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भारत-ब्राज़ील संबंधों का विस्तार

  • 24 Feb 2026
  • 206 min read

यह एडिटोरियल 22/02/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित "India, Brazil set $30 billion trade target by 2030, sign mineral pacts” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख वैश्विक व्यापार विखंडन और बहुध्रुवीय पुनर्गठन की संदर्भभूमि में उभरती भारत-ब्राज़ील साझेदारी का विश्लेषण करता है। यह ऐतिहासिक प्रगति, समकालीन महत्त्व, निरंतर विद्यमान चुनौतियाँ और रणनीतिक सहयोग को और प्रगाढ़ करने के संभावित मार्गों की समीक्षा करता है।

प्रारंभिक परीक्षा के लिये: वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन, G4, MERCOSUR, BRICS, हरित हाइड्रोजन

मुख्य परीक्षा के लिये: भारत-ब्राज़ील संबंधों का विकास, भारत के लिये इसका महत्त्व, संबंधों में प्रमुख मतभेद, संबंधों को सुदृढ़ करने के लिये आवश्यक उपाय।

व्यापार विभाजन और टैरिफ राष्ट्रवाद के इस युग में, भारत-ब्राज़ील द्वारा वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 30 अरब डॉलर तक बढ़ाने का निर्णय ग्लोबल साउथ के एक शांत लेकिन महत्त्वपूर्ण पुनर्गठन का संकेत देता है। वाणिज्य से परे, यह साझेदारी महत्त्वपूर्ण खनिजों, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और रक्षा सहयोग को सुदृढ़ करती है ताकि एकाधिकार वाली आपूर्ति शृंखलाओं पर प्रणालीगत निर्भरता को कम किया जा सके। एक डिजिटल महाशक्ति और नवीकरणीय ऊर्जा तथा खनिज महाशक्ति के अभिसरण के साथ, यह संबंध बहुपक्षवाद के माध्यम से लेन-देन संबंधी कूटनीति से रणनीतिक स्वायत्तता की ओर संक्रमण को दर्शाता है। भारत और ब्राज़ील मिलकर वर्चस्ववादी अतिचार के बिना विकासात्मक सहयोग का एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत कर रहे हैं

समय के साथ  भारत–ब्राज़ील संबंध कैसे विकसित हुए हैं?

