रैपिड फायर
तुर्कमान गेट
- 09 Jan 2026
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तुर्कमान गेट हाल ही में एक ध्वस्तीकरण अभियान के दौरान हुई हिंसा के बाद चर्चा में है, जिसने आपातकाल (1975-77) के घटनाक्रमों का पुनः स्मरण करा दिया। उस अवधि में इस क्षेत्र में बलपूर्वक विध्वंस तथा ज़बरन नसबंदी अभियानों को क्रियान्वित दिया गया था, जिनकी बाद में शाह आयोग द्वारा जाँच की गई।
- परिचय: तुर्कमान गेट शाहजहानाबाद के 14 द्वारों में से एक था। शाहजहानाबाद की स्थापना मुगल सम्राट शाहजहाँ ने 17वीं शताब्दी के मध्य (लगभग 1650 ई.) में एक परकोटाबद्ध नगर के रूप में की थी।
- इस द्वार का नाम सूफी संत हज़रत शाह तुर्कमान बयाबानी के नाम पर रखा गया था, जिनकी मज़ार इसके समीप स्थित है। इसी कारण यह क्षेत्र आज भी सांस्कृतिक एवं धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है।
- इतिहास: तुर्कमान गेट का महत्त्व मुगलकालीन दिल्ली से भी पूर्व का है। यह क्षेत्र एक महत्त्वपूर्ण पूर्व-विद्यमान शहरी एवं आध्यात्मिक परिदृश्य का हिस्सा रहा है, जो सूफी परंपराओं के प्रमुख केंद्र के रूप में दिल्ली की ऐतिहासिक भूमिका को प्रतिबिंबित करता है।
- सूफी संत शाह तुर्कमान बयाबानी को दिल्ली में प्रारंभिक सूफी परंपराओं से परंपरागत रूप से जोड़ा जाता है। उनकी दरगाह के समीप रज़िया सुल्तान की कब्र का होना, इस स्थल के प्रति शताब्दियों से चले आ रहे सम्मान एवं पवित्रता को दर्शाता है।
- स्थान: तुर्कमान गेट फतेहपुरी मस्जिद – हौज़ काज़ी – पुरानी यमुना पट्टी को जोड़ने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित था, जो शाहजहानाबाद के शहरी नियोजन में शामिल था। आज यह पुरानी दिल्ली, जामा मस्जिद के पास स्थित है।
- महत्त्व: परकोटा शहर के अन्य द्वारों की तरह तुर्कमान गेट ने रक्षात्मक और वाणिज्यिक दोनों भूमिकाएँ निभाईं। यह शहर को बाह्य खतरों से सुरक्षा प्रदान करता था और साथ ही लोगों और माल की आवाजाही को नियंत्रित करता था।
- ऐतिहासिक परिवर्तनों में जीवित रहना: तुर्कमान गेट ने कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक संकटों और परिवर्तनों को सहन किया, जिनमें 1857 का विद्रोह, औपनिवेशिक काल में शहर की दीवारों का ध्वंस, विभाजन और उसके बाद की व्यावसायिक पुनर्गठन शामिल हैं।
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