प्रारंभिक परीक्षा
डिज़ाइन आधारित प्रोत्साहन (DLI) योजना
सेमीकंडक्टरों के लिये भारत की डिज़ाइन आधारित प्रोत्साहन (DLI) योजना ने ज़मीनी स्तर पर ठोस परिणाम दिये हैं, जो वैश्विक आपूर्ति शृंखला की अनिश्चितताओं के बीच आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर डिज़ाइन ईकोसिस्टम के निर्माण में तेज़ प्रगति को दर्शाते हैं।
डिज़ाइन आधारित प्रोत्साहन (DLI) योजना के संबंध में मुख्य तथ्य क्या हैं?
- परिचय: DLI योजना केंद्र सरकार की एक पहल है, जिसे इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा सेमिकॉन इंडिया कार्यक्रम के अंतर्गत लागू किया जा रहा है। इसका उद्देश्य वित्तीय प्रोत्साहन तथा उन्नत डिज़ाइन अवसंरचना उपलब्ध कराकर घरेलू स्टार्टअप्स एवं MSMEs में स्वदेशी सेमीकंडक्टर चिप डिज़ाइन को बढ़ावा देना है।
- उद्देश्य: DLI योजना का लक्ष्य फैबलेस सेमीकंडक्टर डिज़ाइन के क्षेत्र में एक आत्मनिर्भर, नवोन्मेषी और वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्द्धी चिप डिज़ाइन ईकोसिस्टम विकसित करना है।
- फैबलेस सेमीकंडक्टर डिज़ाइन में स्वयं का विनिर्माण संयंत्र रखे बिना सेमीकंडक्टर चिप्स का डिज़ाइन और विकास किया जाता है, जबकि निर्माण कार्य विशेषीकृत फाउंड्रीज़ को सौंपा जाता है।
- DLI योजना की आवश्यकता: फैबलेस सेमीकंडक्टर कंपनियाँ इलेक्ट्रॉनिक्स वैल्यू चेन में सबसे रणनीतिक स्थान पर होती हैं, क्योंकि डिज़ाइन और बौद्धिक संपदा (IP) चिप के कुल मूल्य का आधे से अधिक योगदान देती हैं, मूल्य संवर्द्धन की लगभग 50% तक सामग्री सूची (बिल ऑफ मटीरियल्स) का 20–50% हिस्सा होती हैं तथा वैश्विक सेमीकंडक्टर बिक्री का लगभग 30–35% संचालित करती हैं।
- चूँकि डिज़ाइन और बौद्धिक संपदा (IP) चिप की कार्यक्षमता, ऊर्जा दक्षता, सुरक्षा और दीर्घकालिक प्रतिस्पर्द्धा को तय करती हैं, इसलिये स्वदेशी डिज़ाइन क्षमता न होने पर स्थानीय उत्पादन के बावजूद देश मुख्य तकनीकों के लिये आयात पर निर्भर रहते हैं। इसी आवश्यकता को देखते हुए DLI योजना के तहत मज़बूत घरेलू फैबलेस ईकोसिस्टम का विकास अनिवार्य है।
- पात्रता: DLI योजना में स्टार्टअप [औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग (DPIIT) अधिसूचना, 2019 के अनुसार], MSME (MSME अधिसूचना, 2020 के अनुसार) और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नीति परिपत्र, 2017 या प्रचलित मानदंडों के अनुरूप भारतीय नागरिकों के स्वामित्व वाली घरेलू कंपनियाँ शामिल हैं।
- यह समावेशी डिज़ाइन उद्यम परिपक्वता के विभिन्न चरणों में भागीदारी की अनुमति देता है।
- समर्थन का दायरा: समर्थन/सपोर्ट संपूर्ण सेमीकंडक्टर डिज़ाइन के लाइफसायकल में प्रदान किया जाता है, जिसमें इंटीग्रेटेड सर्किट (IC), चिपसेट, सिस्टम-ऑन-चिप (SoC), सिस्टम और IP कोर शामिल हैं।
- योजना स्वदेशी डिज़ाइन, IP स्वामित्व और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों में तैनाती पर ज़ोर देती है।