  • चरण 1: लुसोफोन संबंध और शीत युद्धकालीन द्वंद्व (1500 – 1980): इस संबंध की नींव ऐतिहासिक संयोगों और शीत युद्ध के दिशा में निहित थी।
    • लुसोफोन संबंध: ऐतिहासिक संबंध 1500 ईस्वी से शुरू होता है जब पुर्तगाली खोजकर्त्ता पेड्रो अल्वारेस कैब्राल वास्कोडीगामा के भारत जाने के मार्ग का अनुसरण करते समय मार्ग से भटककर ब्राज़ील पहुँच गया।
      • इससे कृषि और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की दीर्घकालिक परंपरा स्थापित हुई, जिसमें भारतीय ज़ेबू मवेशियों (जैसे गिर नस्ल) का स्थानांतरण विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा, जो ब्राज़ील की आधुनिक पशुधन प्रणाली की आधारशिला बने।
      • 16वीं और 18वीं शताब्दी के बीच, ब्राज़ील और गोवा, जो दोनों पुर्तगाली साम्राज्य की चौकियाँ थीं, के बीच द्विपक्षीय आदान-प्रदान हुए जो भोजन और परिधान के साथ-साथ स्थानीय परंपराओं में भी परिलक्षित होते हैं।
    • राजनयिक आरंभ और गोवा विवाद : औपचारिक राजनयिक संबंध वर्ष 1948 में स्थापित किये गए, किंतु प्रारंभिक चरण में संबंधों में पर्याप्त तनाव रहा।
      • वर्ष 1961 में भारत द्वारा गोवा को पुर्तगाली शासन से मुक्त किये जाने पर, पुर्तगाल से अपने सांस्कृतिक और राजनयिक संबंधों के कारण ब्राज़ील ने प्रारंभ में संयुक्त राष्ट्र में भारत की कार्रवाई का विरोध किया।
  • सामरिक स्वायत्तता: प्रारंभिक तनावों के बावजूद, दोनों देशों ने शीत युद्ध काल में अपनी सामरिक स्वायत्तता की सुदृढ़ता से रक्षा की।
  • एक उल्लेखनीय सहमति तब उत्पन्न हुई जब नई दिल्ली और ब्रासीलिया दोनों ने परमाणु अप्रसार संधि, 1968 की भेदभावपूर्ण प्रकृति की निंदा की। 
  • चरण 2 : शीत युद्धोत्तर पुनर्गठन और बहुपक्षीय जागृति (1990s – 2005): शीत युद्ध की समाप्ति और पारस्परिक आर्थिक उदारीकरण ने दोनों देशों को क्षेत्रीय सीमाओं से परे दृष्टि विकसित करने के लिये प्रेरित किया।
    • 1990 के दशक में अर्थव्यवस्थाओं के उदारीकरण के साथ, दोनों देशों ने एक-दूसरे को व्यापक और अपेक्षाकृत अप्रयुक्त उभरते बाज़ारों के रूप में देखना आरंभ किया।
    • इस चरण में “दक्षिण–दक्षिण सहयोग” का संस्थागत स्वरूप विकसित हुआ। 2003 में IBSA संवाद मंच (भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका) की स्थापना एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई, जिसने बहुजातीय, विकासशील लोकतंत्रों का एक समूह निर्मित किया।
    • वर्ष 2003 में द्विपक्षीय रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर (जिसे वर्ष 2006 में अनुमोदित किया गया) ने रणनीतिक और सैन्य सहयोग की औपचारिक शुरुआत को चिह्नित किया।
    • वर्ष 2004 में भारत और ब्राज़ील (जर्मनी और जापान के साथ) ने G4 का गठन किया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता प्राप्त करने के लिये अपने राजनयिक प्रयासों का समन्वय किया।
    • इसके अतिरिक्त, भारत ने 2004 में MERCOSUR समूह (जिसमें ब्राज़ील भी सम्मिलित है) के साथ वरीयतापूर्ण व्यापार समझौते (PTA) पर हस्ताक्षर किये।
  • चरण 3 : रणनीतिक साझेदारी और ब्रिक्स युग (2006–2020) : इस अवधि में संबंधों को औपचारिक रूप से उन्नत किया गया और यह सहयोग उभरती बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था का एक आधार स्तंभ बना।
    • वर्ष 2006 में द्विपक्षीय संबंधों को आधिकारिक रूप से “रणनीतिक साझेदारी” का दर्जा प्रदान किया गया, जिससे विज्ञान, प्रौद्योगिकी और रक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में संयुक्त आयोगों पर आधारित व्यापक संस्थागत ढाँचा विकसित हुआ। भारत और ब्राज़ील ब्रिक्स समूह के मूल स्तंभ बने।
    • इस मंच ने उन्हें पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाली वैश्विक वित्तीय संरचनाओं को चुनौती देने और व्यापक आर्थिक नीतियों का समन्वय करने की अनुमति दी।
    • इसके अतिरिक्त, वर्ष 2009 में प्रसारित ब्राज़ीलियाई टेलीविज़न धारावाहिक ‘कैमिन्हो दास इंडियास’ (भारत का मार्ग) ने ब्राज़ील में भारत के प्रति जन-जागरूकता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया।
    • BASIC समूह (ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, भारत, चीन) के अंतर्गत, दोनों देशों ने UNFCCC शिखर सम्मेलनों में विकासशील देशों के आर्थिक हितों की रक्षा के लिये कठोर और असमान जलवायु दायित्वों के विरुद्ध घनिष्ठ समन्वय किया।
  • चरण 4: विविधीकरण, प्रौद्योगिकी और ग्लोबल साउथ का अग्रदूत (2021 – वर्तमान): वर्तमान चरण की विशेषता पारंपरिक वस्तुओं से आगे बढ़कर गहन-प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा और महत्त्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं में तीव्र विविधीकरण है।
    • इस अवधि में अभूतपूर्व उच्चस्तरीय सहभागिता देखी गई, जिसमें जुलाई 2025 में भारतीय प्रधानमंत्री की ऐतिहासिक ब्राज़ील यात्रा और फरवरी 2026 में राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा की नई दिल्ली की प्रत्यावर्ती राजकीय यात्रा शामिल है।
    • फरवरी 2026 के शिखर सम्मेलन ने साझेदारी को मूलतः उन्नत कर दिया। दोनों देशों ने डिजिटल साझेदारी पर संयुक्त घोषणा (जिसमें AI, सुपरकंप्यूटर और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना पर बल दिया गया) तथा दुर्लभ मृदा तत्त्वों और महत्त्वपूर्ण खनिजों पर एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये, ताकि सुदृढ़ और गैर-पश्चिमी आपूर्ति शृंखलाओं का निर्माण किया जा सके।
    • ऊर्जा परिवर्तन की महाशक्तियाँ: इथेनॉल में अग्रणी ब्राज़ील और सौर ऊर्जा में अग्रणी भारत, हरित परिवर्तन की प्रक्रिया में गहन रूप से सहयोग कर रहे हैं।
      • ब्राज़ील, भारत के नेतृत्व वाले वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन (GBA) और अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) का संस्थापक सदस्य है।
      • वर्ष 2006 में, जब दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी को औपचारिक रूप दिया, तब उनका द्विपक्षीय व्यापार 2.4 अरब डॉलर था। इसके पश्चात यह बढ़कर लगभग 13 अरब डॉलर हो गया है।
      • इस प्रवृत्ति को देखते हुए, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति लूला ने फरवरी 2026 में एक महत्त्वाकांक्षी नवीन लक्ष्य निर्धारित किया, जिसके अंतर्गत वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 30 अरब डॉलर तक पहुँचाना है।

भारत के लिये ब्राज़ील का क्या महत्त्व है?  

