भारतीय अर्थव्यवस्था
भारत के निर्यात में तीव्र वृद्धि
- 05 Mar 2026
- 131 min read
प्रिलिम्स के लिये: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26, मुक्त व्यापार समझौते (FTA), सक्रिय औषधि सामग्री (API), केंद्रीय बजट 2026-27, सेमीकंडक्टर, पीएम ई-ड्राइव योजना, रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020, रक्षा खरीद मैनुअल (DMP) 2025, वैश्विक क्षमता केंद्र (GCC), SEZ, उत्पत्ति के नियम, कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM), महत्त्वपूर्ण खनिज, निर्यात संवर्द्धन मिशन।
मेन्स के लिये: भारत के निर्यात प्रदर्शन से संबंधित प्रमुख तथ्य, भारत के निर्यात को बढ़ावा देने के लिये उठाए गए कदम, भारत के निर्यात क्षेत्र के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ तथा उन्हें सुदृढ़ करने के उपाय।
स्रोत: पीआईबी
चर्चा में क्यों?
भारत का बढ़ता निर्यात महामारी के उपरांत इसके आर्थिक पुनरुत्थान को परिभाषित करता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने इस वृद्धि को “विश्व के लिये ईर्ष्या का विषय” बताया है, जिसे मज़बूत बैंकिंग प्रणाली, पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार तथा चालू खाता का समर्थन प्राप्त है।
- लक्षित आयात प्रतिस्थापन द्वारा मज़बूत हुई यह निर्यात गति वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में भारत के प्रतिस्पर्द्धात्मक एकीकरण को सुनिश्चित करती है।
सारांश
- भारत का कुल निर्यात अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच 720.76 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, जो वैश्विक चुनौतियों के बावजूद 6.15% की वृद्धि को दर्शाता है।
- इलेक्ट्रॉनिक्स तीसरा सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र बनकर उभरा, जबकि रक्षा निर्यात 23,622 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच गया।
- हालाँकि अमेरिका के शुल्क तथा यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) जैसी चुनौतियाँ 25,060 करोड़ रुपये के निर्यात संवर्द्धन मिशन के माध्यम से रणनीतिक हस्तक्षेपों की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।
भारत के निर्यात प्रदर्शन से संबंधित प्रमुख तथ्य क्या हैं?
- समग्र निर्यात प्रदर्शन: भारत का कुल निर्यात (वस्तुएँ तथा सेवाएँ मिलाकर) अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच अनुमानतः 720.76 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। यह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 6.15% की वृद्धि को दर्शाता है, जो वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद प्राप्त हुई है।
- निर्यात विविधीकरण: निर्यात उत्पाद विविधता के संदर्भ में भारत वैश्विक स्तर पर शीर्ष 5 में तथा व्यापार भागीदार विविधता के मामले में शीर्ष 3 देशों में शामिल है। इससे भारत को वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव तथा आपूर्ति शृंखला व्यवधानों का बेहतर सामना करने में सहायता मिलती है।
- क्षेत्रीय प्रदर्शन:
- पेट्रोलियम उत्पाद: भारत परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों का विश्व का 7वाँ सबसे बड़ा निर्यातक है तथा वैश्विक स्तर पर शीर्ष 5 परिष्करण देशों में शामिल है।
- इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ: इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात वित्त वर्ष 2022 में 7वें सबसे बड़े निर्यात क्षेत्र से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में तीसरे सबसे बड़े तथा सबसे तीव्र गति से बढ़ने वाले क्षेत्र के रूप में उभरा है। यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र बनने की दिशा में अग्रसर है।
