भारतीय अर्थव्यवस्था
भारत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की पुनर्कल्पना
- 16 Jan 2026
- 123 min read
यह एडिटोरियल 15 जनवरी, 2026 को द हिंदू में प्रकाशित “Moving on: On India’s Consumer Price Index and a new base year” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत के बदलते उपभोग पैटर्न के अनुरूप मुद्रास्फीति आकलन को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने में हाल ही में किये गए CPI आधार वर्ष संशोधन और संबंधित सुधारों के महत्त्व पर प्रकाश डालता है।
प्रिलिम्स के लिये: CPI (C), मौद्रिक नीति समिति (MPC), घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24, e-NAM
मेन्स के लिये: भारत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से जुड़े प्रमुख मुद्दे, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और थोक मूल्य सूचकांक के बीच अंतर।
खुदरा कीमतों में उतार-चढ़ाव का एक प्रमुख मापक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) दिसंबर 2025 में वार्षिक आधार पर 1.33% रहा, जो भारतीय रिज़र्व बैंक के (2% से 6%) लक्ष्य सीमा से काफी नीचे है। यह अर्थव्यवस्था में मंद मूल्य दबावों को दर्शाता है। इस सकारात्मक आँकड़े के बावजूद, CPI डेटा लगातार ऋणात्मक खाद्य मुद्रास्फीति और ग्रामीण-शहरी प्रवृत्तियों के बीच विचलन को छिपा देता है, जिससे नीतिगत विमर्श जटिल हो जाता है। संशोधित CPI शृंखला (आधार वर्ष 2024) शीघ्र ही जारी होने वाली है; ऐसे में कमज़ोर परिवारों के बीच जीवन-यापन लागत संबंधी चिंताएँ बनी हुई हैं। संतुलित नीतिगत प्रतिक्रियाओं के लिये CPI की गतिशीलता को समझना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) क्या है?
- परिचय: उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) एक सांख्यिकीय माप है जो दैनिक उपभोग के लिये उपयोग की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं के एक निश्चित समूह के लिये उपभोक्ताओं द्वारा भुगतान की गई कीमतों में समय के साथ होने वाले औसत परिवर्तन को दर्शाता है।
- इसके विपरीत, थोक मूल्य सूचकांक (WPI), थोक या उत्पादक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में औसत परिवर्तन का आकलन करता है।
- उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) द्वारा मापी गई भारत की खुदरा मुद्रास्फीति दिसंबर 2025 में 1.33% रही।
- CPI के प्रमुख प्रकार:
- संयुक्त CPI (ग्रामीण+शहरी): आधार वर्ष— 2012, जिसका उपयोग मुख्य मुद्रास्फीति संकेतक और RBI की मौद्रिक नीति (मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण) के लिये किया जाता है।
- औद्योगिक श्रमिकों (IW) के लिये CPI: आधार वर्ष— 2016, जिसका उपयोग औद्योगिक और केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के महँगाई भत्ते (DA) के संशोधन के लिये किया जाता है।
- कृषि श्रमिक (AL) के लिये CPI: आधार वर्ष— 2019, जिसका उपयोग भारत में कृषि श्रमिकों के लिये जीवन यापन की लागत में परिवर्तन (मुद्रास्फीति) पर नज़र रखने के लिये किया जाता है, जिसका उपयोग वेतन निर्धारण और सामाजिक सुरक्षा विश्लेषण के लिये किया जाता है।
- CPI-ग्रामीण श्रमिक (CPI-RL): आधार वर्ष— 2019, यह ग्रामीण श्रमिक परिवारों द्वारा सामना की जाने वाली मूल्य परिवर्तनों को मापता है, जिसका उपयोग न्यूनतम मज़दूरी निर्धारण और ग्रामीण आजीविका स्थितियों के मूल्यांकन में प्रयुक्त होता है।
- CPI जारी करने वाली संस्थाएँ:
- राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा CPI-समेकित, CPI-ग्रामीण और CPI-शहरी जारी किये जाते हैं, जिनका उपयोग खुदरा मुद्रास्फीति मापन एवं नीतिगत उद्देश्यों के लिये होता है।
- श्रम ब्यूरो द्वारा CPI-औद्योगिक श्रमिक, CPI-कृषि श्रमिक और CPI-ग्रामीण श्रमिक जारी किये जाते हैं, जिनका मुख्य उपयोग मज़दूरी निर्धारण, महँगाई भत्ता संशोधन एवं श्रमिक कल्याण से संबंधित उद्देश्यों के लिये किया जाता है।
- CPI के प्रमुख घटक (वजन सहित):
- खाद्य एवं पेय पदार्थ (45.86% ) — उच्चतम भार
- विविध (28.32%) — स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन
- आवास (10.07%)
- ईंधन और प्रकाश (6.84%)
- कपड़े और जूते (6.53%)
- पान, तंबाकू और मादक पदार्थ (2.38%)
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और थोक मूल्य सूचकांक में क्या अंतर है?