  • व्यापार में तीव्र वृद्धि और आर्थिक पूरकता : लचीली आपूर्ति शृंखलाओं के निर्माण और अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकियों के लिये प्रतिद्वंद्वी एकाधिकारों पर असमान निर्भरता को कम करने के भारत के रणनीतिक जनादेश में ब्राज़ील अनिवार्य भूमिका निभाता है। 
    • हरित गतिशीलता और उन्नत विनिर्माण की ओर भारत के संक्रमण को आधार प्रदान करते हुए, ब्राज़ील महत्त्वपूर्ण संसाधनों के शस्त्रीकरण के विरुद्ध एक सुरक्षित भू-राजनीतिक प्रतिरोधक के रूप में कार्य करता है।
    • MERCOSUR वरीयतापूर्ण व्यापार समझौते जैसे विस्तारित ढाँचे भारतीय निर्यातकों को लैटिन अमेरिका में महत्त्वपूर्ण और कम शुल्क वाली पहुँच उपलब्ध कराते हैं।
      • द्विपक्षीय व्यापार में वर्ष 2025 में प्रभावशाली 25.5% की वृद्धि दर्ज की गई, जिसमें भारत ने एक सुदृढ़ व्यापार अधिशेष बनाए रखा। 
  • रक्षा सह-उत्पादन और एयरोस्पेस समन्वय:
    • भारत–ब्राज़ील रक्षा संबंध साधारण क्रेता–विक्रेता स्वरूप से आगे बढ़कर गहन औद्योगिक सह-उत्पादन में रूपांतरित हो चुके हैं, जिससे भारत के आत्मनिर्भर भारत (स्वावलंबन) लक्ष्यों को प्रत्यक्ष रूप से बल मिलता है।
    • अपनी रक्षा आपूर्ति शृंखलाओं के एकीकरण से भारत न केवल एक विशाल निर्यात बाज़ार सुरक्षित करता है, बल्कि उन्नत एयरोस्पेस विनिर्माण प्रौद्योगिकियों तक पहुँच भी प्राप्त करता है।
    • यह सहजीवी पारितंत्र अटलांटिक क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति और सैन्य–औद्योगिक आधार को सुदृढ़ करता है।
      • उदाहरणार्थ, ब्राज़ील की एयरोस्पेस दिग्गज कंपनी एम्ब्रेयर ने वर्ष 2026 में अडानी डिफेंस के साथ भारत में E175 जेट विमानों के लिये अंतिम संयोजन लाइन (Final Assembly Line) स्थापित करने हेतु एक समझौते पर हस्ताक्षर किये।
  • वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन में अग्रणी भूमिका: जैव ऊर्जा में ब्राज़ील की अद्वितीय विशेषज्ञता और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की व्यापक क्षमता का संयोजन इस साझेदारी को भारत की जलवायु कार्रवाई रणनीति का एक आधारशिला बनाता है। 
    • साथ मिलकर, वे वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा संरचना को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं, जिससे विकासशील देशों की अस्थिर जीवाश्म ईंधन आयात पर निर्भरता कम हो रही है। 
    • यह गठबंधन भारत को विदेशी मुद्रा में अरबों की बचत करते हुए हरित ईंधन की ओर तीव्र संक्रमण करने में सक्षम बनाता है।
    • भारत के नेतृत्व वाले वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन (GBA), जिसे ब्राज़ील का सशक्त समर्थन प्राप्त है, से भारत को तेल आयात में सालाना लगभग 5.4 अरब डॉलर की बचत होने की संभावना है। 
    • दोनों देशों की राष्ट्रीय जैव ईंधन पहलों में समान लक्ष्य विद्यमान हैं, जैसे भारत की राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति और ब्राज़ील का रेनोवाबायो कार्यक्रम, जो स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिये पेट्रोल और डीज़ल में जैव ईंधन के मिश्रण अनुपात को बढ़ाने पर केंद्रित हैं।
  • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) और AI एकीकरण: उभरती तकनीकी महाशक्ति के रूप में, भारत अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के वैश्वीकरण तथा न्यायसंगत AI शासन ढाँचों की स्थापना के लिये ब्राज़ील के साथ अपने संबंधों का उपयोग कर रहा है।
    • लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को स्केलेबल डिजिटल समाधान निर्यात कर भारत अपने तकनीकी-कूटनीति मॉडल को सुदृढ़ करता है और अपने आईटी क्षेत्र के लिये व्यापक अवसर उत्पन्न करता है।
