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ध्यान दें:

प्रिलिम्स फैक्ट्स

प्रारंभिक परीक्षा

इंडिया एनर्जी वीक (IEW) 2026

स्रोत: पीआईबी

चर्चा में क्यों?

भारत ने गोवा में आयोजित इंडिया एनर्जी वीक (IEW) 2026 का समापन किया, जिसमें वैश्विक स्तर पर ऊर्जा अस्थिरता की स्थितियों के निवारण हेतु भारत की तैयारियों को विश्व-पटल पर रखा गया। इस आयोजन ने एक प्रमुख वैश्विक ऊर्जा शक्ति के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिये पारंपरिक ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित करने और ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों की ओर संक्रमण को गति देने की भारत की दोहरी रणनीति पर बल दिया।

इंडिया एनर्जी वीक 2026 की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

  • ऊर्जा संवर्द्धन: भारत ने इस बात पर बल दिया कि वैश्विक ऊर्जा संक्रमण मूल रूप से केवल प्रतिस्थापन के बजाय "ऊर्जा संवर्द्धन" के बारे में है, जिसके लिये तेल, गैस, जैव ईंधन, हरित हाइड्रोजन और द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) में निरंतर निवेश की आवश्यकता है।
    • भारत ने वैश्विक निवेश को आकर्षित करने के लिये ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी (OALP) और डिस्कवर्ड स्मॉल फील्ड्स (DSF) बिडिंग राउंड के माध्यम से बड़े बेसिनों को वैश्विक निवेश हेतु खोलने के अपने दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला।
    • वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद, कीमतों में अस्थिरता का असर भारतीय उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ा है। तेल विपणन कंपनियों (OMC) के समय पर किये गए हस्तक्षेपों के कारण, भारत ने ईंधन और LPG की वैश्विक स्तर पर सबसे कम कीमतों को बनाए रखा है।
  • भारत-UAE ऊर्जा साझेदारी: IEW, 2026 के दौरान यूएई ने भारत को कच्चे तेल और LPG के एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्त्ता के रूप में अपनी भूमिका को मबूत किया, साथ ही चेतावनी दी कि अपर्याप्त निवेश वैश्विक ऊर्जा प्रणाली के लिये सबसे बड़ा जोखिम है।
    • भारत के तेल आयात का चौथा सबसे बड़ा स्रोत संयुक्त अरब अमीरात है, जो रूस, इराक और सऊदी अरब के बाद आता है।
    • UAE भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और दूसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य भी है, जहाँ वित्त वर्ष 2024–25 में निर्यात 36.63 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक रहा। दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार को वित्त वर्ष 2025 के 100.06 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़ाकर 2032 तक 200 अरब अमेरिकी डॉलर करने का लक्ष्य रखा है।
  • वैश्विक मांग के प्रेरक तत्त्व: सम्मेलन में यह रेखांकित किया गया कि भविष्य की वैश्विक ऊर्जा मांग उभरते बाज़ारों, डिजिटलीकरण और विविध ऊर्जा प्रणालियों के एकीकरण से संचालित होगी, और इन व्यापक प्रवृत्तियों के केंद्र में भारत रहेगा।
  • गोवा के लिये नवीन दृष्टि: मेबान राज्य के रूप में गोवा ने वर्ष 2050 तक 100% नवीकरणीय ऊर्जा प्राप्त करने की अपनी रूपरेखा प्रस्तुत की, जिसमें हरित अर्थव्यवस्था और ब्लू इकोनॉमी (समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग) के बीच संतुलन की आवश्यकता पर बल दिया गया।

इंडिया एनर्जी वीक (IEW)

  • पहली बार 2023 में शुरू किया गया, इंडिया एनर्जी वीक (IEW) भारत का प्रमुख वैश्विक ऊर्जा मंच है, जिसे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoP&NG) के संरक्षण में आयोजित किया जाता है। यह एक सुरक्षित, संधारणीय और किफायती ऊर्जा भविष्य को बढ़ावा देने के लिये सरकारों, उद्योग जगत के प्रमुख और नवप्रवर्तकों को एक साथ लाता है।
    • IEM एक तटस्थ अंतर्राष्ट्रीय मंच के रूप में कार्य करता है जो नीतिगत संवाद, निवेश की सुविधा और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देता है।

