना चाहता है, तो इन मूल्य-बिंदु और देयता संबंधी बाधाओं का समाधान करना आवश्यक है।
- यह परियोजना, जिसमें छह 1,650 MW के EPR रिएक्टर शामिल हैं, वर्षों से वार्ता में है पर कोई ठोस विकास नहीं हुआ।
- हालाँकि शांति अधिनियम (2025) देयता की सीमा स्पष्ट करके आशा की किरण प्रस्तुत करता है, लेकिन यह फ्राँसीसी कानूनी जाँच को संतुष्ट करता है या नहीं, यह तो समय ही बताएगा।
- व्यापार अस्थिरता और असंतुलन का दबाव: हालाँकि द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि हुई है, लेकिन यह अत्यधिक अस्थिर बना हुआ है और एयरोस्पेस और पेट्रोलियम जैसे कुछ उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों पर अत्यधिक निर्भर है, जिससे नई दिल्ली के लिये व्यापार घाटे में उतार-चढ़ाव होता रहता है।
- भारत अपने वस्त्र और कृषि उत्पादों के लिये अधिक विविधीकृत बाज़ार पहुँच चाहता है, जबकि फ्राँस गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाने के लिये दबाव डाल रहा है।
- इसके अलावा, हाल के वर्षों में 14-15 अरब अमेरिकी डॉलर पर काफी हद तक स्थिर रहने के बावजूद, फ्राँस के साथ भारत का माल व्यापार अत्यधिक अस्थिर रहा है, जिसमें पेट्रोलियम निर्यात में तीव्र संकुचन और निरंतर विमान आयात द्विपक्षीय संतुलन को नया आकार दे रहे हैं।
- इसके अलावा, सितंबर 2025 तक फ्राँस का भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) अन्य प्रमुख साझेदारों की तुलना में पीछे है, वैश्विक स्तर पर केवल 11वें स्थान पर।
- रूस-यूक्रेन भू-राजनीति पर मतभेद: यूरोपीय संघ के एक प्रमुख नेता के रूप में फ्राँस रूसी आक्रामकता के खिलाफ सख्त दृष्टिकोण अपनाता है, जबकि भारत अपनी ‘बहु-संबद्ध’ रणनीति जारी रखता है ताकि अपनी ऊर्जा और रक्षा सुरक्षा संरक्षित रह सके
- यह अंतर सूक्ष्म कूटनीतिक तनाव उत्पन्न करता है, विशेष रूप से जब फ्राँस संयुक्त वक्तव्यों या G7 जैसे बहुपक्षीय मंचों में मॉस्को के विरुद्ध कठोर भाषा अपनाने का दबाव डालता है।
- हालाँकि यह साझेदारी 'हर मौसम के लिये उपयुक्त' है, लेकिन क्षेत्रीय अखंडता के संबंध में 'रणनीतिक शब्दावली' में अंतर दोनों नेताओं के लिये एक संवेदनशील संतुलन बनाए रखने का कार्य करता है।
- भारत ने 'शत्रुता समाप्त करने' का आह्वान किया, लेकिन उल्लेखनीय रूप से उसने मॉस्को की प्रत्यक्ष निंदा नहीं की।
- रक्षा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की गहराई और नौकरशाही बाधा: 'क्रेता–विक्रेता’ से ‘सह-विकास’ मॉडल में बदलाव ने उच्च स्तरीय तकनीकी हस्तांतरण (ToT) में महत्त्वपूर्ण विलंब उत्पन्न किया है।
- फ्राँसीसी OEM (मूल उपकरण निर्माता) प्रायः भारत की कठोर 'वैश्विक स्तर पर खरीदें - भारत में निर्माण करें' आवश्यकताओं के साथ संघर्ष करते हैं तथा बौद्धिक संपदा और स्थानीय विक्रेता गुणवत्ता को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं।
- राजनीतिक इच्छाशक्ति होते हुए भी ये नौकरशाही और तकनीकी बाधाएँ भारतीय सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण को धीमा कर सकती हैं।
- वर्तमान में भारत के हथियार आयात में फ्राँस की हिस्सेदारी 28% है, फिर भी वास्तविक 'संप्रभु' प्रौद्योगिकी साझाकरण सीमित बना हुआ है।
