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प्रारंभिक परीक्षा

व्हाइट-बेलीड हेराॅन एवं कलई-II परियोजना

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

अरुणाचल प्रदेश (AR) में लोहित नदी पर प्रस्तावित 1,200 मेगावाट की कलई-II जलविद्युत परियोजना को प्रदान की गई पर्यावरणीय स्वीकृति (Environmental Clearance- EC) ने पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment- EIA) में गंभीर कमियों को लेकर चिंता उत्पन्न की है। यह चिंता विशेषत: गंभीर रूप से लुप्तप्राय व्हाइट-बेलीड हेराॅन के संरक्षण से संबंधित है।

व्हाइट-बेलीड हेराॅन क्या है?

  • परिचय: व्हाइट-बेलीड हेराॅन (Ardea insignis), जिसे इंपीरियल हेरॉन या ग्रेट व्हाइट-बेलीड हेरॉन भी कहा जाता है, आर्डेइडे (Ardeidae) कुल की बगुला प्रजाति है। यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा बगुला माना जाता है।
  • पर्यावास: यह प्रजाति पूर्णतः पूर्वी हिमालय की मुक्त-प्रवहमान एवं तीव्र प्रवाह वाली नदी पारितंत्र पर निर्भर करती है, जहाँ मानव हस्तक्षेप/गतिविधियाँ न्यूनतम हों। यह प्रजाति मुख्यतः नदी की तीव्र धाराओं (Rapids) में उपलब्ध मछलियों पर निर्भर रहती है, जिसके कारण यह बांधों के निर्माण तथा नदी प्रवाह व्यवस्था में होने वाले परिवर्तनों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती है।
  • रूपात्मक विशेषताएँ: इसकी गर्दन लंबी एवं लचीली तथा अत्यंत तीक्ष्ण दाँतेदार (Serrated) चोंच होती है, जो इसे गहरे जल में मछलियाँ पकड़ने में विशेष रूप से सक्षम बनाती है।
    • इसका सुगठित (कॉम्पैक्ट) शरीर तथा अपेक्षाकृत छोटी टाँगें तीव्र नदी धाराओं में स्थिरता बनाए रखने में सहायक होती हैं। इसकी लंबी एवं फैली हुई पैर की उँगलियाँ फिसलन भरी चट्टानों को मज़बूती से पकड़ने में सक्षम बनाती हैं, जो अशांत एवं प्रवहमान नदी पर्यावास के प्रति एक महत्त्वपूर्ण अनुकूलन है।
  • अनुसूची-I में आने वाली प्रजाति (भारत में सर्वोच्च विधिक संरक्षण) — वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत।
    • भूटान वैश्विक प्रजातियों के लगभग 45% को आश्रय देता है, जहाँ 3–5 सक्रिय प्रजनन युग्मक प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिससे यह देश इस प्रजाति का अंतिम सशक्त गढ़ बन गया है।
    • नेपाल में इसे विलुप्त माना जाता है और बांग्लादेश में भी इसके विलुप्त होने की आशंका है।
  • संरक्षण स्थिति: IUCN रेड लिस्ट के अनुसार यह एक गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) प्रजाति है।
  • वैश्विक एवं क्षेत्रीय आकलन: यह प्रजाति हिमालयी मीठे जल के पारितंत्रों में लगभग 1,65,000 वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत है, जिसमें भूटान, भारत, म्याँमार, चीन और बांग्लादेश शामिल हैं। वर्तमान में वनों में 60 से भी कम प्रजातियाँ शेष हैं।
  • भारत में वितरण: यह प्रजाति अरुणाचल प्रदेश के लोहित, अंजॉ और चांगलांग ज़िलों में पाई जाती  हैं। नामदफा टाइगर रिज़र्व (AR) और कामलांग टाइगर रिज़र्व (AR) के आसपास इसकी उपस्थिति दर्ज की गई है। लोहित नदी के संपूर्ण प्रवाह क्षेत्र में इसके प्रवास के प्रमाण मिले हैं।
  • व्यवहार: यह प्रजाति प्रायः एकाकी रहती है, भोर और संध्या के समय गहरी आवाज़ में टर्राहट करती है तथा ऊँचे वृक्षों पर घोंसला बनाती है।
  • पारिस्थितिक महत्त्व: यह प्रजाति हिमालय के मीठे जलीय पारितंत्र के लिये एक जैव-संकेतक (bio-indicator) के रूप में कार्य करती है, जो जल गुणवत्ता, मत्स्य आबादी, प्रदूषण और आवास की अखंडता जैसे कारकों को प्रतिबिंबित करती है। इसका पतन व्यापक पारितंत्र क्षरण और खाद्य शृंखलाओं के विघटन का संकेत देता है।
  • मुख्य खतरे: जलविद्युत बांध (आवास विखंडन, नदी प्रवाह में परिवर्तन), आवासन हानि, शिकार और मानवजनित व्यवधान। इसके अतिरिक्त अत्यंत छोटा जीन पूल और सीमित वितरण क्षेत्र भी गंभीर चुनौतियाँ हैं।