भारत में ऊर्जा सुरक्षा

  • IRENA अक्षय ऊर्जा सांख्यिकी 2025 के अनुसार, भारत वैश्विक स्तर पर सौर ऊर्जा क्षमता में तीसरे, पवन ऊर्जा में चौथे और कुल अक्षय ऊर्जा क्षमता में चौथे स्थान पर है, जो तीव्र स्वच्छ ऊर्जा विस्तार को दर्शाता है।
  • तीसरा सबसे बड़ा शुद्ध ऊर्जा आयातक होने के बावजूद, भारत ने अपनी संचयी स्थापित बिजली क्षमता का 50% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त कर लिया है, जो वर्ष 2030 के लक्ष्य से पाँच वर्ष पहले हासिल किया गया है।
  • हालाँकि, विश्व आर्थिक मंच के ऊर्जा संक्रमण सूचकांक 2025 में देश वर्ष 2024 की 63वीं रैंक से फिसलकर 118 देशों में 71वें स्थान पर आ गया है।
  • ऊर्जा सुरक्षा पहल: भारत के अक्षय ऊर्जा संक्रमण को प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना और विकेंद्रीकृत सौर अपनाने के लिये प्रधानमंत्री-कुसुम जैसी पहलों, जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति 2018 (एथनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम (EBP) के तहत 2025 में पेट्रोल में 20% एथनॉल सम्मिश्रण हासिल किया गया), और राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन द्वारा संचालित किया जा रहा है।
    • इन प्रयासों को अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के माध्यम से सौर कूटनीति, वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड (OSOWOG), सौर पार्क योजना के तहत विस्तार, परमाणु ऊर्जा मिशन के माध्यम से प्रमुख परमाणु क्षमता प्रयास और ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस जैसी वैश्विक साझेदारियों द्वारा सुदृढ़ किया जा रहा है।
  • अपस्ट्रीम रिफॉर्म:
    • तेलक्षेत्र (विनियमन और विकास) संशोधन अधिनियम, 2025: घरेलू तेल और गैस उत्पादन को सरल नियमों के माध्यम से बढ़ावा देना।
    • पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियम, 2025: नियामक निश्चितता और व्यवसाय को सुगम बनाना।
    • हाइड्रोकार्बन अन्वेषण लाइसेंसिंग नीति (HELP) और ओपन एकडेज लाइसेंसिंग नीति (OALP): घरेलू तेल और गैस अन्वेषण व उत्पादन को बढ़ावा देना।
  • डाउनस्ट्रीम रिफॉर्म: एकीकृत पाइपलाइन टैरिफ (UPT): "वन नेशन, वन गैस ग्रिड" के तहत क्षेत्रीय गैस मूल्य असमानताओं को कम करना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 

1. इंडिया एनर्जी वीक (IEW) क्या है?
IEW ऊर्जा सुरक्षा, स्थिरता, निवेश और प्रौद्योगिकी सहयोग पर संवाद के लिये भारत का प्रमुख वैश्विक ऊर्जा मंच है।

2. भारत की ऊर्जा रणनीति में "ऊर्जा संवर्द्धन" का क्या अर्थ है?
यह रणनीति एक ईंधन को दूसरे से बदलने के बजाय, पारंपरिक ईंधन और स्वच्छ ऊर्जा दोनों में निवेश करके कुल ऊर्जा आपूर्ति का विस्तार करने पर बल देती है।

3. भारत ने वैश्विक ऊर्जा मूल्य में होने वाले आघातों से उपभोक्ताओं की रक्षा कैसे की है?
तेल विपणन कंपनियों के समय पर हस्तक्षेप के माध्यम से, भारत ने वैश्विक अस्थिरता के बावजूद ईंधन और एलपीजी की कीमतों को कम बनाए रखा है।

4. नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में भारत की प्रमुख उपलब्धियाँ क्या हैं?
सौर ऊर्जा में भारत तीसरे, पवन ऊर्जा में चौथे, कुल नवीकरणीय क्षमता में चौथे स्थान पर है, और इसने अपने वर्ष 2030 के लक्ष्य से पहले ही 50% गैर-जीवाश्म बिजली उत्पादन क्षमता हासिल कर ली है।

5. ऊर्जा संक्रमण सूचकांक में भारत की रैंकिंग चिंता का विषय क्यों है?
क्षमता वृद्धि के बावजूद, वहनीयता, ग्रिड एकीकरण, भंडारण और समग्र संक्रमण दक्षता में चुनौतियाँ बनी हुई हैं, जो इसकी निम्न वैश्विक रैंकिंग में परिलक्षित होती हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रिलिम्स:

प्रश्न. भारतीय नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी लिमिटेड (IREDA) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं? (2015)

  1. यह एक पब्लिक लिमिटेड सरकारी कंपनी है।
  2. यह एक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी है।

नीचे दिये गए कोड का उपयोग करके सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)


मेंस:

प्रश्न. "वहनीय (ऐफोर्डेबल), विश्वसनीय, धारणीय तथा आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच संधारणीय (सस्टेनबल) विकास लक्ष्यों (एस० डी० जी०) को प्राप्त करने के लिये अनिवार्य है।" भारत में इस संबंध में हुई प्रगति पर टिप्पणी कीजिये। (2018)


प्रारंभिक परीक्षा

अंतरिक्ष में पेटेंट संबंधी कानून

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

पृथ्वी-आधारित बौद्धिक संपदा (IPR) कानून चंद्रमा या मंगल पर जल निष्कर्षण जैसी जीवन-रक्षक प्रौद्योगिकियों के विकास के लिये आवश्यक संप्रभुता‑मुक्त और खुले नवाचार मॉडल से टकराते हैं। इससे बड़े पैमाने पर बहुराष्ट्रीय सहयोग की स्पष्ट आवश्यकता होने के बावजूद एक गंभीर कानूनी चुनौती उत्पन्न होती है।

वर्तमान पेटेंट संबंधी कानून बाह्य अंतरिक्ष के लिये अनुपयुक्त क्यों है?