    • यह साझेदारी सुनिश्चित करती है कि भविष्य के डिजिटल मानदंडों के निर्माण में ग्लोबल साउथ की निर्णायक भूमिका बनी रहे।
      • उदाहरणार्थ, फरवरी 2026 में “भविष्य के लिये डिजिटल साझेदारी” पर संयुक्त घोषणा में संयुक्त DPI पहलों और शिक्षा क्षेत्र में AI के उपयोग पर विशेष ज़ोर दिया गया है।
      • इसके अतिरिक्त, ओपन प्लैनेटरी इंटेलिजेंस नेटवर्क (OPIN) का शुभारंभ डिजिटल और जलवायु रूपांतरणों के एकीकरण हेतु दोनों देशों के संयुक्त प्रयासों को रेखांकित करता है।
  • भविष्य की प्रौद्योगिकियों के लिये महत्त्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षा: महत्त्वपूर्ण खनिजों के लिये सुदृढ़, गैर-एकाधिकारिक आपूर्ति शृंखला सुनिश्चित करना भारत की उच्च-तकनीकी और EV विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं के लिये आर्थिक अस्तित्व प्राथमिकता है।
    • ब्राज़ील, जिसके पास दुर्लभ मृदा तत्त्वों और रणनीतिक खनिजों के विशाल भंडार हैं, चीन के प्रभुत्व को चुनौती देने में एक महत्त्वपूर्ण साझेदार है।
    • यह खनिज सुरक्षा भारत के हरित और डिजिटल रूप से उन्नत अर्थव्यवस्था में संक्रमण का आधार है।
    • उदाहरण स्वरूप, फरवरी 2026 द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के दौरान दुर्लभ मृदा तत्त्वों और महत्त्वपूर्ण खनिजों पर ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किये गए।
      • यह समझौता भारत के घरेलू बैटरी निर्माण और हरित ऊर्जा ग्रिड के लिये कच्चे माल की विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित करता है।
  • MSME सहयोग और फार्मास्युटिकल समन्वय: दोनों देशों के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्रों का एकीकरण भारत के लिये ज़मीनी स्तर पर व्यापक आर्थिक संभावनाएँ और सीमा-पार नवाचार के अवसर सृजित करता है।
    • साथ ही, औषधि क्षेत्र में सामंजस्य भारत को अत्यधिक विनियमित लैटिन अमेरिकी स्वास्थ्य सेवा बाज़ार में प्रवेश कर “विश्व की फार्मेसी” के रूप में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने का अवसर देता है।
    • यह दोहरा दृष्टिकोण समावेशी आर्थिक विकास और वैश्विक स्वास्थ्य समानता को बढ़ावा देता है।
    • फरवरी 2026 में MSME क्षेत्र में सहयोग को गहरा करने के लिये भारत और ब्राज़ील  के बीच एक विशेष समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये गए थे।
    • फार्मा क्षेत्र में दोनों देश आवश्यक औषधियों के सह-विकास और प्रौद्योगिकी अंतरण के लिये प्रतिबद्ध हैं।
  • रणनीतिक भू-राजनीतिक संरेखण और ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: भारत और ब्राज़ील  ग्लोबल साउथ के मूलभूत स्तंभों के रूप में कार्य करते हैं, जो वैश्विक शासन को बाधित करने के बजाय उसे लोकतांत्रिक बनाने के लिये सक्रिय रूप से समन्वय करते हैं। 
    • BRICS, IBSA और G20 जैसे बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से वे पश्चिम-प्रधान वित्तीय संरचनाओं के विरुद्ध विकासशील देशों की सामूहिक आवाज़ को सुदृढ़ करते हैं।
      • बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था की दिशा में उनका साझा प्रयास वैश्विक मंच पर भारत के राजनयिक प्रभाव को मौलिक रूप से सुदृढ़ करता है।
    • उदाहरण के लिये, राष्ट्रपति लूला की फरवरी 2026 में नई दिल्ली की राजकीय यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की अपनी संयुक्त G4 मांग को दोहराया।
      • इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री मोदी ने इस बहुध्रुवीय एजेंडा को और सुदृढ़ करने हेतु राष्ट्रपति लूला को वर्ष 2026 में भारत द्वारा आयोजित किये जाने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में औपचारिक रूप से आमंत्रित किया।

