प्रारंभिक परीक्षा
धारा 17A पर विभाजित निर्णय
चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय (SC) की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A की संवैधानिक वैधता पर विभाजित निर्णय दिया है, जिससे ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण देने और भ्रष्टाचार की निर्बाध जाँच सुनिश्चित करने के बीच के मूलभूत विमर्श को पुनः बल मिला है।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA), 1988 क्या है?
- परिचय: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भारत का प्रमुख भ्रष्टाचार-विरोधी कानून है, जिसे संथानम समिति (1962–64) की सिफारिशों के आधार पर अधिनियमित किया गया था।
- यह “लोक सेवक” की व्यापक परिभाषा प्रदान करता है, जिसमें सरकारी कर्मचारी, न्यायाधीश तथा कोई भी व्यक्ति जो सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वहन करता है, शामिल हैं और रिश्वत, अनुचित लाभ तथा आपराधिक दुराचार जैसे अपराधों को दंडनीय बनाता है।
- यह अधिनियम विशेष रूप से लोक सेवकों द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किये गए इन अपराधों के लिये दंड का प्रावधान करता है।
- धारा 17A की उत्पत्ति एवं उद्देश्य: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में वर्ष 2018 के संशोधन के माध्यम से जोड़ी गई यह धारा, सद्भावना में लिये गए निर्णयों के लिये अधिकारियों को जाँच से संरक्षण प्रदान कर निर्णय-निर्माण हेतु एक “सुरक्षित क्षेत्र” बनाने के उद्देश्य से अधिनियमित की गई थी, जिससे नौकरशाही में ‘प्ले-इट-सेफ सिंड्रोम’ की प्रवृत्ति को रोका जा सके।
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A के अनुसार, किसी लोक सेवक के आधिकारिक कृत्यों के संबंध में जाँच या अन्वेषण प्रारंभ करने से पूर्व जाँच एजेंसियों (जैसे CBI या पुलिस) को संबंधित सरकारी प्राधिकरण से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य है।
- धारा 17A, अधिनियम की धारा 19 से भिन्न है, जिसमें न्यायालय में अभियोजन के चरण पर सक्षम सरकार से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने का प्रावधान किया गया है।
- विभाजित निर्णय:
- न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन (शर्त सहित समर्थन): उन्होंने माना कि ईमानदार अधिकारियों को उत्पीड़नकारी एवं निरर्थक शिकायतों से संरक्षण प्रदान करने के लिये पूर्व स्वीकृति आवश्यक है। हालाँकि, इसकी वैधता सशर्त है—पूर्व स्वीकृति सरकार द्वारा नहीं, बल्कि किसी स्वतंत्र प्राधिकरण की बाध्यकारी राय के आधार पर दी जानी चाहिये, केंद्र के मामलों में लोकपाल तथा राज्यों के मामलों में लोकायुक्त।
- न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना (अमान्य घोषित किया): उन्होंने धारा 17A को “नई बोतल में पुरानी शराब” बताते हुए असंवैधानिक घोषित किया और निर्णय दिया कि यह अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता) का उल्लंघन करती है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अभियोजन के चरण में धारा 19 पहले से ही पर्याप्त संरक्षण प्रदान करती है।
- विधिक दृष्टांत:
- विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1998): सर्वोच्च न्यायालय ने “एकल निदेश” को निरस्त कर दिया, जो एक कार्यपालिका आदेश था और जिसके तहत कुछ श्रेणियों के लोक सेवकों के विरुद्ध जाँच प्रारंभ करने से पूर्व CBI को नामित प्राधिकरण से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य था।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह निर्देश एक मनमाना संरक्षित वर्ग सृजित करता है और निष्पक्ष जाँच में बाधा उत्पन्न करता है, जिससे अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होता है।
- डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम निदेशक, CBI (2014): सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (DSPE) अधिनियम, 1946 की धारा 6A को निरस्त कर दिया, जिसमें संयुक्त सचिव और उससे ऊपर के पद के अधिकारियों की जाँच हेतु केंद्र सरकार से पूर्व स्वीकृति की अनिवार्यता थी। न्यायालय ने माना कि यह प्रावधान तर्कहीन वर्गीकरण करता है और स्वतंत्र जाँच में अवरोध उत्पन्न करता है।
- विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1998): सर्वोच्च न्यायालय ने “एकल निदेश” को निरस्त कर दिया, जो एक कार्यपालिका आदेश था और जिसके तहत कुछ श्रेणियों के लोक सेवकों के विरुद्ध जाँच प्रारंभ करने से पूर्व CBI को नामित प्राधिकरण से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य था।
- प्रणालीगत सुधारों पर प्रकाश: यह विमर्श सहायक उपायों की आवश्यकता को रेखांकित करता है, जैसे भ्रष्टाचार के मामलों का त्वरित निपटारा ताकि प्रतिरोधक प्रभाव सुनिश्चित हो सके तथा दुरुपयोग को रोकने के लिये झूठी एवं दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर दंडात्मक प्रावधान लागू करना।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A क्या है?
