प्रारंभिक परीक्षा
भारत की मेगा रेल परियोजनाएँ
चर्चा में क्यों?
भारतीय रेलवे 21वीं सदी के महत्त्वपूर्ण अवसंरचनात्मक परियोजनाओं को चला रहा है, जो कनेक्टिविटी को बदल रही हैं, लॉजिस्टिक्स को बढ़ावा दे रही हैं, और भारत की इंजीनियरिंग क्षमता तथा दीर्घकालिक विकास दृष्टि को प्रदर्शित कर रही हैं।
भारत में हाल की प्रमुख रेलवे अवसंरचना परियोजनाएँ कौन सी हैं?
- उधमपुर–श्रीनगर–बारामूला रेल लिंक (USBRL): हिमालयी क्षेत्र में 272 किमी. लंबी यह रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण रेलवे परियोजना लगभग ₹44,000 करोड़ की लागत से बनाई गई है। इसमें 36 सुरंगें (119 किमी.) और 943 पुल शामिल हैं, जो कश्मीर घाटी को सभी मौसम में रेल संपर्क प्रदान करती हैं। यह परियोजना सुरक्षा, गतिशीलता, पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को महत्त्वपूर्ण रूप से बढ़ाती है।
- चिनाब रेलवे पुल: USBRL का हिस्सा, यह विश्व का सबसे ऊँचा रेलवे आर्च ब्रिज है, जो नदी से 359 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और 1,315 मीटर लंबा है। इसे उच्च भूकंपीय गतिविधि तथा चरम हवाओं को सहने के लिये डिज़ाइन किया गया है और यह भारत की उन्नत इंजीनियरिंग क्षमताओं का प्रतीक है।
- अंजी रेलवे पुल: भारत का पहला केबल-स्टेर्ड रेलवे पुल, जिसे अंजी नदी पर बनाया गया है, पहाड़ी क्षेत्रों में रेलवे पुल निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि को दर्शाता है।
- नया पंबन रेलवे पुल (तमिलनाडु): भारत का पहला वर्टिकल‑लिफ्ट समुद्री पुल, 2.08 किमी लंबा, उन्नत जंग-रोकथाम प्रणालियों के साथ बनाया गया है। यह कठोर समुद्री परिस्थितियों में लंबी अवधि तक टिकाऊपन सुनिश्चित करता है और रामेश्वरम, जो एक प्रमुख तीर्थ स्थल और पर्यटन केंद्र है, को रेल संपर्क से जोड़ता है।
- नेटवर्क विस्तार: वर्ष 2014 से भारतीय रेलवे ने उत्तर‑पूर्वी भारत में कनेक्टिविटी में महत्त्वपूर्ण सुधार किया है। इसमें 1,679 किमी. से अधिक नई पटरियाँ बिछाई गई हैं, 2,500 किमी. से अधिक मार्ग विद्युतीकृत किये गए हैं और 470 से अधिक रोड ओवरब्रिज/अंडरब्रिज का निर्माण किया गया है।
- राजधानी कनेक्टिविटी की उपलब्धि: बैराबी–सैरांग नई लाइन के चालू होने से आइजॉल पहली बार राष्ट्रीय रेल नेटवर्क से जुड़ा, जिससे यह उत्तर-पूर्व की चौथी राजधानी बन गई जिसे रेल कनेक्टिविटी प्राप्त हुई।
- अवसंरचना आधुनिकीकरण और एकीकरण: अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत 60 स्टेशनों का पुनर्विकास किया जा रहा है, जबकि सिवोक–रंगपो, डिमापुर–कोहिमा और जिरीबाम–इंफाल जैसी प्रमुख परियोजनाएँ प्रगति पर हैं। ये परियोजनाएँ क्षेत्र को भारत के बाकी हिस्सों के साथ आर्थिक और सामाजिक रूप से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
- समर्पित माल ढुलाई कॉरिडोर (DFC) नेटवर्क विस्तार: पूर्वी समर्पित माल ढुलाई कॉरिडोर (लुधियाना–सोननगर, 1,337 किमी) पूरी तरह चालू हो चुका है, जबकि पश्चिमी समर्पित माल ढुलाई कॉरिडोर (जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट–दादरी, 1,506 किमी.) का 93.2% हिस्सा चालू है। ये दोनों मिलकर 2,843 किमी. को कवर करते हैं, जिसमें 96.4% नेटवर्क वर्तमान में संचालन में है।
- यह यात्रियों की भीड़ कम करेगा, लॉजिस्टिक्स लागत घटाएगा, ट्रांजिट समय कम करेगा, और औद्योगिक एवं बंदरगाह कनेक्टिविटी को मज़बूत करके तेज़ आर्थिक विकास को बढ़ावा देगा।
- उच्च गति रेल: मुंबई–अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना, जिसे नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) द्वारा कार्यान्वित किया गया है, महाराष्ट्र में उन्नत सुरंग निर्माण कार्य और सूरत एवं अहमदाबाद में रोलिंग-स्टॉक डिपो शामिल हैं। यह परियोजना दो प्रमुख आर्थिक केंद्रों के बीच यात्रा समय को काफी कम करके भारत को विश्व स्तरीय उच्च गति रेल संपर्क की दिशा में अग्रसर करती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. चेनाब रेल ब्रिज की खासियत क्या है?
