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ध्यान दें:

प्रिलिम्स फैक्ट्स

प्रारंभिक परीक्षा

NavIC नेविगेशन सिस्टम

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

चर्चा में क्यों? 

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने घोषणा की कि भारत की क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली के उपग्रह (IRNSS) -1F पर लगी परमाणु घड़ी ने कार्य करना बंद कर दिया है।

  • यह भारत के नेविगेशन कॉन्स्टेलेशन में अन्य तकनीकी आघातों के बीच आया है, जिसमें NVS-02 उपग्रह का अपनी अंतिम कक्षा तक पहुँचने में विफल होना शामिल है, जिससे नाविक (नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन) की विश्वसनीयता के बारे में चिंताएँ बढ़ गई हैं।

IRNSS या NavIC क्या है?

  • परिचय: भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS), जिसे परिचालन रूप से नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन (NavIC) के रूप में जाना जाता है, भारत का स्वदेशी उपग्रह नेविगेशन सिस्टम है।
    • इसे भारत और इसकी सीमाओं से 1500 किमी. तक के उपयोगकर्त्ताओं को सटीक स्थिति की जानकारी प्रदान करने के लिये डिज़ाइन किया गया था, जो प्राथमिक सेवा क्षेत्र का निर्माण करता है।
    • इसके अतिरिक्त एक विस्तारित सेवा क्षेत्र प्राथमिक क्षेत्र और 30° दक्षिण से 50° उत्तरी अक्षांश और 30° पूर्व से 130° पूर्वी देशांतर से घिरे आयत के बीच के क्षेत्र को कवर करता है।
  • नाविक की आवश्यकता: यह परियोजना नेविगेशन सेवाओं में सामरिक स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिये शुरू की गई थी।
    • वर्ष 1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान अमेरिका ने भारत को GPS डेटा तक पहुँच से वंचित कर दिया था, जिससे विदेशी प्रणालियों पर निर्भर रहने के जोखिम उजागर हुए। इस भेद्यता को दूर करने के लिये भारत ने वर्ष 2006 में नाविक परियोजना को स्वीकृति प्रदान की।
  • नाविक सेवाएँ:
    • मानक स्थिति निर्धारण सेवा (SPS) सभी नागरिक उपयोगकर्त्ताओं के लिये उपलब्ध है और सामान्य नेविगेशन उद्देश्यों के लिये स्थिति की जानकारी प्रदान करती है।
    • प्रतिबंधित सेवा (RS) एक एंक्रिप्टेड सेवा है जो केवल अधिकृत उपयोगकर्त्ताओं के लिये उपलब्ध है, मुख्यतः सामरिक और रक्षा अनुप्रयोगों के लिये
      • सिस्टम को प्राथमिक सेवा क्षेत्र में 20 मीटर से बेहतर स्थिति की सटीकता प्रदान करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
  • प्रमुख विशेषताएँ: नाविक की मानक स्थिति निर्धारण सेवा संपूर्ण भारत में लगभग 5–10 मीटर की सटीकता प्रदान करती है।
    • भारत से 1,500 किमी. दूर तक के क्षेत्रों में लगभग 20 मीटर की सटीकता की उम्मीद है।
    • GPS के विपरीत, नाविक दोहरी आवृत्तियों (Lऔर S बैंड) का उपयोग करता है, जिससे वायुमंडलीय त्रुटियों का बेहतर सुधार और संभावित रूप से उच्च सटीकता प्राप्त होती है।
      • यह उत्खात क्षेत्रों, जैसे– घाटियों, वनों एवं शहरी क्षेत्रों में जहाँ GPS सिग्नल कमज़ोर हो सकते हैं, वैश्विक प्रणालियों से बेहतर काम करता है।
  • नाविक के अनुप्रयोग: स्थलीय, हवाई और समुद्री नेविगेशन, आपदा प्रबंधन, वाहन ट्रैकिंग और बेड़ा प्रबंधन का समर्थन करता है।
    • मोबाइल फोन और स्मार्ट डिवाइस के साथ एकीकरण को सक्षम बनाता है, सटीक समय सेवाएँ  प्रदान करता है और ड्राइवरों, पैदल यात्रियों एवं अन्य यात्रियों के लिये मानचित्रण, भूगणितीय डेटा संग्रह और नेविगेशन असिस्टेंस का समर्थन करता है।
