बिहार Switch to English
बिहार ‘नक्सल-मुक्त’ राज्य घोषित
चर्चा में क्यों?
बिहार सरकार ने घोषणा की है कि वरिष्ठ माओवादी विद्रोही सुरेश कोड़ा उर्फ मुस्तकीम के आत्मसमर्पण के बाद राज्य अब माओवादी-मुक्त हो गया है।
मुख्य बिंदु:
- ऐतिहासिक संदर्भ: सशस्त्र संघर्ष की माओवादी विचारधारा में निहित नक्सलवाद दशकों तक बिहार के लिये एक प्रमुख आंतरिक सुरक्षा चुनौती रहा है। वर्ष 2005 का जहानाबाद जेल हमला जैसी घटनाएँ अतीत में विद्रोही गतिविधियों की तीव्रता को रेखांकित करती हैं।
- सुरेश कोड़ा: वह बिहार और झारखंड क्षेत्रों में सक्रिय एक दीर्घकालिक माओवादी कमांडर था तथा राज्य के सबसे वांछित उग्रवादियों में शामिल था।
- कोड़ा ने मुंगेर ज़िले में बिहार पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) के समक्ष आत्मसमर्पण किया।
- राज्य की घोषणा: बिहार सरकार और पुलिस अधिकारियों ने कहा है कि नक्सल प्रभावित रहे ज़िलों में अब किसी भी प्रकार की सक्रिय सशस्त्र माओवादी टुकड़ी मौजूद नहीं है। इस प्रकार राज्य को प्रभावी रूप से माओवादी प्रभाव से मुक्त घोषित किया गया है।
- पुनर्वास नीति: राज्य की आत्मसमर्पण-सह-पुनर्वास नीति के तहत सुरेश कोड़ा को घोषित ₹3 लाख का इनाम, इसके अतिरिक्त ₹5 लाख की प्रोत्साहन राशि तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिये मासिक भत्ता मिलने की संभावना है।
- महत्त्व: एक प्रमुख माओवादी नेता के आत्मसमर्पण के बाद ‘नक्सल-मुक्त’ स्थिति की घोषणा राज्य के लंबे समय से चले आ रहे वामपंथी उग्रवाद विरोधी संघर्ष में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।
- यह घटनाक्रम समन्वित सुरक्षा उपायों, प्रभावी पुनर्वास नीतियों और सतत प्रशासनिक प्रयासों के सकारात्मक प्रभाव को सुदृढ़ करता है, जिससे प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी शांति तथा स्थिरता सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है।
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और पढ़ें: नक्सल-मुक्त, वामपंथी उग्रवाद |

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केंद्रीय कैबिनेट ने केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने की स्वीकृति दी
चर्चा में क्यों?
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम (Keralam)’ करने के प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी है, जिससे राज्य का आधिकारिक नाम मलयालम भाषा में प्रचलित नाम के अनुरूप हो जाएगा।
मुख्य बिंदु:
- पृष्ठभूमि: ‘केरलम (Keralam)’ राज्य का मूल मलयालम नाम है, जिसका सांस्कृतिक और भाषायी प्रयोग सदियों से निरंतर होता रहा है।
- प्राचीन संदर्भ: इस शब्द का उल्लेख सम्राट अशोक के द्वितीय शिलालेख (257 ईसा पूर्व) में ‘केरलपुत्र’ के रूप में मिलता है, जो चेर वंश को संदर्भित करता है।
- भाषायी पुनर्गठन: मलयालम भाषी समुदायों के लिये एकीकृत ‘केरलम’ की मांग राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही उठती रही है।
- औपनिवेशिक नाम: अंग्रेज़ी नाम ‘केरल’ औपनिवेशिक प्रशासन के दौरान प्रचलन में आया और स्वतंत्रता के बाद भी बनाए रखा गया।
- प्रस्ताव: केरल विधानसभा ने पहले सर्वसम्मति से नाम परिवर्तन का प्रस्ताव पारित कर इसे केंद्र सरकार को अनुमोदन हेतु भेजा था।
- संवैधानिक और कानूनी आधार: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को नए राज्यों के गठन तथा मौजूदा राज्यों के नाम, क्षेत्रफल या सीमाओं में परिवर्तन करने का अधिकार देता है।
- प्रक्रिया: इस प्रक्रिया हेतु आवश्यक है:
- राष्ट्रपति की अनुशंसा पर संसद में विधेयक प्रस्तुत किया जाता है।
- विधेयक को संबंधित राज्य विधानसभा के विचार हेतु भेजा जाता है (हालाँकि ये विचार बाध्यकारी नहीं होते)।
- मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद, परिवर्तन को औपचारिक रूप देने हेतु विधेयक संसद में पेश किया जाता है।
- संसदीय स्वीकृति: विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा दोनों में उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत से पारित होना आवश्यक है।
- राष्ट्रपति की स्वीकृति: पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु भेजा जाता है।
- अनुसूचियों में संशोधन: अधिनियम के अधिसूचित होने पर संविधान की प्रथम अनुसूची (राज्यों के नामों की सूची) और चतुर्थ अनुसूची (राज्यसभा में सीटों के आवंटन से संबंधित) को तद्नुसार अद्यतन किया जाता है।
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और पढ़ें: प्रथम अनुसूची, अनुच्छेद 3 |