भारत-ब्राज़ील संबंधों में मतभेद के प्रमुख क्षेत्र कौन-से हैं?

  • कृषि प्रतिस्पर्द्धा और विश्व व्यापार संगठन का चीनी विवाद: नई दिल्ली और ब्रासीलिया के बीच आर्थिक स्तर पर सबसे निरंतर मतभेद का स्रोत वैश्विक कृषि बाज़ार में दोनों देशों की प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्द्धा है, जो विशेष रूप से गन्ने से जुड़ी मूल्य-निर्धारण नीतियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।
    • ब्राज़ील  का तर्क है कि भारत के घरेलू समर्थन तंत्र कृत्रिम रूप से वैश्विक कीमतों को कम करते हैं, जिससे बाज़ार में प्रभुत्व के लिये असमान प्रतिस्पर्द्धा का माहौल बनता है। 
      • वर्ष 2021 के उत्तरार्द्ध में, ब्राज़ील, ऑस्ट्रेलिया और ग्वाटेमाला की शिकायत पर विश्व व्यापार संगठन (WTO) ने भारत की चीनी सब्सिडी के विरुद्ध निर्णय दिया, जिसके विरुद्ध नई दिल्ली की अपील अब भी अनसुलझी बनी हुई है।
    • भारत के अतिरिक्त उत्पादन को अवशोषित करने के लिये ब्राज़ील की इथेनॉल प्रौद्योगिकी को साझा करने के उद्देश्य से हाल ही में वर्ष 2024-2026 के दौरान हुए संवादों के बावजूद, मूल्य निर्धारण में विकृति, बुनियादी ढाँचे की कमियाँ, कच्चे माल की परिवर्तनशीलता और नियामक विसंगति जैसी संरचनात्मक बाधाएँ पारस्परिक रूप से लाभकारी जैव ईंधन साझेदारी की पूर्ण प्राप्ति को सीमित करती रहती हैं।
  • व्यापार असंतुलन और MERCOSUR की सीमाएँ: द्विपक्षीय आर्थिक जुड़ाव एक सीमित व्यापार समूह और व्यापक क्षेत्रीय व्यापार ढाँचों के सुस्त विस्तार से संरचनात्मक रूप से बाधित है। 
    • यह संबंध कुछ प्राथमिक वस्तुओं पर बहुत अधिक निर्भर करता है, जिससे विविध औद्योगिक एकीकरण को बढ़ावा देने के बजाय समग्र व्यापार मात्रा वैश्विक मूल्य आघातों के प्रति सुभेद्य हो जाती है। 
      • इसके अलावा, एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते की कमी भारतीय IT और फार्मास्यूटिकल्स जैसे विशेष क्षेत्रों के लिये गहन बाज़ार पहुँच को सीमित करती है। 
    • इस बीच, भारत-MERCOSUR वरीयतापूर्ण व्यापार समझौता (PTA), जिस पर वर्ष 2004 में हस्ताक्षर किये गए थे, विस्तार के लिये बार-बार किये गए वादों के बावजूद, अभी भी केवल 450 वस्तुओं की एक अत्यंत प्रतिबंधात्मक सूची तक ही सीमित है।
  • G4 की निष्क्रियता और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार की गतिरोध: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता प्राप्त करने की साझा कूटनीतिक महत्त्वाकांक्षा अनजाने में रणनीतिक नीरसता का स्रोत बन गई है।
    • G4 ढाँचे के तहत काम करते हुए, दोनों देश महत्त्वपूर्ण राजनयिक पूंजी का निवेश करते हैं, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताएँ मूल रूप से उनकी संबंधित उम्मीदवारी को रोक देती हैं। 
    • मौजूदा स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकारों को दरकिनार करने में असमर्थता, साथ ही अपने ही BRICS समूह के भीतर से प्रतिरोध, उनके गठबंधन की प्रभावशीलता को गंभीर रूप से सीमित करता है। 
  • भू-राजनीतिक संरेखण के मुद्दे: BRICS+ समूह का निरंतर विस्तार एवं रणनीतिक दिशा नई दिल्ली और ब्रासीलिया के बीच सूक्ष्म वैचारिक मतभेद प्रस्तुत करती है। 
    • भारत इस गुट को बीजिंग के प्रभुत्व वाले खुले तौर पर पश्चिमी विरोधी गठबंधन में बदलने के प्रयासों का सक्रिय रूप से विरोध करता है तथा एक कड़ाई से गुटनिरपेक्ष, बहुध्रुवीय मंच को प्राथमिकता देता है। 
    • हालाँकि ब्राज़ील अपने पश्चिमी संबंधों को संतुलित करने का प्रयास करता है, लेकिन निष्क्रिय प्रशासन के तहत उसकी हालिया राजनयिक मुद्रा कभी-कभी चीन-रूस के भू-राजनीतिक आख्यानों के साथ संगत होती है। 
      • इसके अलावा, ब्राज़ील की अपने शीर्ष व्यापारिक साझेदार चीन पर भारी आर्थिक निर्भरता प्रायः उसे कूटनीतिक रूप से अधिक सतर्क रहने के लिये मजबूर करती है, जिससे भारत-ब्राज़ील नीति समन्वय में सूक्ष्म असंगतता उत्पन्न होती हैं।
  • महत्त्वपूर्ण खनिज और प्रौद्योगिकी अंतरण की सीमाएँ: महत्त्वपूर्ण खनिज आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित करने की प्रतिस्पर्द्धा कच्चे माल के निष्कर्षण बनाम संसाधन राष्ट्रवाद के संबंध में अंतर्निहित मतभेद को उजागर करती है। 
    • भारत को चीनी एकाधिकार से मुक्ति पाने और अपने घरेलू हरित ऊर्जा संक्रमण को गति देने के लिये दुर्लभ मृदा तत्त्वों को सुरक्षित करने की तत्काल आवश्यकता है। 
      • हालाँकि, ब्राज़ील अपनी अप्रयुक्त खनिज संपदा को लेकर अत्यधिक सतर्क है तथा भारत को कच्चे अयस्क का निर्यात करने के बजाय पर्याप्त प्रौद्योगिकी अंतरण और स्थानीय प्रसंस्करण निवेश की मांग करता है। 
    • इस्पात और प्रौद्योगिकी आपूर्ति शृंखलाओं को स्थिर करने के उद्देश्य से द्विपक्षीय वार्ता के दौरान फरवरी 2026 में दुर्लभ मृदा तत्त्व एवं महत्त्वपूर्ण खनिजों पर एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किये गए थे, हालाँकि, इसकी दीर्घकालिक विश्वसनीयता प्रभावी कार्यान्वयन तथा निरंतर राजनीतिक और वाणिज्यिक प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगी।
  • जैव ईंधन का प्रभुत्व बनाम ऊर्जा सुरक्षा : यद्यपि वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन एक एकीकृत मोर्चा प्रस्तुत करता है, लेकिन इसके ऊर्जा सहयोग की सतह के नीचे तीव्र तकनीकी और वाणिज्यिक प्रतिस्पर्द्धा  विद्यमान है।
    • नवीकरणीय ऊर्जा और इथेनॉल उत्पादन में स्थापित वैश्विक महाशक्ति के रूप में ब्राज़ील अपने उन्नत फ्लेक्स-फ्यूल इंजन और बायो-रिफाइनरी की बौद्धिक संपदा की कठोर सुरक्षा करता है।
    • घरेलू ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु भारत अपने मिश्रण आदेशों को आक्रामक रूप से बढ़ा रहा है और इसके लिये गहन तकनीकी रियायतों की मांग कर रहा है, जिन्हें ब्राज़ील की निजी संस्थाएँ सहजता से उपलब्ध कराने को तैयार नहीं हैं।
      • हालांकि ब्राज़ील ने हाल ही में विश्व व्यापार संगठन (WTO) में चीनी विवाद समाधान हेतु बुनियादी इथेनॉल उत्पादन प्रौद्योगिकी साझा करने पर सहमति दी है, किंतु व्यापार-से-व्यावसाय (B2B) प्रौद्योगिकी अंतरण हेतु वाणिज्यिक शर्तों का अंतिम निर्धारण अभी भी विवादित वार्ता का विषय बना हुआ है।