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पहलू |
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) |
थोक मूल्य सूचकांक (WPI) |
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अर्थ |
खुदरा/उपभोक्ता स्तर पर औसत मूल्य परिवर्तनों को मापता है |
थोक/उत्पादक स्तर पर औसत मूल्य परिवर्तनों को मापता है |
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मुद्रास्फीति प्रकार |
खुदरा या जीवनयापन लागत मुद्रास्फीति |
थोक या उत्पादक मुद्रास्फीति |
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द्वारा संकलित |
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO), विज्ञान, प्रौद्योगिकी मंत्रालय |
आर्थिक सलाहकार कार्यालय (OEA), वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय |
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आधार वर्ष |
वर्ष 2012 = 100 (2024 तक संशोधन जारी है) |
वर्ष 2011–12 = 100 |
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RBI द्वारा उपयोग |
मुद्रास्फीति को लक्षित करने के लिये उपयोग किया जाता है |
मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के लिये उपयोग नहीं किया जाता है |
भारत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- खाद्य पदार्थों का उच्च भार पूर्वाग्रह: खाद्य और पेय पदार्थों का संयुक्त CPI में लगभग 46% भार होता है, जिससे मुद्रास्फीति मानसून के झटकों, आपूर्ति में व्यवधान एवं खाद्य कीमतों में अस्थिरता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है तथा प्रायः सामान्यीकृत मुद्रास्फीति को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है।
- उदाहरण के लिये, जून 2024 में सब्ज़ियों की कीमतों में तीव्र वृद्धि के कारण हेडलाइन CPI भारतीय रिज़र्व बैंक की सहनशीलता सीमा से ऊपर चला गया, जबकि खाद्य और ईंधन को छोड़कर मापी जाने वाली ‘कोर मुद्रास्फीति’ तुलनात्मक रूप से मध्यम बनी रही।
- डिजिटल ब्लाइंडस्पॉट— आधुनिक सेवाओं की अदृश्यता: तीव्र शहरीकरण और डिजिटल सेवाओं की बढ़ती खपत CPI में पर्याप्त रूप से परिलक्षित नहीं होती है, जिससे शहरी मध्यम वर्ग के मुद्रास्फीति दबावों का सीमित प्रतिनिधित्व होता है।
- यह सूचकांक वर्ष 2016 के बाद की डिजिटल क्रांति को शामिल नहीं करता है तथा स्मार्टफोन, 5G डेटा पैक, OTT सब्सक्रिप्शन एवं गिग-इकोनॉमी जैसे आवश्यक आधुनिक व्यय को नजरअंदाज़ करता है।
- इन ‘नई आवश्यकताओं’ का आकलन न कर पाने के कारण CPI विशेषकर शहरी क्षेत्रों में औसत भारतीय परिवार के वास्तविक जीवन-यापन खर्च को कम करके दर्शाता है।
- यह सूचकांक वर्ष 2016 के बाद की डिजिटल क्रांति को शामिल नहीं करता है तथा स्मार्टफोन, 5G डेटा पैक, OTT सब्सक्रिप्शन एवं गिग-इकोनॉमी जैसे आवश्यक आधुनिक व्यय को नजरअंदाज़ करता है।
- आपूर्ति पक्ष द्वारा संचालित मुद्रास्फीति का प्रभुत्व: भारत में CPI मुद्रास्फीति प्रायः मांग के बजाय आपूर्ति झटकों (खाद्य पदार्थ, ईंधन, लॉजिस्टिक्स) से संचालित होती है, जिससे ब्याज दर आधारित मौद्रिक नीति की प्रभावशीलता सीमित हो जाती है।
- भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85% आयात करता है, जिससे घरेलू मुद्रास्फीति वैश्विक मूल्य झटकों के प्रति अत्यधिक सुभेद्य हो जाती है।
- उदाहरण के लिये, यूक्रेन युद्ध के बाद वर्ष 2022 में कच्चे तेल की कीमतों में हुई वृद्धि ने ईंधन और परिवहन लागत को तेज़ी से बढ़ा दिया, जिससे घरेलू मांग में कमी के बावजूद CPI में वृद्धि हुई।
- भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85% आयात करता है, जिससे घरेलू मुद्रास्फीति वैश्विक मूल्य झटकों के प्रति अत्यधिक सुभेद्य हो जाती है।
- सीमित क्षेत्रीय सटीकता: CPI राष्ट्रीय तथा व्यापक ग्रामीण-शहरी अनुमान तो उपलब्ध कराता है, किंतु राज्यों और शहरों के बीच मौजूद तीव्र मूल्य-असमानताओं को समुचित रूप से नहीं दर्शाता। इससे राज्य-विशिष्ट नीतिगत प्रतिक्रियाओं की उपयोगिता सीमित हो जाती है।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2022–23 के दौरान सब्ज़ियों की कीमतों में वृद्धि से बंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरी केंद्रों में खाद्य मुद्रास्फीति तीव्र रही, जबकि कई पूर्वी एवं उत्तरी राज्यों में मूल्यवृद्धि अपेक्षाकृत कम थी। इसके बावजूद CPI ने केवल औसत राष्ट्रीय प्रवृत्ति को ही प्रदर्शित किया।
- इस प्रकार राज्यों और शहरों के स्तर पर मूल्य-दबाव के छिप जाने से राज्य सरकारों की लक्षित राजकोषीय, करात्मक अथवा बाज़ार-आधारित हस्तक्षेपों की क्षमता सीमित हो जाती है।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2022–23 के दौरान सब्ज़ियों की कीमतों में वृद्धि से बंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरी केंद्रों में खाद्य मुद्रास्फीति तीव्र रही, जबकि कई पूर्वी एवं उत्तरी राज्यों में मूल्यवृद्धि अपेक्षाकृत कम थी। इसके बावजूद CPI ने केवल औसत राष्ट्रीय प्रवृत्ति को ही प्रदर्शित किया।
- वेतन मुद्रास्फीति से असंगति: CPI मुद्रास्फीति हमेशा वेतन वृद्धि के अनुरूप नहीं होती है, विशेषकर अनौपचारिक क्षेत्र में, जिससे मध्यम हेडलाइन मुद्रास्फीति के बावजूद वास्तविक आय में गिरावट आती है।
- उदाहरण के लिये, दिसंबर 2025 में शीर्ष CPI मुद्रास्फीति लगभग 1.3% तक गिर गई, फिर भी कमज़ोर वेतन वृद्धि, जो शहरी क्षेत्रों में लगभग ₹24,400 और ग्रामीण क्षेत्रों में ₹17,000 की औसत मासिक आय (PLFS 2023-24) में परिलक्षित होती है, का अर्थ है कि कई अनौपचारिक एवं कम वेतन वाले श्रमिकों को वास्तविक आय में गिरावट का सामना करना पड़ा, जिससे मूल्य स्थिरता व आजीविका सुरक्षा के बीच का अंतर उजागर हुआ।
- आवास मुद्रास्फीति का संरचनात्मक अल्पमूल्यांकन: CPI आवास सूचकांक, जिसका भार 10.07% है, गतिशील, बाज़ार से जुड़े किराये के रुझानों को प्रतिबिंबित करने के बजाय पुराने स्थिर किराये और सरकारी आवास डेटा पर बहुत अधिक निर्भर करता है।