- वित्तीय प्रोत्साहन: योजना दो प्रमुख पहलों पर आधारित है। उत्पाद डिज़ाइन आधारित पहल में होने वाले व्यय का 50% तक (प्रति आवेदन ₹15 करोड़ की अधिकतम सीमा के साथ) प्रतिपूर्ति करती है।
- डिप्लॉय आधारित प्रोत्साहन: इस प्रोत्साहन के तहत पाँच वर्षों के लिये शुद्ध बिक्री कारोबार का 4–6% प्रदान किया जाता है, जिसकी अधिकतम सीमा ₹30 करोड़ है। यह प्रोत्साहन न्यूनतम बिक्री मानदंडों की पूर्ति तथा उत्पाद के सफल परिनियोजन की शर्त के अधीन होगा।
- डिज़ाइन अवसंरचना समर्थन: उन्नत कंप्यूटिंग विकास केंद्र (C-DAC) द्वारा संचालित ChipIN सेंटर के माध्यम से प्रदान किया जाता है।
- इसमें उन्नत राष्ट्रीय EDA (इलेक्ट्रॉनिक डिज़ाइन ऑटोमेशन) टूल ग्रिड, IP कोर रिपॉजिटरी, MPW प्रोटोटाइपिंग और पोस्ट-सिलिकॉन सत्यापन तक पहुँच शामिल है, जो चिप डिज़ाइन के लिये प्रवेश संबंधी बाधाओं को काफी कम करता है।
- DLI की प्रमुख उपलब्धियाँ: DLI योजना के तहत, वीडियो निगरानी, ड्रोन पहचान, ऊर्जा मीटर, माइक्रोप्रोसेसर, उपग्रह संचार और ब्रॉडबैंड एवं इंटरनेट ऑफ थिंग्स सिस्टम ऑन चिप (IoT SoC) जैसे क्षेत्रों में 24 चिप-डिज़ाइन प्रोजेक्ट को स्वीकृति प्रदान की गई है।
- ChipIN सेंटर ने चिप डिज़ाइन अवसंरचना तक पहुँच को डेमोक्रेटिक किया है, जो 400 संगठनों में लगभग 1 लाख इंजीनियरों और छात्रों का समर्थन कर रहा है, हालाँकि राष्ट्रीय EDA ग्रिड का व्यापक उपयोग हुआ है, जो पारिस्थितिक तंत्र के मज़बूत अंगीकरण को दर्शाता है।
भारत में सेमीकंडक्टर डिज़ाइन हेतु प्रमुख संस्थागत ढाँचे
- सेमिकॉन इंडिया प्रोग्राम (SIM): 76,000 करोड़ रुपये के प्रावधान के साथ, SIM सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले निर्माण के साथ-साथ चिप डिज़ाइन का समर्थन करता है।
- उन्नत कंप्यूटिंग विकास केंद्र (C-DAC) इसे लागू करने वाली केंद्रीय संस्था (नोडल कार्यान्वयन एजेंसी) के रूप में कार्य करता है।
- चिप्स टू स्टार्टअप (C2S) प्रोग्राम: यह एक राष्ट्रीय क्षमता निर्माण पहल है, जो शैक्षणिक संस्थानों में BTech, MTech और PhD स्तर पर लगभग 85,000 उद्योग-तैयार पेशेवरों को सेमीकंडक्टर चिप डिज़ाइन में तैयार करने हेतु संचालित की जाती है।
- माइक्रोप्रोसेसर विकास कार्यक्रम: C-DAC, IIT मद्रास और IIT बॉम्बे द्वारा नेतृत्व किये गए इस कार्यक्रम ने VEGA, SHAKTI और AJIT जैसे ओपन-सोर्स, स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर विकसित किये हैं, जिससे तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिला है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) स्कीम क्या है?
यह केंद्रीय सरकार की एक योजना है, जिसे सेमिकॉन इंडिया प्रोग्राम के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा लागू किया जाता है। इसका उद्देश्य प्रोत्साहन और साझा अवसंरचना के माध्यम से देशी सेमीकंडक्टर चिप डिज़ाइन को बढ़ावा देना है।
2. भारत के लिये DLI स्कीम क्यों आवश्यक है?
