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भारतीय अर्थव्यवस्था

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और राज्य-पूंजी संबंधों का पुनर्गठन

  • 23 Feb 2026
  • 238 min read

यह एडिटोरियल 21/02/2026 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित “As we contemplate possibilities of AI, it is wreaking enduring transformations in state-capital relations” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। इस लेख में इस बात का विश्लेषण किया गया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता किस प्रकार बुनियादी ढॉंचे, डेटा और राष्ट्रीय सुरक्षा से पूंजी को जोड़कर राज्य-पूंजी संबंधों को मौलिक रूप से रूपांतरित कर रहा है। साथ ही यह प्रौद्योगिकी-राष्ट्रवाद के उदय तथा लोकतंत्र, बाज़ारों और नागरिक स्वतंत्रताओं के समक्ष उत्पन्न हो रही शासनगत चुनौतियों को भी रेखांकित करता है।

प्रिलिम्स के लिये: इंडिया AI मिशन, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, DPDP अधिनियम 2023, सेमीकंडक्टर मिशन

मेन्स के लिये: कृत्रिम बुद्धिमत्ता राज्य-पूंजी संबंधों की संरचना को किस प्रकार नया आकार दे रही है, इस नए आकार से कौन से मुद्दे उत्पन्न होते हैं और आवश्यक उपाय क्या हैं?

कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब केवल एक विघटनकारी प्रौद्योगिकी तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह राजनीतिक अर्थव्यवस्था की संरचना को पुनर्संयोजित कर रही है। पूर्ववर्ती वैश्वीकरण चरणों के विपरीत, जो गतिशील और अस्थिर पूंजी प्रवाह पर आधारित थे। एआई मूलतः अवसंरचना-निर्भर, भौगोलिक रूप से निहित तथा डेटा-केंद्रित प्रौद्योगिकी है। इसने पूंजी के व्यवहारगत प्रोत्साहनों को रूपांतरित करते हुए उसे विनियमन, सुरक्षा और रणनीतिक संरक्षण के संदर्भ में राज्य के अधिक निकट ला दिया है। परिणामस्वरूप, एआई राज्य–पूंजी संबंधों में एक संरचनात्मक परिवर्तन को जन्म दे रहे हैं, जिसकी पहचान प्रौद्योगिकी-राष्ट्रवाद, शक्ति के केंद्रीकरण और बाज़ार–राज्य सीमाओं के पतन से होती है।

भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता राज्य–पूंजी संबंधों की संरचना को कैसे पुनर्गठित कर रही है?