धारा 17A के तहत, लोक सेवकों द्वारा अपने आधिकारिक निर्णयों से संबंधित कथित अपराधों की जाँच प्रारंभ करने से पूर्व सक्षम सरकार से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य है।
2. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A, धारा 19 से किस प्रकार भिन्न है?
धारा 17A जाँच के चरण पर लागू होती है, जबकि धारा 19 न्यायालय में अभियोजन आरंभ करने से पूर्व, पूर्व स्वीकृति की अनिवार्यता निर्धारित करती है।
3. वर्ष 2018 में धारा 17A को क्यों पेश किया गया था?
धारा 17A को सद्भावना में लिये गए निर्णयों के लिये अधिकारियों को उत्पीड़नकारी जाँच से संरक्षण प्रदान कर ‘प्ले-इट-सेफ सिंड्रोम’ को रोकने के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया था।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रश्न1. 'बेनामी संपत्ति लेनदेन निषेध अधिनियम, 1988 (PBPT अधिनियम)' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)
- किसी संपत्ति लेनदेन को बेनामी लेनदेन नहीं माना जाता है यदि संपत्ति के मालिक लेनदेन से अवगत नहीं है।
- बेनामी संपत्तियाँ सरकार द्वारा अधिकृत की जा सकती हैं।
- अधिनियम में जाँच के लिये तीन प्राधिकरणों का प्रावधान है, लेकिन किसी भी अपीलीय तंत्र का प्रावधान नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) केवल 1 और 3
(d) केवल 2 और 3
उत्तर: (b)
प्रारंभिक परीक्षा
एक ज़िला एक उत्पाद (ODOP)
हाल ही में एक ज़िला एक उत्पाद (ODOP) पहल राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार के कारण खबरों में रही है, जो ज़िला स्तर पर आर्थिक विकास और स्थानीय उद्यमिता को प्रोत्साहित करने में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को दर्शाती है।
एक ज़िला एक उत्पाद (ODOP) क्या है?
- परिचय: एक ज़िला एक उत्पाद (ODOP) पहल वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की एक प्रमुख कार्यक्रम है, जिसे इन्वेस्ट इंडिया के सहयोग से उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) द्वारा लागू किया जाता है
- जापान के “वन विलेज वन प्रोडक्ट” मॉडल से प्रेरणा लेकर, ODOP प्रत्येक ज़िले के एक विशिष्ट उत्पाद की पहचान करती है तथा उसकी ब्रांडिंग और प्रचार को बढ़ावा देती है। वर्ष 2025 तक यह योजना 761 ज़िलों में 1,102 उत्पादों को शामिल करती है, जिनमें कृषि, हस्तशिल्प, वस्त्र तथा खाद्य पदार्थ शामिल हैं।
- उद्देश्य: इस योजना का उद्देश्य स्थानीय विशेषताओं को वैश्विक ब्रांड में बदलना है, इसके लिये शिल्पकारों, किसानों और छोटे उद्यमों का समर्थन किया जाता है, साथ ही भारत की सांस्कृतिक धरोहर तथा पारंपरिक कौशल को संरक्षित किया जाता है।
- वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश में शुरू हुई इस पहल की शुरुआत मुरादाबाद के पीतल के बर्तनों से हुई थी और इसने चिकनकारी कढ़ाई, मिट्टी के बर्तन, कालीन, चमड़े के उत्पाद तथा पीतल के बर्तन जैसी पारंपरिक शिल्प कलाओं को पुनरुज्जीवित करने में योगदान दिया।