  • बाह्य अंतरिक्ष में वर्तमान पेटेंट संबंधी कानून: वर्तमान में, अंतरिक्ष-अन्वेषण करने वाले राष्ट्रों ने बाह्य अंतरिक्ष में गतिविधियों और आविष्कारों पर अपने राष्ट्रीय पेटेंट कानूनों को लागू करने के लिये सार्वभौमिक रूप से 'पंजीकरण-आधारित अधिकार क्षेत्र' के सिद्धांत [बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 (OST) का अनुच्छेद VIII] को अपनाया है। अर्थात् यदि कोई आविष्कार अमेरिकी-पंजीकृत मॉड्यूल पर किया जाता है, तो उसे कानूनी दृष्टि से अमेरिका के अधिकार क्षेत्र के भीतर घटित माना जाता है।
  • मूल रूप से कानूनी संघर्ष: पृथ्वी की पेटेंट व्यवस्था क्षेत्राधिकार के सिद्धांत पर आधारित है, जहाँ अधिकार विशिष्ट राष्ट्रीय सीमाओं से जुड़े होते हैं। यह व्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून से टकराती है, क्योंकि वर्ष 1967 की बाह्य अंतरिक्ष संधि के अनुच्छेद II के अनुसार किसी भी खगोलीय पिंड पर राष्ट्रीय संप्रभुता का दावा निषिद्ध है।
  • ISS मॉडल और इसकी सीमाएँ: अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) एक अंतरसरकारी समझौते के तहत कार्य करता है जो अधिकार क्षेत्र को मॉड्यूल-दर-मॉड्यूल आवंटित करता है, प्रत्येक को अपने भागीदार देश के क्षेत्र के रूप में मानता है। 
    • यह व्यवस्था स्थिर और खंडित संरचनाओं के लिये तो काम कर सकती है, लेकिन साझा प्लेटफॉर्म पर बहुराष्ट्रीय टीमों द्वारा संयुक्त रूप से तकनीक विकसित करने वाले एकीकृत लुनार बेस (Lunar Base) के लिये उपयुक्त नहीं है, जहाँ आविष्कार के वास्तविक स्थान की सीमाएँ कमज़ोर हो जाती हैं।
  • सैद्धांतिक स्तर पर अंतरिक्ष संबंधी कानूनों में विरोधाभास: जीवन-रक्षा से जुड़ी आवश्यक तकनीकों (जैसे- जीवन-समर्थन प्रणालियाँ) पर पेटेंट के माध्यम से विशिष्ट अधिकार स्थापित होने से व्यवहार में दूसरों को बाहर किये जाने की स्थिति बन सकती है, जो 1967 की बाह्य अंतरिक्ष संधि (OST) के उस प्रावधान से संभावित रूप से टकराता है जिसके अनुसार अंतरिक्ष का उपयोग ‘समस्त मानवता के हित में’ किया जाना चाहिये (OST, 1967 का अनुच्छेद-I)
  • असुलझे सिद्धांत और कानूनी कमियाँ: यह स्पष्ट नहीं है कि औद्योगिक संपदा के संरक्षण हेतु 1883 के पेरिस कन्वेंशन में निहित ‘अस्थायी उपस्थिति’ सिद्धांत (जो ट्रांज़िट में सामान पर पेटेंट लागू करने को सीमित करता है) अंतरिक्ष उपकरणों पर लागू होता है या नहीं, जिससे कानूनी अनिश्चितता उत्पन्न होती है। इसके अतिरिक्त, पंजीकरण प्रणाली ‘फ्लैग्स ऑफ कन्वीनियंस’ जैसी रणनीतियों को भी प्रोत्साहित कर सकती है, जहाँ संस्थाएँ अप्रभावी प्रवर्तन वाले क्षेत्रों के अधिकार-क्षेत्र का उपयोग कर पेटेंट दावों से बचने का प्रयास करती हैं।
  • समन्वय की सीमाएँ: संचालनात्मक समन्वय तंत्र, जैसे– NASA आर्टेमिस समझौते हस्तक्षेप को कम कर सकते हैं, वे अधिकार क्षेत्र का गठन नहीं करते हैं इसलिये अंतरिक्ष क्षेत्रों में स्वामित्व और प्रवर्तन से संबंधित प्रश्नों का समाधान नहीं कर पाते।
    • अंतरिक्ष-विशिष्ट बौद्धिक संपदा (IP) तंत्रों पर बढ़ती चर्चाओं के बावजूद, समन्वय अभी भी असमान बना हुआ है और अधिकांश राज्य केवल नियम-अनुसरणकर्त्ता बने हुए हैं, जिससे स्वामित्व और प्रवर्तन से जुड़े प्रश्न अब भी अनसुलझे हैं।

बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 

  • परिचय: बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 सभी खगोलीय गतिविधियों को नियंत्रित करने वाली मूलभूत कानूनी रूपरेखा है। यह शांतिपूर्ण उपयोग, गैर-अधिग्रहण (Non-appropriation) तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सिद्धांत स्थापित करती है, ताकि संघर्ष को रोका जा सके और यह सुनिश्चित हो कि अंतरिक्ष से समस्त मानवता को लाभ प्राप्त हो।
  • उत्पत्ति एवं स्थिति: संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा 1966 में अंगीकृत, 1967 में प्रभावी हुई तथा इसके 115 से अधिक पक्षकार देश हैं, जिससे यह लगभग सार्वभौमिक हथियार-नियंत्रण एवं अंतरिक्ष-शासन साधन बन जाती है। भारत ने इस संधि पर 1967 में हस्ताक्षर किये और 1982 में इसकी पुष्टि की।
  • मौलिक सिद्धांत:
    • अनुच्छेद I: समस्त मानवता के हित में अंतरिक्ष अन्वेषण का प्रावधान करता है तथा सभी राज्यों के लिये अंतरिक्ष को मुक्त घोषित करता है।
    • अनुच्छेद II: गैर-अधिग्रहण के सिद्धांत की स्थापना करता है, जिसके अंतर्गत अंतरिक्ष में संप्रभुता के दावों पर प्रतिबंध है।
    • अनुच्छेद IV: शांतिपूर्ण उपयोग को लागू करता है तथा खगोलीय पिंडों पर सामूहिक विनाश के हथियारों और सैन्य ठिकानों पर रोक लगाता है।
    • अनुच्छेद VII: किसी राज्य के अंतरिक्ष पिंडों से होने वाली क्षति के लिये राज्य की देयता निर्धारित करता है।
    • अनुच्छेद VI: निजी गतिविधियों सहित सभी राष्ट्रीय अंतरिक्ष कार्यों के लिये राज्य की ज़िम्मेदारी की पुष्टि करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. अंतरिक्ष में पेटेंट संबंधी कानून समस्याग्रस्त क्यों है?
क्योंकि पेटेंट कानून क्षेत्रीय होता है, जबकि बाह्य अंतरिक्ष पर बाह्य अंतरिक्ष संधि के अनुच्छेद II के तहत गैर-संप्रभुता का सिद्धांत लागू होता है।

2. बाह्य अंतरिक्ष संधि का अनुच्छेद VIII पेटेंट पर कैसे लागू होता है?
यह राज्यों को उनके द्वारा पंजीकृत अंतरिक्ष वस्तुओं पर अधिकार क्षेत्र प्रयोग करने की अनुमति देता है, जिससे राष्ट्रीय पेटेंट कानूनों का विस्तार अंतरिक्ष तक हो जाता है।

3. भविष्य के अंतरिक्ष आवासों के लिये ISS मॉडल अनुपयुक्त क्यों है?
ISS में मॉड्यूल-आधारित अधिकार क्षेत्र अपनाया जाता है, जो एकीकृत और बहुराष्ट्रीय चंद्र या मंगल आवासों में प्रभावी नहीं है, क्योंकि वहाँ आविष्कार सामूहिक रूप से विकसित किये जाते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2016)

इसरो द्वारा प्रक्षेपित मंगलयान:

  1. को मंगल ऑर्बिटर मिशन भी कहा जाता है।  
  2. के कारण अमेरिका के बाद मंगल ग्रह की परिक्रमा करने वाला भारत दूसरा देश बना।  
  3. ने भारत को अपने अंतरिक्ष यान को अपने पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह की परिक्रमा करने में सफल होने वाला एकमात्र देश बना दिया।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(a) केवल

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)


प्रश्न: अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी के थेमिस मिशन, जो हाल ही में खबरों में था, का उद्देश्य क्या है? (2008)

(a) मंगल ग्रह पर जीवन की संभावना का अध्ययन करना।

(b) शनि के उपग्रहों का अध्ययन करना।

(c) उच्च अक्षांश पर आकाश के रंगीन प्रदर्शन का अध्ययन करना।

(d) तारकीय विस्फोटों का अध्ययन करने के लिये एक अंतरिक्ष प्रयोगशाला का निर्माण करना।

उत्तर: (c)


प्रारंभिक परीक्षा

राष्ट्रीय महिला आयोग का 34वाँ स्थापना दिवस

स्रोत: पीआईबी 

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने 31 जनवरी को अपना 34वाँ स्थापना दिवस मनाया और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिये भारत की शीर्ष वैधानिक संस्था के रूप में अपनी भूमिका की पुनः पुष्टि की।

  • इस आयोजन में “स्वास्थ्य ही सशक्तीकरण” विषय के तहत महिलाओं के स्वास्थ्य को सशक्तीकरण और राष्ट्र निर्माण का एक प्रमुख स्तंभ बताया गया।

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) के संबंध में मुख्य बिंदु क्या हैं?