  • प्रौद्योगिकी-राष्ट्रवाद और अवसंरचना एकाधिकारों का उदय: भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) अवसंरचना में एक निष्क्रिय नियामक से सक्रिय सह-निवेशक की ओर अग्रसर है और सॉवरेन कंप्यूटिंग और मूलभूत मॉडल बनाने के लिये घरेलू बड़ी कंपनियों के साथ राज्य की क्षमता का समन्वय कर रहा है। यह प्रौद्योगिकी-राष्ट्रवादी, रणनीति भू-राजनीतिक और आर्थिक अनिवार्यताओं से प्रेरित एक घनिष्ठ, रणनीतिक राज्य-पूंजी गठबंधन का निर्माण करते हुए, बड़े पैमाने पर अवसंरचना एकाधिकारों को बढ़ावा देकर विदेशी प्रौद्योगिकी कंपनियों पर निर्भरता कम करने का प्रयास करती है।
    • 10,372 करोड़ रुपये के इंडियाAI मिशन के तहत राज्य ने हाल ही में रणनीतिक सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से 65 रुपये प्रति घंटे की रियायती दर पर 38,000 से अधिक GPU तैनात किये हैं। 
    • इसी के साथ 76,000 करोड़ रुपये की इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की क्वालकॉम के साथ हाल ही में हुई वर्ष 2026 की साझेदारी जैसी घरेलू कंपनियों को महत्त्वपूर्ण AI चिप्स का स्थानीय स्तर पर निर्माण करने के लिये प्रोत्साहित कर रही है।
  • राज्य की निगरानी और कॉर्पोरेट डेटा निष्कर्षण का अभिसरण: AI निजी डेटा निष्कर्षण और राज्य के अधिकार के बीच की खाई को कम कर रही है, जिसमें कंपनियाँ बड़े पैमाने पर विश्लेषण करने के लिये कानूनी अनुमोदन पर निर्भर हैं, जबकि राज्य तेज़ी से निजी एल्गोरिदम को आउटसोर्स करके पुलिस व्यवस्था और शासन कार्यों को संचालित कर रहा है।
    • यह निगरानी पूंजीवाद को बढ़ावा देती है, जहाँ कॉर्पोरेट राजस्व राज्य अनुबंधों के माध्यम से सुरक्षित होता है और सार्वजनिक सुरक्षा विशेषाधिकार प्राप्त उपकरणों पर निर्भर हो जाती है।
    • वर्ष 2025 में पुणे के गणेश चतुर्थी के दौरान, AI सक्षम CCTV सिस्टमों ने प्राइवेट फेस रिकग्निशन सॉफ़्टवेयर का उपयोग करते हुए 8 लाख से अधिक व्यावहारिक अलर्ट उत्पन्न किये, जबकि फरवरी 2026 में AI को राष्ट्रीय आपराधिक डेटाबेस में एकीकृत करके पूर्वानुमान आधारित पुलिस व्यवस्था में यह राज्य–कॉर्पोरेट परस्पर निर्भरता और भी संस्थागत हो गई।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) और सूचनात्मक पूंजीवाद: भारतीय राज्य डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का निर्माण करके अपनी आर्थिक भूमिका को पुनर्परिभाषित कर रहा है, जो बुनियादी AI संसाधनों का लोकतंत्रीकरण करके निजी संपत्ति सृजन को गति प्रदान करती है।
    • परिणामस्वरूप, राज्य एक अपरिहार्य पारिस्थितिकी तंत्र प्रवर्तक के रूप में परिवर्तित हो जाता है और यह सुनिश्चित करता है कि निजी क्षेत्र की AI नवाचार और पूंजी संचय संरचनात्मक रूप से राज्य-निर्मित सार्वजनिक साधनों पर निर्भर हैं। 
    • सरकार का AIKosh प्लेटफॉर्म इस दिशा में सक्रिय है, जो स्टार्टअप और उद्यमों के लिये 7,500 से अधिक उच्च-गुणवत्ता वाले डेटासेट और 273 AI मॉडल साझा राष्ट्रीय संसाधनों के रूप में उपलब्ध कराता है।
      • इसके अतिरिक्त, आंध्र प्रदेश द्वारा फरवरी 2026 में IBM और NxtGen के साथ साझेदारी में ‘स्वदेशी AI स्टैक’ का शुभारंभ क्षेत्रीय सरकारों द्वारा निजी वाणिज्यिक उपयोग के लिये केंद्रीकृत डिजिटल उत्पाद उपलब्ध कराने का एक उदाहरण है।
  • नियामक नियंत्रण और नवाचार-समर्थक नीतिगत गठबंधन: निजी पूंजी भारत के AI नियामक परिदृश्य को अत्यधिक प्रभावित कर रही है। यह पूंजी ऐसे नरम, नवाचार-समर्थक ढाँचे के पक्षधर हैं, जो कड़े अधिकार-आधारित सुरक्षा उपायों के बजाय तीव्र बाज़ार विस्तार को प्राथमिकता देते हैं। यूरोपीय संघ की तरह तकनीकी एकाधिकारों पर अंकुश लगाने के बजाय, भारतीय सरकार रणनीतिक रूप से पूंजी के साथ गठबंधन कर रही है और वैश्विक निवेश आकर्षित करने के लिये विनियमन में ढील को एक भू-राजनीतिक समझौता मानती है।
    • यह संरचनात्मक समझौता राज्य–पूंजी सहमति को दर्शाता है, जहाँ नागरिक दायित्व और निजता संबंधी चिंताओं को घरेलू तकनीकी वर्चस्व को गति देने के साझा लक्ष्य के अधीन रखा गया है। इस विनियमन-मुक्त गठबंधन को प्रमाणित करते हुए, फरवरी 2026 में आयोजित इंडिया AI इम्पैक्ट समिट ने वैश्विक और घरेलू तकनीकी कंपनियों से बुनियादी ढाँचे में 250 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धता सफलतापूर्वक प्राप्त की। 
    • साथ ही, सरकार द्वारा हाल ही में प्रकाशित AI गवर्नेंस दिशानिर्देश सख्ती से गैर-हस्तक्षेपवादी दृष्टिकोण अपनाते हैं, जो स्व-नियमन के लिये उद्योग की मांगों को दर्शाता है और वर्ष 2031 तक अनुमानित 32 बिलियन डॉलर के घरेलू AI बाज़ार को सक्षम बनाता है।