चिप के मूल्य में डिज़ाइन और IP का योगदान आधे से अधिक होता है, लगभग 50% मूल्य संवर्द्धन और 20-50% BOM में जबकि फैबलेस कंपनियाँ वैश्विक बिक्री का लगभग 30-35% संचालित करती हैं। इसलिये, देशी डिज़ाइन प्रतिस्पर्द्धा और सुरक्षा के लिये महत्त्वपूर्ण है।
3. DLI स्कीम के तहत कौन पात्र है?
स्टार्टअप (DPIIT पंजीकृत), MSME और घरेलू कंपनियाँ, जो भारतीय नागरिकों के स्वामित्व में हैं और FDI नियमों के अनुरूप हैं, जिससे विभिन्न स्तरों की उद्यम क्षमता के साथ भागीदारी संभव होती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न: निम्नलिखित में से किस लेज़र प्रकार का उपयोग लेज़र प्रिंटर में किया जाता है? (2008)
(a) डाई लेज़र
(b) गैस लेज़र
(c) सेमीकंडक्टर लेज़र
(d) एक्सीमर लेज़र
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. भारत ने एक सेमीकंडक्टर विनिर्माण केंद्र बनने का लक्ष्य रखा है। भारत में सेमीकंडक्टर उद्योग के सामने क्या चुनौतियाँ हैं? भारत सेमीकंडक्टर मिशन की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिये। (2025)
रैपिड फायर
ICGS समुद्र प्रताप
भारत के रक्षा मंत्री ने भारतीय तटरक्षक बल के लिये स्वदेशी रूप से निर्मित दो प्रदूषण नियंत्रण पोतों में से पहले भारतीय तटरक्षक पोत (ICGS) समुद्र प्रताप को कमीशन किया, जो भारत की समुद्री पर्यावरण संरक्षण क्षमताओं को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
- पोत का निर्माण विशेष रूप से भारत के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में तेल रिसाव (Oil Spill) और समुद्री प्रदूषण से निपटने के लिये किया गया है। यह पोत कोस्ट गार्ड रीजन (पश्चिम) के अधीन कार्य करता है, लेकिन इसका होमपोर्ट कोच्चि (Kochi) निर्धारित किया गया है।
- ICGS समुद्र प्रताप: इसका निर्माण गोवा शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा किया गया है, जिसमें 60% से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है।
- ICGS समुद्र प्रताप, जिसका अर्थ ‘मैजेस्टी ऑफ द सीज़’ है, जो समुद्री पर्यावरण की सुरक्षा, प्रदूषण नियंत्रण और भारत के समुद्री हितों की रक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, साथ ही यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
- यह पोत 22 नॉट से अधिक की गति और 6,000 समुद्री मील की परिचालन क्षमता (एंड्यूरेंस) के साथ भारतीय तटरक्षक बल के बेड़े का सबसे बड़ा पोत है।
- यह प्रदूषण प्रतिक्रिया, तेल रिसाव नियंत्रण, अग्निशमन, समुद्री सुरक्षा, तटीय गश्त और निगरानी के लिये एक बहु-भूमिका मंच के रूप में कार्य करता है।
- पोत उन्नत प्रदूषण पहचान प्रणालियों, विशेष प्रतिक्रिया नौकाओं, आधुनिक अग्निशमन उपकरणों तथा हेलीकॉप्टर हैंगर सहित विमानन सुविधाओं से सुसज्जित है।
- यह समुद्री पर्यावरण संरक्षण को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ करता है, प्रवाल भित्तियों, मैंग्रोव और मत्स्य संसाधनों की रक्षा करता है तथा ब्लू इकाॅनोमी को समर्थन प्रदान करता है।
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चर्चित स्थान