  • परिचय: राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) एक वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना 31 जनवरी, 1992 को राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 के अंतर्गत की गई थी।
    • इसका मुख्य दायित्व महिलाओं के लिये संवैधानिक संरक्षणों की समीक्षा करना, विधायी उपायों की सिफारिश करना तथा शिकायतों के निवारण को सुगम बनाना है।
  • पृष्ठभूमि: राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की स्थापना 'भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति' (CSWI) तथा ‘महिलाओं के लिये राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (1988–2000)’ की सिफारिशों के फलस्वरूप की गई थी।
  • आयोग का गठन: केंद्र सरकार इस निकाय को नामित करती है। इसकी संरचना महिलाओं के कल्याण से संबंधित विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करती है।
    • एक अध्यक्ष: जो महिलाओं के हितों/मुद्दों के प्रति समर्पित हो।
    • पाँच सदस्य: कानून, श्रमिक संघवाद, प्रबंधन, महिला स्वैच्छिक संगठनों, प्रशासन या सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में अनुभव रखने वाले क्षमता एवं सत्यनिष्ठा से युक्त व्यक्ति।
      • कम-से-कम एक सदस्य अनुसूचित जाति से तथा एक सदस्य अनुसूचित जनजाति से होना अनिवार्य है।
    • एक सदस्य-सचिव: प्रबंधन/समाजशास्त्र का विशेषज्ञ अथवा उपयुक्त अनुभव वाला कोई सिविल सेवक।
    • सभी का कार्यकाल तीन वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक (जो भी पहले हो)।
  • कार्य एवं अधिदेश 
    • जाँच: संविधान के अंतर्गत महिलाओं को प्रदान किये गए संरक्षणों से संबंधित मामलों की जाँच करना।
    • प्रतिवेदन: संरक्षण प्रावधानों के कार्यान्वयन पर केंद्र सरकार को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करना तथा प्रभावी क्रियान्वयन हेतु अनुशंसाएँ करना।
    • विधायी समीक्षा: महिलाओं से संबंधित मौजूदा कानूनों की समीक्षा करना और कमियों या त्रुटियों को दूर करने के लिये संशोधनों का सुझाव देना।
    • स्वप्रेरणा से संज्ञान: अधिकारों से वंचित किये जाने, कानूनों के अनुपालन न होने तथा नीतिगत दिशा-निर्देशों की अवहेलना से जुड़े मामलों में स्वयं पहल करना।
    • अनुसंधान एवं अध्ययन: महिलाओं की प्रगति में बाधक कारकों (जैसे- आवास, स्वास्थ्य जोखिम) की पहचान हेतु शोध करना तथा व्यापक संख्या में महिलाओं को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर मुकदमेबाज़ी के लिये वित्तीय सहायता देना।
    • निरीक्षण: कारागारों, रिमांड होम्स तथा महिला संस्थानों का निरीक्षण करना ताकि अभिरक्षा की परिस्थितियाँ उचित बनी रहें।
  • आयोग के अधिकार: राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) को सिविल न्यायालय के समान अधिकार प्राप्त हैं, जिनमें शामिल हैं: व्यक्तियों को उपस्थित करना, गवाहों से शपथपूर्वक पूछताछ करना, दस्तावेज़ मांगना, सार्वजनिक अभिलेखों की मांग करना और हलफनामों (Affidavits) के माध्यम से साक्ष्य प्राप्त करना।
    • ये अधिकार इसे अर्द्ध-न्यायिक संस्था के रूप में सशक्त बनाते हैं।
    • अपने अधिदेश के बावजूद, इसे अक्सर ‘टूथलेस टाइगर’ कहा जाता है क्योंकि यह केवल अनुशंसा करने वाली संस्था है और इसके पास प्रवर्तन संबंधी सीमित शक्तियाँ हैं।
  • पहलें:
    • हेल्पलाइन: ऑनलाइन सहायता, मानसिक परामर्श और पुलिस/अस्पताल से जुड़ने के लिये व्हाट्सएप हेल्पलाइन और 24x7 महिला हेल्पलाइन शुरू की गई।
    • महिला जन सुनवाई: शिकायतों के शीघ्र निपटान के लिये व्यक्तिगत और ऑनलाइन सुनवाई की सुविधा प्रदान करने वाला एक पायलट प्रोजेक्ट।
    • क्षमता निर्माण: पुलिसकर्मियों में लैंगिक संवेदनशीलता बढ़ाने तथा घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत प्रोटेक्शन ऑफिसर्स को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से LBSNAA के साथ सहयोग किया गया।
    • "शी इज़ अ चेंजमेकर" – राजनीति में महिलाएँ: राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) का कार्यक्रम महिलाओं के नेतृत्व और राजनीतिक भागीदारी को समर्थन करता है।
      • इसमें सार्वजनिक नीति, लैंगिक रूप से उत्तरदायी शासन, संचार और नेतृत्व पर प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।
    • साइबर सुरक्षा: महिलाओं के खिलाफ साइबर खतरों पर शोध किया गया तथा "मिज़जनी ऑनलाइन" (Misogyny Online) और सोशल मीडिया उत्तरदायित्व से संबंधित जागरूकता अभियान चलाए गए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 

1. राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) क्या है?
NCW एक वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना वर्ष 1992 में राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 के तहत महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और संवर्द्धन के लिये की गई थी।

2. NCW के प्रमुख कार्य क्या हैं?
यह कानूनी संरक्षण उपायों की समीक्षा करता है, विधायी सुधारों का सुझाव देता है, शिकायतों का निपटारा करता है, शोध-कार्य करता है तथा अभिरक्षा संस्थानों का निरीक्षण करता है।

3. NCW के पास क्या शक्तियाँ हैं?
NCW को दीवानी न्यायालय के समान अधिकार प्राप्त हैं, जिनमें व्यक्तियों को तलब करना, गवाहों से पूछताछ करना तथा आधिकारिक अभिलेख मंगाने की शक्ति शामिल है।

4. हाल ही में महिला सुरक्षा के लिये NCW ने क्या पहलें की हैं?
NCW ने 24×7 हेल्पलाइन, महिला जन सुनवाई, साइबर सुरक्षा जागरूकता कार्यक्रम और पुलिस क्षमता निर्माण जैसी पहलें शुरू की हैं।

5. भारत में महिला सशक्तीकरण के लिये NCW प्रासंगिक क्यों है?
यह नीतिगत समर्थन, शिकायत निवारण और संस्थागत सुधारों के माध्यम से लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने वाली एक शीर्ष निगरानी संस्था के रूप में कार्य करता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

मेंस

प्रश्न. महिलाएँ जिन समस्याओं का सार्वजनिक एवं निजी दोनों स्थलों पर सामना कर रही हैं, क्या राष्ट्रीय महिला आयोग उनका समाधान निकालने की रणनीति बनाने में सफल रहा है? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क प्रस्तुत कीजिये। (2017)