  • एल्गोरिदम आधारित शासन और श्रम का अनौपचारिकीकरण: राज्य सक्रिय रूप से तकनीकी पूंजी के श्रम को अनौपचारिक बनाने के लिये एल्गोरिदम प्रबंधन का उपयोग करने की अनुमति देता है और व्यवस्थित रूप से पारंपरिक श्रमिक सुरक्षा की तुलना में निर्बाध पूंजी संचय को प्राथमिकता देता है।
    • गिग वर्कर्स के लिये औपचारिक रोज़गार की स्थिति अनिवार्य न करके, सरकार वेतन लागत को कम करने और सामाजिक सुरक्षा दायित्वों को दरकिनार करने के लिये प्लेटफॉर्म एकाधिकारों के साथ संरचनात्मक रूप से गठबंधन करती है। 
    • इस समझौते ने औद्योगिक कार्यबल का पुनर्गठन किया, जिससे प्लेटफॉर्म पूंजीवाद का आर्थिक जोखिम एल्गोरिदम-प्रबंधित डिजिटल श्रम पर आ गया। जनवरी 2026 में देशव्यापी गिग वर्कर हड़तालों के बाद श्रम मंत्रालय ने प्लेटफॉर्म श्रमिकों को औपचारिक कर्मचारियों के रूप में वर्गीकृत करने से इनकार किया, जिससे प्लेटफॉर्मों को AI-आधारित कार्य-आधारित वेतन बनाए रखने की अनुमति मिली।
    • परिणामस्वरूप, भारत का डिजिटल गिग वर्कफोर्स, जिसका 2030 तक 23.5 मिलियन से अधिक होने का अनुमान है, वर्तमान डिजिटल श्रम कानूनों के तहत वैधानिक भविष्य निधि और न्यूनतम मज़दूरी से संरचनात्मक रूप से वंचित बना हुआ है।
  • संप्रभु उद्यम पूंजीवाद और गहन प्रौद्योगिकी संरक्षणवाद: भारतीय राज्य रणनीतिक AI नवाचार को विदेशी अधिग्रहण से सुरक्षित रखने के लिए आक्रामक रूप से उद्यम पूंजीपति की भूमिका निभा रहा है, जिससे सार्वजनिक वित्त और निजी उद्यम की सीमाऍं धुंधली हो रही हैं। उच्च-तकनीकी जोखिम के अंतिम गारंटर की भूमिका निभाते हुए, सरकार संरचनात्मक रूप से निजी पूंजी संचय को संप्रभु भू-राजनीतिक हितों से सीधे जोड़ रही है। 
    • इससे सुनिश्चित होता है कि निजी स्टार्टअप्स द्वारा किये गए महत्त्वपूर्ण AI आविष्कार वैश्विक वित्तीय बाज़ारों के बजाय पूरी तरह से घरेलू सरकारी एजेंडा के अधीन ही रहें।
      • नवगठित 10,000 करोड़ रुपये के डीपटेक फंड के माध्यम से सरकार ने वर्ष 2025 के अंत से दोहरे उपयोग वाली प्रौद्योगिकियों पर ध्यान केंद्रित करने वाले 12 से अधिक स्वदेशी AI स्टार्टअप्स में सीधे सह-निवेश किया है।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सैन्यीकरण और उभरता सैन्य-तकनीकी तंत्र: सरकारें पारंपरिक सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा विनिर्माण से आगे बढ़कर AI-सक्षम क्षमताओं के लिये चुस्त निजी प्रौद्योगिकी फर्मों के साथ जुड़ रही हैं, जिससे राज्य-पूंजी संबंध तेज़ी से सैन्यीकृत हो रहे हैं। यह बदलाव स्वायत्त प्रणालियों, निगरानी विश्लेषण और ड्रोन-रोधी प्रौद्योगिकियों में तीव्र नवाचार की आवश्यकता से प्रेरित है, जिन्हें पारंपरिक रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियॉं अक्सर समयबद्ध रूप से पूरा नहीं कर पातीं।
    • परिणामस्वरूप, राष्ट्रीय सुरक्षा संरचनाएँ अब संरचनात्मक रूप से निजी बौद्धिक संपदा पर निर्भर हो रही हैं, जिससे विशेषीकृत रक्षा-तकनीक फर्मों को रणनीतिक संप्रभु संपत्तियों का दर्जा प्राप्त हो रहा है।
    • रक्षा आधुनिकीकरण की हालिया प्राथमिकताएँ और खरीद सुधार AI-संचालित खतरे के आकलन, मानवरहित प्रणालियाँ और निर्णय-समर्थन उपकरणों में स्टार्टअप और निजी फर्मों की भागीदारी को बढ़ावा देती हैं।
    • यह प्रवृत्ति घरेलू सैन्य-औद्योगिक-तकनीकी परिसर के क्रमिक उद्भव का संकेत देती है, जहाँ सार्वजनिक रक्षा उद्देश्यों और निजी तकनीकी पूंजी का तीव्र एकीकरण हो रहा है, जिससे सुरक्षा क्षेत्र में राज्य के अधिकार और बाज़ार शक्ति के बीच संतुलन को नया आकार मिल रहा है। 
  • सरकारी प्रौद्योगिकी का निजीकरण और एल्गोरिदम आधारित मितव्ययिता: राज्य तेज़ी से अपने मुख्य कल्याणकारी ढाँचे को निजी क्लाउड और एनालिटिक्स कंपनियों को आउटसोर्स कर रहा है ताकि एल्गोरिदम अनुकूलन और मितव्ययिता के माध्यम से राजकोषीय सुदृढ़ीकरण प्राप्त किया जा सके। नागरिक कल्याण सेवाओं को एक आकर्षक सरकारी प्रौद्योगिकी खरीद बाज़ार में परिवर्तित करके, निजी कंपनियाँ राज्य के व्यय को सुव्यवस्थित करने और प्रशासनिक अनावश्यकताओं की पहचान करने से प्रत्यक्ष रूप से लाभ कमा रही हैं। 
    • इससे एक संरचनात्मक निर्भरता उत्पन्न होती है, जहाँ राज्य की मूलभूत क्षमता संसाधनों के वितरण और शासन की पूरी तरह निजी-संस्थान-स्वामित्व वाले पूर्वानुमानित मॉडल पर आश्रित हो जाती है।
    • आधार से जुड़े सार्वजनिक वितरण प्रणालियों में निजी AI एनालिटिक्स के वर्ष 2025 के अंत तक एकीकरण से TCS और इंफोसिस जैसी IT दिग्गजों कंपनियों के लिये निरंतर राज्य अनुबंधों में 1.8 बिलियन डॉलर से अधिक का वार्षिक AI राजस्व उत्पन्न हुआ।

