अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता 2026
- 03 Feb 2026
- 105 min read
प्रिलिम्स के लिये: भारत-अमेरिका कॉम्पैक्ट, डेटा स्थानीयकरण, यूएस-भारत iCET, सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश
मेन्स के लिये: भारत–अमेरिका व्यापार संबंधों का रणनीतिक महत्त्व, शुल्क युक्तीकरण और निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता, रणनीतिक स्वायत्तता बनाम लेन-देन आधारित कूटनीति
चर्चा में क्यों?
अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर प्रभावी शुल्क को 50% की उच्चतम सीमा (जिसमें दंडात्मक शुल्क भी शामिल थे) से घटाकर 18% कर दिया है। यह समझौता व्यापार तनावों में रणनीतिक कमी को दर्शाता है और भारत की मुख्य अमेरिकी सहयोगी के रूप में भूमिका तथा हिंद-प्रशांत में चीन के विरुद्ध महत्त्वपूर्ण संतुलन बनाने वाली भूमिका को पुनः पुष्टि करता है।
भारत–अमेरिका व्यापार समझौते की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
- शुल्क में कमी: अमेरिका ने भारतीय आयात पर पारस्परिक शुल्क को 25% से घटाकर 18% कर दिया है।
- महत्त्वपूर्ण रूप से अतिरिक्त 25% दंडात्मक शुल्क (जो अगस्त 2025 में भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद के कारण लगाया गया था) को प्रभावी रूप से हटा दिया गया है, जिससे कुल प्रभावी शुल्क लगभग 50% से घटकर 18% हो गया है।
- भारत की प्रतिबद्धताएँ:
- ऊर्जा में परिवर्तन: एक महत्त्वपूर्ण कूटनीतिक समझौते के तहत भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद को रोकने या कम करने पर सहमति जताई है।
- भारत अपनी ऊर्जा खरीद को अमेरिका और संभावित रूप से वेनेज़ुएला की ओर केंद्रित करेगा।
- बाज़ार तक पहुँच: भारत अमेरिकी वस्तुओं पर अपने शुल्क और गैर-शुल्क अवरोधों को “शून्य” करने की उम्मीद कर रहा है।
- अमेरिका को उम्मीद है कि कृषि निर्यात (जैसे– ट्री नट्स, कपास और सोयाबीन तेल) भारत के बड़े उपभोक्ता बाज़ार में तेज़ी से बढ़ेंगे।
- ‘बाय अमेरिकन’ पॉलिसी: भारत ने सरकारी तथा बड़े पैमाने की औद्योगिक खरीद प्रक्रियाओं में ‘बाय अमेरिकन’ दृष्टिकोण को और सुदृढ़ करने का आश्वासन दिया है।
- भारत अमेरिका से ऊर्जा, कोयला, प्रौद्योगिकी, कृषि और अन्य उत्पादों की 500 अरब अमेरिकी डॉलर तक की खरीद कर सकता है।
- ऊर्जा में परिवर्तन: एक महत्त्वपूर्ण कूटनीतिक समझौते के तहत भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद को रोकने या कम करने पर सहमति जताई है।
भारत–अमेरिका शुल्क (टैरिफ) विकास की पृष्ठभूमि
18% शुल्क तक पहुँचने का रास्ता आक्रामक “लेन-देन आधारित कूटनीति” से चिह्नित रहा:
- ‘टैरिफ किंग’ की धारणा: अमेरिका लंबे समय से भारत के उच्च आयात शुल्कों की आलोचना करता रहा है। 2025 के मध्य में अमेरिका ने भारत की औसत शुल्क दरों के अनुरूप 25% पारस्परिक टैरिफ लागू किया।
- रूसी तेल विवाद: यूक्रेन संघर्ष के दौरान भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की निरंतर खरीद के कारण अमेरिका ने अगस्त 2025 में 25% का दंडात्मक अतिरिक्त शुल्क लगाया, जिससे कुल शुल्क बढ़कर 50% हो गया।