यह विश्व का सबसे ऊँचा रेल मेहराब पुल है (नदी से 359 मीटर ऊपर)।
2. न्यू पंबन ब्रिज को विशेष क्या बनाता है?
यह भारत का पहला वर्टिकल-लिफ्ट समुद्री रेल पुल है।
3. उत्तर-पूर्व में रेल संपर्क कैसे बेहतर हुआ है?
नई पटरियों, विद्युतीकरण, आइज़ॉल का पहला रेल लिंक और स्टेशन पुनर्विकास के माध्यम से।
4. डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) क्या हैं?
विशेष मालगाड़ी मार्ग जो जाम कम करने और लॉजिस्टिक्स लागत कम करने के लिये बनाए गए हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न: भारतीय रेलवे द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले जैव शौचालयों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2015))
- जैव-शौचालय में मानव अपशिष्ट का अपघटन एक कवक इनोकुलम द्वारा शुरू किया जाता है।
- इस अपघटन में अमोनिया और जलवाष्प ही एकमात्र अंतिम उत्पाद हैं जो वायुमंडल में छोड़े जाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (d)
रैपिड फायर
विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में भारत
सरकार ने घोषणा की कि भारत जापान को पीछे छोड़कर विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है, जिसका GDP USD 4.18 ट्रिलियन है और यह सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है। वर्तमान में भारत संयुक्त राज्य अमेरिका (USD 30.6 ट्रिलियन), चीन (USD 19.4 ट्रिलियन) और जर्मनी (USD 5 ट्रिलियन) के पीछे है।
- तत्काल अपेक्षाएँ: भारत अगले 2.5 से 3 वर्षों में जर्मनी को तीसरे स्थान से पीछे छोड़ने की स्थिति में है और वर्ष 2030 तक इसका अनुमानित GDP USD 7.3 ट्रिलियन होने का अनुमान है।
- क्रय शक्ति समता (PPP) के अनुसार GDP: क्रय शक्ति समता के आधार पर भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में तीसरे स्थान पर है, जिसका GDP USD 14 ट्रिलियन है और यह चीन (USD 33 ट्रिलियन) तथा संयुक्त राज्य अमेरिका (USD 25 ट्रिलियन) के पीछे है।
- IMF का प्रक्षेपण: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) का अनुमान है कि भारत का GDP (PPP) 2030 तक USD 20.7 ट्रिलियन तक पहुँच सकता है और 2038 तक विश्व की दूसरी सबसे बड़ी PPP अर्थव्यवस्था बन सकता है, जिसका GDP USD 34.2 ट्रिलियन होने का अनुमान है।
- मज़बूत आर्थिक वृद्धि की गति: भारत का वास्तविक GDP वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही (जुलाई, अगस्त और सितंबर) में 8.2% बढ़ा, जो छह तिमाहियों में सबसे उच्च वृद्धि है। यह वैश्विक व्यापार अस्थिरताओं के बावजूद अर्थव्यवस्था का लचीलापन और मज़बूती को दर्शाता है।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रक्षेपण: विश्व बैंक ने वर्ष 2026 के लिये भारत की विकास दर 6.5% रहने का अनुमान लगाया है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने वर्ष 2025 हेतु अपनी पूर्वानुमान दर 6.6% तक बढ़ा दी है।
- एशियाई विकास बैंक और मूडीज का अनुमान: एशियाई विकास बैंक ने 2025 के लिये भारत की वृद्धि दर का पूर्वानुमान 7.2% तक बढ़ा दिया है । इसी के साथ, मूडीज की रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि भारत G20 समूह की सबसे तीव्र गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना रहेगा।
- सहायक मैक्रोइकॉनॉमिक संकेतक: मुद्रास्फीति कम है, बेरोज़गारी घट रही है और मज़बूत क्रेडिट प्रवाह तथा शहरी मांग निरंतर वृद्धि को समर्थन दे रही हैं।
