प्रारंभिक परीक्षा
आकाश-NG मिसाइल
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने आकाश-NG (नेक्स्ट जेनरेशन) के उपयोगकर्त्ता मूल्यांकन परीक्षण (User Evaluation Trials- UET) सफलतापूर्वक पूरे कर लिये हैं, जिससे भारतीय वायुसेना (IAF) में इसे शामिल करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
- DRDO द्वारा विकसित प्रणालियों का विकास चक्र सामान्यतः तीन चरणों–विकासात्मक परीक्षण, विभिन्न परिस्थितियों में उपयोगकर्त्ता सहायता प्राप्त परीक्षण तथा उपयोगकर्त्ता मूल्यांकन परीक्षण (UET) में होता है।
- उपयोगकर्त्ता मूल्यांकन परीक्षण (UET) के सफलतापूर्वक पूर्ण होने से प्रणाली के शामिल होने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है, जिसके बाद उपयोगकर्त्ता द्वारा आवश्यकता की स्वीकृति जारी की जाती है। आकाश-NG के मामले में यह उपयोगकर्त्ता भारतीय वायुसेना (IAF) है।
सारांश
- DRDO ने आकाश-NG के उपयोगकर्त्ता मूल्यांकन परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे कर लिये हैं, जिससे इसके भारतीय वायुसेना में शामिल होने का मार्ग प्रशस्त हुआ है और यह भारत की स्वदेशी वायु रक्षा क्षमता में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
- आकाश-NG मूल आकाश प्रणाली की तुलना में हल्की, अधिक दूरी तक मार करने में सक्षम और अधिक घातक उन्नत संस्करण है, जिसे उच्च गति तथा कम रडार परावर्तन क्षेत्र (Low-RCS) वाले हवाई खतरों का मुकाबला करने व आत्मनिर्भर भारत के तहत भारत की बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रणाली को सशक्त बनाने हेतु डिज़ाइन किया गया है।
आकाश-NG के संबंध में मुख्य तथ्य क्या हैं?
- परिचय: यह सतह-से-हवा में मार करने वाली मिसाइल है, जिसे भारतीय वायुसेना (IAF) के लिये विकसित किया गया है। यह उच्च गति, वहनीय सुगमता तथा कम रडार क्रॉस सेक्शन (RCS) वाले हवाई खतरों, जैसे– विमान, ड्रोन और क्रूज़ मिसाइलों को अवरोधित करने में सक्षम है। इसकी मारक क्षमता 70 किमी. तक है और प्रतिक्रिया समय भी तेज़ है।
- विकास एवं उत्पादन: यह प्रणाली DRDO द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित की गई है (जिसमें 96% घटक स्वदेशी हैं) और इसका उत्पादन भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) तथा भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) द्वारा किया जाता है, जिससे रक्षा निर्माण में आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत के प्रयासों को मज़बूती मिलती है।
- प्रदर्शन विशेषताएँ: मिसाइल आकाश-NG मैक 2.5 की गति से उड़ान भर सकती है, लगभग 60–70 किमी. की दूरी पर स्थित लक्ष्य को भेद सकती है, 20 किमी. से अधिक ऊँचाई पर संचालन कर सकती है तथा लगभग 90% की विनाश संभावना (किल प्रॉबेबिलिटी) प्राप्त करती है, जिससे यह अपने पूर्ववर्ती संस्करणों की तुलना में कहीं अधिक घातक बन जाती है।
- आकाश-NG मिसाइल को सील किये गए कंटेनरों में संगृहीत और लॉन्च किया जाता है, जो परिवहन तथा भंडारण को सुगम बनाता है, साथ ही इसकी शेल्फ लाइफ (मिसाइल की सुरक्षित और प्रभावी रहने की अवधि) व संचालन तैयारियों में वृद्धि होती है।
- प्रौद्योगिकीगत उन्नति: इसमें अंतर्निर्मित इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटर मेज़र्स (ECCM) मौजूद हैं, अर्थात ऐसे ऑनबोर्ड तंत्र जो खोज प्रणाली को भ्रमित या निष्क्रिय करने का प्रयास करने वाली शत्रु इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों का प्रभावी ढंग से मुकाबला कर सकते हैं।
- इसमें स्वदेशी रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) सीकर, डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर तथा पूरी तरह से स्वदेशी रडार और कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम शामिल हैं, जो कम रडार क्रॉस सेक्शन (Low-RCS) और उच्च गतिशील लक्ष्यों पर सटीक हमले को सक्षम बनाते हैं।