 AI-संचालित राज्य-पूंजी गठजोड़ से कौन-से मुद्दे उत्पन्न होते हैं? 

  • नियामक नियंत्रण और एकाधिकार: सरकारों और प्रौद्योगिकी जगत की बड़ी कंपनियों के बीच का गठबंधन गंभीर नियामक नियंत्रण को बढ़ावा देता है, जिससे ज़मीनी स्तर पर नवाचार और बाज़ार प्रतिस्पर्द्धा प्रभावी रूप से बाधित होती है। जैसे-जैसे राज्य राष्ट्रीय स्तर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वर्चस्व को सुरक्षित करने के लिये कॉर्पोरेट पूंजी पर अधिकाधिक निर्भर होते जा रहे हैं, वे ऐसी संरक्षणवादी नीतियाँ लागू कर रहे हैं जो अंतर्निहित रूप से मौजूदा तकनीकी एकाधिकारों को संरक्षण प्रदान करती हैं। 
    • परिणामस्वरूप, कुछ उद्योगपतियों के बाज़ार प्रभुत्व को बनाए रखने के लिये सार्वजनिक हित और नैतिक सुरक्षा उपायों को व्यवस्थित रूप से कमज़ोर किया जा रहा है। उदाहरण के लिये, यूरोपीय संघ में डिजिटल उद्योग के लॉबी खर्च 2026 तक €151 मिलियन तक बढ़ गए ताकि AI अधिनियम की डेटा सुरक्षा धाराओं को कमज़ोर किया जा सके।
    • इसी तरह प्रमुख अमेरिकी तकनीकी कंपनियों ने वर्ष 2025 में 100 मिलियन डॉलर के ‘लीडिंग द फ्यूचर’ सुपर PAC को वित्त पोषित किया ताकि राज्य-स्तरीय AI नियमों को सफलतापूर्वक अवरुद्ध किया जा सके और संघीय नियामक स्थगन प्राप्त किया जा सके।
  • निगरानी पूंजीवाद और डिजिटल अधिनायकवाद: यह गठजोड़ व्यापक निगरानी प्रणालियों की तैनाती को गति देता है, जिसमें कॉरपोरेट डेटा निष्कर्षण राज्य सुरक्षा तंत्रों के साथ सहज रूप से एकीकृत हो जाता है। पूंजी लाभ प्रेरित पूर्वानुमानित अत्यधिक आक्रामक मॉडल विकसित करती है, जिनका उपयोग अधिनायकवादी या लोकतांत्रिक राज्य समान रूप से नागरिकों की निगरानी और राजनीतिक असहमति दबाने के लिये करते हैं।
    • इस अभिसरण से निजता के अधिकारों का हनन होता है और ऐसा डिजिटल निगरानी तंत्र निर्मित होता है जिसमें सामाजिक भागीदारी के लिये बायोमेट्रिक ट्रैकिंग अनिवार्य शर्त बन जाती है। 
      • उदाहरणस्वरूप, पाकिस्तान में राज्य अधिकारियों ने बलूच समुदाय जैसे हाशिये पर रहने वाले समूहों को पीढ़ियों तक ट्रैक करने हेतु सोशल मीडिया डेटा से निर्मित AI-संचालित फेस रिकग्निशन मॉडल का उपयोग किया। अमेरिका में FTC ने हाल ही में पक्षपातपूर्ण चेहरे की पहचान सुरक्षा प्रणालियों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि अनियंत्रित कॉर्पोरेट निगरानी उपकरण अल्पसंख्यकों को लक्षित कर सकते हैं।
  • अति-सैन्यीकरण और स्वायत्त युद्ध: निजी पूंजी AI प्रौद्योगिकी का सैन्यीकरण कर रही है, जिससे नागरिक नवाचार और घातक स्वायत्त हथियार प्रणालियों के बीच की सीमा धुंधली हो रही है। 
    • रक्षा विभाग कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित लक्ष्य पहचान और कमान एवं नियंत्रण अवसंरचना विकसित करने के लिये प्रौद्योगिकी कंपनियों में अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है, जो आधुनिक युद्ध की नैतिकता में मौलिक परिवर्तन लाता है। 
    • संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2024 के अंत में संकल्प 79/239 पारित किया, जिसमें AI और सैन्य एकीकरण से उत्पन्न गंभीर अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों को संबोधित करने का प्रस्ताव रखा गया।
      • इसका एक स्पष्ट उदाहरण मध्य पूर्व में ‘लैवेंडर’ जैसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों का प्रलेखित उपयोग है, जहाँ स्वचालित एल्गोरिदम ने हत्या सूची तैयार की और मानव ऑपरेटरों ने मात्र 20 सेकंड में हमलों को स्वीकृति दे दी।
  • अनियंत्रित पर्यावरणीय गिरावट: कृत्रिम बुद्धिमत्ता में श्रेष्ठता हासिल करने की राज्य–पूँजी प्रतिस्पर्द्धा ने अत्यधिक कंप्यूटिंग अवसंरचना के पर्यावरणीय प्रभाव को सक्रिय रूप से नजरअंदाज़ कर दिया है। सरकारें कॉरपोरेट डेटा केंद्रों को भारी सब्सिडी और नियामकीय छूट देती हैं और प्रौद्योगिकी-राष्ट्रवाद को अंतर्राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं की तुलना में प्राथमिकता देती हैं।
    • इस असीमित प्रोसेसिंग पावर की मांग संसाधनों की कमी को और बढ़ाती है, जिससे संवेदनशील क्षेत्र गंभीर जल और ऊर्जा संकट में डूब जाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक वैश्विक डेटा केंद्रों की बिजली खपत दोगुनी होकर 945 टेरावॉट-घंटे हो जाएगी। इसके अतिरिक्त, भारतीय डेटा केंद्रों द्वारा जल की खपत वर्ष 2030 तक दोगुनी होकर 358 अरब लीटर तक पहुँच जाएगी, जिससे देश का जल संकट और गहरा जाएगा।
  • भू-राजनीतिक विभाजन और ‘स्प्लिंटरनेट’: राज्य-रणनीति और तकनीकी पूँजी का संलयन वैश्विक डिजिटल पारितंत्र को गहराई से ध्रुवीकृत, संप्रभु तकनीकी गुटों में विभाजित कर रहा है। तकनीकी राष्ट्रवाद से प्रेरित होकर महाशक्तियाँ सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखलाओं और हार्डवेयर निर्यात को हथियार बना रही हैं ताकि भूराजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों को अग्रणी कंप्यूट क्षमताओं से वंचित किया जा सके।