- विज़न 2047: भारत का दीर्घकालिक दृष्टिकोण वर्ष 2047 तक उच्च मध्यम-आय वर्गीय देश बनने का लक्ष्य रखता है, जो संरचनात्मक सुधारों, आर्थिक लचीलापन और सामाजिक प्रगति पर आधारित है।
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और पढ़ें: भारत के लिये उच्च विकास दर का लक्ष्य |
रैपिड फायर
भारत-मालदीव अवसंरचना सहयोग
स्रोत: TH
नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) से हनीमाधू हवाई अड्डे के प्रबंधन के लिये भारतीय कंपनियों को नियुक्त करने के मालदीव के प्रस्ताव की जाँच करने को कहा।
- संदर्भ: यह कदम वर्ष 2012 में 511 मिलियन अमेरिकी डॉलर के GMR हवाई अड्डे के अनुबंध को रद्द करने और वर्ष 2014 में बीजिंग अर्बन कंस्ट्रक्शन ग्रुप (चीन) को निर्माण कार्य सौंपे जाने के बाद उठाया गया है।
- इस विवाद का समाधान वर्ष 2016 में तब हुआ, जब सिंगापुर मध्यस्थता केंद्र ने GMR के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए, अनुचित बर्खास्तगी के हर्जाने के रूप में 270 मिलियन अमेरिकी डॉलर का मुआवज़ा देने का आदेश दिया।
- हनीमाधू अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा: यह हा ढालू एटोल (Haa Dhaalu Atoll) के हनीमाधू द्वीप पर स्थित है। भारत सरकार ने 'एक्ज़िम बैंक ऑफ इंडिया' के माध्यम से हनीमाधू हवाई अड्डे के पुनर्विकास हेतु 800 मिलियन अमेरिकी डॉलर की ऋण सुविधा (Line of Credit) उपलब्ध कराई है।
- मालदीव उत्तरी-मध्य हिंद महासागर में स्थित निचले प्रवाल द्वीपों और एटोल की एक शृंखला है, जो भारत और श्रीलंका के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है तथा भूमध्यरेखीय क्षेत्र में फैली हुई है।
- रणनीतिक महत्त्व: यह घटनाक्रम द्विपक्षीय जुड़ाव के नवीनीकरण का संकेत देता है और हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में कनेक्टिविटी, विकास सहायता और रणनीतिक प्रभाव में भारत की भूमिका को मज़बूत करता है।
- यह घटनाक्रम द्विपक्षीय संबंधों के एक नए अध्याय का संकेत है, जो हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में कनेक्टिविटी, विकासात्मक सहायता और रणनीतिक प्रभाव के मामले में भारत की अग्रणी भूमिका को और अधिक सुदृढ़ करता है।
- भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI): यह नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय है, जिसका गठन भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण अधिनियम, 1994 के तहत किया गया है तथा राष्ट्रीय विमानपत्तन प्राधिकरण तथा भारतीय अंतर्राष्ट्रीय विमानपत्तन प्राधिकरण के विलय के बाद 1 अप्रैल, 1995 से परिचालन में है।
- यह भारत के नागरिक उड्डयन बुनियादी ढाँचे का विकास, रखरखाव एवं प्रबंधन करता है, जिसमें हवाई अड्डे के संचालन तथा यात्री और मालवाहक टर्मिनल शामिल हैं।
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और पढ़ें: भारत-मालदीव संबंध |
रैपिड फायर
अरावली पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ही फैसले पर लगाई रोक
सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने नवंबर 2025 के अपने उस निर्णय को स्थगित कर दिया है, जिसमें 100 मीटर ऊँचाई और 500 मीटर क्लस्टर मानदंड के आधार पर अरावली पहाड़ियों की एक संकीर्ण परिभाषा को बरकरार रखा गया था।
- स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognisance): स्वतः संज्ञान लेते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने उल्लेख किया कि राजस्थान में 100 मीटर के मानदंड के अनुसार 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही ठहरेंगी, जिससे निम्न ऊँचाई वाली पहाड़ी शृंखलाएँ पर्यावरणीय संरक्षण से वंचित हो सकती हैं।