कलाई-II जलविद्युत परियोजना क्या है?

  • परिचय: यह अरुणाचल प्रदेश के अंजॉ ज़िले में स्थित ब्रह्मपुत्र की एक प्रमुख सहायक नदी लोहित नदी पर प्रस्तावित 1,200 मेगावाट की रन-ऑफ-रिवर जलविद्युत परियोजना है, जिसमें तालाब (कम  भंडारण क्षमता) भी शामिल है।
    • इसका विकास टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन इंडिया लिमिटेड द्वारा किया जा रहा है ।
  • विकास का इतिहास: प्रारंभ में एक प्राइवेट डेवलपर को आवंटित यह परियोजना वर्षों तक गैर-संचालित बनी रही, फिर वर्ष 2023-24 में इसे पुनरुज्जीवित किया गया और अरुणाचल प्रदेश सरकार द्वारा THDC इंडिया लिमिटेड को हस्तांतरित कर दिया गया ।
    • यह उन 13 रुकी हुई जलविद्युत परियोजनाओं में से एक है जिन्हें तेज़ी से क्रियान्वयन के लिये केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को पुनः आवंटित किया गया है।

लोहित नदी

  • परिचय: लोहित नदी ब्रह्मपुत्र नदी के दाहिने तट की एक सहायक नदी है। इसका उद्गम पूर्वी तिब्बत की कांगरी कार्पो पर्वतमाला से होता है, जहाँ इसे जायुल चू (Zayul Chu) कहा जाता है।
  • प्रवाह मार्ग: यह नदी अरुणाचल प्रदेश के किबिथू (भारत का सबसे पूर्वी आबाद क्षेत्र) के पास भारत में प्रवेश करती है, अंजॉ और लोहित ज़िलों में मिश्मी पहाड़ियों से होकर दक्षिण की ओर बहती है और अंततः परशुराम कुंडसादिया के निकट असम के मैदानों में प्रवेश करती है।
    • यह नदी कमलांग वन्यजीव अभयारण्य (Kamlang Wildlife Sanctuary) और मेहाओ वन्यजीव अभयारण्य (अरुणाचल प्रदेश) जैसे संरक्षित क्षेत्रों से होकर प्रवाहित होती है।
  • संगम: यह असम के कोबो के पास सियांग (ऊपरी ब्रह्मपुत्र) और दिबांग नदियों से मिलकर ब्रह्मपुत्र नदी की मुख्यधारा का निर्माण करती है।
  • जलविद्युत परियोजनाएँ: कलाई–II जलविद्युत परियोजना (1,200 मेगावाट), डेमवे लोअर जलविद्युत परियोजना (1,750 मेगावाट, वर्तमान में रुकी हुई), हटोंग (प्रस्तावित) और डेमवे अपर (प्रस्तावित)।