रैपिड फायर

महात्मा गांधी की पुण्यतिथि

स्रोत: पीआईबी

प्रधानमंत्री ने महात्मा गांधी की 78वीं पुण्यतिथि (30 जनवरी) पर गांधी स्मृति में श्रद्धांजलि अर्पित की और इस बात पर बल दिया कि उनकी विरासत आज भी पीढ़ियों को प्रेरित करती है।

  • ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: महात्मा गांधी की 30 जनवरी, 1948 को नई दिल्ली स्थित बिड़ला हाउस (अब गांधी स्मृति) में नाथूराम गोडसे द्वारा हत्या कर दी गई थी। इस अपराध के लिये गोडसे को 15 नवंबर, 1949 को अंबाला जेल में फाँसी दी गई।
    • महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्तूबर, 1869 को हुआ था और यह तिथि अब वैश्विक स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाई जाती है, जिसे संयुक्त राष्ट्र ने 2007 में उनकी शांति और अहिंसा की विचारधारा को बढ़ावा देने के लिये घोषित किया था।
  • राष्ट्रीय पालन: इस दिन को आधिकारिक रूप से शहीद दिवस (गांधीजी की पुण्यतिथि) या गांधी पुण्यतिथि के रूप में मनाया जाता है, जिसमें राजघाट (महात्मा गांधी की समाधि स्थल) पर श्रद्धांजलि दी जाती है। इसे सर्वोदय दिवस के रूप में भी मनाया जाता है, जहाँ सर्वोदय का अर्थ महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित ‘सभी का उत्थान’ है।

Mahatma_Gandhi

और पढ़ें: महात्मा गांधी की जयंती


रैपिड फायर

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा UGC 2026 के विनियमों पर रोक

स्रोत: द हिंदू 

सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने यह कहते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के विनियमों [उच्च शिक्षा संस्थानों में समता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026] के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है क्योंकि इनसे समाज में विभाजन होने और परिसर की एकता कमज़ोर पड़ने की आशंका है।  

  • न्यायिक हस्तक्षेप: चूँकि वर्ष 2012 वाले विनियम पहले ही निरस्त किये जा चुके थे, इसलिये न्यायालय ने अपने अनुच्छेद 142 के तहत निहित विशेषाधिकारों का उपयोग करते हुए निर्देश दिया कि आगामी आदेश तक UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता को बढ़ावा देने संबंधी) विनियम, 2012 ही लागू रहेंगे।
  • पृष्ठभूमि एवं संदर्भ: वर्ष 2026 के विनियम अबेदा सलीम तडवी बनाम भारत संघ (2019) मामले की पृष्ठभूमि में बनाए गए थे, जिसका उद्देश्य परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव समाप्त करने के लिये एक ठोस तंत्र स्थापित करना है।
  • वर्ष 2026 के विनियमों पर मुख्य विधिक एवं परिभाषात्मक चुनौतियाँ: याचिकाओं में विशेष रूप से धारा 3(1)(c) को चुनौती दी गई, क्योंकि यह भेदभाव को केवल SC, ST और OBC सदस्यों तक सीमित रूप से परिभाषित करती है, जिससे सामान्य वर्ग इससे पृथक् रह जाता है।
    • पीठ ने इस संकीर्ण उपबंध की आवश्यकता पर सवाल उठाया, क्योंकि धारा 3(1)(e) पहले ही धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्मस्थान या दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव की एक व्यापक और समावेशी परिभाषा प्रदान करती है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी सवाल उठाए कि क्या UGC 2026 के विनियम क्षेत्रीय आधार पर होने वाले उत्पीड़न, आर्थिक रूप से सशक्त लोगों द्वारा की जाने वाली अंतःजाति (जाति के भीतर) हिंसा/उत्पीड़न और रैगिंग की घटनाओं को पर्याप्त रूप से कवर करते हैं या नहीं। इसके अतिरिक्त, इन विनियमों में झूठी शिकायतों के लिये दंडात्मक तंत्र का भी अभाव है।
  • मुख्य न्यायिक चिंताएँ: सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरण और सामाजिक न्याय संबंधी कानूनों में विकसित "नो-रिग्रेशन सिद्धांत" का हवाला देते हुए प्रश्न किया कि वर्ष 2012 के नियमों की तुलना में वर्ष 2026 के नियम अधिक समावेशी होने के बजाय कम समावेशी क्यों हैं।
    • पीठ ने इन विनियमों की समीक्षा अनुच्छेद 15(4) के दृष्टिकोण से भी की, जो राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों, विशेषकर SC और ST के उन्नयन के लिये विशेष उपबंध करने में सक्षम बनाता है।

और पढ़ें: जाति-आधारित भेदभाव के विरुद्ध UGC के नए नियम


रैपिड फायर

डिस्कॉम्बोबुलेटर

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

अमेरिका ने कथित रूप से वेनेज़ुएला में संचालित ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व के तहत ‘डिस्कॉम्बोबुलेटर’ नामक एक गोपनीय हथियार प्रणाली का प्रयोग दुश्मन की रक्षा‑प्रणालियों को जाम करने और निष्क्रिय करने के लिये किया।