- स्मार्टफोन निर्यात वित्त वर्ष 2025–26 के पहले पाँच महीनों में 1 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 55% अधिक है।
- औषधि तथा रसायन: औषधि निर्यात के मूल्य के आधार पर भारत वैश्विक स्तर पर 11वें स्थान पर है तथा इसका वैश्विक बाज़ार में लगभग 3% हिस्सा है। चिकित्सा उपकरण निर्यात वित्त वर्ष 2021 के 2.5 अरब डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 4.1 अरब डॉलर तक पहुँच गया।
- वस्त्र निर्यात: वस्त्र तथा परिधान निर्यात के मामले में भारत वैश्विक स्तर पर छठा सबसे बड़ा निर्यातक है तथा इसका वैश्विक बाज़ार में लगभग 4% हिस्सा है। वस्त्र तथा परिधान निर्यात (हस्तशिल्प सहित) वित्त वर्ष 2024 के 35.87 अरब डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 37.75 अरब डॉलर हो गया।
- ऑटोमोबाइल निर्यात: कुल ऑटोमोबाइल निर्यात वित्त वर्ष 2021 की 4,131 हज़ार इकाइयों से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 5,357 हज़ार इकाइयों तक पहुँच गया, जो भारत में निर्मित वाहनों की वैश्विक मांग में वृद्धि को दर्शाता है।
- रक्षा निर्यात: वित्त वर्ष 2024–25 में रक्षा निर्यात 23,622 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच गया (जबकि वर्ष 2014 में यह 1,000 करोड़ रुपये से भी कम था)। भारतीय रक्षा उत्पाद अब संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्राँस और आर्मेनिया सहित 100 से अधिक देशों को निर्यात किये जा रहे हैं। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2029 तक रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये तक पहुँचाना है।
- सेवा निर्यात: वित्त वर्ष 2025 में भारत का सेवा निर्यात 387.5 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच गया, जिसमें 188.8 अरब डॉलर का व्यापार अधिशेष दर्ज किया गया।
- व्यापारिक साझेदार और व्यापार समझौते: पिछले 3 वर्षों में भारत ने 38 देशों के साथ 9 मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) पर हस्ताक्षर किये हैं। इससे भारत को ऐसे बाज़ारों में शून्य शुल्क पहुँच प्राप्त हुई है, जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 70% का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- इस रणनीति का उद्देश्य व्यापार संबंधों का विविधीकरण करना तथा किसी एक बाज़ार पर निर्भरता कम करना है।
भारत के निर्यात को बढ़ावा देने के लिये क्या उपाय किये गए हैं?
- उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ:
- ऑटोमोबाइल तथा ऑटो घटक उद्योग के लिये PLI योजना: यह योजना उन्नत ऑटोमोटिव प्रौद्योगिकी (AAT) वाले उच्च-मूल्य वाहनों तथा उत्पादों को बढ़ावा देती है। सितंबर 2025 तक इसने 35,657 करोड़ रुपये के संचयी निवेश आकर्षित किये हैं।
- थोक दवाओं के लिये PLI: इसका उद्देश्य आयातित सक्रिय औषधि सामग्री (API), मुख्य प्रारंभिक पदार्थ (KSM) तथा औषधि मध्यवर्ती उत्पादों पर निर्भरता को कम करना है। इसके माध्यम से 26 महत्त्वपूर्ण उत्पादों के लिये 55,000 मीट्रिक टन वार्षिक विनिर्माण क्षमता विकसित की गई है।
- निर्यात प्रोत्साहन मिशन (EPM): निर्यात पारिस्थितिक तंत्र को सुदृढ़ करने, सुलभ व्यापार वित्त तक पहुँच में सुधार करने और वैश्विक बाज़ार की तैयारी को बढ़ाने के लिये वित्त वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक कुल 25,060 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ इसे स्वीकृति दी गई थी। यह योजना दो उप-योजनाओं, अर्थात् निर्यात प्रोत्साहन और निर्यात दिशा के माध्यम से संचालित होती है। निर्यात को बढ़ावा देने के लिये EPM के प्रमुख हस्तक्षेपों में शामिल हैं:
- ई-कॉमर्स ऋण सहायता: 90% गारंटी के साथ 50 लाख रुपये तक की प्रत्यक्ष सुविधा; 75% गारंटी के साथ 5 करोड़ रुपये तक की विदेशी सुविधा।
- TRACE (व्यापार विनियम, प्रत्यायन और अनुपालन सक्षमता): अनुपालन लागत का 60-75% प्रतिपूर्ति करता है, जो प्रति वर्ष प्रति IEC 25 लाख रुपये तक सीमित है।
- FLOW (लॉजिस्टिक्स, ओवरसीज़ वेयरहाउसिंग और फुलफिलमेंट की सुविधा): ओवरसीज़ वेयरहाउसिंग के लिये स्वीकृत परियोजना लागत का 30% तक।
- LIFT (लॉजिस्टिक्स इंटरवेंशन फॉर फ्रेट एंड ट्रांसपोर्ट): कम निर्यात-गहनता वाले ज़िलों में माल ढुलाई लागत के 30% तक की प्रतिपूर्ति करता है, जो प्रति वर्ष प्रति IEC 20 लाख रुपये तक सीमित है।
- INSIGHT (व्यापार खुफिया एवं सुविधा हेतु एकीकृत सहायता): क्षमता निर्माण और व्यापार खुफिया जानकारी के लिये परियोजना लागत का 50-100% तक।
- सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण पहल:
- इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS): वर्ष 2025 में 40,000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ अधिसूचित इस योजना का उद्देश्य भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं के साथ एकीकृत करना है।
- इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0: केंद्रीय बजट 2026–27 में प्रारंभ यह मिशन उद्योग-नेतृत्व वाले अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास तथा कुशल कार्यबल निर्माण पर केंद्रित है, विशेषकर सेमीकंडक्टर निर्माण, असेंबली, परीक्षण तथा चिप डिज़ाइन में।
- सीमा शुल्क और कराधान उपाय: केंद्रीय बजट 2026-27 में विमानन पुर्जों, लिथियम-आयन सेल निर्माण और रक्षा एवं नागरिक विमानन घटकों पर सीमा शुल्क कम किया गया है ताकि एयरोस्पेस, इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग और ऊर्जा भंडारण हार्डवेयर के विनिर्माण लागत को कम किया जा सके।
- क्षेत्र-विशिष्ट निर्यात प्रोत्साहन: पीएम ई-ड्राइव योजना इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहनों के लिये मांग प्रोत्साहन प्रदान करती है, ई-ट्रकों और ई-एंबुलेंस को समर्थन देती है और चार्जिंग अवसंरचना के लिये धन उपलब्ध कराती है।
- भारत में इलेक्ट्रिक यात्री कारों के निर्माण को बढ़ावा देने की योजना (SMEC) घरेलू और निर्यात बाज़ारों के लिये इलेक्ट्रिक कार निर्माण को बढ़ावा देती है।
- रक्षा निर्यात संवर्द्धन: रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020 तथा रक्षा खरीद मैनुअल (DPM) 2025 के माध्यम से गति, पारदर्शिता, नवाचार तथा आत्मनिर्भरता को सुनिश्चित किया जा रहा है।
- उत्तर प्रदेश रक्षा औद्योगिक गलियारा (UPDIC) और तमिलनाडु रक्षा औद्योगिक गलियारा (TNDIC) ने अक्तूबर 2025 तक 9,145 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश आकर्षित किये हैं।
- अवसंरचना और पारिस्थितिक तंत्र विकास: पूंजीगत वस्तुओं और कंटेनर विनिर्माण के लिये अवसंरचना तथा पारिस्थितिक तंत्र को मज़बूत करने हेतु केंद्रीय बजट 2026–27 में रेयर अर्थ कॉरिडोर, केमिकल पार्क और बायोफार्मा शक्ति (SHAKTI) जैसी पहलों की घोषणा की गई।
- सेवा निर्यात संवर्द्धन: वैश्विक क्षमता केंद्र (GCCs) के तीव्र विस्तार से सेवा निर्यात को बढ़ावा मिल रहा है, जिसे SEZ के कर प्रोत्साहनों का समर्थन प्राप्त है। इसके साथ ही AI कौशल प्रसार में भारत की वैश्विक स्तर पर दूसरी रैंकिंग भी इस क्षेत्र की वृद्धि को गति दे रही है।
भारत के निर्यात क्षेत्र के सामने मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?