भारत-ब्राज़ील संबंधों को सुदृढ़ करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है? 

  • महत्त्वपूर्ण खनिजों का एकीकरण: औद्योगिक संप्रभुता को  सुदृढ़ करने के लिये दुर्लभ मृदा तत्त्वों के संयुक्त अन्वेषण, निष्कर्षण और संवर्द्धन हेतु एक समन्वित ढाँचा आवश्यक है। साझा एआई-संचालित भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण प्रौद्योगिकियों को तैनात करने से पर्यावरणीय प्रभाव को कम करते हुए खनिज प्रसंस्करण पद्धतियों को अनुकूलित किया जा सकेगा। 
    • सुरक्षित समुद्री लॉजिस्टिक्स के लिये द्विपक्षीय संस्थागत तंत्र स्थापित करने से आवश्यक धातुकर्म इनपुट का निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित होता है। रणनीतिक भंडार नीतियों को प्रभावी ढंग से संरेखित करने से प्रमुख विनिर्माण क्षेत्रों को एकतरफा वैश्विक आपूर्ति आघातों से बचाया जा सकता है। 
    • इससे एक सुदृढ़, बंद-लूप आपूर्ति शृंखला का निर्माण होता है, जो बढ़ती अवसंरचनात्मक आवश्यकताओं के लिये दीर्घकालिक औद्योगिक सुरक्षा की गारंटी देता है।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना की अंतर-संचालनीयता: तकनीकी असंगतता को गहन करने के लिये निर्बाध सीमा-पार सत्यापन योग्य प्रमाण पत्रों को सक्षम करने के लिये डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचनाओं का संरचनात्मक एकीकरण आवश्यक है।
    • एक एकीकृत खुफिया नेटवर्क की स्थापना से ग्लोबल साउथ की जनांकिकी के लिये विशेष रूप से तैयार किये गए ओपन-सोर्स एल्गोरिदम मॉडल के सहयोगात्मक प्रशिक्षण में सुविधा मिलती है।
      • सरकारों को एल्गोरिदम में होने वाले पूर्वाग्रह को सक्रिय रूप से रोकने के लिये संयुक्त डेटा संरक्षण प्रोटोकॉल और नैतिक एआई शासन ढाँचे को संस्थागत रूप देना चाहिये। 
    • शीर्ष तकनीकी केंद्रों के बीच संस्थागत संबंधों को बढ़ावा देने से भविष्यसूचक शासन और विकेंद्रीकृत वित्त मॉडल के कार्यान्वयन में तेज़ी आती है। 
      • यह डिजिटल अभिसरण मौलिक रूप से तकनीकी पहुँच का लोकतंत्रीकरण करता है, साथ ही वैश्विक डिजिटल नीति निर्माण में पारस्परिक नेतृत्व को मज़बूत करता है।
  • जैव ऊर्जा और हरित ईंधन गलियारे: हरित परिवर्तन को गति देने के लिये जैव ईंधन मिश्रण जनादेशों और एकीकृत वैकल्पिक ईंधन मानकों का व्यापक सामंजस्य अनिवार्य है। 
    • देशों को पारस्परिक प्रमाणीकरण प्रोटोकॉल तथा हरित सीमा शुल्क के त्वरित कार्यान्वयन के माध्यम से समर्थित समर्पित सतत विमानन ईंधन गलियारों को शीघ्र परिचालनात्मक रूप प्रदान करना चाहिये।
      • उन्नत सेलुलोसिक इथेनॉल और अगली पीढ़ी के बायोमास फीडस्टॉक पर सहयोगात्मक जीनोमिक अनुसंधान कृषि भूमि उपयोग संघर्षों को व्यवस्थित रूप से हल करता है। 
    • यह समन्वित ऊर्जा कूटनीति उष्णकटिबंधीय जलवायु संबंधी कार्रवाई को मौलिक रूप से पुनर्परिभाषित करती है तथा पूर्ण दीर्घकालिक ऊर्जा स्वायत्तता सुनिश्चित करती है।
  • रक्षा औद्योगिक आधार का एकीकरण: रणनीतिक रक्षा स्वायत्तता की ओर संक्रमण के लिये एयरोस्पेस और नौसेना क्षेत्रों के लिये व्यापक सह-उत्पादन पारिस्थितिकी तंत्र में लेन-देन संबंधी खरीद से आगे बढ़ना आवश्यक है। 