पोपोकाटेपेटल ज्वालामुखी
मेक्सिको के एक राष्ट्रीय स्वायत्त विश्वविद्यालय (UNAM) ने मेक्सिको के पोपोकाटेपेटल ज्वालामुखी की आंतरिक संरचना की पहली 3D भूकंपीय छवि तैयार की है, जिसने इस उच्च जोखिम वाले क्षेत्र में मैग्मा संचलन और प्रस्फुटन के व्यवहार की समझ को व्यापक रूप से उन्नत किया है।
- इमेजिंग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग एल्गोरिद्म का उपयोग भूकंपीय संकेतों (कंपन) को वर्गीकृत और विश्लेषण करने के लिये किया गया। इमेजिंग से एकल मैग्मा कक्ष के बजाय विभिन्न गहराइयों (क्रेटर से 18 किमी. नीचे तक) पर अनेक मैग्मा संचयन पाए गए हैं।
- यह ज्वालामुखी एक "प्राकृतिक प्रयोगशाला" के रूप में कार्य करता है, जो वैज्ञानिकों को ज्वालामुखीयता, मैग्मा डायनामिक्स और खतरा कम करने के मॉडल को परिष्कृत करने में मदद करता है।
- पोपोकाटेपेटल ज्वालामुखी: जिसे "स्मोकिंग माउंटेन" के नाम से भी जाना जाता है, यह मध्य मेक्सिको में मेक्सिको और प्यूब्ला स्टेट की सीमा पर स्थित एक तीक्ष्ण ढाल वाला सक्रिय ज्वालामुखी है।
- यह ट्रांस-मेक्सिकन ज्वालामुखी पेटी पर स्थित है, जो उत्तरी अमेरिकी प्लेट के नीचे कोकोस प्लेट के निमज्जन के परिणामस्वरूप निर्मित हुई है।
- समुद्र तल से 5,452 मीटर की ऊँचाई तक उठने वाला पोपोकाटेपेटल पिको डे ओरिज़ाबा के बाद मेक्सिको का दूसरा सबसे ऊँचा ज्वालामुखी है और यह देश के सबसे सक्रिय और खतरनाक ज्वालामुखियों में से एक है, जिसमें वर्ष 1519 में प्रस्फुटन दर्ज किया गया, यह परिप्रशांत मेखला का हिस्सा है।
- परिप्रशांत मेखला या परिप्रशांत पेटी प्रशांत महासागर के चारों ओर तीव्र भूकंपीय और ज्वालामुखीय संचलन का एक घोड़े की नाल के आकार का क्षेत्र है, जो विश्व भर में लगभग 75% सक्रिय ज्वालामुखियों और लगभग 90% भूकंपों के लिये ज़िम्मेदार है।
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रैपिड फायर
वुल्फ सुपरमून
वर्ष 2026 की पहली पूर्णिमा, जिसे वुल्फ सुपरमून कहा जाता है, 2 जनवरी को अपने उच्चतम स्तर पर थी, जिसमें पूर्णिमा सामान्य की तुलना में थोड़ी बड़ी और अधिक उज्ज्वल दिखाई दी। वुल्फ सुपरमून एक संयुक्त शब्द है, जो वुल्फ मून की घटना को सुपरमून के समय में संदर्भित करता है।
- वुल्फ मून जनवरी माह की पहली पूर्णिमा का पारंपरिक नाम है। यह नाम मूल अमेरिकी (इंडिजिनस), सेल्टिक और पुरानी अंग्रेज़ी लोककथाओं में मूल रूप से मौजूद है और इसे द ओल्ड फार्मर ऐल्मनैक जैसे पंचांगों ने लोकप्रिय बनाया है।
- यह मध्य शीतऋतु से जुड़ी उस धारणा से संबंधित है कि इस समय भेड़ियों की हुआँ-हुआँ (चीखने-चिल्लाने) की आवाज़ें अधिक सुनाई देती हैं, हालाँकि चंद्रमा में स्वयं कोई भौतिक परिवर्तन नहीं होता।
- वुल्फ सुपरमून एक अपेक्षाकृत दुर्लभ घटना है, जो केवल तब घटित होती है जब जनवरी की पूर्णिमा का संयोग सुपरमून से होता है।
- सुपरमून वह स्थिति है जब चंद्रमा अपनी पूर्ण अवस्था में होते हुए पृथ्वी के सबसे निकट बिंदु पर होता है, जिससे वह रात्रि में आकाश में थोड़ा बड़ा और अधिक उज्ज्वल दिखाई देता है।
