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धारा 17A पर विभाजित निर्णय

  • 30 Jan 2026
  • 40 min read

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय (SC) की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A की संवैधानिक वैधता पर विभाजित निर्णय दिया है, जिससे ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण देने और भ्रष्टाचार की निर्बाध जाँच सुनिश्चित करने के बीच के मूलभूत विमर्श को पुनः बल मिला है।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA), 1988 क्या है?

  • परिचय: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भारत का प्रमुख भ्रष्टाचार-विरोधी कानून है, जिसे संथानम समिति (1962–64) की सिफारिशों के आधार पर अधिनियमित किया गया था।
    • यह “लोक सेवक” की व्यापक परिभाषा प्रदान करता है, जिसमें सरकारी कर्मचारी, न्यायाधीश तथा कोई भी व्यक्ति जो सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वहन करता है, शामिल हैं और रिश्वत, अनुचित लाभ तथा आपराधिक दुराचार जैसे अपराधों को दंडनीय बनाता है।
    • यह अधिनियम विशेष रूप से लोक सेवकों द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किये गए इन अपराधों के लिये दंड का प्रावधान करता है।
  • धारा 17A की उत्पत्ति एवं उद्देश्य: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में वर्ष 2018 के संशोधन के माध्यम से जोड़ी गई यह धारा, सद्भावना में लिये गए निर्णयों के लिये अधिकारियों को जाँच से संरक्षण प्रदान कर निर्णय-निर्माण हेतु एक “सुरक्षित क्षेत्र” बनाने के उद्देश्य से अधिनियमित की गई थी, जिससे नौकरशाही में ‘प्ले-इट-सेफ सिंड्रोम’ की प्रवृत्ति को रोका जा सके।
    • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A के अनुसार, किसी लोक सेवक के आधिकारिक कृत्यों के संबंध में जाँच या अन्वेषण प्रारंभ करने से पूर्व जाँच एजेंसियों (जैसे CBI या पुलिस) को संबंधित सरकारी प्राधिकरण से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य है।
    • धारा 17A, अधिनियम की धारा 19 से भिन्न है, जिसमें न्यायालय में अभियोजन के चरण पर सक्षम सरकार से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने का प्रावधान किया गया है।
  • विभाजित निर्णय:
    • न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन (शर्त सहित समर्थन): उन्होंने माना कि ईमानदार अधिकारियों को उत्पीड़नकारी एवं निरर्थक शिकायतों से संरक्षण प्रदान करने के लिये पूर्व स्वीकृति आवश्यक है। हालाँकि, इसकी वैधता सशर्त है—पूर्व स्वीकृति सरकार द्वारा नहीं, बल्कि किसी स्वतंत्र प्राधिकरण की बाध्यकारी राय के आधार पर दी जानी चाहिये, केंद्र के मामलों में लोकपाल तथा राज्यों के मामलों में लोकायुक्त
    • न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना (अमान्य घोषित किया): उन्होंने धारा 17A को “नई बोतल में पुरानी शराब” बताते हुए असंवैधानिक घोषित किया और निर्णय दिया कि यह अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता) का उल्लंघन करती है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अभियोजन के चरण में धारा 19 पहले से ही पर्याप्त संरक्षण प्रदान करती है।
  • विधिक दृष्टांत: 
    • विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1998): सर्वोच्च न्यायालय ने “एकल निदेश” को निरस्त कर दिया, जो एक कार्यपालिका आदेश था और जिसके तहत कुछ श्रेणियों के लोक सेवकों के विरुद्ध जाँच प्रारंभ करने से पूर्व CBI को नामित प्राधिकरण से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य था।
      • न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह निर्देश एक मनमाना संरक्षित वर्ग सृजित करता है और निष्पक्ष जाँच में बाधा उत्पन्न करता है, जिससे अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होता है।
    • डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम निदेशक, CBI (2014): सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (DSPE) अधिनियम, 1946 की धारा 6A को निरस्त कर दिया, जिसमें संयुक्त सचिव और उससे ऊपर के पद के अधिकारियों की जाँच हेतु केंद्र सरकार से पूर्व स्वीकृति की अनिवार्यता थी। न्यायालय ने माना कि यह प्रावधान तर्कहीन वर्गीकरण करता है और स्वतंत्र जाँच में अवरोध उत्पन्न करता है।
  • प्रणालीगत सुधारों पर प्रकाश: यह विमर्श सहायक उपायों की आवश्यकता को रेखांकित करता है, जैसे भ्रष्टाचार के मामलों का त्वरित निपटारा ताकि प्रतिरोधक प्रभाव सुनिश्चित हो सके तथा दुरुपयोग को रोकने के लिये झूठी एवं दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर दंडात्मक प्रावधान लागू करना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A क्या है?
धारा 17A के तहत, लोक सेवकों द्वारा अपने आधिकारिक निर्णयों से संबंधित कथित अपराधों की जाँच प्रारंभ करने से पूर्व सक्षम सरकार से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य है।

2. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A, धारा 19 से किस प्रकार भिन्न है?
धारा 17A जाँच के चरण पर लागू होती है, जबकि धारा 19 न्यायालय में अभियोजन आरंभ करने से पूर्व, पूर्व स्वीकृति की अनिवार्यता निर्धारित करती है।

3. वर्ष 2018 में धारा 17A को क्यों पेश किया गया था?
धारा 17A को सद्भावना में लिये गए निर्णयों के लिये अधिकारियों को उत्पीड़नकारी जाँच से संरक्षण प्रदान कर ‘प्ले-इट-सेफ सिंड्रोम’ को रोकने के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया था।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रश्न1. 'बेनामी संपत्ति लेनदेन निषेध अधिनियम, 1988 (PBPT अधिनियम)' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)

  1. किसी संपत्ति लेनदेन को बेनामी लेनदेन नहीं माना जाता है यदि संपत्ति के मालिक लेनदेन से अवगत नहीं है। 
  2. बेनामी संपत्तियाँ सरकार द्वारा अधिकृत की जा सकती हैं। 
  3. अधिनियम में जाँच के लिये तीन प्राधिकरणों का प्रावधान है, लेकिन किसी भी अपीलीय तंत्र का प्रावधान नहीं है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) केवल 1 और 3

(d) केवल 2 और 3

उत्तर: (b)

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