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भारत के महत्त्वपूर्ण खनिज पारितंत्र में अनुकूलन-क्षमता का निर्माण

  • 15 Jan 2026
  • 160 min read

यह लेख 12 /01/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित "Refining India’s future in critical minerals” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण, औद्योगिक विस्तार तथा रणनीतिक स्वायत्तता को दिशा देने में महत्त्वपूर्ण खनिजों की बढ़ती भूमिका की समीक्षा करता है। साथ ही लचीली और सतत खनिज आपूर्ति शृंखलाएँ सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक नीतिगत उपायों का विश्लेषण करता है।

प्रिलिम्स के लिये: महत्त्वपूर्ण खनिज, OGP, राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन, दुर्लभ मृदा तत्त्व, तत्त्व, खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2023, NEMMP

मेन्स के लिये: महत्त्वपूर्ण खनिजों की प्राप्ति में भारत की प्रगति, प्रमुख चुनौतियाँ और उपाय। 

महत्त्वपूर्ण खनिज 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था की रणनीतिक आधारशिला के रूप में उभर चुके हैं, जो उन्नत और उभरती प्रौद्योगिकियों को संबल प्रदान करते हैं। जैसे-जैसे नवीकरणीय ऊर्जा की ओर वैश्विक संक्रमण तीव्र हो रहा है, खनिज आपूर्ति शृंखलाओं पर नियंत्रण भू-राजनीतिक समीकरणों तथा आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा को पुनर्परिभाषित कर रहा है। इसके बावजूद, उत्पादन और प्रसंस्करण का अत्यधिक संकेंद्रण आपूर्ति जोखिमों तथा रणनीतिक संवेदनशीलताओं को जन्म देता है। भारत के संदर्भ में, शुद्ध-शून्य लक्ष्य, आत्मनिर्भर भारत और उन्नत विनिर्माण की प्राप्ति के लिये महत्त्वपूर्ण खनिजों तक सुरक्षित तथा स्थिर पहुँच राष्ट्रीय विकास तथा सुरक्षा की दृष्टि से अपरिहार्य है।

महत्त्वपूर्ण खनिज क्या हैं?