- संचालनात्मक क्षमताएँ: यह मिसाइल मोबाइल प्लेटफॅार्म से प्रक्षेपित की जा सकती है, एक साथ कई लक्ष्यों को भेदने में सक्षम है तथा निम्न ऊँचाई, सीमा के निकट और उच्च ऊँचाई पर लंबी दूरी से आने वाले खतरों का प्रभावी ढंग से मुकाबला कर सकती है।
- रणनीतिक महत्त्व: आकाश को वर्ष 2014 में भारतीय वायुसेना (IAF) में और इसके बाद भारतीय सेना में शामिल किया गया था। वर्तमान में वायुसेना तथा सेना (थल सेना) क्रमशः कई स्क्वाड्रन एवं मिसाइल समूहों का संचालन कर रही हैं।
- आकाश-NG मिसाइल भारत की बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रणाली को और अधिक सशक्त बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, आकाश-NG भारत की बहु-स्तरीय वायु रक्षा संरचना को आवश्यक रूप से सुदृढ़ करती है, आधुनिक हवाई खतरों के खिलाफ तैयारी में वृद्धि करती है तथा महत्त्वपूर्ण मिसाइल प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भर भारत को सशक्त बनाती है।
- दिसंबर 2020 में भारत ने आकाश मिसाइल के निर्यात को मंज़ूरी दी, बाद में अर्मेनिया, फिलीपींस, वियतनाम, मिस्र और ब्राज़ील सहित कई देशों ने इसकी खरीद में रूचि दिखाई, जो भारत की स्वदेशी रक्षा प्रणालियों की वैश्विक स्वीकृति को दर्शाता है।
- आकाश का निर्यात संस्करण भारतीय सशस्त्र बलों में सेवारत संस्करणों से भिन्न होगा।
- पूर्ववर्ती आकाश से अंतर: मूल आकाश मिसाइल की तुलना में आकाश-NG मिसाइल अधिक हल्की है (अब 350 किग्रा., पहले 700 किग्रा.), इसकी मारक क्षमता अधिक है (अब 70 किमी. तक, पहले लगभग 30 किमी.), इसमें रैमजेट प्रणोदन के स्थान पर ठोस रॉकेट मोटर का उपयोग किया गया है तथा यह बेहतर गतिशीलता (Mobility) व उत्तरजीविता (Survivability) प्रदान करती है।
- DRDO ने आकाश प्राइम मिसाइल भी विकसित की है, जो आकाश मिसाइल का उन्नत संस्करण है। इसकी मारक क्षमता मूल आकाश मिसाइल के समान ही है, लेकिन इसमें स्वदेशी एक्टिव RF सीकर लगाया गया है, जिससे हवाई लक्ष्यों के मुकाबले सटीकता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP)
- एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) (1983-2012) की शुरुआत ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नेतृत्व में मिसाइल प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से की गई थी। इसके अंतर्गत 5 मिसाइलों (P-A-T-N-A: पृथ्वी-आकाश-त्रिशूल-नाग-अग्नि) का विकास किया गया:
- पृथ्वी (अल्प दूरी की सतह-से-सतह पर मार करने वाली मिसाइल), आकाश (मध्यम दूरी की सतह-से-वायु में मार करने वाली निर्देशित मिसाइल), त्रिशूल (अल्प दूरी की सतह-से-वायु में मार करने वाली निर्देशित मिसाइल), नाग (तृतीय पीढ़ी की एंटी-टैंक मिसाइल) तथा अग्नि-I (कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल)।
- पृथ्वी शृंखला में पृथ्वी-I (150 किमी की मारक क्षमता, अब सेवामुक्त), पृथ्वी-II (250-350 किमी. की मारक क्षमता, तरल-ईंधन चालित, परमाणु-सक्षम) तथा पृथ्वी-III (हल्के पेलोड के साथ 750 किमी. तक की मारक क्षमता) शामिल हैं; धनुष इसका नौसैनिक संस्करण है।
- त्रिशूल की मारक क्षमता 12 किमी. थी, जिसका उपयोग बिंदु वायु रक्षा (Point Air Defence) के लिये किया जाना था, जबकि आकाश 30 किमी. अवरोधन क्षमता के साथ एक प्रमुख मध्यम दूरी की सतह-से-वायु में मार करने वाली निर्देशित मिसाइल (SAM) के रूप में उभरी।
- रणनीतिक महत्त्व के कारण अग्नि मिसाइल कार्यक्रम को बाद में IGMDP से अलग कर स्वतंत्र रूप से विस्तारित किया गया, जो भारत की रणनीतिक प्रतिरोधक क्षमता (Strategic Deterrence Capability) में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि सिद्ध हुआ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. आकाश-NG क्या है?