- ऑपरेशन सिंदूर और क्षेत्रीय प्रभाव: खबरों के अनुसार, अमेरिका ने पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों के खिलाफ भारत के 'ऑपरेशन सिंदूर' (मई 2025) के बाद क्षेत्रीय स्थिरता के लिये टैरिफ दबाव को एक रणनीतिक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया और बाद में दावा किया कि व्यापारिक दबाव ने युद्धविराम को आगे बढ़ाने में मदद की।
- समझौते से पूर्व भारत की पहल: संबंधों में सुधार के उद्देश्य से भारत ने केंद्रीय बजट में भारी मोटरसाइकिलों और बर्बन व्हिस्की जैसे उत्पादों पर शुल्क में कटौती की थी तथा परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को खोलने के लिये शांति अधिनियम, 2025 को मंज़ूरी दी थी।
भारत-अमेरिका व्यापार संबंध
- वित्त वर्ष 2024–25 (FY 25) में भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड 132 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, जबकि FY 24 में यह 119.71 अरब अमेरिकी डॉलर था। FY 25 में भारत को अमेरिका के साथ व्यापार में 40.82 अरब अमेरिकी डॉलर का अधिशेष प्राप्त हुआ।
- वित्तवर्ष 2024–25 (FY 25) में अमेरिका से भारत के आयात में मुख्य रूप से खनिज ईंधन और तेल, कीमती एवं अर्द्ध-कीमती पत्थर तथा धातुएँ, परमाणु रिएक्टर व मशीनरी एवं विद्युत उपकरण शामिल थे।
- अमेरिका को भारत के निर्यात में मुख्य रूप से विद्युत मशीनरी, कीमती एवं अर्द्ध-कीमती पत्थर और धातुएँ, औषधि उत्पाद, मशीनरी तथा यांत्रिक उपकरण, खनिज ईंधन एवं लौह और इस्पात से बने उत्पाद शामिल थे।
- अमेरिका भारत में तीसरा सबसे बड़ा निवेशक है, जहाँ वर्ष 2000 से 2025 के बीच विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के रूप में कुल 70.65 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश आया है।
- भारत-अमेरिका कॉम्पैक्ट को 2025 में लॉन्च किया गया। इस ढाँचे के तहत ‘मिशन 500’ पहल शुरू की गई, जिसका उद्देश्य 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाना है, जिसे द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) के लिये वार्त्ता द्वारा समर्थन प्राप्त है।
भारत-अमेरिका टैरिफ सुधार का महत्त्व क्या है?
भारत संबंधी
- भारतीय निर्यात को बढ़ावा: 18% तक की कटौती भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्द्धात्मकता को पुनः स्थापित करती है। वस्त्र और परिधान जैसे क्षेत्र (जो अल्प लाभ अर्जित करते हैं) तथा फार्मास्यूटिकल्स में ऑर्डर में त्वरित सुधर की संभावना है।
- प्रतिस्पर्द्धात्मक बढ़त: 18% दर पर भारत अब क्षेत्रीय प्रतिस्पर्द्धियों, जैसे– वियतनाम (20%), बांग्लादेश (20%) और चीन (30–35%) की तुलना में अधिक अनुकूल दर का सामना करता है।
- आर्थिक स्थिरता: इस समझौते से व्यापार युद्ध की अनिश्चितता का समाधान होता है, जिससे रुपये का स्थिरीकरण होने की संभावना है और FDI भारतीय विनिर्माण में पुनः निवेशित हो सकता है।
अमेरिका संबंधी
- नाभिकीय एवं प्रौद्योगिकी निर्यात: यह समझौता अमेरिकी कंपनियों के लिये भारत के नाभिकीय ऊर्जा क्षेत्र (शांति अधिनियम, 2025 द्वारा समर्थकृत) और रक्षा विनिर्माण में प्रवेश करने का मार्ग प्रशस्त करता है।
- इससे "क्रिटिकल और उभरती प्रौद्योगिकी पर अमेरिका-भारत पहल" (iCET) का सुदृढ़ीकरण होता है।