- हालाँकि 26 राफेल-M विमानों का सौदा अंतिम रूप ले चुका है, लेकिन 110kN कॉम्बैट इंजन का संयुक्त विकास अभी भी 'रचनात्मक' चरण में है।
- डिजिटल कर और डेटा स्थानीयकरण संघर्ष: फ्राँस की वैश्विक डिजिटल सेवा कर की पहल और भारत के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम के तहत सख्त डेटा स्थानीयकरण नियम दोनों देशों की तकनीकी कंपनियों के लिये संघर्ष उत्पन्न करते हैं।
- पेरिस OECD के बहुपक्षीय कर ढाँचे का समर्थन करता है, जबकि नई दिल्ली ने ऐतिहासिक रूप से विदेशी तकनीकी दिग्गजों से राजस्व प्राप्त करने के लिये इक्वलाइजेशन लेवी का उपयोग किया, जिसमें फ्राँसीसी कंपनियाँ भी शामिल हैं।
- डिजिटल सॉवरेनिटी को लेकर ये भिन्न-भिन्न विचारधाराएँ डेटा-संचालित नवाचार और स्टार्टअप सहयोग के निर्बाध प्रवाह में बाधा डाल सकती हैं।
- भारत के बजट 2026 में क्लाउड प्रदाताओं के लिये कर छूट की शुरुआत की गई, लेकिन DPDP अधिनियम के तहत सख्त डेटा प्रतिधारण नियम अनुपालन में एक बाधा बने हुए हैं।
- 'ग्लोबल साउथ' में रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा: हालाँकि फ्राँस 'ग्लोबल साउथ की आवाज़ के रूप में भारत की भूमिका का समर्थन करता है, लेकिन दोनों देश कभी-कभी फ्राँसीसी भाषी अफ्रीका और हिंद महासागर में रणनीतिक प्रभाव और बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिये प्रतिस्पर्द्धा करते हैं।
- फ्राँस का ऐतिहासिक 'फ्राँसाफ्रिक' प्रभाव कभी-कभी भारत के बढ़ते विकास साझेदारी मॉडल को ओवरलैप करता है, जिससे संसाधनों और राजनीतिक गठबंधन के लिये एक तरह की अप्रत्यक्ष प्रतिस्पर्द्धा होती है।
- विकासशील क्षेत्रों में यह सुनिश्चित करने के लिये कि वे 'प्रतिस्पर्द्धी’' के बजाय 'पूरक' भागीदारों के रूप में कार्य करें, इस ओवरलैप का प्रबंधन करना आवश्यक है।
- वर्ष 2025–2026 में, दोनों देशों ने अफ्रीकी साझेदारों के साथ “त्रिपक्षीय सहयोग” प्रस्तावित करके इसे कम करने का प्रयास किया।
- हालाँकि, अफ्रीका में बड़े पैमाने पर संयुक्त वित्तपोषण उनके द्विपक्षीय व्यय का केवल एक छोटा हिस्सा है। अधिकांश वित्तपोषण अभी भी अलग-अलग राष्ट्रीय चैनलों के माध्यम से होता है।
- उदाहरण के लिये, फ्राँस मुख्य रूप से फ्रेंच डेवलपमेंट एजेंसी के माध्यम से अपनी भागीदारी को निर्देशित करता है, जबकि भारत बुनियादी ढाँचे और नवीकरणीय ऊर्जा का समर्थन करने के लिये क्रेडिट लाइनों (LoC) का उपयोग करता है।
- 'ब्रेन ड्रेन' संबंधी चिंताएँ: फ्राँस में भारतीय छात्रों की संख्या को 2026 तक तिगुना करने के प्रयासों के बावजूद, इस प्रवास की 'चक्रीयता' और 'यंग प्रोफेशनल स्कीम' में सीमित प्रवेश को लेकर विवाद बना हुआ है।
- भारत को इस बात का डर है कि उसकी तकनीकी प्रतिभाएँ स्थायी रूप से फ्राँसीसी स्टार्टअप्स की ओर पलायन कर जाएंगी, जबकि फ्राँसीसी श्रमिक संघ समय-समय पर गैर-यूरोपीय संघ के कुशल श्रमिकों के आगमन पर चिंता व्यक्त करते हैं, जो विशेष क्षेत्रों में स्थानीय प्रतिभाओं को विस्थापित कर रहे हैं।
- वर्ष 2030 तक 30,000 भारतीय छात्रों के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को भारतीय पेशेवर अपेक्षाओं और फ्राँसीसी श्रम बाज़ार संरक्षणवाद के बीच एक असंतुलन का सामना करना पड़ता है।