- इसमें ग्रामीण परिवारों के लिये अनुमानित किराए को भी शामिल नहीं किया गया है। परिणामस्वरूप, यह सूचकांक जीवन यापन की वास्तविक लागत को काफी कम करके आँकता है, जहाँ अचल संपत्ति के उतार-चढ़ाव से परिवारों की क्रय शक्ति में भारी कमी आती है।
- अनौपचारिक बाज़ार संबंधी समस्याएँ: अनौपचारिक बाज़ारों से मूल्य संग्रह के कारण गुणवत्ता में सुधार, मुद्रास्फीति में कमी और छिपी हुई मूल्य वृद्धि के लिये समायोजन करना मुश्किल हो जाता है, जिससे सटीकता प्रभावित होती है।
- उदाहरण के लिये, अनौपचारिक खुदरा बाज़ारों में, पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में प्रायः ‘श्रिंकफ्लेशन’ (अर्थात समान कीमत पर कम मात्रा या मौन रूप से गुणवत्ता में गिरावट) का अनुभव होता है, जिसे दर्ज कीमतों में पूर्णतः परिलक्षित नहीं किया जाता।
- परिणामस्वरूप, परिवारों को जीवन यापन की प्रभावी लागत का सामना करना पड़ता है जो कि CPI द्वारा दर्शाई गई लागत से अधिक होती है, जिससे वास्तविक मुद्रास्फीति के दबावों का कम अनुमान लगाया जाता है।
- उदाहरण के लिये, अनौपचारिक खुदरा बाज़ारों में, पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में प्रायः ‘श्रिंकफ्लेशन’ (अर्थात समान कीमत पर कम मात्रा या मौन रूप से गुणवत्ता में गिरावट) का अनुभव होता है, जिसे दर्ज कीमतों में पूर्णतः परिलक्षित नहीं किया जाता।
भारत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को मज़बूत करने के लिये कौन-से उपाय आवश्यक हैं?
- खाद्य पदार्थों के अत्यधिक भार को संतुलित करना: खाद्य और पेय पदार्थों का CPI-संयुक्त में लगभग 46% हिस्सा होने के कारण, भारत की शीर्ष मुद्रास्फीति आपूर्ति-पक्ष के आघात से असमान रूप से प्रभावित रहती है।
- एंगेल के नियम के अनुरूप— जिसके अनुसार आय बढ़ने पर कुल आय में खाद्य व्यय का अनुपात घटता है, भले ही खाद्य पर किया गया वास्तविक व्यय बढ़े और बढ़ती आय के संदर्भ में, भारों का क्रमिक पुनर्संतुलन आवश्यक है। साथ ही, नीति-संकेत के लिये कोर मुद्रास्फीति पर अधिक बल देने से, खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताओं की उपेक्षा किये बिना, मौद्रिक संचरण में सुधार किया जा सकता है।
- क्षेत्रीय CPI को मज़बूत करना: भारत का CPI कार्यढाँचा मुख्य रूप से राष्ट्रीय और व्यापक ग्रामीण-शहरी सूचकांक प्रदान करता है, जो अंतर-राज्यीय एवं अंतर-शहरी मुद्रास्फीति भिन्नताओं को छिपाता है।
- मूल्य संग्रह केंद्रों के नेटवर्क का विस्तार करने तथा राज्य-स्तरीय एवं प्रमुख शहर-स्तरीय CPI सूचकांकों को प्रकाशित करने से विकेंद्रीकृत मुद्रास्फीति प्रबंधन संभव होगा और क्षेत्र-विशिष्ट मूल्य दबावों से निपटने में केंद्र-राज्य समन्वय में सुधार होगा।
- आवास और सेवाओं की मुद्रास्फीति के बेहतर मापन: तेज़ शहरीकरण के बावजूद, सीमित किराया बाज़ार कवरेज तथा पद्धतिगत बाधाओं के कारण CPI में आवास एवं सेवाओं की मुद्रास्फीति का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है।
- शहरी किराये के रुझान, निजी शिक्षा शुल्क, स्वास्थ्य देखभाल लागत और परिवहन सेवाओं को बेहतर ढंग से समझने की आवश्यकता है।