- जब चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर अंडाकार कक्षा में परिक्रमा करता है, तो वह अपनी कक्षा के दो विशिष्ट बिंदुओं से होकर गुज़रता है- पेरिजी, जो पृथ्वी के सबसे निकट का बिंदु होता है और एपोजी, जो पृथ्वी से सबसे दूर का बिंदु होता है।
- सुपरमून के दौरान एक सामान्य दृश्य प्रभाव चंद्र भ्रम (Moon Illusion) होता है। इसमें चंद्रमा क्षितिज के निकट आकाश में ऊँचा होने की तुलना में अधिक बड़ा प्रतीत होता है। यह भ्रम हमारे मस्तिष्क की दूरी और पैमाने की धारणा/आकलन में त्रुटि के कारण होता है, न कि चंद्रमा के आकार में किसी वास्तविक/भौतिक परिवर्तन के कारण।
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रैपिड फायर
भारत का ब्रेल ईकोसिस्टम
प्रतिवर्ष 4 जनवरी को मनाया जाने वाला 'विश्व ब्रेल दिवस' ब्रेल लिपि को केवल पढ़ने की एक प्रणाली के रूप में नहीं, बल्कि दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिये शिक्षा, गरिमा और समान भागीदारी के प्रवेश द्वार के रूप में रेखांकित करता है।
- परिचय: ब्रेल एक स्पर्शजन्य (छूकर लिखने और पढ़ने) लेखन और पठन प्रणाली है, जिसका उपयोग उन लोगों द्वारा किया जाता है जो दृष्टिबाधित हैं या जिनकी दृष्टि कमज़ोर है। यह छह बिंदुओं वाले एक सेल पर आधारित होती है, जिसमें तीन-तीन बिंदुओं की दो पंक्तियाँ होती हैं। उभरे हुए इन बिंदुओं के विभिन्न संयोजन अक्षरों, संख्याओं, विराम चिह्नों और प्रतीकों को दर्शाते हैं, जिससे इसे स्पर्श के माध्यम से पढ़ा जा सकता है।
- ब्रेल स्वयं में कोई भाषा नहीं है, बल्कि एक कोड है जो विभिन्न भाषाओं को स्पर्शजन्य रूप (छूकर पढ़ने और लिखने) में पढ़ने और लिखने की सुविधा प्रदान करता है।
- यह भारत में 19वीं सदी के अंत में प्रस्तुत किया गया था और तब से दृष्टिहीन लोगों के साक्षरता और सशक्तीकरण का केंद्र बना हुआ है। भारत में 50.32 लाख दृष्टिहीन व्यक्ति (जनगणना 2011) हैं।
- कानूनी आधार: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 पहुँच योग्यता, समावेशी शिक्षा तथा ब्रेल और सहायक उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करता है।
- सरकारी पहलें:
- भारती ब्रेल (मानक भारती ब्रेल कोड, 2025): भारत की एकीकृत यूनिकोड-आधारित ब्रेल लिपि, जो भारतीय भाषाओं में डिजिटल पहुँच को सक्षम बनाती है।
- सुगम्य भारत अभियान एवं सुगम्य पुस्तकालय: यह एक राष्ट्रीय ढाँचा है, जो ब्रेल-सक्षम सार्वजनिक अवसंरचना तथा मुद्रित अक्षमता (Print Disabilities) वाले व्यक्तियों के लिये बहुभाषी डिजिटल शिक्षण संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करता है।
- दृष्टिबाधित व्यक्तियों के सशक्तीकरण हेतु राष्ट्रीय संस्थान (NIEPVD): इसने राष्ट्रीय ब्रेल मानकों के तकनीकी उन्नयन और डिजिटल अनुकूलता के लिये ड्राफ्ट भारती ब्रेल 2.1 (2026) जारी किया है।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धता: दिव्यांगजन के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCRPD) का पक्षकार होने के कारण भारत ब्रेल सहित सुलभ प्रारूपों में सूचना और शिक्षा तक पहुँच सुनिश्चित करता है।
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