  • परिचय: महत्त्वपूर्ण खनिज वे खनिज होते हैं, जो आर्थिक संवृद्धि, ऊर्जा संक्रमण और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये अनिवार्य होते हैं, लेकिन जिनकी आपूर्ति शृंखला आयात पर निर्भरता, भू-राजनीतिक संकेंद्रण या सीमित घरेलू उपलब्धता के कारण  बाधित होने की आशंका रहती है।
    • भारत सरकार ने देश के लिये 30 महत्त्वपूर्ण खनिजों की सूची जारी की है।  
      • इन खनिजों में एंटीमनी, बेरिलियम, बिस्मथ, कोबाल्ट, कॉपर, गैलियम, जर्मेनियम, ग्रेफाइट, हैफनियम, इंडियम, लिथियम, मोलिब्डेनम, नाइओबियम, निकेल, पीजीई, फॉस्फोरस, पोटाश, आरईई, रेनियम, सिलिकॉन, स्ट्रोंटियम, टैंटलम, टेल्यूरियम, टिन, टाइटेनियम, टंगस्टन, वैनेडियम, जिरकोनियम, सेलेनियम और कैडमियम शामिल हैं।
  • ये महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि:
    • इनका आर्थिक और रणनीतिक महत्त्व अत्यधिक है।
    • घरेलू स्तर पर भंडार सीमित हैं।
    • आयात पर निर्भरता अधिक है।
    • वैश्विक आपूर्ति भौगोलिक रूप से अत्यधिक संकेंद्रित है।
    • कठिन प्रतिस्थापन है।
  • उपयोग: स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और आधुनिक उद्योगों में महत्त्वपूर्ण खनिजों की मुख्य भूमिका होती है। इनके अनुप्रयोग निम्नलिखित क्षेत्रों में देखे जा सकते हैं:
    • स्वच्छ ऊर्जा: सौर, पवन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और ऊर्जा भंडारण भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के आधार स्तंभ हैं, जो महत्त्वपूर्ण खनिजों पर निर्भर हैं।
      • सौर PV प्रणालियों में सिलिकॉन, टेल्यूरियम, इंडियम और गैलियम का उपयोग होता है, जबकि पवन टर्बाइनों के स्थायी चुंबकों के लिये नियोडिमियम तथा डिस्प्रोसियम जैसे दुर्लभ तत्त्वों की आवश्यकता होती है। 
      • राष्ट्रीय विद्युत गतिशीलता मिशन योजना (NEMMP) तथा नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण योजनाओं के विस्तार से EV और ग्रिड-स्तरीय भंडारण में लिथियम, कोबाल्ट तथा निकेल की मांग में तीव्र वृद्धि होगी।
    • इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर: गैलियम, जर्मेनियम, सिलिकॉन, इंडियम और दुर्लभ मृदा तत्त्वों जैसे महत्त्वपूर्ण खनिज सेमीकंडक्टर, स्मार्टफोन, कंप्यूटर, एलईडी तथा माइक्रोचिप के निर्माण के लिये आवश्यक हैं।
    • रक्षा एवं रणनीतिक प्रौद्योगिकियाँ: दुर्लभ मृदा तत्त्व, टाइटेनियम, टंगस्टन और बेरिलियम का उपयोग मिसाइल मार्गदर्शन प्रणालियों, रडार, लड़ाकू विमानों, ड्रोन और रात्रि दृष्टि उपकरणों में किया जाता है। रक्षा तैयारियों तथा रणनीतिक स्वायत्तता के लिये इन खनिजों तक सुरक्षित पहुँच अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • अंतरिक्ष और हवाई प्रौद्योगिकी: टाइटेनियम, लिथियम और दुर्लभ मृदा तत्त्वों जैसे महत्त्वपूर्ण खनिजों का उपयोग विमान इंजनों, उपग्रहों तथा अंतरिक्ष प्रक्षेपणयानों में किया जाता है, क्योंकि इनका भार-सदृश अनुपात उच्च होता है एवं ये ताप प्रतिरोधी होते हैं। भारत के बढ़ते अंतरिक्ष क्षेत्र तथा गगनयान मिशन से इनकी मांग और भी बढ़ेगी।
    • परमाणु ऊर्जा: परमाणु ईंधन, रिएक्टरों और नियंत्रण छड़ों में यूरेनियम, ज़िरकोनियम तथा दुर्लभ मृदा तत्त्वों का उपयोग किया जाता है। भारत स्वच्छ आधारभूत ऊर्जा सुनिश्चित करने के लिये परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ाने का लक्ष्य रखता है, ऐसे में इन खनिजों का रणनीतिक महत्त्व और भी बढ़ जाता है।
    • दूरसंचार और डिजिटल अवसंरचना: ताँबा, दुर्लभ तत्त्व और लिथियम 5G नेटवर्क, ऑप्टिकल फाइबर केबल, डेटा सेंटर तथा पावर बैकअप सिस्टम के लिये महत्त्वपूर्ण हैं। डिजिटल इंडिया और भारतनेट के तहत भारत का डिजिटल विस्तार काफी हद तक इन तत्त्वों पर निर्भर करता है।
    • चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवा प्रौद्योगिकियाँ: दुर्लभ मृदा तत्त्व, प्लैटिनम समूह धातुएँ और कोबाल्ट जैसे महत्त्वपूर्ण खनिजों का उपयोग MRI मशीनों, एक्स-रे प्रणालियों, कैंसर उपचार उपकरणों और चिकित्सा प्रत्यारोपणों में किया जाता है, जिससे निदान तथा उपचार क्षमताओं में सुधार होता है।
    • विनिर्माण और उन्नत सामग्री: टंगस्टन, क्रोमियम, निकेल और मोलिब्डेनम का उपयोग उच्च-शक्ति मिश्र धातुओं, स्टेनलेस स्टील तथा औद्योगिक मशीनरी में किया जाता है, जो निर्माण, ऑटोमोबाइल और भारी इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों का समर्थन करते हैं।
    • जल उपचार और पर्यावरण प्रबंधन: जल संकट बढ़ने के साथ-साथ जल संसाधनों के शुद्धीकरण और प्रबंधन के लिये महत्त्वपूर्ण खनिज आवश्यक होते जा रहे हैं। दुर्लभ मृदा तत्त्व (जैसे लैंथनम और सेरियम) का उपयोग विशेष फिल्टरों में अपशिष्ट जल से भारी धातुओं तथा फॉस्फेट को हटाने के लिये किया जाता है।
    • भारत में घरेलू भंडार की उपलब्धता: भारत में लिथियम, ग्रेफाइट, ताँबा और दुर्लभ मृदा तत्त्वों जैसे कई महत्त्वपूर्ण खनिजों की भूवैज्ञानिक क्षमता है, लेकिन इनमें से अधिकांश भंडार अभी तक पूरी तरह से खोजे या व्यावसायिक रूप से खनन नहीं किये गए हैं।
      • उदाहरण के लिये, जम्मू-कश्मीर में लिथियम के भंडार की पहचान की गई है, लेकिन बड़े पैमाने पर खनन शुरू नहीं हुआ है।