Lohit_River

EIA

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. व्हाइट-बेलीड हेराॅन का संरक्षण की स्थिति क्या है?
यह IUCN रेड लिस्ट में गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) श्रेणी में शामिल है और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत अनुसूची–I (Schedule-I) की प्रजाति है।

2. भारत में व्हाइट-बेलीड हेरॉन कहाँ पाया जाता है?
मुख्य रूप से अरुणाचल प्रदेश में लोहित, अंजॉ और चांगलांग ज़िले, जिनमें नामदफा और कमलांग टाइगर रिज़र्व शामिल हैं।

3. हाइड्रोपावर बांध व्हाइट-बेलीड हेरॉन के लिये खतरा कैसे हैं?
नदी के प्रवाह में बदलाव, आवासों के विखंडन, मछलियों की उपलब्धता में कमी और मानव गतिविधियों में वृद्धि के माध्यम से।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

प्रश्न. मरुभूमि राष्ट्रीय उद्यान के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2020) 

  1. यह दो ज़िलों में विस्तृत है।
  2. उद्यान के अंदर कोई मानव बस्ती नहीं है।
  3. यह ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के प्राकृतिक आवासों में से एक है। 

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2 

(b) केवल 2 और 3 

(c) केवल 1 और 3 

(d) 1, 2 और 3 

उत्तर: C


प्रश्न. निम्नलिखित नेशनल पार्कों में से किस एक की जलवायु उष्णकटिबंधीय से उपोष्ण, शीतोष्ण और आर्कटिक तक परिवर्तित होती है? (2015)

(a) कंचनजंघा नेशनल पार्क

(b) नंदादेवी नेशनल पार्क

(c) नेवरा वैली नेशनल पार्क

(d) नामदफा नेशनल पार्क

उत्तर: (d)


रैपिड फायर

भाषिणी का बहुभाषी अनुवाद उपकरण: श्रुतलेख

स्रोत: पी.आई.बी.

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने डिजिटल इंडिया भाषिणी के AI उपकरण श्रुतलेख का प्रदर्शन करते हुए प्रमुख भाषणों के दौरान वास्तविक समय में बहुभाषी स्पीच-टू-टेक्स्ट अनुवाद के लिये इसका उपयोग किया।

श्रुतलेख

  • परिचय: श्रुतलेख भारत के भाषिणी (BHASHINI - BHASHa INterface for India) मंच के अंतर्गत विकसित एक AI-आधारित उपकरण है, जिसे राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा प्रारंभ किया गया है।
  • कार्य: यह वास्तविक समय में स्पीच-टू-टेक्स्ट लिप्यंतरण और बहुभाषी अनुवाद प्रणाली के रूप में कार्य करता है। इसके माध्यम से स्वचालित भाषा पहचान (ALD), बोले गए कंटेंट का लिप्यंतरण तथा विभिन्न भारतीय भाषाओं में लाइव अनुवाद प्रदर्शन संभव होता है।

भाषिणी (BHASHa INterface for India)

  • परिचय: भाषिणी भारत का एक AI-संचालित मंच है, जिसे भाषा संबंधी बाधाओं को दूर करने और भाषा-समावेशी डिजिटल इंडिया के निर्माण के उद्देश्य से विकसित किया गया है।
  • उद्देश्य: इसका मूल उद्देश्य नागरिकों को उनकी पसंदीदा भारतीय भाषाओं में डिजिटल सामग्री और सेवाओं तक पहुँच सक्षम करना है, जिससे शासन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में डिजिटल समावेशन को बढ़ावा मिलता है।
  • क्षेत्र एवं सुलभता: यह मंच 22 से अधिक अनुसूचित भारतीय भाषाओं का समर्थन करता है तथा इसमें श्रुतलेख (स्पीच-टू-टेक्स्ट), दस्तावेज़ अनुवाद और डेटा योगदान हेतु क्राउडसोर्सिंग पहल (भाषादान) जैसे उपकरण सम्मिलित हैं।
  • व्यावहारिक एकीकरण: भाषिणी भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का एक प्रमुख स्तंभ है, जो आधार, UPI और डिजिलॉकर के साथ भाषा-स्तरीय अंतर-संचालनीयता सुनिश्चित करता है। इसका उपयोग शासन से संबंधित मंचों, जैसे– ई-श्रम पर वास्तविक समय भाषण अनुवाद, संवादात्मक UPI भुगतान तथा प्रमुख सार्वजनिक आयोजनों में किया जा चुका है।