- डेटा सेंटर प्रभुत्व: जैसा कि केंद्रीय बजट 2026–27 में प्रस्तुत किया गया, भारत में डेटा सेंटर स्थापित करने वाली विदेशी कंपनियों के लिये कर मुक्तता अवधि की सुविधा प्रत्यक्ष रूप से अमेरिका की प्रौद्योगिकी कंपनियों, जैसे– गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेज़ॅन को लाभ पहुँचाती है, जिससे भारत के डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर में उनका प्रभुत्व बढ़ता है।
- ऊर्जा निर्यात: वित्तीय वर्ष 2025 में भारत की कच्चे तेल की आयात निर्भरता बढ़कर 88.2% हो गई, जबकि FY 24 और FY 23 में यह क्रमशः 87.4% और 85.5% थी।
- भारत के रूस से दूरी बनाने के साथ अमेरिकी ऊर्जा क्षेत्र (तेल, LNG, कोयला) को एक विशाल और दीर्घकालिक उपभोक्ता प्राप्त होता है। इससे प्रत्यक्षतया अमेरिकी शेल ऑयल उत्पादक और LNG निर्यातक लाभान्वित होते हैं।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते 2026 की चुनौतियाँ क्या हैं?
- "रणनीतिक स्वायत्तता" की दुविधा: इस समझौते की सफलता इस पर निर्भर है कि भारत रूस से तेल आयात बंद करे या उसमें काफी कमी करे। इससे मॉस्को के साथ "विशिष्ट और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी" के प्रभावित होने का खतरा है, जो भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्त्ता बना हुआ है।
- यह भारत की डी-हाईफेनेटेड विदेश नीति के समक्ष विद्यमान चुनौती को भी रेखांकित करता है, जो किसी एक शक्ति गुट के साथ विशेष रूप से गठबंधन करने के बजाय स्वतंत्र, बहु-संरेखित संबंध बनाए रखने पर आधारित है।
- लेन-देन संबंधी कूटनीति: समझौते की "पारस्परिक" प्रकृति (टैरिफ को 18% तक बराबर करना) से स्पष्ट होता है कि अमेरिका अब भारत को विशुद्ध रूप से लेन-देन की दृष्टि से देखता है।
- इससे यह उदाहरण स्थापित हो सकता है कि हर रणनीतिक रियायत के लिये भारी आर्थिक या राजनीतिक "प्रतिफल" की आवश्यकता होगी।
- चीन की जवाबी कार्रवाई: भारत का "चीन के प्रतिस्पर्द्धी" के रूप में अपनी भूमिका को सुदृढ़ करने के साथ ही बीजिंग ने पहले ही इसके परिणामों की चेतावनी दे दी है।
- भारत की आयात के मामले में चीन पर निर्भरता को देखते हुए (विशेष रूप से दुर्लभ मृदा तत्त्वों और API फार्मास्यूटिकल्स) चीन की ओर से किसी भी प्रकार की जवाबी व्यापार बाधा भारतीय विनिर्माण को प्रभावित कर सकती है।
- क्षेत्रीय समानता: भारत अभी भी नुकसान में है क्योंकि बांग्लादेश और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्द्धी देशों को लगभग 5% की विशेष GSP (सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली) रियायत प्राप्त है, जिसे 2019 में भारत के लिये समाप्त कर दिया गया था, जिससे वास्तविक क्षेत्रीय समानता पर संदेह उत्पन्न होता है।
- आर्थिक जोखिम: अमेरिका ने दावा किया है कि भारत ने टैरिफ को "शून्य" करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है। भारत के डेयरी और पोल्ट्री क्षेत्रों को अत्यधिक सब्सिडी वाले अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिये खोलने से व्यापक ग्रामीण संकट और किसान विरोध प्रदर्शन हो सकते हैं, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से संरक्षण प्राप्त रहा है।