भारत ने महत्त्वपूर्ण खनिजों के संबंध में कौन-कौन से सुधार किये हैं?

  • राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM): सरकार ने राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन की शुरुआत की है। जिसका उद्देश्य महत्त्वपूर्ण खनिजों के अन्वेषण, घरेलू खनन और प्रसंस्करण को बढ़ावा देना, पुनर्चक्रण को प्रोत्साहित करना तथा अनुसंधान तथा प्रौद्योगिकी को सुदृढ़ करना है।
  • विधायी सुधार: खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2023 ने भारत के खनन क्षेत्र में बड़े सुधार किये हैं, ताकि महत्त्वपूर्ण खनिजों पर वैश्विक लक्ष्य के अनुरूप नीतिगत सुधार लागू हो सकें।  
    • इस अधिनियम के तहत लिथियम, टाइटेनियम और ज़िरकोनियम सहित छह खनिजों को परमाणु खनिजों की सूची से हटाकर व्यापक भागीदारी के लिये सुलभ बनाया गया है। 
    • इसके अतिरिक्त गहन और महत्त्वपूर्ण खनिज अन्वेषण को बढ़ावा देने के लिये अन्वेषण लाइसेंस प्रणाली लागू की गई है।
  • पुनर्चक्रण और शहरी खनन: चूँकि घरेलू खनन में समय लगता है, इसलिये भारत महत्त्वपूर्ण खनिजों की पुनर्प्राप्ति के लिये बैटरी, ई-कचरा और इलेक्ट्रॉनिक सामान के पुनर्चक्रण को बढ़ावा दे रहा है।
    • उदाहरण के लिये, महत्त्वपूर्ण खनिजों के पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने वाली प्रोत्साहन योजना के तहत द्वितीयक स्रोतों से महत्त्वपूर्ण खनिजों के पृथक्करण और उत्पादन के लिये देश में पुनर्चक्रण क्षमता विकसित करने हेतु 1,500 करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं। 
    • यह चक्रीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करता है और आयात पर निर्भरता को कम करता है।
  • विनिर्माण और प्रसंस्करण को प्रोत्साहन: सरकार कच्चे माल के आयात पर निर्भरता कम करने हेतु भारत के भीतर मूल्य शृंखलाओं का निर्माण करने के लिये दुर्लभ-मृदा चुंबकों, बैटरियों और अर्द्धचालक सामग्रियों के घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित कर रही है।
    • उदाहरण के लिये, दुर्लभ मृदा प्रसंस्करण और चुंबक निर्माण के विस्तार के लिये IREL के प्रयास, एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC)  बैटरी के लिये PLI योजना तथा फैब्रिकेशन एवं कंपाउंड सेमीकंडक्टर इकाइयों का समर्थन करने वाला सेमीकंडक्टर मिशन, खनिज निर्भरता से मूल्यवर्द्धित विनिर्माण की ओर भारत के बदलाव को दर्शाते हैं।
  • नियामक सरलीकरण: सितंबर 2025 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने राष्ट्रीय सुरक्षा तथा रणनीतिक चिंताओं का हवाला देते हुए परमाणु, महत्त्वपूर्ण एवं रणनीतिक खनिजों के खनन परियोजनाओं को सार्वजनिक परामर्श से मुक्त कर दिया।
    • हालाँकि, इन परियोजनाओं का क्षेत्रीय विशेषज्ञ समितियों द्वारा व्यापक मूल्यांकन किया जाएगा और परियोजना के आकार की चिंता किये बिना इन्हें केंद्रीय स्तर पर मंज़ूरी दी जाएगी।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: भारत महत्त्वपूर्ण खनिजों की सतत आपूर्ति सुनिश्चित करने और विदेशी खनन तथा प्रसंस्करण परियोजनाओं में निवेश करने के लिये द्विपक्षीय तथा बहुपक्षीय पहलों के माध्यम से अन्य देशों के साथ साझेदारी कर रहा है।
    • उदाहरण के लिये, KABIL की विदेशी साझेदारियाँ, जिनमें अर्जेंटीना की CAMYEN SE के साथ लिथियम अन्वेषण समझौता (15,703 हेक्टेयर लिथियम अन्वेषण को कवर करते हुए) और ऑस्ट्रेलिया के क्रिटिकल मिनरल ऑफिस के साथ एक समझौता ज्ञापन शामिल हैं। 
    • भारत ने महत्त्वपूर्ण खनिजों के लिये सतत आपूर्ति शृंखला सुनिश्चित करने के लिये अमेरिका के नेतृत्व वाले मिनरल्स सिक्योरिटी पार्टनरशिप (MSP) फाइनेंस नेटवर्क में शामिल हो गया है।
    • इसके अतिरिक्त, भारत आयात स्रोतों में विविधता लाने, क्रय समझौतों को सुरक्षित करने और रणनीतिक आयात संबंधी भेद्यता को कम करने के लिये क्वाड सहयोग (भारत-अमेरिका-जापान-ऑस्ट्रेलिया) और इंडो-पैसिफिक आर्थिक पहलों का लाभ उठा रहा है।