- दृष्टिकोण: एक ज़िला एक उत्पाद (ODOP) पहल, आत्मनिर्भर भारत और ‘वोकल फॉर लोकल’ के लक्ष्यों को पूरा करती है। यह पहल नवाचार, सतत उत्पादन और बाज़ार पहुँच को प्रोत्साहित करती है। साथ ही, यह पारंपरिक एवं पर्यावरण-सहायक उत्पादों को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों के लिये तैयार करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- उत्पादों का चयन और कवरेज: राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा मौजूदा स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के आधार पर उत्पादों का चयन किया जाता है और इसकी जानकारी DPIIT (उद्योग संवर्द्धन और आंतरिक व्यापार विभाग) को दी जाती है।
- वर्तमान में, वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प और खनिज जैसे क्षेत्रों में 1,200 से अधिक ODOP उत्पाद आधिकारिक डिजिटल पोर्टल पर सूचीबद्ध हैं।
- बाज़ार तक पहुँच और डिजिटल एकीकरण: ODOP उत्पादों को गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM), ODOP बाज़ार तथा राज्य-स्तरीय ई-कॉमर्स पोर्टलों जैसे मंचों से जोड़कर व्यापक बाज़ार उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जिससे बिक्री और पहुँच का विस्तार हो रहा है।
- निर्यात और वैश्विक पहचान: ODOP ‘मेक इन इंडिया’, ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘डिस्ट्रिक्ट्स ऐज़ एक्सपोर्ट हब’ जैसी पहलों के साथ सामंजस्य बनाकर भारत के निर्यात पारितंत्र को सुदृढ़ करती है तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेलों और वैश्विक मंचों पर भारतीय उत्पादों का प्रदर्शन करता है।
ODOP वॉल
- ODOP वॉल SARAS आजीविका स्टोर्स जैसे मंचों पर ज़िला-विशेष स्वदेशी उत्पादों के चयनित प्रदर्शन के रूप में कार्य करती है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण कारीगरों तथा महिला स्वयं सहायता समूहों (SHG) के लिये बाज़ार पहुँच और दृश्यता को बढ़ाना है।
पीएम एकता मॉल्स
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत विकसित किये जा रहे ये मॉल स्थानीय शिल्प को राष्ट्रीय सांस्कृतिक केंद्रों और वैश्विक बाज़ार गंतव्यों में बदलने का लक्ष्य रखते हैं, जिससे आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी भारत को समर्थन मिलेगा।
- इन्हें ₹5,000 करोड़ की ब्याज-मुक्त सहायता (प्रत्येक राज्य के लिये कम से कम ₹100 करोड़) के साथ विकसित किया जा रहा है। 27 राज्यों में 29 यूनिटी मॉल स्वीकृत किये गए हैं, ताकि कारीगरों और स्थानीय उद्यमियों की बाज़ार पहुँच और आय में वृद्धि हो सके।
- ये ODOP, भौगोलिक संकेतक (GI)-टैग्ड तथा हस्तशिल्प उत्पादों को बढ़ावा देने हेतु समर्पित खुदरा केंद्रों के रूप में कार्य करेंगे, जहाँ प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के लिये ज़िला-स्तरीय विशिष्टताओं को प्रदर्शित करने हेतु निर्धारित स्थान होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. ODOP क्या है?
ODOP (वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट) एक सरकारी पहल है जो प्रत्येक ज़िले के एक विशिष्ट उत्पाद को बढ़ावा देती है, ताकि स्थानीय आजीविका और क्षेत्रीय विकास को प्रोत्साहन मिले।
2. ODOP को कब शुरू किया गया?
ODOP की शुरुआत वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश में हुई थी और बाद में इसे राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित किया गया।