- उच्च टैरिफ और संरक्षणवाद: वर्ष 2025 में अमेरिकी प्रशासन द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50% तक टैरिफ लगाए जाने से अमेरिका को होने वाले कुल निर्यात में 22% की गिरावट दर्ज की गई। इससे प्रभावित क्षेत्रों में झींगा (एंटी-डंपिंग ड्यूटी के कारण मात्रा में 15% गिरावट), वस्त्र क्षेत्र (10% संकुचन) तथा इस्पात शामिल हैं।
- हालाँकि फरवरी 2026 से शुरू हुए एक अंतरिम भारत-अमेरिका व्यापार समझौते ने अधिकांश वस्तुओं पर पारस्परिक टैरिफ को 50% से घटाकर 18% कर दिया है, लेकिन इसके बावजूद संरक्षणवाद की प्रवृत्ति अभी भी बनी हुई है।
- गैर-शुल्क बाधाएँ और जलवायु-संबंधी चुनौतियाँ: निर्यातक, विशेष रूप से सूक्ष्म और लघु उद्यम (SMEs) मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के तहत जटिल गैर-टैरिफ बाधाएँ से जूझ रहे हैं। इनमें उत्पत्ति के नियम की कड़ी आवश्यकताएँ, उच्च दस्तावेज़ीकरण लागत, ऑडिट जोखिम और सीमा शुल्क की असंगत व्याख्यायाएँ शामिल हैं।
- इन चुनौतियों को और बढ़ाते हुए यूरोपीय यूनियन (EU) का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM), जो वर्ष 2026 से लागू हो रहा है, इस्पात, एल्यूमिनियम और सीमेंट के भारतीय निर्यात पर कार्बन कर लगाएगा, जिससे लागत बढ़ने और यूरोपीय बाज़ार में प्रतिस्पर्द्धात्मकता घटने की संभावना है।
- विविधीकरण की चुनौतियाँ: भारत का निर्यात पोर्टफोलियो अभी भी अमेरिका की ओर झुका हुआ है, जहाँ कुल निर्यात का लगभग 18% हिस्सा जाता है। यह स्थिति भारत को अमेरिकी बाज़ार में होने वाली उथल-पुथल के प्रति संवेदनशील बनाती है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में वैश्विक मांग में गिरावट और मुद्रा में उतार-चढ़ाव निर्यात के विविधीकरण के प्रयासों में लगातार बाधा डाल रहे हैं।
- आपूर्ति शृंखला की संवेदनशीलता: भू-राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से मध्य पूर्व में, जो भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग 55% हिस्सा प्रदान करता है,भारत की ऊर्जा सुरक्षा और निर्यात लागत के लिये महत्त्वपूर्ण जोखिम उत्पन्न करता है। व्यापक भू-राजनीतिक संरेखण व्यापार को 'दक्षता' से हटाकर 'सुरक्षा' की ओर मोड़ रहे हैं, जिससे बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ रही है।
- वित्त वर्ष 2024-25 में भारत-GCC द्विपक्षीय व्यापार USD 178.56 बिलियन तक पहुँच गया, जो भारत के कुल वैश्विक व्यापार का 15.42% है। चूँकि विश्व का लगभग 20% तेल और गैस होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुज़रता है, इसलिये ईरान द्वारा इसकी घेराबंदी भारत में तेल तथा गैस की कीमतों में भारी उछाल का कारण बन सकती है।
- गहराता क्षेत्रीय दबाव: वियतनाम एवं बांग्लादेश जैसे देशों से बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा भारत के श्रम-गहन निर्यात क्षेत्रों को नुकसान पहुँचा रही है, जो पहले से ही संकट तथा रोज़गार की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। अमेरिका के साथ जटिल व्यापारिक वार्त्ताएँ, जिनमें पारस्परिक शुल्क पर विवाद शामिल हैं, जैसे– अमेरिकी कपास पर भारत द्वारा लगाया गया 11% शुल्क, इन उद्योगों के भविष्य को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना रहे हैं।
भारत के निर्यात क्षेत्र को मज़बूत करने हेतु क्या कदम उठाने की आवश्यकता है?