    • यह शून्य-योग प्रतिस्पर्द्धा एक खुले, वैश्विक स्तर पर एकीकृत इंटरनेट के वादे को नष्ट कर देती है, जिससे तृतीय पक्ष के देशों को एल्गोरिदम शीत युद्ध में पक्ष चुनने के लिये विवश होना पड़ता है। रणनीतिक मतभेद स्पष्ट है; वाशिंगटन 53 अरब डॉलर के चिप्स अधिनियम के माध्यम से निजी क्षेत्र के नवाचार और निर्यात नियंत्रण का लाभ उठाता है, जबकि बीजिंग वर्ष 2030 तक 90% से अधिक AI एडॉप्शन के लक्ष्य के साथ राज्य-नेतृत्व वाली आत्मनिर्भरता का अनुसरण करता है।
    • परिणामस्वरूप, वैश्विक AI अनुसंधान दो भागों में बंट रहा है, जिसमें चीन वर्ष 2024 में वैश्विक AI उद्धरणों का 40% से अधिक हिस्सा हासिल कर रहा है, जो अकेले अमेरिका की तुलना में चार गुना अधिक है।
  • डिजिटल उपनिवेशवाद और ग्लोबल साउथ का शोषण: कृत्रिम बुद्धिमत्ता का गठजोड़ आधुनिक डिजिटल उपनिवेशवाद को बढ़ावा देता है, जहाँ शक्तिशाली राज्य-समर्थित तकनीकी समूह ग्लोबल साउथ से संसाधन और डेटा निकालते हैं। विकासशील देशों को डेटा एनालिसिस के लिये सस्ता श्रम और हार्डवेयर के लिये कच्चे महत्त्वपूर्ण खनिज उपलब्ध कराने तक सीमित कर दिया गया है, जबकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उत्पन्न अपार धन पश्चिमी एवं चीनी राजधानियों में केंद्रित रहता है। 
    • यह संरचनात्मक असमानता विकासशील देशों को उनकी डिजिटल सॉवरेनिटी से वंचित कर देती है, जिससे वे निरंतर तकनीकी निर्भरता में जकड़े रहते हैं। एक मानक 2 किलोग्राम का कंप्यूटर बनाने के लिये 800 किलोग्राम कच्चे माल के निष्कर्षण की आवश्यकता होती है, जो उत्तरी AI हार्डवेयर को ईंधन प्रदान करने के लिये ग्लोबल साउथ में अस्थिर दुर्लभ मृदा खनन पर अत्यधिक निर्भर है। 
    • इसके अतिरिक्त, सिलिकॉन वैली और शेन्ज़ेन में उन्नत तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संचालित GDP वृद्धि से होने वाले खरबों डॉलर का संचय कर रहे हैं, जिससे विकासशील राष्ट्र उपेक्षित रह गए हैं तथा उन्हें मूलभूत मॉडलों तक समान पहुँच से वंचित कर दिया गया है।
  • श्रम व्यवधान और अत्यधिक धन संकेंद्रण: कॉर्पोरेट पूंजी कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करके श्रम को सक्रिय रूप से स्वचालित कर रही है तथा परिचालन लागत में भारी कटौती कर रही है, जबकि राज्य की नीतियाँ विस्थापित कार्यबल की रक्षा करने या परिणामस्वरूप उत्पादकता लाभों को पुनर्वितरित करने में विफल रहती हैं। 
    • यह संरचनात्मक परिवर्तन मानव श्रम से शक्ति को हटा कर सीधे कंप्यूटर मालिकों के हाथों में स्थानांतरित कर देता है, जिससे मध्य वर्ग मूल रूप से अस्थिर हो जाता है तथा सामाजिक-आर्थिक विभाजन और भी बढ़ जाता है। 
    • तकनीकी लॉबिंग से बुरी तरह प्रभावित सरकारें, मजबूत कल्याणकारी योजनाओं या सार्वभौमिक बुनियादी आय को लागू करने का सक्रिय रूप से विरोध करती हैं और सामाजिक स्थिरता की तुलना में कॉर्पोरेट लाभ को प्राथमिकता देती हैं। 
    • केवल संयुक्त राज्य अमेरिका में ही AI से संबद्ध पूँजीगत व्यय वर्तमान में अमेरिकी सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.8% के बराबर है। इसी बीच व्यापक वाणिज्यिक स्वचालन ब्लू-कॉलर और वाइट-कॉलर दोनों ही क्षेत्रों में रोज़गार विस्थापन की गति को तीव्र कर रहा है, जिसके परिणामस्वरूप बढ़ती असमानता के विरुद्ध तीव्र लोकलुभावन प्रतिक्रिया तथा स्थानीय स्तर पर विरोध-प्रदर्शन उभर रहे हैं। अकेले अमेरिका में ही, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संबंधित पूंजीगत व्यय वर्तमान में अमेरिकी GDP का लगभग 0.8% है। वहीं, व्यापक व्यावसायिक स्वचालन से श्रमिक और श्रमिक दोनों क्षेत्रों में नौकरियों का विस्थापन तेज़ी से बढ़ रहा है, जिससे बढ़ती असमानता के विरुद्ध गंभीर जनवादी प्रतिक्रिया और स्थानीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
  • लोकतांत्रिक व्यवस्था का क्षरण और एल्गोरिदम आधारित दुष्प्रचार: राज्य संस्थाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के बीच गठबंधन सूचना तंत्र को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है, जनरेटिव AI का उपयोग करके अभूतपूर्व पैमाने पर जन धारणा को प्रभावित कर रहा है। पूंजीपति वर्ग ऐसे एल्गोरिदम को प्राथमिकता देता है, जो ध्रुवीकरण करने वाले कंटेंट को बढ़ावा देते हैं, जिसका राज्य और राजनीतिक संस्थाएँ आसानी से लक्षित दुष्प्रचार अभियान चलाने तथा लोकतांत्रिक संवाद को दबाने के लिये फायदा उठाती हैं। 
    • वास्तविकता का यह कृत्रिम हेर-फेर संस्थागत विश्वास को कमज़ोर करता है तथा लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के सुचारू संचालन के लिये आवश्यक साझा तथ्यात्मक आधार को नष्ट कर देता है। हाल के वैश्विक चुनाव चक्रों के दौरान, तकनीकी एकाधिकारों द्वारा एकत्रित व्यक्तिगत डेटा के विशाल भंडार का फायदा उठाते हुए, मतदाताओं को लक्षित करने के लिये डीप फेक और एल्गोरिदम पूर्वाग्रह का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया।
    • CCIA जैसे AI लॉबिंग समूह सक्रिय सहमति के बिना संवेदनशील राजनीतिक और जनांकिकीय डेटा को कलेक्ट करने के अधिकार के लिये दबाव बनाना जारी रखते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि ये सिस्टम अत्यधिक प्रभावी हेर-फेर इंजन बने रहें।