    • पारस्परिक सैन्य लॉजिस्टिक्स सहायता समझौतों को लागू करने से परिचालन अंतर-संचालनीयता में प्रत्यक्ष रूप से वृद्धि होती है और उन्नत समुद्री प्लेटफार्मों के रख-रखाव को सुव्यवस्थित किया जाता है। 
      • प्रमुख रक्षा कंपनियों के बीच संयुक्त उद्यमों को बढ़ावा देने से विशेषीकृत विमानन घटकों और मानवरहित स्वायत्त प्रणालियों के निर्माण को स्थानीय स्तर पर सुनिश्चित किया जा सकेगा।
    • यह गहन एकीकरण स्वाभाविक रूप से सैन्य सहयोग को स्वदेशी तकनीकी संप्रभुता के लिये एक दुर्जेय उत्प्रेरक में परिणत कर देता है।
  • जैव-औषधीय विनियामक अभिसरण: वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा को मज़बूत करने के लिये औषधीय विनियामक ढाँचों की तत्काल पारस्परिक मान्यता और समन्वित नैदानिक परीक्षण प्रोटोकॉल की आवश्यकता है। 
    • सक्रिय फार्मास्युटिकल अवयवों के लिये एक द्विराष्ट्रीय त्वरित अनुमोदन मार्ग स्थापित करने से जीवन रक्षक चिकित्साओं के लिये बाज़ार-प्रवेश में लगने वाला समय काफी कम हो जाता है। 
      • परंपरागत चिकित्सा औषध संहिताओं का सामंजस्य स्थापित करना और स्मार्ट अस्पताल प्रबंधन मैट्रिक्स को एकीकृत करना सीमा पार स्वास्थ्य सेवा वितरण को सीधे तौर पर अनुकूलित करता है। 
      • यह सुनियोजित चिकित्सा कूटनीति स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुँच सुनिश्चित करती है, साथ ही व्यवस्थित रूप से प्रतिबंधात्मक गैर-टैरिफ व्यापार बाधाओं को दूर करती है।
  • जलवायु-सहिष्णु कृषि-प्रौद्योगिकी समन्वय: पोषण संबंधी संप्रभुता को सुनिश्चित करने के लिये कठोर पादप-स्वास्थ्य संबंधी अवरोधों को परस्पर मान्य इलेक्ट्रॉनिक मूल प्रमाण-पत्रों के माध्यम से क्रमबद्ध रूप से समाप्त करना आवश्यक है।
    • सहयोगात्मक कृषि अनुसंधान में उष्णकटिबंधीय मानसून के बदलते पैटर्न के लिये अनुकूलित सूखा-सहिष्णु बीज किस्मों के जीनोमिक इंजीनियरिंग को प्राथमिकता दी जानी चाहिये। 
    • उपग्रह आधारित अर्थ ऑब्ज़रवेशन टेलीमेट्री का उपयोग करके परिशुद्ध कृषि मैट्रिक्स को  एकीकृत करने से जैव उर्वरक अनुप्रयोग और मृदा स्वास्थ्य निगरानी को अनुकूलित किया जा सकता है।
      • कृषि आधुनिकीकरण का यह ढाँचा स्वाभाविक रूप से वैश्विक खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं को स्थिर करता है, साथ ही ग्रामीण आर्थिक समुत्थानशीलता को तेज़ी से बढ़ाता है।
  • अंतरिक्ष क्षेत्र और भू-स्थानिक गुप्तसूचना सहयोग: बाह्य अंतरिक्ष कूटनीति को उन्नत करने के लिये उपग्रह समूहों के सह-विकास और गहन-अंतरिक्ष टेलीमेट्री अनुगमन हेतु एक व्यापक संयुक्त मार्गदर्शिका का निर्माण आवश्यक है। 
    • अर्थ ऑब्ज़रवेशन क्षमताओं का समन्वय करने से वास्तविक काल में आपदा प्रबंधन, जलवायु विसंगति का पता लगाने तथा समुद्री क्षेत्र की जागरूकता में काफी सुधार होगा। 
    • द्विपक्षीय खगोल-जैविकी तथा सूक्ष्म-गुरुत्व अनुसंधान संघ की स्थापना नागरिक प्रौद्योगिकी के उन प्रतिफलों को तीव्र करेगी, जिन्हें पृथ्वी-आधारित औद्योगिक उपयोग में लाया जा सकता है।
      • यह एकीकृत कक्षीय रणनीति न केवल इन्हें अग्रणी अंतरिक्ष-गामी शक्तियों के रूप में स्थापित करती है, बल्कि विकासशील क्षेत्रों के लिये अंतरिक्ष तक पहुँच के लोकतंत्रीकरण को भी प्रोत्साहित करती है।