3. ODOP का मुख्य उद्देश्य क्या है?
ODOP का मुख्य उद्देश्य ज़िला-स्तरीय आर्थिक क्षमता को उजागर करना है, स्थानीय कारीगरों और उत्पादकों का ब्रांडिंग, बाज़ार पहुँच और कौशल विकास के माध्यम से समर्थन करना।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स:
प्रश्न. विनिर्माण क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देने के लिये भारत सरकार की हाल की नीतिगत पहल क्या है/हैं? (2012)
- राष्ट्रीय निवेश और विनिर्माण क्षेत्र की स्थापना
- 'सिंगल विंडो क्लीयरेंस' का लाभ प्रदान करना
- प्रौद्योगिकी अधिग्रहण और विकास कोष की स्थापना
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
रैपिड फायर
नई औषधि एवं नैदानिक परीक्षण नियम, 2019 में संशोधन
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने नई औषधि एवं नैदानिक परीक्षण (NDCT) नियम, 2019 में महत्त्वपूर्ण संशोधन अधिसूचित किये हैं, जिनका उद्देश्य नियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाना और “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” फ्रेमवर्क के तहत औषधीय अनुसंधान को गति देना है।
- लाइसेंस परीक्षण में छूट: अनुसंधान, परीक्षण या विश्लेषण के लिये सीमित मात्रा में दवाओं के गैर-व्यावसायिक निर्माण हेतु सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन (CDSCO) से लाइसेंस परीक्षण प्राप्त करने की आवश्यकता को अब पूर्व-अधिसूचना तंत्र से प्रतिस्थापित किया गया है।
- यह छूट साइटोटॉक्सिक दवाओं, मादक दवाओं और मनोदैहिक पदार्थों जैसी उच्च-जोखिम वाली श्रेणियों पर लागू नहीं होगी। इनके लिये लाइसेंस अनिवार्य रहेगा।
- समय-सीमा में कमी: इस सुधार से दवा विकास चक्र में लगभग 90 दिनों की बचत होने की उम्मीद है।
- जिन श्रेणियों के लिये लाइसेंस आवश्यक है, उनके लिये कानूनी प्रसंस्करण अवधि 90 दिनों से घटाकर 45 दिन कर दी गई है। इससे CDSCO के मौजूदा मानव संसाधन का बेहतर उपयोग और नियामक दक्षता में वृद्धि होगी।
- नैदानिक अध्ययन के लिये सुविधा: निम्न-जोखिम वाले जैव उपलब्धता/जैव समतुल्यता (BA/BE) अध्ययनों के संचालन के लिये पूर्व अनुमति की आवश्यकता समाप्त कर दी गई है। अब ये अध्ययन केवल CDSCO को ऑनलाइन सूचना के साथ प्रारंभ किये जा सकते हैं।
- डिजिटल एकीकरण: प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिये नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम (NSWS) और SUGAM पोर्टल (CDSCO ई-गवर्नेंस प्लेटफॉर्म) पर समर्पित ऑनलाइन मॉड्यूल लॉन्च किये जाएंगे, जिससे पारदर्शी, पेपरलेस और सरल प्रक्रिया सुनिश्चित होगी।
- जन विश्वास सिद्धांत: ये जन विश्वास आधारित सुधार सरकार की "जन विश्वास" नीति के अनुरूप हैं, जिनका लक्ष्य भारत को वैश्विक औषधीय अनुसंधान एवं विकास केंद्र के रूप में स्थापित करना है।
रैपिड फायर
टंट्या मामा और भील जनजाति
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सम्मानित जनजातीय नायक टंट्या मामा की नई धातु प्रतिमा स्थापित किये जाने की घोषणा के बाद वे हाल के दिनों में चर्चा का विषय बने हैं।
टंट्या मामा
- परिचय: ये भील समुदाय के एक प्रमुख जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी थे। भील समुदाय मध्य प्रदेश की 1.53 करोड़ जनजातीय आबादी (ज्ञात हो कि मध्य प्रदेश में भारत की सर्वाधिक जनजातीय आबादी रहती है, जो राज्य की कुल जनसंख्या का 21% है) का लगभग 40% है।