- रूस से तेल का क्रय छूट पर किया गया था, जो वैश्विक मुद्रास्फीति के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता था। अमेरिका या वेनेज़ुएला से तेल की खरीद करने से भारत के आयात बिल में वृद्धि हो सकती है, जो चालू खाता घाटे (CAD) को प्रभावित कर सकता है।
- नियामक और तकनीकी बाधाएँ: कम टैरिफ के बावज़ूद, अमेरिकी "सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी" (SPS) मानक प्रायः भारतीय खाद्य और फार्मा निर्यात के लिये अदृश्य दीवारों का कार्य करते हैं। हालाँकि यह समझौता इन तकनीकी बाधाओं को पूरी तरह से दूर नहीं करता है।
- यह समझौता अंततः भारत को अपने बौद्धिक संपदा कानूनों को अमेरिकी हितों के साथ संरेखित करने के लिये मजबूर कर सकता है, जिससे स्वास्थ्य सेवा लागत में वृद्धि होने की संभावना है।
- डिजिटल व्यापार: डेटा स्थानीयकरण और भारत के DPDP अधिनियम (2023) से संबंधित मुद्दे अभी भी विवाद के बिंदु बने हुए हैं। अमेरिकी तकनीकी दिग्गज "डेटा के मुक्त प्रवाह" की मांग करते हैं, जो भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा और गोपनीयता ढाँचों से मतभेद उत्पन्न करता है।
विकसित भारत के लिये 'भारत-अमेरिका व्यापार' का लाभ कैसे उठाना है?
- रणनीतिक स्वायत्तता और ऊर्जा संक्रमण का संतुलन: रूस से कच्चे तेल की आपूर्ति घटाकर अमेरिका की ओर शिफ्ट करने में सामरिक संरेखण की आर्थिक लागत को स्वीकार करना होगा।
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को तेज़ी से आगे बढ़ाते हुए परमाणु ऊर्जा, विशेषकर स्माल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR), का विस्तार किया जाए। प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिये व्यापार समझौतों का उपयोग कर राजकोषीय असंतुलन के बिना ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
- निर्यात बाज़ारों का विविधीकरण: भारत को खाड़ी देशों और पूर्वी एशियाई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों को तेज़ी से आगे बढ़ाना चाहिये, ताकि भारतीय उद्योग निर्यात बाज़ारों को विविध बना सकें और अमेरिकी खरीदारों पर निर्भरता कम कर सकें।
- घरेलू हितों की रक्षा: “शून्य शुल्क” प्रतिबद्धताओं को सावधानी से अंशांकन करना होगा, ताकि छोटे किसानों और MSME पर सस्ते अमेरिकी आयातों का अत्यधिक दबाव न पड़े।
- सेमीकंडक्टर एवं फार्मास्यूटिकल्स सप्लाई चैन इंटीग्रेशन में सुधार करने, निवेश को आकर्षित करने और अमेरिकी मानकों के अनुरूप विनियामक सामंजस्य के लिये द्विपक्षीय व्यापार समझौता (BTA) को शीघ्र अंतिम रूप दिया जाए।
- “फ्रेंडशोरिंग” का लाभ: 18% टैरिफ विंडो को अवसर के रूप में अपनाकर भारत को केवल असेंबली इन इंडिया से आगे बढ़ते हुए डीप मैन्युफैक्चरिंग की ओर कदम बढ़ाना चाहिये। अमेरिका के साथ बढ़ी निकटता का उपयोग करते हुए, चीन से स्थानांतरित हो रही आपूर्ति शृंखलाओं को आकर्षित किया जा सकता है और भारत को इस 18% टैरिफ को दुनिया के लिये “मेक इन इंडिया” के रूप में एक स्थिर वातावरण के रूप में प्रस्तुत करना चाहिये।
- कृषि आजीविकाओं की सुरक्षा के साथ व्यापार उदारीकरण: सभी उत्पादों पर एक समान शून्य-शुल्क की बजाय, उत्पाद-विशिष्ट सुरक्षा उपाय अपनाए जाएँ। गैर-निर्मित वस्तुओं की अपेक्षा प्रसंस्कृत एवं जैविक उत्पादों जैसे मूल्यवर्द्धित कृषि निर्यात को बढ़ावा दिया जाए।
