प्रश्न: वैश्विक व्यापार के विखंडन के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करने में भारत-EU FTA की भूमिका पर चर्चा कीजिये। (250 शब्द)
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत भारत-यूरोपीय संघ (EU) मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के हालिया हस्ताक्षर को रेखांकित करते हुए कीजिये।
- मुख्य भाग में तर्क दीजिये कि यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को कैसे सुदृढ़ करता है।
- इसके बाद उन चुनौतियों का उल्लेख कीजिये जो स्वायत्तता को बाधित कर सकती हैं।
- लाभों को अधिकतम करने के उपाय सुझाएँ।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
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परिचय:
भारत-यूरोपीय संघ (EU) मुक्त व्यापार समझौता (FTA) वर्षों की ठहराव की स्थिति से रणनीतिक पुनर्संरेखण की दिशा में एक निर्णायक बदलाव का संकेत देता है। खंडित आपूर्ति शृंखलाओं और गुटीय राजनीति के दौर में व्यापार को भू-राजनीतिक स्थिरता के उपकरण के रूप में स्थापित करते हुए यह FTA केवल व्यावसायिक समझौता नहीं, बल्कि दोनों भागीदारों के लिये अनुकूलन, विविधीकरण तथा रणनीतिक स्वायत्तता को बढ़ावा देने वाला एक भू-आर्थिक साधन है।
मुख्य भाग:
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करने में भारत–EU FTA की भूमिका
- बाज़ार विविधीकरण और निर्भरता में कमी: प्रतिबंधों और व्यापार के हथियारबंद उपयोग के समय में यह FTA भारत को विश्व के सबसे बड़े एकल बाज़ार तक प्राथमिक पहुँच सुनिश्चित करता है, जिससे किसी एक भौगोलिक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता घटती है।
- द्विपक्षीय व्यापार $136 बिलियन तक पहुँचने और FTA से अतिरिक्त $75 बिलियन निर्यात खुलने की संभावना के साथ, भारत को बाहरी आघातों तथा दबावपूर्ण व्यापार प्रथाओं से आर्थिक सुरक्षा मिलती है।
- आपूर्ति-शृंखला अनुकूलन और जोखिम-न्यूनन (डी-रिस्किंग): यह FTA चीन-केंद्रित मूल्य शृंखलाओं से ‘डिकप्लिंग’ किये बिना जोखिम घटाने की भारत की रणनीति के अनुरूप है।
- उत्पाद-विशिष्ट उत्पत्ति नियम और चरणबद्ध/संतुलित शुल्क उदारीकरण भारतीय कंपनियों को EU-केंद्रित वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में शामिल होने की अनुमति देते हैं, साथ ही इनपुट स्रोतों में अनुकूलन बनाए रखते हैं जिससे अलगाव नहीं बल्कि विविधीकरण के माध्यम से स्वायत्तता मज़बूत होती है।
- नियम-निर्माण में रणनीतिक प्रभाव: सततता, प्रौद्योगिकी और मानकों में सहयोग के साथ व्यापार को जोड़कर यह FTA भारत को केवल नियम अपनाने वाला बनने के बजाय भीतर से नियम-निर्माण की प्रक्रिया में भाग लेने में सक्षम बनाता है।
- कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (CBAM) के तहत अनुकूल प्रावधानों पर MFN आश्वासन भारत को विकासात्मक हितों की रक्षा करते हुए जलवायु-व्यापार के समन्वय पर बातचीत करने का अवसर देता है।
- प्रौद्योगिकी, गतिशीलता और उच्च-गुणवत्ता निवेश: यह समझौता केवल शुल्कों तक सीमित न रहकर सेवाओं, पेशेवर गतिशीलता और प्रौद्योगिकी सहयोग को भी शामिल करता है।
- IT, पेशेवर सेवाओं और शिक्षा में प्रतिबद्धताएँ, साथ ही पूर्वानुमेय गतिशीलता ढाँचे (ICTs, CSS, IPs), भारत की मानव-पूंजी शक्ति को बढ़ाते हैं और किसी एक प्रौद्योगिकी पारितंत्र पर निर्भरता कम करते हैं।