इस परिवर्तन को प्रबंधित करने के लिये कौन-से उपाय आवश्यक हैं?

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिये संप्रभु डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: मूलभूत कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडलों पर कंपनियों के पूर्ण अधिग्रहण को रोकने के लिये, सरकारों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता कंप्यूटिंग और डेटासेट के लिये समर्पित एक सुदृढ़, सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) स्थापित करनी चाहिये। यह दृष्टिकोण उन्नत कंप्यूटिंग क्लस्टरों और उच्च-गुणवत्ता वाले प्रशिक्षण डेटा को विशिष्ट निजी परिसंपत्तियों के बजाय साझा सार्वजनिक उपयोगिता के रूप में मानकर पहुँच का लोकतंत्रीकरण करता है।
    • सॉवरेन GPU ग्रिड और सांस्कृतिक रूप से प्रतिनिधि ओपन-सोर्स डेटासेट तक रियायती पहुँच प्रदान करके, राज्य स्थानीय स्टार्टअप और शोधकर्त्ताओं को बिग टेक इकोसिस्टम पर निर्भर हुए बिना प्रतिस्पर्द्धी मॉडल बनाने के लिये सशक्त बना सकते हैं। 
    • ऐसा कदम AI के उभरते बाज़ार में मौजूद उच्च प्रवेश बाधाओं को सीधे तौर पर समाप्त कर देता है, जिससे विकेंद्रीकृत नवाचार का परिवेश बनता है। अंततः AI अवसंरचना के लिये एक सार्वजनिक विकल्प का निर्माण तकनीकी संप्रभुता की गारंटी देता है और यह सुनिश्चित करता है कि महत्त्वपूर्ण डिजिटल विकास केवल कॉर्पोरेट लाभ के बजाय जनहित के अनुरूप बना रहे।
  • फेडरेटेड डेटा ट्रस्ट्स का कार्यान्वयन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बुनियादी संसाधन पर एकाधिकार को तोड़ने के लिये डेटा साझाकरण और उपयोग को नियंत्रित करने हेतु फेडरेटेड डेटा ट्रस्ट्स की कानूनी स्थापना आवश्यक है। ये स्वतंत्र, न्यासी-संचालित ट्रस्ट डेटा विषयों एवं AI डेवलपर्स के बीच मध्यस्थ के रूप में कार्य करेंगे, यह सुनिश्चित करते हुए कि डेटा का उपयोग नैतिक रूप से, सुरक्षित रूप से और केवल अधिकृत उद्देश्यों के लिये किया जाए। 
    • डेटा पोर्टेबिलिटी और इंटर-ऑपरेबिलिटी के सिद्धांतों पर काम करते हुए, यह ढाँचा यह अनिवार्य करता है कि प्रमुख तकनीकी प्लेटफॉर्म गुमनाम, उच्च-मूल्य वाले डेटासेट को अत्यधिक विनियमित API के माध्यम से छोटे बाज़ार भागीदारों के साथ साझा करें। 
    • यह संरचनात्मक हस्तक्षेप डेटा संचय की शून्य-योग प्रकृति को समाप्त करता है, जिससे प्रभावी रूप से उन व्यापक नेटवर्क प्रभावों को निष्क्रिय किया जा सकता है, जो मौजूदा एकाधिकारों को प्रतिस्पर्द्धा से बचाते हैं। सामूहिक सौदाकारी शक्ति को न्यासी के हाथों में पुनः स्थापित कर डेटा ट्रस्ट्स शोषणकारी निगरानी प्रथाओं को संतुलित, सहमति-आधारित डेटा अर्थव्यवस्था में रूपांतरित करते हैं।
  • AI स्टैक के लिये पूर्व-निर्धारित प्रतिस्पर्द्धा प्रवर्तन: पारंपरिक प्रतिस्पर्द्धा कानून AI और राज्य–पूँजी गठजोड़ के तीव्र विकास के प्रति अत्यधिक प्रतिक्रियाशील हैं, इसलिये आक्रामक पूर्व-निवारक प्रतिस्पर्द्धा ढाँचों की ओर संक्रमण आवश्यक हो गया है। नियामकों को सिलिकॉन निर्माण और क्लाउड कंप्यूट से लेकर आधारभूत मॉडलों और उपभोक्ता अनुप्रयोगों तक व्याप्त AI तकनीकी स्टैक के महत्त्वपूर्ण ‘चोकपॉइंट्स’ को सक्रिय रूप से परिभाषित कर निगरानी में लेना चाहिये।
    • इस उपाय में ऊर्ध्वाधर विलय और एकाधिकार आपूर्ति साझेदारी को सख्ती से रोकना शामिल है, जो प्रमुख भागीदारों को पारिस्थितिकी तंत्र पर नियंत्रण बनाए रखने और प्रतिस्पर्द्धियों को आवश्यक अधोसंरचना से वंचित करने की अनुमति देते हैं। AI आपूर्ति शृंखला के विभिन्न स्तरों के बीच संरचनात्मक पृथक्करण को कानूनी रूप से लागू करके, अधिकारी बड़े निगमों को अपने स्वयं के डाउनस्ट्रीम अनुप्रयोगों को प्राथमिकता देने से रोक सकते हैं। 
    • परिणामस्वरूप, बाज़ार को आकार देने की यह सक्रिय प्रक्रिया एक समान अवसर सुनिश्चित करती है जहाँ नवाचार स्थापित पूंजीगत शक्ति के बजाय योग्यता एवं तकनीकी श्रेष्ठता द्वारा संचालित होता है।
  • डिज़ाइन में तकनीकी-कानूनी अनुपालन को समाहित करना: न्यूरल नेटवर्क्स की अंतर्निहित जटिलता और अस्पष्टता यह मांग करती है कि विनियामक अनुपालन को विकासोत्तर जाँच-सूची के रूप में न लेकर AI संरचना में ही शामिल किया जाये। नीति-निर्माताओं को ऐसा तकनीकी–विधिक शासन ढाँचा अनिवार्य करना चाहिये जिसमें निजता-संरक्षण, पूर्वाग्रह निवारण और पारदर्शिता जैसे कानूनी दायित्वों के मॉडल के प्रशिक्षण एवं परिनियोजन प्रक्रियाओं में गणितीय रूप से अंतःस्थापित हों।
    • इसमें डेवलपर्स को किसी सिस्टम को व्यावसायिक रूप से जारी करने से पहले स्वचालित ऑडिट ट्रेल, वास्तविक काल में विसंगति का पता लगाने और व्याख्यात्मक मॉड्यूल को एकीकृत करने की आवश्यकता होती है। नियम-आधारित कानूनी शर्तों को तकनीकी प्रवर्तन तंत्रों के साथ मिलाकर, नियामक नवाचार की गति को बाधित किये बिना निरंतर, स्वचालित निगरानी प्राप्त कर सकते हैं। 
    • यह संरचनात्मक परिवर्तन यह सुनिश्चित करता है कि अग्रणी मॉडल सामाजिक सुरक्षा उपायों से अंतःनिहित रूप से बँधे रहें तथा विनाशकारी विफलताओं अथवा अदृश्य प्रणालीगत भेदभाव के जोखिम को उल्लेखनीय रूप से घटाया जा सके।
