अंतर्राष्ट्रीय संबंध
बढ़ते भौतिकवाद और व्यक्तिवाद से चिह्नित
- 14 Jan 2026
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यह लेख 12/01/2026 को द हिंदू में प्रकाशित ‘India, Germany to simplify defence trade’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत-जर्मनी की विकसित होती रणनीतिक साझेदारी का विश्लेषण करता है, जिसमें रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार और हरित परिवर्तन के क्षेत्र में बढ़ते सहयोग पर प्रकाश डाला गया है। यह प्रमुख मतभेदों का भी विश्लेषण करता है और तेज़ी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ करने के उपायों को रेखांकित करता है।
प्रिलिम्स के लिये: भारत-ईयू मुक्त समझौता, कार्बन सीमा समायोजन तंत्र, कार्बन उत्सर्जन में कमी, IMEEE कॉरिडोर
मेन्स के लिये: भारत-जर्मनी संबंध, प्रमुख मुद्दे और संबंधों को घनिष्ठ करने के उपाय।
भारत-जर्मनी संबंधों में साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और आर्थिक, तकनीकी तथा सुरक्षा क्षेत्रों में बढ़ते सहयोग के कारण रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण वृद्धि देखी जा रही है। द्विपक्षीय व्यापार 50 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया है, जिससे जर्मनी यूरोपीय संघ में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है। हाल ही में उच्च स्तरीय बैठकों के परिणामस्वरूप रक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, कौशल और नवाचार क्षेत्रों में समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर हुए हैं, साथ ही भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को भी गति मिली है। इस प्रकार यह साझेदारी केवल व्यापार तक सीमित न रहकर एक व्यापक रणनीतिक सहयोग में विकसित हो रही है।
समय के साथ भारत-जर्मनी संबंधों में किस प्रकार परिवर्तन आए हैं?
- चरण I: स्थापना और विकास सहयोग (1951–1970)
- भारत और जर्मनी ने वर्ष 1951 में राजनयिक संबंध स्थापित किये।
- युद्धोत्तर काल में जर्मनी भारत के लिये एक महत्त्वपूर्ण विकास और तकनीकी भागीदार के रूप में उभरा, जिसने औद्योगिक प्रशिक्षण, अवसंरचना एवं क्षमता निर्माण में KfW जैसे संस्थानों के माध्यम से समर्थन प्रदान किया।
- यह संबंध मुख्यतः आर्थिक और विकासात्मक रहे तथा इसमें राजनीतिक या रणनीतिक गंभीरता सीमित रही।
- चरण II: शीत युद्ध की बाधाएँ (1970-1989):
- शीत युद्ध के गठबंधनों ने रणनीतिक संबंधो को सीमित कर दिया, क्योंकि भारत ने सोवियत संघ के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे जबकि जर्मनी NATO के सदस्य के रूप में बना रहा।
- इसके बावजूद आर्थिक सहायता, नवीकरणीय ऊर्जा और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग जारी रहा, परंतु राजनीतिक तथा रक्षा संबंध सीमित ही रहे।
- चरण III: शीत युद्धोपरांत पुनर्रचना (1990-1999):
- जर्मनी का एकीकरण और भारत का वर्ष 1991 का आर्थिक उदारीकरण एक महत्त्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।
- व्यापार, निवेश और प्रौद्योगिकी सहयोग में तेज़ी से विस्तार हुआ, विशेष रूप से विनिर्माण तथा इंजीनियरिंग क्षेत्रों में।
- दोनों देशों के बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था के अनुरूप ढलने के साथ-साथ राजनीतिक सहभागिता और भी गहरी होती गई।
- चरण IV: रणनीतिक साझेदारी चरण (2000-2010):
- वर्ष 2000 में भारत और जर्मनी ने औपचारिक रूप से एक रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की, जिससे राजनीतिक संवाद को संस्थागत रूप दिया गया तथा विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा एवं बहुपक्षीय मंचों में सहयोग का विस्तार हुआ।
- इस चरण में संबंधों ने दीर्घकालिक रणनीतिक उद्देश्य विकसित कर लिये।
- चरण V: अंतर-सरकारी परामर्श (IGC) के माध्यम से संस्थागत सुदृढ़ीकरण (2011–2019):
- वर्ष 2011 में अंतर-सरकारी परामर्श (IGC) के शुभारंभ ने संबंधों को उच्च-विश्वास वाली साझेदारी के स्तर तक पहुँचाया।
- नवीकरणीय ऊर्जा, जलवायु कार्रवाई, शहरी विकास, कौशल विकास और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग का विस्तार हुआ है तथा जर्मनी भारत के सतत विकास एजेंडा में एक प्रमुख भागीदार के रूप में उभरा है।
- चरण VI: रणनीतिक अभिसरण (2020-वर्तमान):
- इंडो-पैसिफिक अभिसरण, अनुकूलित आपूर्ति-शृंखला, रक्षा औद्योगिक सहयोग, हरित हाइड्रोजन, महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों और कुशल गतिशीलता के संबंधों में बदलाव आया है।
- जर्मनी ने वर्ष 2022 की हरित और सतत विकास साझेदारी के तहत भारत को वर्ष 2030 तक 10 अरब यूरो उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
- सामरिक साझेदारी के 25 वर्ष (2025) और राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष (2026) पूरे होने का उत्सव संबंधों की परिपक्वता को दर्शाता है।
भारत और जर्मनी के मध्य सहयोग के प्रमुख क्षेत्र कौन-कौन से हैं?
- रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग: रक्षा सहयोग भारत-जर्मनी संबंधों का एक प्रमुख स्तंभ बनकर उभरा है, जिसमें सैन्य सहयोग, रणनीतिक संवाद और रक्षा औद्योगिक सहयोग शामिल हैं।
- रक्षा औद्योगिक सहयोग योजना पर संयुक्त आशय घोषणा-पत्र क्रेता-विक्रेता मॉडल से सह-विकास मॉडल की ओर बदलाव का संकेत देता है।
- जर्मनी की मिलन (नौसेना अभ्यास), हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी और तरंग शक्ति (वायु अभ्यास) में भागीदारी, साथ ही Eurodrone MALE UAV जैसे उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों में सहयोग, भारत-जर्मनी संबंधों के इंडो-पैसिफिक अभिसरण को दर्शाते हैं।
- पारस्परिक रसद सहायता, शांतिरक्षा प्रशिक्षण और DRDO–BAANBW सहयोग जैसी पहलें अंतरसंचालनीयता और रणनीतिक विश्वास को सुदृढ़ करती हैं।
- आतंकवाद विरोधी सहयोग: भारत और जर्मनी ने सीमा पार आतंकवाद सहित आतंकवाद तथा हिंसक उग्रवाद के सभी रूपों की स्पष्ट रूप से निंदा की है।
- जर्मनी ने जम्मू-कश्मीर और दिल्ली में हुए हालिया आतंकी हमलों की कड़ी निंदा करते हुए आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति को दोहराया।
- पारस्परिक कानूनी सहायता संधि की पुष्टि और आतंकवाद विरोधी संयुक्त कार्य समूह के तहत हुई प्रगति से कानूनी तथा संस्थागत सहयोग को बढ़ावा मिलता है।
- दोनों पक्ष संयुक्त राष्ट्र की 1267 प्रतिबंध समिति के तहत सूचीबद्ध आतंकवादी संस्थाओं सहित अन्य आतंकवादी संस्थाओं के विरुद्ध सहयोग को मज़बूत करने के लिये प्रतिबद्ध हैं।
- व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग: आर्थिक सहयोग भारत-जर्मनी संबंधों का आधार है, जिसमें वस्तुओं और सेवाओं का द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2024 में 50 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया, जो यूरोपीय संघ के साथ भारत के व्यापार का एक चौथाई से अधिक है तथा वर्ष 2025 में भी यह गति बनी रहेगी।
- जर्मनी ने खुद को भारतीय कंपनियों के लिये यूरोप और उन्नत प्रौद्योगिकियों के प्रवेश द्वार के रूप में स्थापित किया है।
- भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के शीघ्र निष्कर्ष के लिये समर्थन और जर्मन-भारतीय CEO फोरम को सुदृढ़ करना, विनिर्माण, रक्षा, अवसंरचना, फार्मास्यूटिकल्स एवं ऊर्जा क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के सहयोग को संस्थागत रूप देने के प्रयासों को दर्शाता है।
- प्रौद्योगिकी, नवाचार, विज्ञान और अनुसंधान: भारत-जर्मनी संबंधों ने नवाचार-आधारित स्वरूप को तेज़ी से ग्रहण कर लिया है, जो सेमीकंडक्टर, डिजिटलीकरण, स्वास्थ्य, जैव-अर्थव्यवस्था और उभरती प्रौद्योगिकियों को आच्छादित करने वाले नवाचार तथा प्रौद्योगिकी साझेदारी योजना पर आधारित है।
- सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम पार्टनरशिप और महत्त्वपूर्ण खनिजों पर संयुक्त आशय घोषणा-पत्र का उद्देश्य अनुसंधान एवं विकास, विनिर्माण, पुनर्चक्रण तथा तीसरे देशों की आपूर्ति शृंखलाओं में सहयोग को सुदृढ़ करना है।
- भारत-जर्मन विज्ञान और प्रौद्योगिकी केंद्र (IGSTC) के विस्तार ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत विनिर्माण तथा सतत उत्पादन जैसे क्षेत्रों में उद्योग-अकादमिक संबंध एवं समावेशी नवाचार को सुदृढ़ किया है।