आकाश-NG एक अगली पीढ़ी की सतह-से-वायु में मार करने वाली निर्देशित मिसाइल (SAM) है, जिसे उच्च गति, सशक्त गतिशीलता (High-Manoeuvring) तथा निम्न RCS वाले हवाई खतरों को 70 किमी. तक की दूरी पर अवरोधित करने के लिये अभिकल्पित किया गया है।
2. उपयोगकर्त्ता मूल्यांकन परीक्षण (UET) क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
सफल UET वास्तविक परिचालन परिस्थितियों में प्रणाली की संचालनात्मक तत्परता की पुष्टि करते हैं और इसे भारतीय वायुसेना (IAF) में शामिल किये जाने की स्वीकृति प्रदान करते हैं।
3. आकाश-NG मिसाइल मूल आकाश मिसाइल से किस प्रकार भिन्न है?
आकाश-NG अधिक हल्की है (350 किग्रा. बनाम 700 किग्रा.), इसकी मारक क्षमता अधिक है, इसमें डुअल-पल्स ठोस रॉकेट मोटर का उपयोग किया गया है तथा यह बेहतर गतिशीलता और उत्तरजीविता प्रदान करती है।
4. आकाश-NG मिसाइल का विकास किसने किया और इसका उत्पादन कौन करता है?
इसका विकास DRDO ने किया है तथा इसका उत्पादन भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) द्वारा किया जाता है।
5. IGMDP क्या है और इसका महत्त्व क्या है?
एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP), जिसे ए पी.जे. अब्दुल कलाम के नेतृत्व में संचालित किया गया, ने पृथ्वी, आकाश, नाग और अग्नि जैसी स्वदेशी मिसाइल प्रणालियों की नींव रखी तथा भारत की रणनीतिक आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ किया।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न 1. कभी-कभी समाचारों में उल्लिखित ‘टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस’ (THAAD) क्या है? (2018)
(a) इज़रायल की एक रडार प्रणाली
(b) भारत का घरेलू मिसाइल प्रतिरोधी कार्यक्रम
(c) अमेरिकी मिसाइल प्रतिरोधी प्रणाली
(d) जापान और दक्षिण कोरिया के बीच एक रक्षा सहयोग
उत्तर: (c)
प्रश्न 2. अग्नि-IV बैलिस्टिक मिसाइल के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2014)
- यह धरातल-से-धरातल तक मार करने वाला बैलिस्टिक है।
- इसमें केवल द्रव नोदक ईंधन के रूप में इस्तेमाल होता है।
- यह एक टन नाभिकीय वारहेड को 7500 किमी. दूरी तक फेंक सकता है।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
रैपिड फायर
भारतीय रेलवे का विद्युतीकरण अभियान
भारतीय रेलवे ने अपने ब्रॉड गेज (दो समानांतर रेल पटरियों के आंतरिक किनारों के बीच 1.676 मीटर दूरी) नेटवर्क का 99.2% विद्युतीकृत कर लिया है, जो नवंबर 2025 के 70,001 मार्ग किमी. (RKM) में से 69,427 RKM को कवर करता है, जिससे बुनियादी ढाँचे की वृद्धि को सतत विकास के साथ जोड़ा जा रहा है।
- ऐतिहासिक महत्त्व: भारत में रेलवे विद्युतीकरण की शुरुआत वर्ष 1925 में हुई, जब बॉम्बे विक्टोरिया टर्मिनस और कुर्ला हार्बर के बीच पहली इलेक्ट्रिक ट्रेन चली, जिसने ऊर्जा-कुशल रेल परिवहन की आधारशिला रखी।
- पिछले दशक में तीव्र वृद्धि: विद्युतीकरण की गति वर्ष 2004–14 में 1.42 किमी./दिन से बढ़कर वर्ष 2019–25 में 15 किमी./दिन से अधिक हो गई। विद्युतीकृत रेलवे पटरियों का हिस्सा वर्ष 2000 के 24% से बढ़कर वर्ष 2024 तक 96% से अधिक और नवंबर 2025 तक 99.2% हो गया।
- राज्य स्तर पर लगभग सार्वभौमिक पहुँच: 25 राज्य/केंद्रशासित प्रदेशों में रेलवे नेटवर्क 100% विद्युतीकृत है, जबकि केवल 5 राज्यों (राजस्थान, तमिलनाडु, कर्नाटक, असम और गोवा) में कुल 574 मार्ग किमी. (0.8%) गैर-विद्युतीकृत खंड शेष है।
- आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ: डीज़ल की तुलना में इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन लगभग 70% अधिक किफायती है और यह कार्बन उत्सर्जन, वायु प्रदूषण तथा जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को भी काफी हद तक कम करता है।
- वैश्विक रेलवे विद्युतीकरण (जून 2025 तक): स्विट्ज़रलैंड 100% रेलवे विद्युतीकरण के साथ आगे है, इसके बाद चीन (82%), स्पेन (67%), जापान (64%), फ्राँस (60%), रूस (52%) और यूनाइटेड किंगडम (39%) का स्थान है।
- नवीकरणीय ऊर्जा का एकीकरण: नवंबर 2025 तक, भारतीय रेल ने 898 मेगावाट सौर ऊर्जा विकसित की है, जो वर्ष 2014 में 3.68 मेगावाट था, यह सौर क्षमता में लगभग 244 गुना वृद्धि को दर्शाता है। वर्तमान में देश भर के 2,626 रेलवे स्टेशनों पर सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किये जा चुके हैं।
|
और पढ़ें: भारतीय रेलवे में सुधार |
रैपिड फायर
एमपेम्बा प्रभाव
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (JNCASR) के वैज्ञानिकों ने पेंबा प्रभाव की व्याख्या के लिये सुपरकंप्यूटर आधारित पहली सिमुलेशन विकसित की है।
- पेंबा प्रभाव: यह वह परिघटना है जिसमें अधिक उष्ण जल कम उष्ण (शीत) जल की तुलना में तेज़ी से जम जाता है।
- इस प्रभाव का उल्लेख सबसे पहले अरस्तू ने मौसम विज्ञान (Meteorologica) में किया था और इसे 20वीं सदी में एरास्तो पेंबा ने पुनः खोजा, जिनके नाम पर इसे पेंबा प्रभाव (Mpemba Effect) कहा जाता है।
- JNCASR अध्ययन के निष्कर्ष: अध्ययन में पता चला कि जल सीधे जमता नहीं है, बल्कि यह क्षणिक मध्यवर्ती आणविक अवस्थाओं (Short-lived Intermediate Molecular States) से होकर गुज़रता है।
- जल अपने प्रारंभिक तापमान के अनुसार इन मध्यवर्ती अवस्थाओं में विभिन्न अवधियों तक रह सकता है।
- अधिक उष्ण जल यदा-कदा इस विलंब को पार कर हिमीकरण की प्रक्रिया (Ice Nucleation) तक तेज़ी से पहुँच सकता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि क्यों उष्ण जल कभी-कभी पहले जम जाता है।
- अध्ययन से पुष्टि होती है कि पेंबा प्रभाव वास्तविक है और यह केवल जल तक सीमित नहीं है, क्योंकि यह अन्य तरल से ठोस अवस्था परिवर्तन (Fluid-to-solid Phase Transitions) में भी देखा जा सकता है।
- यह अध्ययन असंतुलित अवस्थाओं (Out-of-equilibrium Phenomena) की समझ को गहन करता है, अगली पीढ़ी के इलेक्ट्रॉनिक्स में बेहतर कूलिंग एवं ताप नियंत्रण (Thermal Control) के लिये दृष्टिकोण प्रदान करता है और असंतुलन भौतिकी (Nonequilibrium Physics) में एक महत्त्वपूर्ण सफलता को दर्शाता है, जिससे लंबे समय से चले आ रहे प्रायोगिक और सैद्धांतिक विवादों (Experimental and Theoretical Debates) का समाधान हुआ।
|
और पढ़ें: Mpemba प्रभाव |
रैपिड फायर
आयुष निर्यात संवर्द्धन परिषद
हाल ही में आयुष निर्यात संवर्द्धन परिषद (AYUSHEXCIL) ने 4 जनवरी, 2026 को अपना चौथा स्थापना दिवस मनाया।
- परिचय: यह आयुष क्षेत्र के लिये नोडल निर्यात संवर्द्धन परिषद है, जिसे वर्ष 2022 में गांधीनगर में आयोजित ग्लोबल आयुष निवेश एवं नवाचार शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा लॉन्च किया गया था।
- यह आयुष मंत्रालय के परामर्श से तथा वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के सहयोग से कार्य करता है।
- कार्य: परिषद निर्यातकों के क्षमता निर्माण, विनियामक अनुपालन में सुविधा, B2B बैठकें, अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियाँ, सेमिनार तथा वैश्विक बाज़ार तक पहुँच को सुदृढ़ करने हेतु विदेशी आउटरीच कार्यक्रमों का संचालन करती है।
- कवरेज: परिषद आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा, होम्योपैथी, हर्बल उत्पादों तथा भारतीय पारंपरिक स्वास्थ्य सेवाओं के निर्यात की देख-रेख करती है।