निष्कर्ष:

संरक्षणवाद और आपूर्ति शृंखला पर दबाव से ग्रस्त खंडित वैश्विक व्यवस्था में, भारत-ब्राज़ील संबंध ग्लोबल साउथ की रणनीतिक स्वायत्तता के एक स्तंभ के रूप में उभर रहे हैं। यह साझेदारी अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि महत्त्वपूर्ण खनिज, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, रक्षा सह-उत्पादन और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण जैसे क्षेत्रों तक विस्तारित हो चुकी है। कृषि, व्यापार ढांचे और बहुपक्षीय सुधारों में मतभेद बने रहने के बावजूद, संस्थागत अभिसरण लगातार बढ़ रहा है। यदि नीतिगत सामंजस्य और राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ इसका लाभ उठाया जाए, तो यह संबंध न्यायसंगत बहुध्रुवीय सहयोग के लिये एक आदर्श मॉडल बन सकता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

भारत-ब्राज़ील संबंध अब केवल लेन-देन पर आधारित नहीं रह गए हैं, बल्कि रणनीतिक स्वरूप ग्रहण कर चुके हैं।”  ग्लोबल साउथ नेतृत्व और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के संदर्भ में इस परिवर्तन का विश्लेषण कीजिये।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. भारत की खनिज सुरक्षा के लिये ब्राज़ील क्यों महत्त्वपूर्ण है?
ब्राज़ील में दुर्लभ मृदा तत्त्वों और रणनीतिक खनिजों के विशाल भंडार हैं जो भारत के इलेक्ट्रिक वाहन और हरित ऊर्जा क्षेत्रों के लिये अत्यावश्यक हैं।

प्रश्न 2. IBSA क्या है?
IBSA भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका का त्रिपक्षीय मंच है, जो लोकतंत्रों के बीच दक्षिण–दक्षिण सहयोग को प्रोत्साहित करता है।

प्रश्न 3. भारत-MERCOSUR PTA क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह भारतीय निर्यात को लैटिन अमेरिका में प्राथमिक बाज़ार पहुँच प्रदान करता है, हालाँकि वर्तमान में इसका दायरा सीमित है।

प्रश्न 4. भारत और ब्राज़ील को जलवायु कूटनीति में जोड़ने वाले कारक क्या हैं?
BASIC, वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन और नवीकरणीय ऊर्जा पहलों के तहत समन्वय।

प्रश्न 5. 30 अरब डॉलर का व्यापार लक्ष्य क्या है?
फरवरी 2026 में निर्धारित किया गया द्विपक्षीय लक्ष्य, जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक भारत–ब्राज़ील व्यापार को दोगुना करना है।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

मेन्स 

प्रश्न. “विश्व व्यापार संगठन के अधिक व्यापक लक्ष्य और उद्देश्य वैश्वीकरण के युग में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का प्रबंधन एवं प्रोन्नति करना है। लेकिन वार्ताओं की दोहा परिधि मृत्योन्मुखी प्रतीत होती है, जिसका कारण विकसित तथा विकासशील देशों के बीच मतभेद है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस पर चर्चा कीजिये। (2016)

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