- प्रस्तावित भारत-जर्मनी उत्कृष्टता केंद्र और ISRO–DLR अंतरिक्ष सहयोग दीर्घकालिक वैज्ञानिक तथा तकनीकी सहयोग को और अधिक संस्थागत रूप प्रदान करते हैं।
- हरित एवं सतत विकास साझेदारी: हरित एवं सतत विकास साझेदारी भारत-जर्मनी संबंधों का एक प्रमुख स्तंभ है, जिसमें जर्मनी की 10 अरब यूरो की प्रतिबद्धता (2022-2030) में से लगभग 5 अरब यूरो 2026 के मध्य तक पहले ही खर्च या आवंटित किये जा चुके हैं।
- यह साझेदारी जलवायु परिवर्तन के शमन और अनुकूलन, नवीकरणीय ऊर्जा, सतत गतिशीलता, जैवविविधता, चक्रीय अर्थव्यवस्था तथा कौशल विकास का समर्थन करती है, साथ ही पीएम ई-बस सेवा, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, सौर रूफटॉप विस्तार, मेट्रो रेल परियोजनाओं और बैटरी भंडारण जैसी भारतीय पहलों के साथ निकटता से जुड़ी हुई है।
- सौर ऊर्जा उत्पादन, पवन ऊर्जा तथा ऊर्जा भंडारण पर संयुक्त कार्य समूह प्रौद्योगिकी, मानकों एवं अनुकूलित आपूर्ति शृंखलाओं पर सहयोग को मज़बूत करते हैं।
- वैश्विक शासन और रणनीतिक अभिसरण: भारत और जर्मनी ने UNLCOS तथा अंतर्राष्ट्रीय कानून पर आधारित एक स्वतंत्र, मुक्त एवं नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक के लिये समर्थन की पुष्टि की व एक नए इंडो-पैसिफिक परामर्श तंत्र के माध्यम से रणनीतिक समन्वय को संस्थागत रूप दिया, जो इंडो-पैसिफिक महासागर पहल में जर्मनी की भागीदारी द्वारा पूरक है।
- भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) के लिये साझा समर्थन पारदर्शी, स्थायी और पुनरुत्थानशील कनेक्टिविटी पर अभिसरण को दर्शाता है।
- वैश्विक शासन के मुद्दे पर दोनों देश G4 समूह के तहत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों के लिये अपना समर्थन दोहराते हैं, जिसमें स्थायी और गैर-स्थायी श्रेणियों का विस्तार तथा प्रारंभिक पाठ-आधारित वार्ता शामिल है।
- वैश्विक मुद्दों पर भारत और जर्मनी ने यूक्रेन में युद्ध पर चिंता व्यक्त की, संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत न्यायपूर्ण शांति के प्रयासों का समर्थन किया, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के अनुरूप गाज़ा पर हुई प्रगति का स्वागत किया और दो-राज्य समाधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
- भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) के लिये साझा समर्थन पारदर्शी, स्थायी और पुनरुत्थानशील कनेक्टिविटी पर अभिसरण को दर्शाता है।
- शिक्षा, कौशल विकास, गतिशीलता और जन-जन संबंध: जन-जन संबंध भारत-जर्मनी संबंधों का एक मुख्य स्तंभ बना हुआ है, जो जर्मनी में भारतीय छात्रों और कुशल पेशेवरों की बढ़ती उपस्थिति में परिलक्षित होता है।
- उच्च शिक्षा पर भारत-जर्मन व्यापक योजना संस्थागत साझेदारी, संयुक्त डिग्री और अनुसंधान सहयोग को मज़बूत करता है, जबकि भारत ने जर्मन विश्वविद्यालयों को NEP संरचना के तहत परिसर स्थापित करने के लिये आमंत्रित किया है।
- प्रवासन और गतिशीलता साझेदारी नैतिक कुशल प्रवासन को सुगम बनाती है, विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में तथा नवीकरणीय ऊर्जा में कौशल विकास के लिये भारत-जर्मन उत्कृष्टता केंद्र जैसी पहलों के माध्यम से श्रम बाज़ार की जरूरतों को पूरा करती है।
भारत-जर्मनी संबंधों में मतभेद के प्रमुख क्षेत्र कौन-से हैं?