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अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2026
चर्चा में क्यों?
पूरे विश्व में 21 फरवरी, 2026 को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया गया। यह दिन भाषायी विविधता का उत्सव मनाने, मातृभाषाओं के संरक्षण को बढ़ावा देने तथा शिक्षा और सांस्कृतिक पहचान में मातृभाषाओं की भूमिका को रेखांकित करने के लिये समर्पित है।
मुख्य बिंदु:
- उत्पत्ति: UNESCO ने इस दिवस की घोषणा भाषायी विविधता की रक्षा और बहुभाषावाद को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की थी, ताकि मातृभाषाओं के सांस्कृतिक तथा शैक्षिक महत्त्व को उजागर किया जा सके।
- यह प्रतिवर्ष 21 फरवरी को मनाया जाता है, जो बांग्लादेश के ऐतिहासिक भाषा आंदोलन की स्मृति में है, जहाँ वर्ष 1952 में छात्रों ने अपनी मातृभाषा बांग्ला को मान्यता दिलाने के लिये अपने प्राणों का बलिदान दिया था।
- वर्ष 2026 की थीम: ‘बहुभाषी शिक्षा पर युवाओं की आवाज़’ (Youth Voices on Multilingual Education)— यह मातृभाषाओं में समावेशी और बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने में युवाओं की भूमिका पर ज़ोर देती है।
- स्वदेशी अस्मिता का संवर्द्धन: यह स्वदेशी समुदायों को सशक्त बनाने के प्रयासों को रेखांकित करता है, जिसमें मातृभाषाओं को संस्कृति, ज्ञान और पहचान के संवाहक के रूप में प्रोत्साहित किया जाता है।
- वैश्विक आयोजन: ढाका के शहीद मीनार पर श्रद्धांजलि, सांस्कृतिक कार्यक्रम, पैनल चर्चाएँ तथा शैक्षणिक संस्थानों द्वारा आयोजित विविध कार्यक्रमों के माध्यम से भाषायी विविधता का उत्सव मनाया जाता है।
- महत्त्व: मातृभाषाएँ शिक्षा, पहचान निर्माण और संज्ञानात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस, भाषायी विविधता के संरक्षण, समावेशी शिक्षा के प्रसार और वैश्विक सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के महत्त्व को सुदृढ़ करता है।
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और पढ़ें: UNESCO |

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ज़िम्बाब्वे ने लंबे समय तक असर करने वाला HIV-निरोधक इंजेक्शन लेनाकापैविर लॉन्च किया
चर्चा में क्यों?
ज़िम्बाब्वे HIV की रोकथाम के लिये लंबे समय तक असर करने वाली इंजेक्टेबल दवा लेनाकापैविर (Lenacapavir) लॉन्च करने वाले अफ्रीका के पहले देशों में से एक बन गया है। यह कदम महाद्वीप में HIV/AIDS के खिलाफ लड़ाई में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
मुख्य बिंदु:
- लेनाकापैविर: लेनाकापैविर एक दीर्घकालिक प्रभाव वाली एंटीरेट्रोवायरल दवा है, जिसका उपयोग HIV की रोकथाम के लिये प्री-एक्सपोज़र प्रोफिलैक्सिस (PrEP) में किया जाता है।
- क्रिया-विधि: गिलियड साइंसेज़ द्वारा विकसित लेनाकापैविर एक कैप्सिड इनहिबिटर है। यह HIV-1 के वायरल कैप्सिड (जो वायरस की आनुवंशिक सामग्री की रक्षा करने वाला प्रोटीन आवरण है) में उसके जीवन-चक्र के कई चरणों पर हस्तक्षेप करता है, जिससे वायरस निष्क्रिय हो जाता है।
- छह-महीने का संरक्षण: लेनाकापैविर नगेपोन की पहली ऐसी PrEP दवा है, जिसे वर्ष में केवल दो बार (हर छह महीने में) इंजेक्शन के रूप में दिया जाता है।
- WHO पूर्व-अर्हता: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अक्तूबर 2025 में इस दवा को पूर्व-अर्हता प्रदान की और जुलाई 2025 में इसके कार्यान्वयन संबंधी दिशानिर्देश जारी किये।
- क्षेत्रीय नेतृत्व: ज़िम्बाब्वे ने ज़ाम्बिया और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर WHO की सहयोगी पंजीकरण प्रक्रिया के माध्यम से इस तकनीक को अपनाने में अग्रणी भूमिका निभाई, जिससे रिकॉर्ड समय में अनुमोदन संभव हुआ।
- लक्षित आबादी: प्रारंभिक चरण में पूरे देश के 24 केंद्रों पर लगभग 46,500 उच्च-जोखिम वाले व्यक्तियों को लक्षित किया गया है, जिनमें किशोरियाँ, युवा महिलाएँ, यौन कर्मी तथा गर्भवती या स्तनपान कराने वाली माताएँ शामिल हैं।
- वित्तपोषण और समर्थन: यह कार्यक्रम संयुक्त राज्य अमेरिका सरकार और ग्लोबल फंड के सहयोग से संचालित है, जिसके तहत कमज़ोर वर्गों को यह दवा निशुल्क उपलब्ध कराई जाती है।
- प्रभावकारिता: नैदानिक परीक्षणों में HIV संक्रमण की रोकथाम में लगभग 100% प्रभावशीलता पाई गई, जो दैनिक मौखिक PrEP गोलियों की तुलना में कहीं अधिक है।