- ग्रामीण विस्थापन को रोकना और किसानों के लिये अनुकूल व्यापार शर्तें सुनिश्चित की जाएँ।
- नवाचार-आधारित निर्यात को बढ़ावा: AI और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में सहयोग के लिये iCET फ्रेमवर्क का उपयोग किया जाए।
- उच्च प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में बौद्धिक संपदा मानकों को समन्वित करते हुए, फार्मा क्षेत्र में लोक-हित से संबंधित छूट को बरकरार रखे जाए। भारत को वैश्विक अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र के रूप में स्थापित कर ज्ञान-आधारित निर्यात को बढ़ावा दिया जाए।
निष्कर्ष
18% टैरिफ को एक रणनीतिक अवसर माना जा सकता है। भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अमेरिका के अनुकूल संबंधों का उपयोग कर आत्मनिर्भर भारत के लिये एक मज़बूत निर्माण आधार तैयार कर सके, जो भविष्य में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा कर सके — भले ही भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ पुनः बदल जाएँ।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. हाल ही में हुए भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से भारत के लिये उत्पन्न होने वाले अवसरों और जोखिमों का मूल्यांकन कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. वर्ष 2026 के व्यापार समझौते के तहत भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी प्रभावी टैरिफ दर क्या है?
प्रभावी टैरिफ घटाकर 18% कर दिया गया है, जो पहले लगभग 50% था, जिसमें 25% रेसीप्रोकल टैरिफ और 25% दंडात्मक टैरिफ शामिल थे।
2. अगस्त 2025 में भारत पर 25% दंडात्मक टैरिफ क्यों लगाया गया?
यूक्रेन संघर्ष के दौरान भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की निरंतर खरीद के कारण अमेरिका ने अतिरिक्त टैरिफ लगाया था।
3. 18% टैरिफ कटौती से भारतीय निर्यात के कौन-से क्षेत्र सबसे अधिक लाभान्वित होते हैं?
वस्त्र एवं परिधान, रत्न और आभूषण, फार्मास्यूटिकल्स तथा इंजीनियरिंग गुड्स जैसे कम मार्जिन पर कार्यरत क्षेत्र शीघ्र प्रतिस्पर्द्धात्मक बढ़त हासिल कर लेते हैं।
4. 18% टैरिफ की तुलना भारत के क्षेत्रीय प्रतिस्पर्द्धियों से कैसे होती है?
भारत अब वियतनाम और बांग्लादेश (20%) से कम टैरिफ का सामना कर रहा है और चीन (30-35%) से काफी कम, हालाँकि कुछ प्रतिस्पर्द्धी अभी भी GSP बेनिफिट का आनंद लेते हैं।
5. इस समझौते के तहत भारत ने कौन-सी ऊर्जा-संबंधित प्रतिबद्धता प्रदान की है?
भारत से उम्मीद की जाती है कि वह रूसी कच्चे तेल के आयात में काफी कमी करेगा या रोकेगा और अमेरिका तथा संभावित रूप से वेनेज़ुएला की ओर ऊर्जा खरीद को मोड़ेगा।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
मेंस
प्रश्न. 'भारत और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच संबंधों में खटास के प्रवेश का कारण वाशिंगटन का अपनी वैश्विक रणनीति में अभी तक भी भारत के लिये किसी ऐसे स्थान की खोज करने में विफलता है, जो भारत के आत्म-समादर और महत्त्वाकांक्षा को संतुष्ट कर सके।' उपयुक्त उदाहरणों के साथ स्पष्ट कीजिये। (2019)