भारत-फ्राँस संबंधों को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- रक्षा औद्योगिक रोडमैप को संस्थागत रूप देना: दोनों देशों को अगली पीढ़ी के युद्ध प्रणालियों के लिये विक्रेता-आधारित खरीद मॉडल से संयुक्त बौद्धिक संपदा (IP) ढाँचे में संक्रमण को तीव्र करना चाहिये।
- इसके अंतर्गत समर्पित ‘सह-विकास क्षेत्र’ स्थापित किये जाने चाहिये, जहाँ फ्राँसीसी मूल उपकरण निर्माता (OEM) और भारतीय रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (DPSU) एक सुरक्षित द्विपक्षीय विधिक व्यवस्था के अंतर्गत संवेदनशील स्रोत-कोड और मूल धातुकर्म संबंधी रहस्यों को साझा कर सकें।
- साधारण असेंबली लाइनों से आगे बढ़ते हुए 110 किलो न्यूटन क्षमता वाले एयरो-इंजन के विनिर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये।
- इस प्रकार का गहन औद्योगिक एकीकरण रक्षा साझेदारी को बदलते वैश्विक निर्यात नियंत्रण प्रावधानों और तृतीय-पक्ष प्रतिबंधों से सुरक्षित बना देगा।
- हिंद-प्रशांत त्रिपक्षीय ढाँचे का क्रियान्वयन: क्षेत्रीय आधिपत्य का प्रभावी प्रतिकार करने हेतु भारत और फ्राँस को हिंद महासागर के प्रमुख क्षेत्रों में ‘प्लग-एंड-प्ले’ नौसैनिक लॉजिस्टिक्स केंद्रों को औपचारिक रूप देना चाहिये।
- इस उपाय के लिये समुद्री संचार प्रोटोकॉल के मानकीकरण और 'ब्लू इकोनॉमी' की निगरानी तथा समुद्री डकैती-रोधी अभियानों के लिये एक स्थायी संयुक्त कार्यबल की तैनाती आवश्यक होगी।
- संयुक्त अरब अमीरात या ऑस्ट्रेलिया जैसे तीसरे पक्ष के भागीदारों को त्रिपक्षीय प्रारूप में शामिल करके, वे एक समुत्थानशील सुरक्षा संरचना का निर्माण कर सकते हैं, जो द्विध्रुवीय शक्ति संरचनाओं का एक विकल्प प्रदान करती है।
- साझा उपग्रह समूह के माध्यम से समुद्री क्षेत्र की बेहतर जागरूकता इस समुद्री स्थिरता का तकनीकी आधार होगी।
- परमाणु दायित्व और मूल्य निर्धारण पर गतिरोध का समाधान: जैतापुर परियोजना को लेकर लंबे समय से चले आ रहे गतिरोध के लिये एक 'व्यापक ऊर्जा समझौता' की आवश्यकता है, जो नवीन संप्रभु-समर्थित वित्तपोषण मॉडल के माध्यम से उच्च प्रारंभिक पूंजीगत व्यय को दीर्घकालिक परिचालन लागत से पृथक करता है।
- दोनों सरकारों को सुरक्षा मानकों में सामंजस्य स्थापित करने के लिये एक द्विपक्षीय नियामक कार्यबल की स्थापना करनी चाहिये।
- स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) के सह-विकास पर तत्काल ध्यान केंद्रित करने से बड़े पैमाने पर EPR इकाइयों तक पहुँचने से पहले स्थानीयकृत परमाणु विनिर्माण के लिये एक 'प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट' मिल सकता है।
- यह मॉड्यूलर दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करेगा कि परमाणु ऊर्जा भारत की वर्ष 2047 तक के नेट-ज़ीरो लक्ष्य की आकांक्षाओं के लिये एक विश्वसनीय, आधारभूत स्तंभ बनी रहे।
- डिजिटल सॉवरेनिटी और AI एथिक्स का सामंजस्य: AI इम्पैक्ट- 2026 समिट के मद्देनजर, भारत के डेटा संरक्षण अधिनियम को फ्राँस के GDPR से प्रभावित यूरोपीय मॉडल के साथ संरेखित करने के लिये एक 'सामान्य डिजिटल मानक बोर्ड' का गठन किया जाना चाहिये।