- नगरपालिका के किराये के रिकॉर्ड, स्कूल शुल्क संरचना और बीमा प्रीमियम जैसे प्रशासनिक डेटासेट को एकीकृत करने के साथ-साथ शहरी मूल्य सर्वेक्षणों को सुदृढ़ करने से CPI वास्तविक जीवन-यापन लागत की स्थितियों के साथ अधिक निकटता से संरेखित होगा।
- आपूर्ति-पक्षीय मुद्रास्फीति का प्रबंधन: भारत में CPI अस्थिरता का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा आपूर्ति-पक्षीय कारकों से उत्पन्न होता है, जो मौद्रिक नीति के तत्काल नियंत्रण से परे हैं।
- इस तरह की मुद्रास्फीति की स्थिति में गैर-मौद्रिक हस्तक्षेपों की आवश्यकता होती है, जिनमें बफर स्टॉक प्रबंधन, सुनियोजित व्यापार नीतियाँ, लॉजिस्टिक्स में सुधार एवं बाज़ार सुधार शामिल हैं।
- RBI और कृषि, खाद्य और वाणिज्य से संबंधित मंत्रालयों के बीच संस्थागत समन्वय को सुदृढ़ करने से संरचनात्मक रूप से प्रेरित मूल्य दबावों से निपटने के लिये ब्याज दर उपकरणों पर अत्यधिक निर्भरता को रोका जा सकेगा।
- इस तरह की मुद्रास्फीति की स्थिति में गैर-मौद्रिक हस्तक्षेपों की आवश्यकता होती है, जिनमें बफर स्टॉक प्रबंधन, सुनियोजित व्यापार नीतियाँ, लॉजिस्टिक्स में सुधार एवं बाज़ार सुधार शामिल हैं।
- अनौपचारिक बाज़ारों में छिपी मुद्रास्फीति का पर्दाफाश: भारत में CPI मूल्य संग्रह बहुत हद तक अनौपचारिक बाज़ारों पर निर्भर करता है, जहाँ गुणवत्ता में भिन्नता, सिकुड़न मुद्रास्फीति और उत्पाद प्रतिस्थापन आम बात है, जिससे प्रायः मुद्रास्फीति को कम करके आँका जाता है।
- OECD मैनुअल ऑन CPI मेजरमेंट की सिफारिशों के आधार पर, भारत को गुणवत्ता में होने वाले परिवर्तनों को समायोजित करने के लिये हेडोनिक मूल्य निर्धारण विधियों और डिजिटल मूल्य ट्रैकिंग को अपनाने की आवश्यकता है।
- GST डेटा, ई-कॉमर्स कीमतों और स्कैनर डेटा का उपयोग करने से सटीकता में सुधार होगा तथा यह सुनिश्चित होगा कि CPI नाममात्र मूल्य स्थिरता के बजाय उपभोक्ता क्रय शक्ति में वास्तविक परिवर्तनों को प्रतिबिंबित करे।
- संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से मौसमी अस्थिरता को कम करना: कृषि कीमतों में मौसमी उतार-चढ़ाव CPI रीडिंग में महीने-दर-महीने तीव्र अस्थिरता का कारण बनता रहता है, जिससे नीतिगत प्रतिक्रियाएँ जटिल हो जाती हैं।
- किसानों की आय दोगुनी करने पर दलवई समिति ने शीत भंडारण, खाद्य प्रसंस्करण, कटाई-पश्चात अवसंरचना तथा e-NAM जैसे मंचों के माध्यम से बाज़ार एकीकरण में निवेश पर ज़ोर दिया है।
- इन संरचनात्मक सुधारों से अपव्यय कम होगा, आपूर्ति शृंखलाएँ सुगम होंगी और उपभोक्ता कीमतें स्थिर होंगी, जिससे CPI व्यापक आर्थिक प्रबंधन के लिये एक अधिक विश्वसनीय संकेतक बन जाएगा।
निष्कर्ष:
यद्यपि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI ) भारत में खुदरा मुद्रास्फीति का आधिकारिक मापक बना हुआ है, परंतु वर्ष 2012 को आधार वर्ष मानने की इसकी दीर्घकालिक निर्भरता ने उपभोग के बदलते पैटर्न, सेवाओं की मुद्रास्फीति और शहरी लागत दबावों को प्रतिबिंबित करने की इसकी क्षमता को सीमित कर दिया है। नवीनतम घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण के आधार पर वर्ष 2024 तक किये जा रहे आधार संशोधन से प्रतिनिधित्व, भार और मद कवरेज में सुधार की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम उठाया गया है। बेहतर क्षेत्रीय विवरण और मुख्य मुद्रास्फीति संकेतकों के उपयोग के साथ, यह सुधार मौद्रिक नीति संचरण को सुदृढ़ करेगा। इस प्रकार, नियमित रूप से अद्यतन CPI तेज़ी से बदलती भारतीय अर्थव्यवस्था में वास्तविक जीवन-यापन लागत परिवर्तनों को बेहतर ढंग से दर्शाएगी।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. मूल्य सूचकांकों को अद्यतन करना सांख्यिकीय अभ्यास होने के साथ-साथ आर्थिक प्रशासन का भी एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। भारत के CPI सुधारों के संदर्भ में इस कथन पर चर्चा कीजिये, जिसमें आधार वर्ष संशोधन, क्षेत्रीय स्तर पर विश्लेषण और वैकल्पिक मुद्रास्फीति संकेतकों का उपयोग शामिल है। |
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. CPI क्या आकलन करता है?
यह उपभोक्ताओं द्वारा सामना की जाने वाली खुदरा कीमतों में होने वाले परिवर्तनों का आकलन करता है, जो जीवन-यापन लागत से जुड़ी मुद्रास्फीति को दर्शाता है।
प्रश्न 2. भारत में CPI प्रायः अस्थिर क्यों रहता है?
क्योंकि CPI में खाद्य वस्तुओं का भार अधिक है तथा मानसून और लॉजिस्टिक्स में व्यवधान जैसे आपूर्ति-पक्षीय झटकों का प्रभाव पड़ता है।
प्रश्न 3. CPI के आधार वर्ष में संशोधन की आवश्यकता क्यों थी?
क्योंकि वर्ष 2012 का आधार वर्ष वर्तमान उपभोग पैटर्न और सेवाओं से जुड़ी मुद्रास्फीति को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं करता था।
प्रश्न 4. नए CPI आधार वर्ष (2024) का महत्त्व क्या है?
यह नवीनतम उपभोग आँकड़ों और अद्यतन भारों के माध्यम से सूचकांक की प्रतिनिधित्व क्षमता को बेहतर बनाता है।
प्रश्न 5. RBI CPI के साथ-साथ कोर मुद्रास्फीति पर भी नजर क्यों रखता है?
खाद्य और ईंधन की कीमतों में अस्थिरता को दूर करने और अंतर्निहित मांग दबावों का आकलन करने के लिये।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2010)
- भारत में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यू.पी.आई.) केवल मासिक आधार पर उपलब्ध है।
- औद्योगिक कामगारों के लिये उपभोक्ता मूल्य सूचकांक [CPI (IW)] की तुलना में, डब्ल्यू.पी.आई. खाद्य पदार्थों को कम महत्त्व देता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (d)
प्रश्न 2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2020)
- खाद्य वस्तुओं का ‘उपभोक्ता मूल्य सूचकांक’ (CPI) में भार (Weightage) उनके ‘थोक मूल्य सूचकांक’ (WPI) में दिये गए भार से अधिक है।
- WPI, सेवाओं के मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों को नहीं पकड़ता, जैसा कि CPI करता है।
- भारतीय रिज़र्व बैंक ने अब मुद्रास्फीति के मुख्य मान हेतु तथा प्रमुख नीतिगत दरों के निर्धारण और परिवर्तन हेतु WPI को अपना लिया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर : (a)