- प्रतिरोध का काल: उन्होंने 1878 और 1889 के बीच ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का सक्रिय विरोध किया। यह संघर्ष 1857 के विद्रोह के बाद के घटनाक्रमों, राजस्व उत्पीड़न (कर की सख्ती) और जनजातीय समुदायों के शोषण की पृष्ठभूमि में हुआ था।
- लोकप्रिय छवि: अमीर ज़मींदारों और अंग्रेज़ों के सहयोगियों को निशाना बनाने और फिर उन संसाधनों को गरीब और शोषित आदिवासियों में बांटने के कारण उन्हें "भारतीय रॉबिन हुड" के रूप में सम्मानित किया जाता है। उन्हें स्नेहपूर्वक "मामा" के नाम से भी पुकारा जाता है।
भील जनजाति
- परिचय: भील भारत (2011 की जनगणना के अनुसार इनकी संख्या 46.1 लाख है, जो कुल अनुसूचित जनजाति आबादी का 37.7% है) का सबसे बड़ा जनजातीय समूह है। ये मुख्य रूप से गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश में निवास करते हैं।
- धार्मिक मान्यताएँ: ये मुख्य रूप से हिंदू धर्म को मानते हैं जिसमें प्रकृति पूजा के तत्त्व भी शामिल हैं। ये नाग देवताओं और प्रकृति के अन्य देवताओं की पूजा करते हैं। कुछ समूह (जैसे– महाराष्ट्र के निर्धी और तड़वी भील) इस्लाम का भी पालन करते हैं।
- औपनिवेशिक प्रतिरोध और शोषण का इतिहास: ब्रिटिश शासन द्वारा 'आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871' के तहत इन्हें ‘आपराधिक जनजातीय’ घोषित कर दिया गया था। इनके प्रमुख विद्रोहों में शामिल हैं:
- भगत आंदोलन (1883): गोविंद गुरु के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ यह आंदोलन 1913 के मानगढ़ नरसंहार पर समाप्त हुआ, जिसे जनजातीय जलियाँवाला बाग भी कहा जाता है।
- एकी आंदोलन (1920): मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में चलाया गया।
- समृद्ध सांस्कृतिक विरासत: यह क्षेत्र पिथौरा चित्रकला (मध्य प्रदेश) और भील कला (बिंदु शैली) जैसी विशिष्ट कला शैलियों के साथ-साथ भगोरिया (मध्य प्रदेश) और गोल गधेड़ो (गुजरात) जैसे प्रसिद्ध त्योहारों के लिये जाना जाता है।
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रैपिड फायर
साउंड-बेस्ड हीलियम लीक सेंसर
शोधकर्त्ताओं ने टोपोलॉजिकल पदार्थों (ऐसे पदार्थ जो सतह और अंदरूनी हिस्से में भिन्न व्यवहार करते हैं) का उपयोग करते हुए एक नवीन साउंड-बेस्ड सेंसर विकसित किया है, जो हीलियम के रिसाव का पता लगाने में सक्षम है। यह एक महत्त्वपूर्ण प्रगति को दर्शाता है क्योंकि हीलियम रासायनिक रूप से निष्क्रिय, दुर्लभ और औद्योगिक रूप से अत्यंत आवश्यक गैस है।
- नवोन्मेषी तंत्र: यह सेंसर कागोमे लैटिस संरचना के माध्यम से अपने त्रिकोणीय कोनों पर ध्वनि तरंगों को अवरुद्ध करता है, जिससे यह किसी रासायनिक प्रतिक्रिया के बगैर हीलियम का पता लगा सकता है।
- पता लगाने का सिद्धांत: हीलियम सेंसर में ध्वनि की गति को बदल देता है, जिससे फँसी हुई ध्वनि तरंगों की आवृत्ति (frequency) में परिवर्तन होता है। इस परिवर्तन को मापा जाता है ताकि तुरंत हीलियम की सांद्रता की गणना की जा सके।
हीलियम
- परिचय: हीलियम एक रासायनिक रूप से निष्क्रिय उदात्त गैस है, जो रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन और सामान्य परिस्थितियों में गैर-विषैली होती है। यह हाइड्रोजन के बाद ब्रह्मांड में दूसरा सबसे अधिक पाया जाने वाला तत्त्व है।