Bhashini's_Milestones

और पढ़ें: भारत में तकनीक-संचालित बहुभाषी समावेशन


रैपिड फायर

तुर्कमान गेट

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

तुर्कमान गेट हाल ही में एक ध्वस्तीकरण अभियान के दौरान हुई हिंसा के बाद चर्चा में है, जिसने आपातकाल (1975-77) के घटनाक्रमों का पुनः स्मरण करा दिया। उस अवधि में इस क्षेत्र में बलपूर्वक विध्वंस तथा ज़बरन नसबंदी अभियानों को क्रियान्वित दिया गया था, जिनकी बाद में शाह आयोग द्वारा जाँच की गई।

  • परिचय: तुर्कमान गेट शाहजहानाबाद के 14 द्वारों में से एक था। शाहजहानाबाद की स्थापना मुगल सम्राट शाहजहाँ ने 17वीं शताब्दी के मध्य (लगभग 1650 ई.) में एक परकोटाबद्ध नगर के रूप में की थी।
    • इस द्वार का नाम सूफी संत हज़रत शाह तुर्कमान बयाबानी के नाम पर रखा गया था, जिनकी मज़ार इसके समीप स्थित है। इसी कारण यह क्षेत्र आज भी सांस्कृतिक एवं धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है।
  • इतिहास: तुर्कमान गेट का महत्त्व मुगलकालीन दिल्ली से भी पूर्व का है। यह क्षेत्र एक महत्त्वपूर्ण पूर्व-विद्यमान शहरी एवं आध्यात्मिक परिदृश्य का हिस्सा रहा है, जो सूफी परंपराओं के प्रमुख केंद्र के रूप में दिल्ली की ऐतिहासिक भूमिका को प्रतिबिंबित करता है।
    • सूफी संत शाह तुर्कमान बयाबानी को दिल्ली में प्रारंभिक सूफी परंपराओं से परंपरागत रूप से जोड़ा जाता है। उनकी दरगाह के समीप रज़िया सुल्तान की कब्र का होना, इस स्थल के प्रति शताब्दियों से चले आ रहे सम्मान एवं पवित्रता को दर्शाता है।
  • स्थान: तुर्कमान गेट फतेहपुरी मस्जिद – हौज़ काज़ी – पुरानी यमुना पट्टी को जोड़ने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित था, जो शाहजहानाबाद के शहरी नियोजन में शामिल था। आज यह पुरानी दिल्ली, जामा मस्जिद के पास स्थित है।
  • महत्त्व: परकोटा शहर के अन्य द्वारों की तरह तुर्कमान गेट ने रक्षात्मक और वाणिज्यिक दोनों भूमिकाएँ निभाईं। यह शहर को बाह्य खतरों से सुरक्षा प्रदान करता था और साथ ही लोगों और माल की आवाजाही को नियंत्रित करता था।
    • ऐतिहासिक परिवर्तनों में जीवित रहना: तुर्कमान गेट ने कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक संकटों और परिवर्तनों को सहन किया, जिनमें 1857 का विद्रोह, औपनिवेशिक काल में शहर की दीवारों का ध्वंस, विभाजन और उसके बाद की व्यावसायिक पुनर्गठन शामिल हैं।

Turkman_Gate

और पढ़ें: इंडो-इस्लामी वास्तुकला


रैपिड फायर

एवियन फ्लू

स्रोत: द हिंदू 

केरल के कुट्टानाड में एवियन इन्फ्लूएंजा (H5N1) के एक नए प्रकोप ने एक बार फिर से इसकी सदियों पुरानी बतख पालन परंपरा को बाधित कर दिया है, जिससे आजीविका, जैव विविधता और ग्रामीण स्थिरता पर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हो गई हैं।