- सामरिक स्वायत्तता बनाम गठबंधन: भारत और जर्मनी सुरक्षा तथा सामरिक संरेखण के प्रति अपने दृष्टिकोण में भिन्न हैं। भारत सामरिक स्वायत्तता के सिद्धांत का पालन करता है, अपने बाह्य संबंधों में अनुकूलन चाहता है और औपचारिक सैन्य गठबंधनों का विरोध करता है।
- इसके विपरीत, जर्मनी नाटो और यूरोपीय संघ की सुरक्षा संरचनाओं में गहराई से समाहित है, जो उसकी रक्षा नीतियों तथा खतरे की धारणाओं को आकार देती हैं।
- उदाहरण के लिये, रूस-यूक्रेन संघर्ष में जर्मनी ने रूस के खिलाफ एक मज़बूत रुख अपनाया है, यूक्रेन को सैन्य सहायता प्रदान की है और यूरोपीय संघ के ढाँचे के भीतर सख्त प्रतिबंधों का समर्थन किया है।
- भारत ने नागरिकों की पीड़ा पर चिंता व्यक्त की और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करते हुए रूस की स्पष्ट निंदा से परहेज किया।
- व्यापार संरक्षणवाद: जर्मनी आमतौर पर विदेश नीति के उपकरणों के रूप में प्रतिबंधों, नियामक शर्तों और व्यापार मानकों के लिये यूरोपीय संघ की प्राथमिकता के अनुरूप है।
- हालाँकि भारत बाह्य क्षेत्रीय व्यापार प्रतिबंधों को लेकर सतर्क बना हुआ है, क्योंकि वह इन्हें वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं और विकास लक्ष्यों के लिये बाधक मानता है।
- उदाहरण के लिये, यूरोपीय संघ के नियामक तंत्र जैसे कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM), डेटा संरक्षण मानदंड और पर्यावरणीय शर्तें, जिन्हें भारत अपने निर्यात को प्रभावित करने वाली संभावित गैर-टैरिफ बाधाओं के रूप में देखता है।
- यूरोपीय संघ को भारत के इस्पात और एल्यूमीनियम निर्यात में 24.4% की कमी आई है, जो वित्त वर्ष 2024 में 7.71 बिलियन अमेरिकी डॉलर से घटकर वित्त वर्ष 2025 में 5.82 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है।
- यह कमी कमज़ोर यूरोपीय मांग और सख्त व्यापार मानदंडों को रेखांकित करती है तथा इस मंदी का प्रभाव भारत-जर्मनी द्विपक्षीय व्यापार पर भी पड़ा है।
- जलवायु संबंधी कार्रवाई में भिन्नता: भारत और जर्मनी जलवायु परिवर्तन पर व्यापक रूप से सहयोग करते हैं, फिर भी गति, ज़िम्मेदारी तथा वित्तपोषण को लेकर मतभेद बने हुए हैं।
- जहाँ जर्मनी 1.5 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य को पूरा करने के लिये सभी जीवाश्म ईंधनों को तेज़ी से और कानूनी रूप से बाध्यकारी तरीके से चरणबद्ध समाप्त करने का समर्थन करता है, वहीं भारत का मानना है ‘जलवायु न्याय’ के लिये पश्चिम के विलासिता उत्सर्जन और विकासशील दुनिया के जीवन निर्वाह उत्सर्जन के बीच अंतर करना आवश्यक है।
- यह मतभेद समय-सीमा को लेकर तीव्र वार्त्ताओं में प्रकट होता है, जहाँ नई दिल्ली एक ‘चरणबद्ध कमी’ दृष्टिकोण पर ज़ोर देती है जो पूर्ण परिवर्तन से पहले ऊर्जा संकट को समाप्त करने के लिये कोयले के निरंतर उपयोग की अनुमति देता है।
- जर्मनी तेज़ी से उत्सर्जन कमी और सख्त जलवायु मानकों का समर्थन करता है, जबकि भारत जलवायु न्याय, समानता और साझा लेकिन भिन्न ज़िम्मेदारियों (CBDR) पर ज़ोर देता है।