  • हथियार की प्रकृति: विशेषज्ञों का मानना है कि ‘डिस्कॉम्बोबुलेटर’ कोई एकल उपकरण न होकर कई गैर-घातक तथा इलेक्ट्रॉनिक युद्धक प्रौद्योगिकियों की तैनाती है, जिन्हें शत्रु को आवश्यक रूप से मारे बिना अक्षम करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
  • कार्मिक-विरोधी क्षमताएँ (दिग्भ्रम/अक्षमता):
    • एक्टिव डेनियल सिस्टम (ADS): एक डायरेक्टेड‑एनर्जी हथियार (जिसे अक्सर ‘हिट रे’ कहा जाता है) जो त्वचा की बाहरी सतह पर ऊर्जा का प्रभाव डालकर तेज़ जलन‑जैसी अनुभूति उत्पन्न करता है, जिससे लक्ष्य अस्थायी रूप से अक्षम हो जाता है।
    • ध्वनिक हेलिंग उपकरण (लंबी दूरी के ध्वनिक उपकरण): इन्हें ‘सॉनिक कैनन’ भी कहा जाता है; ये अत्यंत लक्षित/केंद्रित, तीखी ध्वनियाँ उत्पन्न करते हैं, जिनसे मतली, चक्कर (वर्टिगो) और भ्रम उत्पन्न होता है।
    • दृष्टि‑भ्रम उत्पन्न करने वाले हथियार: उच्च‑तीव्रता वाले लेज़र‑आधारित हथियार जो थोड़े समय के लिये लड़ाकों की दृष्टि को धुँधला कर देते हैं या उन्हें दिशाभ्रम की स्थिति में पहुँचा देते हैं।
    • वोर्टेक्स रिंग जेनरेटर: हाई‑प्रेशर पल्सेस का उपयोग कर दुर्गंधयुक्त बम (Stink Bombs) या प्रभाव उत्पन्न करने वाले पेलोड को लक्ष्य तक पहुँचाता है, जिससे मतली और असहजता उत्पन्न होती है।
  • अवसंरचना‑विरोधी क्षमताएँ (उपकरणों को निष्क्रिय करना):
    • इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर (EW): ऐसे तंत्र जो वायु‑रक्षा प्रणालियों, रडारों तथा सेंसरों को जाम करने के लिये डिज़ाइन किये जाते हैं।
    • हाई पावर माइक्रोवेव: काउंटर‑इलेक्ट्रॉनिक्स हाई पावर माइक्रोवेव एडवांस्ड मिसाइल प्रोजेक्ट (CHAMP) माइक्रोवेव स्पंदनों के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक परिपथों को नष्ट कर देता है।
    • ग्रेफाइट गोला‑बारूद: गैर‑घातक हथियार, जिनका उपयोग विद्युत ग्रिड को शॉर्ट‑सर्किट कर निष्क्रिय करने के लिये किया जाता है।
  • साइबर युद्ध का एकीकरण (सूटर कार्यक्रम): अमेरिका सूटर कार्यक्रम का उपयोग करता है, जो एक हवाई साइबर आक्रमण प्रणाली है और शत्रु के वायु‑रक्षा नेटवर्क में प्रवेश करने में सक्षम है।
    • सूटर‑1 शत्रु रडार की निगरानी करता है; सूटर‑2 शत्रु सेंसरों पर नियंत्रण स्थापित कर सकता है; सूटर‑3 सतह‑से‑वायु मिसाइल प्रक्षेपकों को नियंत्रित करने वाले संचार‑लिंक में सेंध लगाने में सक्षम प्रतीत होता है।

और पढ़ें: वेनेज़ुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप और बहुपक्षवाद का संकट


रैपिड फायर

मेड इन इंडिया C-295 एयरक्राफ्ट

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

पहला ‘मेड इन इंडिया’ C-295 एयरक्राफ्ट सितंबर 2026 से पहले वडोदरा (गुजरात) स्थित एयरबस-टाटा फाइनल असेंबली लाइन (FAL) से रोल आउट होने वाला है, जो रक्षा स्वदेशीकरण और भारत-स्पेन रणनीतिक सहयोग की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

  • यह वर्ष 2021 में एयरबस डिफेंस एंड स्पेस के साथ किये गए 21,935 करोड़ रुपए के समझौते का हिस्सा है, जिसके तहत 56 C-295 विमान शामिल हैं। इनमें से 16 विमानों की आपूर्ति स्पेन द्वारा  ‘फ्लाई-अवे’ अवस्था में की जाएगी, जबकि 40 विमानों का निर्माण भारत में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) द्वारा किया जाएगा।
    • C-295 एक ट्विन-इंजन (दो इंजनों वाला) टर्बोप्रॉप सामरिक परिवहन विमान है, जिसे मध्यम दूरी के ऑपरेशनों के लिये डिज़ाइन किया गया है, जो भारतीय वायु सेना (IAF) की क्षमताओं में वृद्धि करेगा।
    • C-295 विमान भारतीय वायु सेना के पुराने हो चुके ब्रिटिश मूल के 'एवरो-748' परिवहन विमानों का स्थान लेंगे।