- विशेषज्ञ समिति का प्रस्ताव: SC ने एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा है, जो वर्तमान परिभाषा से बाहर किये गए क्षेत्रों में सतत या विनियमित खनन के अल्पकालिक और दीर्घकालिक पारिस्थितिक प्रभावों का आकलन करेगी।
अरावली पर्वतमाला
- परिचय: यह विश्व की सबसे प्राचीन वलित पर्वत प्रणालियों में से एक है, जो प्रोटेरोज़ोइक युग की है और एक प्राचीन, अत्यधिक क्षयित पर्वत प्रणाली का क्लासिक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
- भौगोलिक विस्तार: यह पर्वतमाला गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में तिरछे (उत्तर-पूर्व–दक्षिण-पश्चिम, 690–800 किमी) रूप में फैली हुई है।
- भू-आकृतिक विभाजन: अरावली को दो मुख्य खंडों में विभाजित किया गया है:
- सांभर–सिरोही शृंखला: दक्षिणी खंड, अधिक ऊँचा और वनाच्छादित, इसमें गुरु शिखर (सबसे ऊँचा शिखर, माउंट आबू, राजस्थान) शामिल है।
- सांभर-खेतड़ी शृंखला: उत्तरी खंड, निचला और अधिक क्षयित।
- जलवायु और पर्यावरणीय भूमिका: यह थार मरुस्थल के पूर्व दिशा में फैलाव के खिलाफ एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक बाधा का कार्य करता है, साथ ही भूजल पुनर्भरण और स्थानीय जलवायु नियंत्रण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- यह सिंधु और गंगा नदी प्रणालियों के बीच एक महत्त्वपूर्ण जलग्रहण क्षेत्र विभाजन का निर्माण करता है।
- नदी प्रवाह: बनास और साहिबी (यमुना की सहायक नदियाँ), लूनी नदी जो पश्चिम की ओर कच्छ के रण में बहती है (आंतरिक जल निकासी)।
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और पढ़ें: अरावली पहाड़ियों का संरक्षण |
रैपिड फायर
प्रलय मिसाइल
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने ओडिशा के तट से दूर एक ही लॉन्चर से स्वदेशी रूप से विकसित दो प्रलय मिसाइलों का सफल प्रक्षेपण किया।
- यह परीक्षण पिनाका लॉन्ग-रेंज गाइडेड रॉकेट और K-4 पनडुब्बी से लॉन्च की जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइल सहित मिसाइल परीक्षणों की एक तीव्र शृंखला का हिस्सा है, जो भारत के मिसाइल शस्त्रागार के आधुनिकीकरण और विविधता लाने पर ध्यान केंद्रित करने को दर्शाता है।
प्रलय मिसाइल:
- परिचय: यह एक ठोस प्रणोदक, सतह-से-सतह पर मार करने वाली, कम दूरी (150 किमी से 500 किमी) की, अर्द्ध-बैलिस्टिक मिसाइल है जिसकी पेलोड क्षमता 500 किलोग्राम से 1000 किलोग्राम है।
- वारहेड क्षमता: यह विभिन्न लक्ष्यों के विरुद्ध कई प्रकार के वारहेड ले जाने में सक्षम है और इसे मोबाइल लॉन्चर से लॉन्च किया जा सकता है।
- मार्गदर्शन और नेविगेशन: यह प्रणाली उच्च परिशुद्धता और उड़ान के दौरान उत्कृष्ट गतिशीलता सुनिश्चित करने के लिये एक उन्नत इनर्टियल नेविगेशन सिस्टम (INS) और रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) सीकर से सुसज्जित है।
- परिचालन संबंधी लाभ: इसके परिचालन संबंधी लाभों में सबसे महत्त्वपूर्ण इसका अर्द्ध-बैलिस्टिक प्रक्षेप वक्र है। उड़ान के दौरान कम ऊँचाई पर युद्धाभ्यास करने की क्षमता के कारण, इसे पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों की तुलना में इंटरसेप्ट करना या रोकना अत्यधिक कठिन हो जाता है।
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