भारत के समक्ष महत्त्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता और सुरक्षा सुनिश्चित करने में कौन-कौन-सी प्रमुख बाधाएँ हैं?

  • उच्च आयात निर्भरता: भारत लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे खनिजों के लिये लगभग पूरी तरह से आयात पर निर्भर है (वित्तीय वर्ष 2024 में 100% आयात निर्भरता थी)। 
    • वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ अत्यधिक केंद्रित हैं, जिनमें चीन परिशोधन और प्रसंस्करण (90% से अधिक प्रसंस्करण के साथ) में अग्रणी है, जिससे भारत मूल्य अस्थिरता, निर्यात नियंत्रण और भू-राजनीतिक दबावों के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
      • उदाहरण के लिये, दुर्लभ-मृदा तत्त्वों और स्थायी चुम्बकों पर चीन द्वारा वर्ष 2025 तक लागू किये गए निर्यात नियंत्रणों ने आयात पर भारत की भारी निर्भरता के कारण उसकी भेद्यता को उजागर कर दिया है।
    • इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (IEEFA) की रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक भारत की महत्त्वपूर्ण खनिजों की मांग दोगुनी से अधिक होने की संभावना है, जिससे यह चुनौती और गंभीर होगी।
  • सीमित घरेलू अन्वेषण: अपर्याप्त भूवैज्ञानिक आँकड़ों, सीमित निजी भागीदारी और उच्च अन्वेषण जोखिम के कारण भारत में अन्वेषण की गति कम है। 
    • कई संभावित भंडार पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील या जनजातीय क्षेत्रों में स्थित हैं, जिससे खनन की मंज़ूरी और संचालन में जटिलताएँ आती हैं।
      • उदाहरण के लिये, भारत की स्पष्ट भूवैज्ञानिक क्षमता (OGP) का केवल लगभग 10% ही खोजा गया है एवं भारत वैश्विक अन्वेषण व्यय का 1% से भी कम खर्च करता है, जिसका अर्थ है कि कई महत्त्वपूर्ण खनिज भंडार अभी भी अनदेखे या कम मूल्यांकन वाले हैं।
  • कमज़ोर प्रसंस्करण क्षमताएँ: जहाँ खनिज उपलब्ध हैं, वहाँ भी भारत में डाउनस्ट्रीम प्रसंस्करण, पृथक्करण और परिशोधन क्षमता की कमी है, विशेष रूप से दुर्लभ मृदा तत्त्वों और बैटरी-ग्रेड सामग्रियों के लिये। 
    • इससे विदेशी मूल्य शृंखलाओं पर निर्भरता बढ़ जाती है, जिससे रणनीतिक स्वायत्तता कमज़ोर हो जाती है।
      • उदाहरण के लिये, भारत के पास लगभग 6.9 मिलियन टन दुर्लभ मृदा तत्त्वों का भंडार है, जो दुनिया के शीर्ष तीन देशों में शामिल है, लेकिन वैश्विक उत्पादन में इसका वास्तविक योगदान 1% से भी कम है, क्योंकि वर्तमान में इसके पास इन खनिजों को उच्च-शुद्धता वाली धातुओं या मिश्र धातुओं में परिष्कृत करने की क्षमता का अभाव है।
  • संसाधन राष्ट्रवाद और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा: बढ़ती वैश्विक मांग ने संसाधन राष्ट्रवाद, दीर्घकालिक अधिग्रहण अवरोधन और प्रमुख शक्तियों द्वारा रणनीतिक भंडारण को बढ़ावा दिया है। 
    • विदेशी खनिज संपदाओं तक पहुँच के मामले में भारत को चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ से कड़ी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ता है।
    • दीर्घकालिक ‘ऑफटेक समझौतों’ को सुरक्षित करना कठिन होता है जब प्रतिद्वंद्वी देश विशाल अवसंरचना के लिये खनिज (infrastructure-for-minerals) समझौते पेश करते हैं, जिन्हें वर्तमान राजकोषीय सीमाओं के साथ भारत पूरा करने में संघर्ष करता है।