  • अनिवार्य एल्गोरिदम प्रभाव आकलन: एल्गोरिदम आधारित निर्णय लेने से उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक जोखिमों का मुकाबला करने के लिये, राज्यों को सभी उच्च जोखिम वाले AI अनुप्रयोगों के लिये अनिवार्य एल्गोरिदम प्रभाव आकलन (AIA) लागू करना चाहिये। पर्यावरणीय प्रभाव अध्ययनों के अनुरूप तैयार किये गए ये मानकीकृत आकलन निगमों को उपेक्षित समुदायों, श्रम बाज़ारों एवं लोकतांत्रिक संस्थानों पर अपने AI सिस्टम के संभावित परिणामों का कठोर मूल्यांकन और दस्तावेजीकरण करने के लिये बाध्य करते हैं। 
    • महत्त्वपूर्ण रूप से, मूल्यांकन प्रक्रिया में विभिन्न अंतर-कार्यात्मक टीमों, डोमेन विशेषज्ञों और प्रौद्योगिकी से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले सार्वजनिक समुदायों के साथ अनिवार्य परामर्श शामिल होना चाहिये। 
    • संगठनों को अपने एल्गोरिदमिक विकल्पों को पारदर्शी रूप से औचित्यपूर्ण ठहराने और जोखिम-न्यूनन रणनीतियों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने के लिये बाध्य कर यह उपाय कॉर्पोरेट प्राइवेसी के आवरण को हटाता  है। इस प्रकार AI विकास तीव्र ‘बीटा-टेस्टिंग’ प्रयास से हटकर उत्तरदायी और सामाजिक रूप से जिम्मेदार इंजीनियरिंग अभ्यास में परिवर्तित होता है।
  • श्रेणीबद्ध दायित्व और मानव भागीदारी अनिवार्य: स्वायत्त प्रणालियों में जवाबदेही की कमी को दूर करने के लिये, एक श्रेणीबद्ध, कार्य-आधारित दायित्व व्यवस्था को लागू करना आवश्यक है, जिसके साथ-साथ मानव भागीदारी की सख्त निगरानी अनिवार्य हो। यह विधिक संरचना, प्रणाली के जोखिम वर्गीकरण तथा उसके द्वारा किये जाने वाले विशिष्ट कार्य के आधार पर, AI डेवलपर्स, डिप्लॉयर्स एवं इंपोर्टर्स को आनुपातिक रूप से विधिक और वित्तीय ज़िम्मेदारी सौंपती है।
    • स्वास्थ्य सेवा, आपराधिक न्याय प्रणाली या अवसंरचना जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में कार्यरत अनुप्रयोगों के लिये, यह उपाय कानूनी रूप से मशीन द्वारा लिये गए निर्णयों की समीक्षा और अनुमोदन के लिये मानव हस्तक्षेप को अनिवार्य बनाता है। इन परिचालन सुरक्षा उपायों को लागू करने से यह सुनिश्चित होता है कि एल्गोरिदम संबंधी भ्रम या पक्षपातपूर्ण परिणाम मानव संदर्भगत निर्णय एवं हस्तक्षेप के बिना स्वचालित रूप से जीवन-परिवर्तनकारी कार्रवाइयों को जन्म न दें। 
    • लापरवाहीपूर्ण एल्गोरिदम तैनाती के साथ गंभीर वित्तीय दंड को जोड़कर, यह उपाय निगमों को तेज़ी से बाज़ार पर कब्ज़ा करने की तुलना में सुरक्षा एवं सटीकता को प्राथमिकता देने के लिये आर्थिक रूप से प्रोत्साहित करता है।
  • संप्रभु नवाचार के लिये चुस्त नियामक सैंडबॉक्सिंग: कठोर राज्य नियंत्रण और अनियंत्रित पूंजीवादी विस्तार के बीच तनाव को दूर करने के लिये राज्य-प्रायोजित, चुस्त नियामक सैंडबॉक्स को व्यापक रूप से अपनाने की आवश्यकता है। 
    • ये नियंत्रित परीक्षण वातावरण उभरते स्टार्टअप्स को नियामक अधिकारियों के प्रत्यक्ष, सहयोगात्मक पर्यवेक्षण के तहत अत्याधुनिक AI अनुप्रयोगों के साथ प्रयोग करने की अनुमति देते हैं। 
    • इन सैंडबॉक्स के भीतर, कंपनियाँ अपने मॉडल के व्यवहार, प्रशिक्षण प्रोटोकॉल और जोखिम प्रोफाइल में नियामकों को पूरी पारदर्शिता प्रदान करने के बदले में कुछ अनुपालन दायित्वों से अस्थायी छूट प्राप्त करती हैं।
    • यह गतिशील प्रतिक्रिया प्रणाली नीति निर्माताओं को अमूर्त, अप्रचलित विधायी मान्यताओं के बजाय वास्तविक दुनिया की तकनीकी क्षमताओं से व्युत्पन्न सटीक, साक्ष्य-आधारित नियम बनाने में सक्षम बनाती है। अंततः, यह सहयोगात्मक दृष्टिकोण एक नवाचार-समर्थक पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देता है जो सार्वजनिक सुरक्षा की रक्षा के लिये आवश्यक सटीक सुरक्षा उपायों को तैयार करते हुए संप्रभु तकनीकी क्षमताओं का पोषण करता है।
  • सामंजस्यपूर्ण वैश्विक अंतरसंचालनीयता मानक: चूँकि AI-संचालित राज्य-पूंजी गठजोड़ सीमाओं के पार सुचारू रूप से संचालित होता है, इसलिये इसके प्रभाव को प्रबंधित करने के लिये बाध्यकारी, अंतरसंचालनीय वैश्विक शासन मानकों की स्थापना आवश्यक है। अंतर्राष्ट्रीय गठबंधनों को AI सुरक्षा, कंटेंट स्रोत और डेटा सुरक्षा के लिये एकीकृत तकनीकी मानदंड स्थापित करने चाहिये ताकि निगमों को उदार अधिकार क्षेत्रों में स्थानांतरित होकर नियामक मध्यस्थता का लाभ उठाने से रोका जा सके। 
    • इस उपाय में कृत्रिम मीडिया के लिये क्रिप्टोग्राफिक वॉटरमार्किंग और वैश्विक एल्गोरिदम संबंधी नुकसानों पर नज़र रखने के लिये सार्वभौमिक घटना रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क जैसे तकनीकी प्रोटोकॉल का मानकीकरण शामिल है। अंतर्राष्ट्रीय कानूनी परिभाषाओं और अनुपालन संरचनाओं को संरेखित करने से यह सुनिश्चित होता है कि बहुराष्ट्रीय तकनीकी समूह नैतिक आवश्यकताओं को कमज़ोर करने के लिये संप्रभु राष्ट्रों को एक-दूसरे के विरुद्ध इस्तेमाल न कर सकें। 
    • एक सुसंगत वैश्विक नियामक संजाल बनाकर, राज्य सामूहिक रूप से सीमाहीन पूंजी पर लोकतांत्रिक प्रभुत्व स्थापित कर सकते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का मार्ग मानव प्रगति के एक एकीकृत दृष्टिकोण की पूर्ति करे।