  • नवीनतम प्रकोप में पहले ही लगभग 55,000 पक्षियों की मौत हो चुकी है, जबकि अन्य 25,000 को निवारक उपाय के रूप में मारने की तैयारी है।
  • चारा और चेंबल्ली जैसी स्वदेशी बतख की नस्लों को स्थानीय तौर पर विलुप्ति का खतरा है।
  • एवियन इन्फ्लूएंजा A(H5N1): यह अत्यधिक रोगजनक वायरस है, जो मुख्य रूप से पक्षियों के बीच फैलता है हालाँकि स्तनधारियों को भी संक्रमित कर सकता है।
  • इतिहास: सर्वप्रथम 1996 में चीन में पाया गया, तब से यह एक वैश्विक खतरा बन गया है। भारत ने वर्ष 2015 में महाराष्ट्र और गुजरात में अपना पहला प्रकोप दर्ज किया था।
    • पोल्ट्री से परे, H5N1 ने कैलिफोर्निया कोंडर जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों के कारण वन्य पक्षियों में व्यापक स्तर पर मृत्यु दर देखने को मिली है और समुद्री स्तनधारियों, जैसे– सी लायन और डॉल्फिन के साथ-साथ लोमड़ी, प्यूमा और भालू जैसे स्थलीय स्तनधारियों में भी फैल गया है।
  • संचरण: मनुष्यों में एवियन इन्फ्लूएंजा संक्रमण दुर्लभ है, यह मुख्य रूप से संक्रमित पक्षियों या उनके स्राव के सीधे संपर्क में आने से फैलता है, विशेष रूप से पोल्ट्री फार्म आदि में।
    • मानव-से-मानव संचरण अत्यंत दुर्लभ बना हुआ है। वायरस लगातार विकसित हो रहा है और यदि यह उत्परिवर्तित होकर सतत मानव-से-मानव संचरण की अनुमति देता है, तो यह एक वैश्विक महामारी को ट्रिगर कर सकता है। इसलिये H5N1 को WHO अनुसंधान एवं विकास ब्लूप्रिंट के तहत एक प्राथमिकता वाले रोगों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
  • लक्षण: सामान्य लक्षणों में तेज़ बुखार, खाँसी, गले में खराश और माँसपेशियों में दर्द शामिल हैं।
    • गंभीर मामले श्वसन की विफलता के कारण बढ़ सकते हैं, हालाँकि कुछ संपर्क में आए पक्षियों के स्पर्श करने (लक्षण-रहित) से भी फैलते हैं।
  • उपचार: ओसेल्टामिविर जैसी एंटीवायरल दवाएँ प्रभावी हैं, विशेष रूप से गंभीर या उच्च जोखिम वाले मामलों में शीघ्र राहत पाने के लिये।

और पढ़ें: H5N1


रैपिड फायर

चीनी नागरिकों के लिये e-B-4 बिज़नेस वीज़ा

स्रोत: द हिंदू

भारत ने चीनी नागरिकों के लिये ई-प्रोडक्शन इन्वेस्टमेंट बिज़नेस वीज़ा (e-B-4) शुरू किया है, जिसके तहत उत्पादन और निवेश से जुड़ी व्यावसायिक गतिविधियों हेतु दूतावास जाए बिना पूरी तरह ऑनलाइन यात्रा की अनुमति दी गई है।