      • उदाहरण के लिये, वर्ष 2018 और 2021 की पहली छमाही के बीच चीनी कंपनियों ने लिथियम संपत्तियों के अधिग्रहण के लिये 4.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश किया, जो कि इसी अवधि के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा की कंपनियों द्वारा संयुक्त रूप से निवेश की गई राशि का दोगुना है।
  • पर्यावरण-सामाजिक संघर्ष: महत्त्वपूर्ण खनिज खनन में उच्च पारिस्थितिकी पदचिह्न, जल संकट और विस्थापन के जोखिम शामिल हैं। स्थिरता तथा त्वरित निकासी के बीच संतुलन बनाए रखना एक प्रमुख शासन चुनौती बनी हुई है।
    • उदाहरण के लिये, वैश्विक स्तर पर कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC), जो वैश्विक कोबाल्ट आपूर्ति का लगभग 70% प्रदान करता है, महत्त्वपूर्ण खनिज खनन में गंभीर ESG चुनौतियों को उजागर करता है। 
    • भारत में तमिलनाडु के मदुरै के पास नायक्करपट्टी में प्रस्तावित टंगस्टन खनन परियोजना ने भूजल संकट, कृषि आजीविका पर प्रभाव और आसपास के जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंताओं के कारण स्थानीय स्तर पर कड़ा विरोध प्रदर्शन किया।
  • पुनर्चक्रण संबंधी बाधाएँ: भारत में उन्नत निष्कर्षण प्रौद्योगिकियाँ, खनिज प्रतिस्थापन और बड़े पैमाने पर पुनर्चक्रण (शहरी खनन) की क्षमता सीमित है। ई-कचरे से कम पुनर्प्राप्ति दर चक्रीय अर्थव्यवस्था समाधानों की क्षमता को सीमित करती है।
    • भारत में प्रतिवर्ष लगभग 1.75 मिलियन टन ई-कचरा और लगभग 60 किलो टन प्रयुक्त लिथियम-आयन बैटरी उत्पन्न होती हैं, जो लिथियम, कोबाल्ट तथा निकेल जैसे महत्त्वपूर्ण खनिजों को पुनर्प्राप्त करने की महत्त्वपूर्ण क्षमता प्रदान करती हैं। 
  • व्यावसायिक जोखिम: विदेशी खनन परियोजनाओं में उच्च पूंजी, लंबी अवधि और मेज़बान देशों में राजनीतिक जोखिम होता है। भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों तथा निजी कंपनियों की सीमित जोखिम क्षमता रणनीतिक निवेशों को बाधित करती है।
    • उदाहरण के लिये, ऑस्ट्रेलिया में अदानी कारमाइकल खदान को पर्यावरणीय मंज़ूरी और स्थानीय विरोधों के कारण लगभग एक दशक की देरी का सामना करना पड़ा।
  • अत्यधिक मूल्य अस्थिरता और बाज़ार जोखिम: पेट्रोलियम की तुलना में महत्त्वपूर्ण खनिजों का बाज़ार कम और अपारदर्शी है, जिससे यह ‘अत्यधिक प्रतिस्पर्द्धी मूल्य निर्धारण’ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है, जहाँ प्रमुख वैश्विक खिलाड़ी कीमतें कम करके नए भारतीय खनन परियोजनाओं को व्यावसायिक रूप से असंभाव्य बना सकते हैं। ‘न्यूनतम मूल्य’ व्यवस्था या घरेलू स्तर पर खरीद की गारंटी के अभाव में भारतीय निजी कंपनियॉं दीर्घकालिक बुनियादी ढाँचे के लिये आवश्यक अरबों डॉलर का निवेश करने में हिचकिचाती हैं।
    • उदाहरण के लिये, दीर्घकालिक मांग में वृद्धि के बावजूद वर्ष 2022 और 2024 के बीच लिथियम की कीमतों में लगभग 80% की गिरावट आई।
    • इस प्रकार की मूल्य अस्थिरता नए खनन परियोजनाओं को व्यावसायिक दृष्टि से अव्यवहार्य बना सकती है और सुनिश्चित घरेलू मांग या मूल्य-सीमा तंत्र की अनुपस्थिति में भारतीय निजी निवेशकों को अधिक पूंजी लगाने से हतोत्साहित कर सकती है।