निष्कर्ष: 

कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल उत्पादन संरचनाओं का रूपांतरण नहीं कर रही बल्कि राज्य और पूंजी के मध्य शक्ति-संतुलन का पुनर्संयोजन भी कर रही है। पूंजी को भौगोलिक क्षेत्र, अवसंरचनात्मक तंत्र तथा डेटा संसाधनों से संबद्ध कर, एआई ने पारंपरिक बाज़ार–राज्य सीमाओं को धुंधला कर दिया है। उभरता हुआ प्रौद्योगिकी-राष्ट्रवादी समझौता यद्यपि रणनीतिक क्षमता का आश्वासन देता है तथापि इसके साथ असमानता, निगरानी विस्तार तथा लोकतांत्रिक क्षरण के जोखिम भी तीव्र करता है। अतः इस परिवर्तन का प्रबंधन करने के लिये सक्रिय शासन की आवश्यकता है जो तकनीकी शक्ति को संवैधानिक मूल्यों और जनहित के अधीन रखे।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में प्रौद्योगिकी राष्ट्रवाद के उदय का विश्लेषण कीजिये तथा स्पष्ट कीजिये कि यह वैश्वीकरण और संप्रभुता की अवधारणा को किस प्रकार पुनर्परिभाषित कर रही है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. प्रौद्योगिकी राष्ट्रवाद से क्या अभिप्राय है?
प्रौद्योगिकी संप्रभुता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से राज्य शक्ति और घरेलू पूंजी के बीच स्थापित रणनीतिक समन्वय।

प्रश्न 2. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पूर्ववर्ती प्रौद्योगिकियों से किस प्रकार भिन्न है?
यह स्वभावतः पूंजी-प्रधान, डेटा-आधारित तथा क्षेत्रीय अवसंरचनाओं पर निर्भर प्रौद्योगिकी है।

प्रश्न 3. निगरानी पूंजीवाद की अवधारणा क्या है?
व्यक्तिगत डेटा के व्यापक संकलन और विश्लेषण के माध्यम से आर्थिक लाभ अर्जित करने की प्रक्रिया।

प्रश्न 4. डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का अर्थ क्या है?
राज्य द्वारा निर्मित डिजिटल प्रणालियाँ बड़े पैमाने पर निजी नवाचार को सक्षम बनाती हैं।

प्रश्न 5. AI गवर्नेंस को जटिल क्यों माना जाता है?
क्योंकि नवाचार, राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के उद्देश्य प्रायः परस्पर संघर्ष की स्थिति में आ जाते हैं।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. विकास की वर्तमान स्थिति में, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), निम्नलिखित में से किस कार्य को प्रभावी रूप से कर सकती है? (2020)

  1. औद्योगिक इकाइयों में विद्युत की खपत कम करना
  2. सार्थक लघु कहानियों और गीतों की रचना
  3. रोगों का निदान
  4. टेक्स्ट से स्पीच (Text-to-Speech) में परिवर्तन
  5. विद्युत ऊर्जा का बेतार संचरण

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1, 2, 3 और 5

(b) केवल 1, 3 और 4

(c) केवल 2, 4 और 5

(d) 1, 2, 3, 4 और 5

उत्तर: (b)


मेन्स

प्रश्न. कृत्रिम बुद्धि (एआई) की अवधारणा का परिचय दीजिये। एआई क्लिनिकल निदान में कैसे मदद करता है? क्या आप स्वास्थ्य सेवा में एआई के उपयोग में व्यक्ति की निजता को कोई खतरा महसूस करते हैं? (2023)

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