- नीतिगत ढाँचे को सुदृढ़ बनाना: संचालन को सुव्यवस्थित करने के लिये सीमा शुल्क और प्रमाणपत्रों को एकीकृत करने वाले AI-संचालित 'सिंगल विंडो 2.0' को क्रियान्वित किया जाना चाहिये। भारत को मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के पुनर्मूल्यांकन को तेज़ी से पूरा करना चाहिये ताकि उन असममित संरचनाओं को ठीक किया जा सके, जहाँ 2017-2022 के दौरान निर्यात में 31% की वृद्धि के मुकाबले आयात में 82% की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
- लॉजिस्टिक्स इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार: निर्यात की कुल लागत को 20-30% तक कम करने के लिये डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) को मेगा बंदरगाहों के साथ एकीकृत किया जाना चाहिये। इसके साथ ही निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्रों, मल्टी-मोडल पार्कों तथा कृषि निर्यात हेतु कोल्ड चेन सुविधाओं में निवेश को प्राथमिकता दी जानी चाहिये।
- सतत अनुपालन सुनिश्चित करना: स्टील, एल्यूमिनियम और सीमेंट पर यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र का मुकाबला करने हेतु एक राष्ट्रीय 'ग्रीन एक्सपोर्ट क्रेडिट' सुविधा विकसित की जानी चाहिये। साथ ही भारतीय उत्पादों की 'कार्बन-न्यूट्रल' ब्रांडिंग के लिये स्वदेशी कार्बन अकाउंटिंग फ्रेमवर्क स्थापित करना अनिवार्य है।
- विनिर्माण को पैमाना देना: संप्रभु औद्योगिक गलियारों के माध्यम से दुर्लभ खनिजों और सेमीकंडक्टर्स के लिये PLI 3.0 सहित उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI) का विस्तार किया जाना चाहिये। इसके अतिरिक्त महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल (केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित) जैसी पहलें ब्रांडिंग और प्रशिक्षण के माध्यम से हथकरघा जैसे पारंपरिक क्षेत्रों को वैश्विक बाज़ारों से जोड़ेंगी।
- डिजिटल विकास का लाभ उठाना: MSMEs को सशक्त बनाने के लिये ई-कॉमर्स खेप पर लगी 10 लाख रुपये की सीमा को हटाया जाना चाहिये। 'उत्पत्ति के नियमों' के सत्यापन के लिये ब्लॉकचेन-आधारित व्यापार प्लेटफॉर्म लागू किये जाने चाहिये। साथ ही समर्पित परिषदों के माध्यम से डिजिटल सेवाओं के निर्यात को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
- आपूर्ति शृंखला के जोखिमों को कम करना: कच्चे तेल, दुर्लभ खनिजों, लिथियम, कोबाल्ट और अन्य महत्त्वपूर्ण खनिजों जैसी उच्च-जोखिम वाली वस्तुओं का सक्रिय रूप से बफर स्टॉक स्थापित करना निर्यात क्षेत्र को अचानक होने वाली कमी या कीमतों में उतार-चढ़ाव से बचाने में मदद करता है।
निष्कर्ष
भारत का निर्यात क्षेत्र वैश्विक चुनौतियों के बीच 6.15% की मज़बूत वृद्धि दर्ज कर रहा है, जिसका श्रेय उद्योग विविधीकरण, PLI योजनाओं और 25,060 करोड़ रुपये की निर्यात संवर्द्धन मिशन को जाता है। हालाँकि अमेरिका के टैरिफ, यूरोपीय यूनियन का CBAM और भू-राजनीतिक जोखिम जैसी बाधाएँ बनी हुई हैं। वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता सुनिश्चित करने के लिये अवसंरचना सुधार, सततता अनुपालन एवं विविध व्यापार समझौतों पर ध्यान देना आवश्यक है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. ‘महामारी के बाद भारत का निर्यात क्षेत्र असाधारण लचीलापन दिखा रहा है।’ इस वृद्धि में योगदान देने वाले प्रमुख कारकों और उसकी स्थिरता को खतरे में डालने वाली प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारत का कुल निर्यात प्रदर्शन 2025-26 में क्या है?
अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच भारत का कुल निर्यात (माल और सेवाएँ) USD 720.76 बिलियन तक पहुँच गया, जो वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद 6.15% की वृद्धि दर्शाता है।
2. निर्यात संवर्द्धन मिशन (EPM) क्या है?
EPM एक प्रमुख योजना है जिसे ₹25,060 करोड़ के परिव्यय के साथ अनुमोदित (वित्त वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक) किया गया है। इसमें 'निर्यात प्रोत्साहन' और 'निर्यात दिशा' जैसी उप-योजनाएँ शामिल हैं, जिनका उद्देश्य निर्यात पारिस्थितिक तंत्र को मज़बूत करना और MSMEs को सहायता प्रदान करना है।
3. भारत की निर्यात वृद्धि को बढ़ावा देने वाले प्रमुख क्षेत्र कौन-से हैं?
भारत की निर्यात वृद्धि को बढ़ावा देने वाले प्रमुख क्षेत्र:
- इलेक्ट्रॉनिक्स: सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला क्षेत्र और तीसरा सबसे बड़ा निर्यात।
- पेट्रोलियम उत्पाद: वैश्विक स्तर पर 7वाँ सबसे बड़ा।
- फार्मास्यूटिकल्स: वैश्विक स्तर पर 11वाँ स्थान।
- रक्षा निर्यात: FY 25 में रिकॉर्ड 23,622 करोड़ रुपये।
- सेवा निर्यात: FY 25 में USD 387.5 बिलियन।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स
प्रश्न. फरवरी 2006 से प्रभाव में आए SEZ अधिनियम, 2005 के कुछ निर्धारित उद्देश्य हैं। इस संदर्भ में निम्नलिखित पर विचार कीजिये: (2010)
- अवसंरचना सुविधाओं का विकास।
- विदेशी स्रोतों से निवेश को बढ़ावा देना।
- केवल सेवाओं के निर्यात को बढ़ावा देना।
उपर्युक्त में से कौन से इस अधिनियम के उद्देश्य हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
प्रश्न. ‘बंद अर्थव्यवस्था’ एक ऐसी अर्थव्यवस्था है जिसमें: (2011)
(a) मुद्रा की आपूर्ति पूरी तरह से नियंत्रित होती है।
(b) घाटे का वित्तपोषण होता है।
(c) केवल निर्यात होता है।
(d) न तो निर्यात और न ही आयात होता है।
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न. "सुधारोत्तर अवधि में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की समग्र संवृद्धि में औद्योगिक संवृद्धि दर पिछड़ती गई है।" कारण बताइये। औद्योगिक-नीति में हाल में किये गए परिवर्तन औद्योगिक संवृद्धि दर को बढ़ाने में कहाँ तक सक्षम हैं ? (2017)
प्रश्न. श्रम-प्रधान निर्यातों के लक्ष्य को प्राप्त करने में विनिर्माण क्षेत्रक की विफलता के कारण बताइये। पूंजी-प्रधान
निर्यातों की अपेक्षा अधिक श्रम-प्रधान निर्यातों के लिये उपायों को सुझाइये। (2017)