भारत के महत्त्वपूर्ण खनिज पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित बनाने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?

  • संसाधन मानचित्रण से गहन अन्वेषण तक: भारत को बुनियादी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणों की सीमाओं से आगे बढ़कर एआई, हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग और 3-डी भूभौतिकी जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग करते हुए गहन, प्रौद्योगिकी-संचालित अन्वेषण अपनाना होगा।
    • ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के अनुभव से स्पष्ट है कि उच्च गुणवत्ता वाले भूविज्ञान डेटा का सार्वजनिक रूप से खुलासा तथा प्रारंभिक अन्वेषण में राज्य का समर्थन निजी निवेश को आकर्षित कर सकता है।
  • संपूर्ण घरेलू मूल्य शृंखलाओं का निर्माण: केवल खनन ही पर्याप्त नहीं है। भारत को प्रसंस्करण, पृथक्करण और परिशोधन में निवेश करना होगा, विशेष रूप से दुर्लभ तत्त्वों और बैटरी-ग्रेड सामग्रियों के लिये, जिनमें वर्तमान में चीन का वर्चस्व है। 
    • लक्षित राजकोषीय प्रोत्साहन, एंकर-फर्म मॉडल और बंदरगाहों के निकट क्लस्टरिंग से भारत को मूल्य शृंखला में ऊपर ले जाने में मदद कर सकते हैं।
  • पुनर्चक्रण को रणनीतिक स्रोत बनाना: शहरी खनन को घरेलू खनन और विदेशी संपत्तियों के साथ खनिज सुरक्षा का तीसरा स्तंभ माना जाना चाहिते। औपचारिक ई-कचरा तथा बैटरी पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना, उन्नत जलधातु विज्ञान प्रौद्योगिकियों को अपनाना और EPR लागू करना कचरे को रणनीतिक संसाधन में परिवर्तित कर सकता है।
  • विदेशी खनिज सुरक्षा को सुदृढ़ करना: भारत को अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों में इक्विटी हिस्सेदारी, दीर्घकालिक क्रय समझौते तथा संयुक्त उद्यम करने चाहिये।
    • KABIL को मज़बूत करना, संप्रभु गारंटी प्रदान करना और खनिज सुरक्षा साझेदारी जैसे प्लेटफॉर्मों के साथ संतुलन स्थापित करना चीन, अमेरिका तथा यूरोपीय संघ के विरुद्ध प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाएगा।
  • ESG के साथ त्वरित मंज़ूरी: भविष्य की तैयारी के लिये सामाजिक रूप से वैध और पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदार खनन आवश्यक हैं। 
    • वन अधिकार अधिनियम (FRA) और PESA के तहत वास्तविक परामर्श सुनिश्चित करते हुए अनुमोदन प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना, जनजातीय समुदायों के साथ लाभ साझा करना तथा मज़बूत पुनर्वास ढाँचे लागू करना, परियोजना संघर्ष और देरी को कम करेगा।
  • अनुसंधान एवं विकास में निवेश: भारत को वैकल्पिक बैटरी रसायन विज्ञान (सोडियम-आयन, जिंक-एयर), दुर्लभ-मृदा प्रतिस्थापन और सामग्री दक्षता में निवेश कर अपनी कमज़ोरियों को कम करना चाहिये। 
    • उत्कृष्टता केंद्रों को DRDO, शिक्षा जगत और उद्योग के साथ एकीकृत करना रणनीतिक नवाचार को बढ़ावा देगा।
  • रणनीतिक भंडार बनाएँ: जिस प्रकार कच्चे तेल के भंडार ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ तत्त्वों के रणनीतिक भंडार भारत को आपूर्ति में व्यवधान, निर्यात नियंत्रण तथा मूल्य अस्थिरता से बचा सकते हैं। 