  • कवरेज: यह वीज़ा उपकरणों की स्थापना और कमीशनिंग, गुणवत्ता जाँच, आवश्यक रखरखाव, उत्पादन, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और एंटरप्राइज़ रिसोर्स प्लानिंग (ERP) की शुरुआत, प्रशिक्षण, सप्लाई-चेन विकास, विक्रेताओं का पैनल बनाना, संयंत्र (प्लांट) की डिज़ाइन और संचालन प्रारंभ करना तथा वरिष्ठ प्रबंधन और अधिकारियों की यात्रा जैसी गतिविधियों की अनुमति देता है।
  • प्रसंस्करण और वैधता: आवेदन के 45–50 दिनों के भीतर वीज़ा जारी किया जाता है और यह भारत में छह महीने तक ठहरने की अनुमति देता है।
  • आवेदन प्रक्रिया: आवेदक आव्रजन ब्यूरो के ई-वीज़ा पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं, जबकि चीनी पेशेवरों को आमंत्रित करने वाली भारतीय कंपनियाँ DPIIT के नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम (NSWS) पर पंजीकरण करना अनिवार्य है।
  • महत्त्व: यह कदम भारत और चीन द्वारा हाल ही में सहमत जन-केंद्रित उपायों का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों को पुनः सक्रिय करना, व्यापारिक आवाजाही को सुगम बनाना और निवेश-आधारित आर्थिक सहभागिता को समर्थन देना है।

और पढ़ें: भारत-चीन संबंधों का बदलता परिदृश्य


रैपिड फायर

स्पाइना बिफिडा

स्रोत: द हिंदू

हाल ही में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने रेखांकित किया है कि भारत में स्पाइना बिफिडा की व्यापकता दर विश्व में सबसे अधिक में से एक है (लगभग 1,000 जन्मों पर 4 मामले), जिससे प्रतिवर्ष 25,000 से अधिक बच्चे प्रभावित होते हैं।

  • परिचय: स्पाइना बिफिडा एक जन्मजात न्यूरल ट्यूब दोष है, जिसमें भ्रूण के प्रारंभिक विकास के दौरान रीढ़ की हड्डी (स्पाइनल कॉर्ड) पूरी तरह से बंद नहीं हो पाती है।
  • लक्षण (Symptoms): इससे प्रभावित बच्चों में हाइड्रोसेफेलस (मस्तिष्क में द्रव का अत्यधिक संचय), मूत्र एवं मल असंयम (नियंत्रण का अभाव), शिशु की पीठ पर दृश्यमान सूजन या गाँठ, क्लब फुट तथा अन्य अस्थि संबंधी विकृतियाँ विकसित हो सकती हैं। इसकी गंभीरता हल्की माँसपेशीय कमज़ोरी से लेकर पूर्ण पैराप्लेजिया (निचले अंगों का पूर्ण पक्षाघात) तक हो सकती है।
  • प्रभाव (Impact): यह स्थिति निचले अंगों के आंशिक या पूर्ण पक्षाघात का कारण बनती है, जिसके परिणामस्वरूप कई बच्चों को कम उम्र से ही व्हीलचेयर पर निर्भर होना पड़ता है। यद्यपि प्रभावित बच्चों की बौद्धिक क्षमता सामान्य रहती है, फिर भी भारत में 75% से अधिक बच्चों को विशेषीकृत चिकित्सकीय एवं शल्य-चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हो पातीं, जिससे परिवारों को दीर्घकालिक आर्थिक एवं मानसिक संकट का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर, विकलांगता भार तथा दीर्घकालिक स्वास्थ्य देखभाल लागत में उल्लेखनीय वृद्धि करती है।
  • रोकथाम (Prevention): वर्ष 1991 से उपलब्ध वैश्विक चिकित्सकीय साक्ष्य यह पुष्टि करते हैं कि गर्भधारण के आसपास (Periconceptional Period) फोलिक एसिड अनुपूरण से स्पाइना बिफिडा के 70% से अधिक मामलों की रोकथाम संभव है।
  • उभरता हुआ अनुसंधान (Emerging Research): हालिया अध्ययनों से संकेत मिलता है कि चाय जैसे व्यापक रूप से उपभोग किये जाने वाले पेयों में फोलेट एवं विटामिन B12 का सुदृढ़ीकरण (Fortification) भारत में एनीमिया तथा न्यूरल ट्यूब दोषों की रोकथाम में सहायक हो सकता है।

और पढ़ें: भारत में न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर


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