भारत-स्पेन संबंध

  • रणनीतिक साझेदारी का उन्नयन: वर्ष 2026 में भारत और स्पेन ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक ले जाने की दिशा में कार्य करने पर सहमति व्यक्त की। इसके साथ ही स्पेन भारत समर्थित हिंद-प्रशांत महासागर पहल (IPOI) में भी शामिल हुआ।
  • आर्थिक एवं व्यापारिक सहयोग: स्पेन यूरोपीय यूनियन (EU) में भारत का छठा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वर्ष 2024 में द्विपक्षीय व्यापार 9.32 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचा, जबकि स्पेन भारत में 4.29 अरब अमेरिकी डॉलर के संचयी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के साथ 16वाँ सबसे बड़ा निवेशक है।
    • भारत से स्पेन को होने वाले प्रमुख निर्यात में खनिज ईंधन, रासायनिक उत्पाद, लोहा एवं इस्पात, वस्त्र, मशीनरी, समुद्री खाद्य उत्पाद और चमड़ा शामिल हैं। वहीं, स्पेन से भारत के प्रमुख आयात में यांत्रिक उपकरण, रसायन और प्लास्टिक शामिल हैं।
  • सांस्कृतिक एवं कूटनीतिक उपलब्धियाँ: दोनों देश 70 वर्षों के राजनयिक संबंधों के उपलक्ष्य में वर्ष 2026 को संस्कृति, पर्यटन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के ‘द्वैध वर्ष’ (Dual Year) के रूप में मना रहे हैं।

और पढ़ें: भारत-स्पेन संबंधों को सुदृढ़ करना


रैपिड फायर

भारत की शास्त्रीय भाषाएँ और तिरुक्कुरल की स्थायी विरासत

स्रोत: द हिंदू 

हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने शास्त्रीय भाषाओं के केंद्रों द्वारा तैयार की गई 55 साहित्यिक कृतियों का विमोचन किया, साथ ही 'तिरुक्कुरल' का एक सांकेतिक भाषा संस्करण भी जारी किया।

  • हाल ही में, केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने क्लासिकल भाषाओं के केंद्रों द्वारा तैयार की गई 55 साहित्यिक रचनाओं के साथ-साथ तिरुक्कुरल का साइन-लैंग्वेज वर्जन भी जारी किया।
  • यह पहल समावेशी और बहुभाषी भारत की परिकल्पना के अनुरूप भारत की भाषायी विरासत को शिक्षा, अनुसंधान और सांस्कृतिक गौरव के केंद्र में स्थापित करने का लक्ष्य रखती है।

शास्त्रीय भाषाएँ

  • परिचय: वर्ष 2004 में भारत सरकार ने प्राचीन साहित्यिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत के संरक्षण के उद्देश्य से कुछ भाषाओं को शास्त्रीय भाषाओं के रूप में मान्यता देना शुरू किया।
    • वर्तमान में भारत में 11 शास्त्रीय भाषाओं को मान्यता प्राप्त है— तमिल (2004), संस्कृत (2005), कन्नड़ (2008), तेलुगु (2008), मलयालम (2013), ओडिया (2014) तथा वर्ष 2024 में मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली।
      • प्रारंभ में गृह मंत्रालय ने तमिल और संस्कृत को यह दर्जा प्रदान किया गया था, इसके बाद आगे के क्रियान्वयन तथा भविष्य की मान्यताओं की ज़िम्मेदारी संस्कृति मंत्रालय को सौंप दी गई।
  • शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त करने हेतु अनिवार्य मानदंड: शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने के मानदंडों में साहित्य अकादमी के अंतर्गत गठित भाषावैज्ञानिक विशेषज्ञ समितियों (LEC) की सिफारिशों के आधार पर वर्ष 2005 तथा पुनः 2024 में संशोधन किया गया।
    • 2024 में प्रस्तुत किये गए संशोधित मानदंड इस प्रकार हैं:
      • इसके प्रारंभिक ग्रंथों/दर्ज इतिहास की प्राचीनता कम-से-कम 1500–2000 वर्षों की हो।
      • प्राचीन साहित्य/ग्रंथों का ऐसा भंडार हो, जिसे वक्ताओं की पीढ़ियों द्वारा विरासत के रूप में माना गया हो।
      • ज्ञानवर्द्धक ग्रंथ, विशेष रूप से काव्य के साथ-साथ गद्य ग्रंथ तथा पुरालेखीय और शिलालेखीय साक्ष्य।
      • शास्त्रीय भाषा और उसका साहित्य अपने वर्तमान रूप से भिन्न हो सकता है या उसकी बाद की विकसित शाखाओं से असतत (भिन्न) भी हो सकता है।
  • शास्त्रीय भाषा के दर्जे के लाभ: शास्त्रीय भाषाओं को राष्ट्रीय पुरस्कारों, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा वित्त पोषित अकादमिक पीठों और अनुसंधान एवं संरक्षण के लिये भारतीय भाषा संस्थान (CIIL), मैसूर में 'उत्कृष्टता केंद्रों' के माध्यम से सरकारी सहायता प्राप्त होती है।

तिरुक्कुरल

  • तिरुक्कुरल, जिसे लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व तिरुवल्लुवर ने रचा था, तमिल साहित्य की एक कालजयी कृति है, जो 1,330 संक्षिप्त दोहों के माध्यम से नैतिकता, शासन, अर्थव्यवस्था और मानवीय संबंधों पर सार्वभौमिक जानकारी प्रदान करती है।
    • यह अरम (सद्गुण), पोरुल (धन/अर्थ) और इनबम (प्रेम/सुख) के आधार पर संरचित है तथा धर्मपूर्वक जीवन जीने एवं सामाजिक सामंजस्य के लिये एक समग्र मार्गदर्शिका प्रस्तुत करती है।

और पढ़ें: केंद्र सरकार ने 5 नई शास्त्रीय भाषाओं को मंज़ूरी दी


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