- यह संस्था 'विश्वास-आधारित डेटा प्रवाह' (DFWT) को सुगम बनाएगी, जिससे भारतीय स्टार्टअप और फ्राँस के अनुसंधान संस्थान जैसे कि INRIA, स्वास्थ्य सेवा एवं जलवायु विज्ञान में नैतिक, निष्पक्ष AI मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिये बड़े डेटासेट साझा कर सकेंगे।
- AI गवर्नेंस पर एक ग्लोबल चार्टर के सह-लेखन के माध्यम से, दोनों राष्ट्र प्रौद्योगिकी में एक 'तृतीय मार्ग' का नेतृत्व कर सकते हैं जो राज्य-नेतृत्व वाली निगरानी और अनियमित कॉर्पोरेट एकाधिकार दोनों पर मानवाधिकारों को प्राथमिकता देता है।
- यह उपाय उनके डिजिटल अभिसरण को वैश्विक मानक स्थापित करने वाली एक शक्तिशाली संस्था में बदल देगा।
- 'नवाचार वर्ष' को एक स्थायी तकनीकी सेतु में विस्तारित करना: 'भारत-फ्राँस नवाचार वर्ष 2026' को एक स्थायी, संस्थागत 'नवाचार सेतु' में परिवर्तित किया जाना चाहिये, जो उद्यम पूंजी और तकनीकी प्रतिभा के निर्बाध आदान-प्रदान को सुगम बनाए।
- इसमें डीप-टेक, स्पेस-टेक और ग्रीन-टेक क्षेत्रों में दोहरे उपयोग वाली प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक संयुक्त संप्रभु प्रौद्योगिकी कोष का गठन शामिल है।
- संस्थापकों और शोधकर्त्ताओं के लिये दीर्घकालिक निवास परमिट सहित पारस्परिक ‘स्टार्ट-अप वीज़ा’ व्यवस्था यह सुनिश्चित करेगी कि प्रतिभाशाली नवप्रवर्तक पेरिस–मुंबई धुरी के पार ‘वैश्विक स्तर पर स्थापित’ उद्यमों का निर्माण कर सकें।
- यह उपाय सुनिश्चित करेगा कि द्विपक्षीय संबंध डिजिटल-आधारित उद्यमियों और वैज्ञानिकों की अगली पीढ़ी के लिये प्रासंगिक बने रहें।
- खुफिया जानकारी को मज़बूत करना और हाइब्रिड खतरे से निपटने के लिये तालमेल स्थापित करना: असममित युद्ध के बढ़ते खतरे से निपटने के लिये, दोनों देशों को सीमा पार आतंकी वित्तपोषण और साइबर-प्रचार नेटवर्क पर नजर रखने के लिये 'निरंतर खुफिया प्रवाह' वाले मॉडल की ओर बढ़ना चाहिये।
- इसके लिये राज्य प्रायोजित हमलों से बिजली ग्रिड और उपग्रह नेटवर्क जैसे महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसंरचना (CNI) की रक्षा के लिये एक संयुक्त साइबर-रक्षा कमान की स्थापना की आवश्यकता है।
- नियमित रूप से 'हाइब्रिड थ्रेट' सिमुलेशन अभ्यास आयोजित करके, दोनों देशों की आंतरिक सुरक्षा एजेंसियाँ वैश्विक संकटों के दौरान त्वरित प्रतिक्रिया के लिये साझा कार्ययोजना विकसित कर सकती हैं।
- इस स्तर का 'असीमित' खुफिया सहयोग उस भरोसे का संकेत देगा जो आमतौर पर सबसे करीबी खुफिया जानकारी साझा करने वाले गठबंधनों के लिये आरक्षित होता है।
- ग्लोबल साउथ के वित्तपोषण में सहयोगात्मक नेतृत्व: भारत और फ्राँस को अफ्रीका और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ऋण-जाल कूटनीति के किफायती एवं पारदर्शी विकल्प प्रदान करने के लिये एक 'ग्लोबल साउथ लचीला अवसंरचना कोष' का सह- प्रारंभ करना चाहिये।
- पेरिस क्लब में फ्राँस के प्रभाव और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) में भारत की विशेषज्ञता का लाभ उठाकर, वे एक समग्र विकास मॉडल पेश कर सकते हैं, जो फिज़िकल कनेक्टिविटी को डिजिटल इन्क्लूज़न के साथ जोड़ता है।
- इसके अंतर्गत ‘त्रिकोणीय सहयोग’ परियोजनाएँ सम्मिलित होंगी, जहाँ फ्राँसीसी पूंजी और भारतीय तकनीकी समाधान तृतीय-पक्ष विकासशील देशों में शासन-संबंधी चुनौतियों के समाधान में प्रयुक्त किये जायेंगे।