- भारत सुनिश्चित जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी अंतरण चाहता है, जबकि जर्मनी प्रायः व्यापक यूरोपीय संघ के वित्तीय और नियामक प्रतिबंधों के दायरे में काम करता है।
- रक्षा निर्यात और प्रौद्योगिकी अंतरण के मुद्दे: यद्यपि रक्षा सहयोग का विस्तार हो रहा है, जर्मनी की कठोर निर्यात नियंत्रण व्यवस्था और संवेदनशील प्रौद्योगिकियों के प्रति सतर्क दृष्टिकोण कभी-कभी प्रगति को धीमा कर देता है।
- भारत त्वरित अनुमोदन, व्यापक प्रौद्योगिकी अंतरण और स्थानीय विनिर्माण अधिकारों की मांग करता है, जबकि जर्मनी वाणिज्यिक हितों को घरेलू राजनीतिक निरीक्षण तथा गठबंधन संबंधी विचारों के साथ संतुलित करता है। इससे रक्षा उद्योग सहयोग की समयसीमा और दायरे में कभी-कभी टकराव उत्पन्न होता है।
- इंडो-पैसिफिक और चीन का दृष्टिकोण: भारत, चीन को मुख्य रूप से क्षेत्रीय अखंडता, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के नजरिये से देखता है, जबकि जर्मनी की चीन नीति ऐतिहासिक रूप से आर्थिक परस्पर निर्भरता से अधिक प्रभावित रही है, हालाँकि यह अब बदल रहा है।
- यद्यपि दोनों देश एक स्वतंत्र और मुक्त इंडो-पैसिफिक का समर्थन करते हैं, लेकिन जर्मनी की भागीदारी अभी भी आर्थिक दृष्टिकोण से रणनीतिक दृष्टिकोण की ओर विकसित हो रही है, जिससे तात्कालिकता और खतरे की धारणा में अंतर उत्पन्न होता है।
- वाणिज्य दूतावास और कानूनी विवाद (अरिहा शाह मामला): द्विपक्षीय संबंधों में एक विशेष और लगातार समस्या का कारण अरीहा शाह के पालन-पोषण को लेकर कानूनी विवाद है, जो वर्ष 2021 में जर्मनी में फोस्टर केयर में ली गई थी।
- यह मामला सांस्कृतिक और कानूनी विसंगति का प्रतीक बन गया है, जिसमें भारत सरकार तथा जनता इसे सांस्कृतिक और भाषायी अधिकारों का उल्लंघन मानती हैं।
- भारत बच्ची की पहचान सुरक्षित रखने के लिये उसे भारतीय पालक गृह में वापस भेजने की मांग कर रहा है, जबकि जर्मनी का कहना है कि इसकी न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र है और पूरी तरह बाल कल्याण कानून पर केंद्रित है।
भारत-जर्मनी संबंधों को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- रणनीतिक संवादों को संस्थागत रूप देना: भारत तथा जर्मनी को सामयिक उच्च-स्तरीय दौरों से परे रणनीतिक संवाद को और अधिक संस्थागत रूप देना चाहिये।
- हाल ही में घोषित इंडो-पैसिफिक परामर्श तंत्र व ट्रैक 1.5 विदेश नीति और सुरक्षा संवाद को नियमित, परिणाम-उन्मुख तथा रक्षा योजना, समुद्री सुरक्षा एवं साइबर सुरक्षा सहयोग से जोड़ा जाना चाहिये।
- रक्षा औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाना: एक महत्त्वपूर्ण उपाय रक्षा औद्योगिक सहयोग रोडमैप का प्रभावी संचालन है।
- दोनों पक्षों को सह-विकास और सह-उत्पादन परियोजनाओं को त्वरित करके उद्देश्यपूर्ण रूप से कार्यान्वयन की ओर बढ़ना चाहिये, जिससे गहन प्रौद्योगिकी अंतरण एवं संयुक्त बौद्धिक संपदा निर्माण को सक्षम बनाया जा सके।
- जर्मनी भारत के कुशल कार्यबल और लागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता से बड़े पैमाने पर लाभ उठा सकता है, जबकि भारत सटीक इंजीनियरिंग, उन्नत सामग्री तथा रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स में जर्मन विशेषज्ञता से लाभान्वित हो सकता है।
- भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते ( FTA) शीघ्र लागू करना: भारत और जर्मनी को भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को शीघ्र-अतिशीघ्र पूरा करने तथा संतुलित ढंग से लागू करने के लिये प्रयास करना चाहिये। इससे शुल्क और गैर-शुल्क बाधाएँ कम होंगी, बाज़ार तक अभिगम्यता में सुधार होगा तथा व्यवसायों को नियामकीय निश्चितता प्राप्त होगी।
- दोनों देशों को संयुक्त इनक्यूबेटरों, वित्त तक आसान पहुँच और डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से लघु एवं मध्यम उद्यमों, स्टार्टअप्स और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र में सहयोग का विस्तार करना चाहिये।
- जलवायु संबंधी कार्रवाई पर बेहतर समन्वय: भारत और जर्मनी को यह सुनिश्चित करके जलवायु सहयोग को गहरा करना चाहिये कि महत्त्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्यों को पर्याप्त वित्त, प्रौद्योगिकी अंतरण और क्षमता निर्माण के साथ पूरा किया जाए।
- जीएसडीपी के तहत रियायती वित्तपोषण का विस्तार करना, हरित हाइड्रोजन, बैटरी भंडारण और शहरी गतिशीलता में संयुक्त पहलों को बढ़ाना तथा जलवायु-लचीली प्रौद्योगिकियों का सह-विकास करना विकासात्मक अंतर को पाटने में सहायक हो सकता है।
- उन्नत और महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में सहयोग को सुदृढ़ करना: भारत और जर्मनी को अपनी साझेदारी को भविष्य के लिये सुरक्षित बनाने हेतु सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम प्रौद्योगिकियाँ, महत्त्वपूर्ण खनिज, अंतरिक्ष और जैव प्रौद्योगिकी में सहयोग को तीव्र करना होगा।
- संयुक्त अनुसंधान केंद्रों की स्थापना, साझा मानकों और समन्वित औद्योगिक रणनीतियों से केंद्रित वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भरता कम होगी।
- शोधकर्त्ताओं, इंजीनियरों और नवोन्मेषकों के सुगम आवागमन को सुविधाजनक बनाने के साथ-साथ बौद्धिक संपदा की सुरक्षा से विश्वास एवं नवाचार-आधारित विकास को और अधिक मज़बूती मिलेगी।
- जन-जन संबंधों को बढ़ावा देना और कुशल गतिशीलता: जन-जन जुड़ाव द्विपक्षीय संबंधों का दीर्घकालिक स्थिरीकरण महत्त्वपूर्ण कारक बना हुआ है।
- प्रवासन और गतिशीलता साझेदारी समझौते के तहत नैतिक एवं पारस्परिक रूप से लाभकारी कुशल प्रवासन कार्यढाँचों को (विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवा, नवीकरणीय ऊर्जा व उन्नत विनिर्माण क्षेत्रों में) बढ़ाया जाना चाहिये।
- संवाद और पारस्परिक संवेदनशीलता के माध्यम से मतभेदों का प्रबंधन: नियमित राजनयिक संवाद रूस-यूक्रेन, मानवाधिकार संबंधी चर्चा, प्रतिबंधों एवं व्यापार नियमों जैसे कि CBAM पर मतभेदों को दूर करने में सहायता कर सकता है।
- एक-दूसरे की रणनीतिक बाध्यताओं, घरेलू बाधाओं और विकास प्राथमिकताओं के प्रति पारस्परिक संवेदनशीलता मतभेदों को समाप्त करेगी तथा विश्वास को बनाए रखेगी।
- वैश्विक शासन और ग्लोबल साउथ में सहयोग का विस्तार: भारत और जर्मनी को संयुक्त राष्ट्र सुधारों, जलवायु वित्त, स्वास्थ्य सुरक्षा एवं डिजिटल गवर्नेंस पर बहुपक्षीय मंचों में समन्वय बढ़ाना चाहिये।
- अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में त्रिकोणीय विकास सहयोग को बढ़ावा देने से भारत के विकास संबंधी अनुभव को जर्मनी की वित्तीय एवं तकनीकी क्षमताओं के साथ जोड़ा जा सकेगा।
निष्कर्ष:
भारत-जर्मनी संबंध रक्षा, डिजिटलीकरण और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने वाली त्रिआयामी साझेदारी की ओर बढ़ रहे हैं, जो साझा लोकतांत्रिक मूल्यों एवं रणनीतिक विश्वास पर आधारित है। भारत के पैमाने, कौशल और विकास-गति को जर्मनी की प्रौद्योगिकी, पूँजी एवं औद्योगिक सामर्थ्य के साथ संयोजित करके यह साझेदारी भविष्य के लिये तैयार हो सकती है। मतभेदों को दूर करने के लिये रचनात्मक संवाद वैश्विक अनिश्चितता के बीच सहयोग को मज़बूत बनाए रखेगा। भारत और जर्मनी मिलकर एक सुरक्षित, सतत तथा नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के प्रमुख निर्माता के रूप में उभर सकते हैं।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न भारत और जर्मनी अपनी पूरक क्षमताओं का लाभ उठाकर अनुकूलित आपूर्ति शृंखलाओं, हरित परिवर्तन तथा वैश्विक शासन में सुधार को किस प्रकार प्रोत्साहित कर सकते हैं? उभरती भू-राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितताओं के संदर्भ में इस पर चर्चा कीजिये। |
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति के लिये जर्मनी क्यों महत्त्वपूर्ण है?
जर्मनी एक स्वतंत्र और मुक्त इंडो-पैसिफिक क्षेत्र, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला की अनुकूलन-क्षमता का समर्थन करता है।
प्रश्न 2. भारत-जर्मनी रक्षा सहयोग का मुख्य केंद्र क्या है?
सह-विकास, सह-उत्पादन और दीर्घकालिक रक्षा औद्योगिक सहयोग।
प्रश्न 3. भारत-जर्मनी संबंधों के लिये भारत-EU मुक्त समझौता क्यों महत्त्वपूर्ण है?
इससे व्यापार एवं निवेश प्रवाह को प्रोत्साहन मिलेगा तथा नियामक और शुल्क संबंधी बाधाएँ कम होंगी।
प्रश्न 4. जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये भारत और जर्मनी किस प्रकार सहयोग करते हैं?
हरित एवं सतत विकास साझेदारी और हरित हाइड्रोजन पहलों के माध्यम से।
प्रश्न 5. दोनों देशों के बीच जन-संबंधों को कौन-सी चीजें आधार प्रदान करती हैं?
शैक्षणिक आदान-प्रदान, कुशल गतिशीलता, प्रवासी योगदान और सांस्कृतिक सहयोग।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. 'व्यापक-आधारयुक्त व्यापार और निवेश करार (ब्रॉड-बेस्ड ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट एग्रीमेंट/BTIA)' कभी-कभी समाचारों में भारत तथा निम्नलिखित में से किस एक के बीच वार्ता के संदर्भ में दिखाई पड़ता है। (2017)
(a) यूरोपीय संघ
(b) खाड़ी सहयोग परिषद
(c) आर्थिक सहयोग और विकास संगठन
(d) शंघाई सहयोग संगठन
उत्तर: A
मेन्स:
प्रश्न 1. "यूरोपीय प्रतिस्पर्द्धा की दुर्घटनाओं द्वारा अफ्रीका को कृत्रिम रूप से निर्मित छोटे-छोटे राज्यों में काट दिया गया।" विश्लेषण कीजिये। (2013)
प्रश्न 2. किस सीमा तक जर्मनी को दो विश्व युद्धों का कारण बनने का ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? समालोचनात्मक चर्चा कीजिये। (2015)