- आयुष गुणवत्ता चिह्न: AYUSHEXCIL आयुष मंत्रालय की आयुष गुणवत्ता चिह्न योजना का एंकर (मुख्य समन्वयक) है, जो वैश्विक गुणवत्ता आश्वासन और उत्पाद विश्वसनीयता को सुदृढ़ करता है।
- व्यापार समझौतों में एकीकरण: आयुष प्रणालियों को द्विपक्षीय व्यापार समझौतों में औपचारिक मान्यता प्राप्त हुई है, जिनमें भारत-ओमान CEPA तथा भारत-न्यूज़ीलैंड FTA शामिल हैं। इन समझौतों में पारंपरिक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं पर समर्पित परिशिष्ट (Annexes) शामिल हैं।
- उपलब्धि: आयुष एवं हर्बल उत्पादों का निर्यात 6.11% की वृद्धि के साथ वर्ष 2023-24 के USD 649.2 मिलियन से बढ़कर वर्ष 2024-25 में USD 688.89 मिलियन हो गया, जो भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों की वैश्विक मांग में वृद्धि को दर्शाता है।
|
और पढ़ें: आयुष क्षेत्र की प्रगति |
रैपिड फायर
BIS स्थापना दिवस 2026
हाल ही में भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने 6 जनवरी, 2026 को अपना 79वाँ स्थापना दिवस मनाया।
- परिचय: भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) उपभोक्ता कार्य विभाग, उपभोक्ता कार्य, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अंतर्गत भारत की राष्ट्रीय मानक संस्था है, जो उत्पादों की सुरक्षा, विश्वसनीयता और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता सुनिश्चित करने के लिये उत्तरदायी है।
- इसकी स्थापना आरंभ में भारतीय मानक संस्थान (ISI) के रूप में की गई थी, जो 6 जनवरी, 1947 को अस्तित्व में आया।
- कानूनी आधार: भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) अधिनियम, 2016 मानकीकरण, प्रमाणन और हॉलमार्किंग के लिये वैधानिक आधार प्रदान करता है।
- विज़न: डिजिटल रूप से सक्षम और वैश्विक स्तर पर सामंजस्यपूर्ण गुणवत्ता पारिस्थितिक तंत्र के माध्यम से ‘मेड इन इंडिया’ को ‘भारत द्वारा विश्वसनीय और विश्व द्वारा विश्वसनीय’ में परिवर्तित करना।”
- सुधार: यह वार्षिक न्यूनतम मार्किंग शुल्क में रियायत प्रदान करता है (80%–सूक्ष्म, 50%–लघु, 20%–मध्यम) तथा बड़े उद्योगों के लिये इन-हाउस प्रयोगशाला संबंधी आवश्यकताओं में ढील देता है।
- सिल्वर HUID हॉलमार्किंग योजना उपभोक्ता संरक्षण और पारदर्शिता को मज़बूत करती है, जिसमें HUID-आधारित अंकन को अनिवार्य बनाया गया है, जबकि चांदी की हॉलमार्किंग स्वैच्छिक बनी हुई है।
- महत्त्वपूर्ण पहल:
- BIS मानकीकरण पोर्टल: मानकों के निर्माण, समीक्षा और विशेषज्ञ सहयोग को एकीकृत करने वाला एंड-टू-एंड डिजिटल प्लेटफॉर्म।
- SHINE योजना: स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के माध्यम से महिलाओं को केंद्र में रखकर गुणवत्ता के प्रति जागरूकता और सशक्तीकरण की पहल।
- BIS–सक्षम: उत्कृष्टता को मान्यता देने की वार्षिक रूपरेखा।
- मानक राष्ट्रीय कार्ययोजना (SNAP), 2022-27: एक राष्ट्रीय रोडमैप, जो उभरती प्रौद्योगिकियों तथा स्थिरता एवं जलवायु परिवर्तन संबंधी चिंताओं को दूर करने के क्रम में मानकीकरण हेतु मज़बूत आधार के रूप में कार्य करता है एवं मानकों को भारत की आर्थिक वृद्धि और गुणवत्ता संस्कृति के सक्षमकर्त्ता के रूप में स्थापित करता है।
- उपलब्धियाँ: 94% भारतीय मानकों को अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (ISO) और अंतर्राष्ट्रीय इलेक्ट्रोटेक्निकल आयोग (IEC) मानकों के अनुरूप बनाया ग
|
और पढ़ें: भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) अधिनियम 2016 |


.webp)