- बहुध्रुवीय व्यवस्था में बहु-संरेखण को सुदृढ़ करना: यह FTA भारत की व्यापक बहु-संरेखण रणनीति का पूरक है, जो EU के साथ संबंध मज़बूत करता है और साथ ही अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता के संदर्भ में स्वायत्तता बनाए रखता है।
- भारत और EU दोनों ही संप्रभुता, अनुकूलन और मुद्दा-आधारित गठबंधनों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे वे बहुध्रुवीय विश्व में स्थिरीकरण करने वाली मध्य शक्ति के रूप में अपनी स्थिति स्थापित करते हैं।
चुनौतियाँ जो रणनीतिक स्वायत्तता को सीमित कर सकती हैं
- CBAM के माध्यम से हरित संरक्षणवाद: आश्वासनों के बावजूद, CBAM भारतीय निर्यात पर 20-35% अतिरिक्त लागत लगाकर वस्तुतः एक व्यापार बाधा के रूप में कार्य कर सकता है, जिससे शुल्क लाभ निरस्त होने और ‘साझा लेकिन विभेदित ज़िम्मेदारियाँ’ (Common But Differentiated Responsibilities) के सिद्धांत पर आधारित नीतिगत गुंजाइश सीमित हो सकती है।
- डिजिटल संप्रभुता और डेटा शासन में अंतराल: EU के GDPR और भारत के DPDP अधिनियम, 2023 के बीच विशेष रूप से राज्य को दी गई व्यापक छूट एवं स्वतंत्र नियामक के अभाव के कारण डेटा पर्याप्तता में देरी हुई है, जिससे भारतीय IT कंपनियों के लिये अनुपालन लागत बढ़ती है तथा उच्च-मूल्य डिजिटल व्यापार में लाभ सीमित हो जाते हैं।
- भू-राजनीतिक और बहुपक्षीय तनाव: रूस-यूक्रेन, WTO सब्सिडी नियम (MSP और सार्वजनिक भंडारण) और MFN एवं S&DT मानदंडों को कमज़ोर करने के EU प्रयासों पर मतभेद निरंतर तनाव को दर्शाते हैं, जो व्यापार सहयोग में हस्तक्षेप कर सकते हैं।
रणनीतिक स्वायत्तता के लाभ अधिकतम करने के उपाय
- हरित समतुल्यता ढाँचा: भारत के कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना को EU ETS के साथ सामंजस्य स्थापित करें, ताकि कार्बन भुगतान भारत में ही बना रहे और EU मानकों को पूरा किया जा सके।
- क्षेत्रीय डेटा पर्याप्तता सैंडबॉक्स: GDPR-अनुरूप डेटा एंक्लेव (जैसे GIFT सिटी) बनाएँ, जिससे उच्च-मूल्य डेटा सेवाएँ दी जा सकें, बिना राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किये।
- तृतीय-बाज़ार सह-निर्माण: अफ्रीका और इंडो-पैसिफिक में भारत की कार्यान्वयन क्षमता के साथ EU पूंजी (ग्लोबल गेटवे) का संयोजन करें, ताकि द्विपक्षीय तनावों से ध्यान हटाकर साझा वैश्विक परिणामों पर ध्यान केंद्रित किया जा सके।
- महत्त्वपूर्ण कच्चे माल की साझेदारी: खरीदार-विक्रेता मॉडल से हटकर संयुक्त-प्रसंस्करण मॉडल अपनाएँ, जिसमें भारत में तकनीकी हस्तांतरण और मूल्य संवर्द्धन सुनिश्चित हो।
निष्कर्ष
भारत-EU FTA भारत की व्यापार रणनीति में निर्भरता से सचेत विविधीकरण की ओर एक बदलाव का प्रतीक है, जिसमें आर्थिक सहभागिता का उपयोग कमज़ोरियों को बढ़ाने के बजाय अनुकूलन बढ़ाने के लिये किया जाता है। एक भरोसेमंद, लेकिन उन्मुक्त साझेदारी के भीतर भारत को स्थापित करके यह समझौता उसकी क्षमता को सुदृढ़ करता है कि वह खंडित आपूर्ति शृंखलाओं में कुशलता से मार्गदर्शन कर सके, बदलते व्यापार मानकों को प्रभावित कर सके और वैश्विक विवादित अर्थव्यवस्था में रणनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए विकास कर सके।