निष्कर्ष: 

महत्त्वपूर्ण खनिज भविष्य के बुनियादी ढाँचे का निर्माण करते हैं, जो स्वच्छ ऊर्जा, डिजिटलीकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा को निरंतर शक्ति प्रदान करते हैं। भारत के लिये वास्तविक चुनौती इन खनिजों तक पहुँच बढ़ाने के साथ-साथ रणनीतिक सुरक्षा, पर्यावरणीय स्थिरता तथा संसाधन संप्रभुता के बीच संतुलन स्थापित करना है। घरेलू क्षमता, उत्तरदायी खनन एवं वैश्विक साझेदारी को समेकित करते हुए अपनाया गया सुनियोजित दृष्टिकोण आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को साकार कर सकता है। यह रणनीति न केवल सतत विकास लक्ष्यों को गति प्रदान करेगी, बल्कि संसाधन-सीमित वैश्विक परिदृश्य में भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता को भी सुदृढ़ करेगी।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

प्रश्न. महत्त्वपूर्ण खनिजों पर भारत की उच्च आयात निर्भरता उसकी ऊर्जा सुरक्षा और विनिर्माण प्रतिस्पर्द्धात्मकता को किस प्रकार प्रभावित करती है? इन कमज़ोरियों को दूर करने के लिये एक समग्र तथा बहुआयामी रणनीति क्या हो सकती है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. महत्त्वपूर्ण खनिज क्या हैं?
आर्थिक और रणनीतिक आवश्यकताओं के लिये आवश्यक खनिज, जिनकी आपूर्ति बाधित होने का उच्च जोखिम रहता है।

प्रश्न 2. भारत के लिये महत्त्वपूर्ण खनिज क्यों आवश्यक हैं?
वे स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा विनिर्माण और तकनीकी संप्रभुता का आधार हैं।

प्रश्न 3. भारत के विदेशी खनिज अधिग्रहण का नेतृत्व कौन-सी संस्था करती है?
खनिज विदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL)।

प्रश्न 4. भारत की खनिज कूटनीति में दो प्रमुख साझेदारों के नाम बताइये।
ऑस्ट्रेलिया और अर्जेंटीना।

प्रश्न 5. महत्त्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में भारत की मुख्य चुनौती क्या है?
आयात पर अत्यधिक निर्भरता और सीमित घरेलू प्रसंस्करण क्षमता।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न 1. निम्नलिखित खनिजों पर विचार कीजिये: (2020)

  1. बेंटोनाइट
  2.  क्रोमाइट
  3.  कायनाइट
  4.  सिलिमनाइट

भारत में, उपर्युक्त में से कौन-सा/से आधिकारिक रूप से नामित प्रमुख खनिज है/हैं?

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 4
(c) केवल 1 और 3
(d) केवल 2, 3 और 4

उत्तरः (d)


प्रश्न 2. हाल में तत्त्वों के एक वर्ग, जिसे ‘दुलर्भ मृदा धातु’ कहते है की कम आपूर्ति पर चिंता जताई गई। क्यों? (2012)

  1. चीन, जो इन तत्त्वों का सबसे बड़ा उत्पादक है द्वारा इनके निर्यात पर कुछ प्रतिबन्ध लगा दिया गया है।
  2. चीन, ऑस्ट्रेलिया कनाडा और चिली को छोड़कर अन्य किसी भी देश में ये तत्त्व नहीं पाये जाते हैं।
  3. दुर्लभ मृदा धातु विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॅानिक सामानों के निर्माण में आवश्यक है इन तत्त्वों की माँग बढती जा रही है।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

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