- पृथ्वी पर दुर्लभता और उत्पत्ति: पृथ्वी के वायुमंडल में हीलियम अति दुर्लभ है। यह यूरेनियम और थोरियम जैसे रेडियोधर्मी तत्त्वों के अल्फा क्षय से बनती है और आमतौर पर प्राकृतिक गैस के साथ उप-उत्पाद के रूप में निष्कर्षित होती है।
- महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोग: MRI स्कैनर (अतिचालक चुंबकों के कूलिंग), एयरोस्पेस क्षेत्र में (रॉकेट प्रणालियों की शुद्धीकरण प्रक्रिया), रिसाव पता लगाने, गुब्बारे और उत्थापन प्रयोजनों (जैसे– वायुयान), गहरे समुद्र में गोताखोरी हेतु श्वसन मिश्रणों तथा विशेष वेल्डिंग (जैसे– एल्यूमिनियम, टाइटेनियम) में एक परिरक्षी गैस के रूप में आवश्यक है जिसमें उच्च ऊष्मा की आवश्यकता होती है।
- भू-राजनीतिक एवं आपूर्ति संबंधी चिंताएँ: यह सीमित भंडार, उत्पादन संबंधी बाधाओं और बढ़ती मांग के कारण वैश्विक कमी का सामना कर रही हैं। भारत का राजमहल ज्वालामुखीय बेसिन (विशेष रूप से बकरेश्वर-तांटलोइ भू-तापीय क्षेत्र) एक संभावित घरेलू स्रोत है, जबकि अमेरिका, अल्जीरिया और रूस के पास प्रमुख वैश्विक भंडार हैं।
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रैपिड फायर
पवित्र कमल में ऊष्माजनन
हाल ही में एक अध्ययन में यह रेखांकित किया गया है कि पवित्र कमल (Nelumbo nucifera) में पुष्पन के दौरान ऊष्मा उत्पन्न करने की विशिष्ट क्षमता होती है, जो पौधों में एक दुर्लभ प्राकृतिक घटना है।
- परिचय: पवित्र कमल उत्तर एवं मध्य भारत का देशज पौधा है, जो तालाबों, झीलों तथा मंद प्रवाह वाले जलाशयों में उगता है। इसका पुष्पन ग्रीष्म ऋतु के आरंभ में होता है और प्रत्येक पुष्प सामान्यतः तीन से चार दिनों तक खिला रहता है।
- ऊष्माजनन: पुष्पन अवस्था के दौरान कमल में ऊष्माजनन (थर्मोजेनेसिस) की क्षमता पाई जाती है, अर्थात यह ऊष्मा उत्पन्न करता है। यह गुण स्कंक कैबेज और एरम लिली जैसे कुछ अन्य पौधों में भी देखा जाता है और मुख्यतः परागण की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के लिये एक अनुकूलन के रूप में विकसित हुआ है।
- मुख्य ऊष्मीय विशेषता: पुष्पन अवस्था के दौरान कमल का फूल अपना आंतरिक तापमान लगभग 30–35°C बनाए रखता है, भले ही परिवेश का तापमान लगभग 10°C तक क्यों न गिर जाए।
- ऊष्मा उत्पन्न करने की प्रक्रिया: ऊष्माजनन उस समय प्रारंभ होती है जब पंँखुड़ियाँ गुलाबी होने लगती हैं और पुष्प अपने मादा चरण (Female Phase) में प्रवेश करता है। इस अवस्था में, पुंकेसर-वहन करने वाले पुष्पासन (रिसेप्टेकल) में कैल्सियम आयनों की तीव्र वृद्धि माइटोकॉन्ड्रिया को सक्रिय करती है, जो वैकल्पिक ऑक्सीडेज मार्ग के माध्यम से संचित स्टार्च और वसा को सीधे ऊष्मा में परिवर्तित कर देते हैं।
- परागण में भूमिका: पुष्प के आधार से निकलने वाली खुशबू परागण करने वाले भृंगों (बीटल) को आकर्षित करती है। पंँखुड़ियाँ आंशिक रूप से बंद होकर एक उष्ण कक्ष का निर्माण करती हैं और इसके बाद के पुष्पन अवस्था में कीट परागकण लेकर अन्य पुष्पों तक पहुँचते हैं, जिससे परस्पर परागण (क्रॉस-पोलिनेशन) संभव होता है।
- जैविक महत्त्व: ऊष्माजनन की प्रक्रिया परागण की दक्षता को बढ़ाती है, आनुवंशिक विविधता को बढ़ावा देती है और पौधे की समग्र प्रजनन सफलता में वृद्धि करती है।
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