- इस तरह का प्रत्यक्ष वैश्विक नेतृत्व एक स्थिर, बहुध्रुवीय अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के दो स्तंभों के रूप में उनकी भूमिका को मज़बूत करेगा।
निष्कर्ष
भारत–फ्राँस संबंध रक्षा, प्रौद्योगिकी और वैश्विक शासन के क्षेत्रों में विश्वास, रणनीतिक स्वायत्तता और नीतिगत समन्वय पर आधारित एक भविष्योन्मुखी साझेदारी के रूप में सुदृढ़ हुए हैं। अमेरिका-चीन प्रभुत्व वाले अंतर्राष्ट्रीय परिवेश में मध्य-शक्तियों के रूप में दोनों राष्ट्र संप्रभुता तथा नियम-आधारित बहुपक्षवाद पर केंद्रित एक व्यावहारिक ‘थर्ड वे’ विकसित कर रहे हैं। यद्यपि व्यापार, परमाणु ऊर्जा और प्रौद्योगिकी अंतरण में संरचनात्मक चुनौतियाँ विद्यमान हैं, तथापि राजनीतिक गठबंधन दृढ़ बना हुआ है। होराइजन 2047 के तहत निरंतर संस्थागत सहयोग इस साझेदारी को बहुध्रुवीय विश्व का एक स्थिर स्तंभ बना सकता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न भारत और फ्राँस के मध्य रणनीतिक सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों की पहचान कीजिये तथा उन चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये, जो इस साझेदारी की पूर्ण प्राप्ति को सीमित करती हैं। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. फ्राँस को भारत का सबसे विश्वसनीय यूरोपीय साझेदार क्यों माना जाता है?
क्योंकि फ्राँस ने रक्षा, परमाणु मुद्दों और रणनीतिक स्वायत्तता के विषयों में बिना किसी राजनीतिक शर्त के निरंतर भारत का समर्थन किया है।
प्रश्न 2. होराइजन 2047 क्या है?
भारत की शताब्दी वर्षगाँठ तक द्विपक्षीय सहयोग को और गहरा करने के उद्देश्य से वर्ष 2023 में भारत-फ्राँस ने एक दीर्घकालिक रोडमैप शुरू किया।
प्रश्न 3. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत-फ्राँस सहयोग क्यों महत्त्वपूर्ण है?
दोनों ही हिंद महासागर में स्थित प्रमुख शक्तियाँ हैं और स्वतंत्र, खुले तथा नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था का समर्थन करती हैं।
प्रश्न 4. भारत–फ्राँस संबंधों में ‘थर्ड वे’ का क्या अर्थ है?
यह एक मध्य-शक्ति दृष्टिकोण है, जो अमेरिकी नेतृत्व वाले कॉर्पोरेट प्रभुत्व और चीन के राज्य-केंद्रित मॉडल के बीच संतुलन स्थापित करता है, विशेषकर प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के क्षेत्र में।
प्रश्न 5. रक्षा सहयोग में मुख्य चुनौती क्या है?
उच्च स्तरीय प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में देरी, विशेष रूप से एयरो-इंजन सह-विकास में।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न: निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2016)
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance) को वर्ष 2015 के संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में प्रारंभ किया गया था।
- इस गठबंधन में संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश सम्मिलित हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न. I2U2 (भारत, इज़रायल, संयुक्त अरब अमीरात और संयुक्त राज्य अमेरिका) समूहन वैश्विक राजनीति में भारत की स्थिति को किस प्रकार रूपांतरित करेगा? (2022)