  • नाविक सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन का प्रदर्शन: नाविक कॉन्स्टेलेशन का निर्माण ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV) का उपयोग करके उपग्रह प्रक्षेपणों की एक शृंखला के माध्यम से किया गया है।
    • पहली पीढ़ी (IRNSS शृंखला): नाविक उपग्रहों की पहली पीढ़ी में IRNSS-1 शृंखला शामिल है, जिसे वर्ष 2013 और 2018 के बीच लॉन्च किया गया था।
      • प्रमुख उपग्रहों में IRNSS-1A, 1B, 1C, 1D, 1E, 1F, 1G और प्रतिस्थापन उपग्रह IRNSS-1I शामिल हैं।
      • IRNSS-1H (2017), जिसे IRNSS-1A को बदलने के लिये लॉन्च किया गया था, हीट शील्ड सेपरेशन फेल्योर के कारण कक्षा तक पहुँचने में विफल रहा।
      • वर्ष 2017 में IRNSS-1H मिशन के विफल होने के बाद IRNSS-1I को वर्ष 2018 में एक प्रतिस्थापन के रूप में लॉन्च किया गया था।
      • इस शृंखला के कई उपग्रहों में परमाणु घड़ी की विफलता का अनुभव हुआ है या वे अपने मिशन लाइफ के अंत के करीब हैं, जिससे नेविगेशन सर्विस प्रभावित हो रही है।
    • दूसरी पीढ़ी (NVS शृंखला): NVS शृंखला नाविक उपग्रहों की दूसरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे विश्वसनीयता में सुधार और क्षमताओं का विस्तार करने के लिये विकसित किया गया है।
      • इसमें NVS-01, NVS-02 शामिल हैं।
      • NVS-01 (2023) परिचालन में है और इसमें स्वदेशी रूप से विकसित रुबिडियम (परमाणु) घड़ी और L1 बैंड सिग्नल शामिल हैं।
      • NVS-02 (2025) को एक ऑनबोर्ड तकनीकी समस्या के कारण अपनी अंतिम परिचालन कक्षा तक पहुँचने में समस्या का सामना करना पड़ा।
      • नए उपग्रहों का मिशन लाइफ 12 वर्ष है, जो पिछली पीढ़ी के 10-वर्षीय जीवनकाल से उन्नत है।
      • L5 और S आवृत्ति संकेतों के अतिरिक्त नए उपग्रह तीसरी आवृत्ति, L1 में संचारित होते हैं।
        • L1 आवृत्ति GPS जैसी अन्य वैश्विक स्थिति निर्धारण प्रणालियों के साथ अंतर-संचालन में सुधार करती है और नाविक डेटा को कम-शक्ति वाले पहनने योग्य उपकरणों, जैसे– स्मार्टवॉच में उपयोग करने की अनुमति देती है।
    • सक्रिय उपग्रह: IRNSS-1F की परमाणु घड़ी के खराब होने के बाद, वर्तमान में केवल चार उपग्रह ही वास्तविक डेटा प्रदान करने में सक्षम हैं: IRNSS-1B, 1C, 1I और नई पीढ़ी का NVS-01
  • नाविक में तकनीकी विकास:
    • स्वदेशी परमाणु घड़ियाँ: इसरो ने आयातित आवृत्ति मानकों पर निर्भरता कम करने के लिये भारतीय रुबिडियम परमाणु घड़ियाँ विकसित कीं। ये घड़ियाँ उपग्रहों की अगली पीढ़ी (NVS शृंखला) को शक्ति प्रदान करेंगी।
    • NavIC-कोम्पैटिबल चिप्स: क्वालकॉम चिपसेट ने वर्ष 2020 में NavIC सिग्नल का समर्थन करना शुरू किया।
      • भविष्य के उपकरण L1 बैंड सिग्नल का समर्थन करेंगे, जिससे स्मार्टफोन और IoT उपकरणों के साथ संगतता में सुधार होगा।
    • स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर: IIT बॉम्बे द्वारा विकसित अजित माइक्रोप्रोसेसर (भारत में अवधारणा, डिजाइन, विकास और निर्मित होने वाला पहला माइक्रोप्रोसेसर), को नाविक रिसीवर में एकीकृत करने की योजना है।
  • नीतिगत और नियामक विकास: नाविक-आधारित वाहन ट्रैकिंग सिस्टम 2019 से संबंधित नियमों को भारत में वाणिज्यिक वाहनों के लिये अनिवार्य कर दिया गया था।
    • वर्ष 2019 में अमेरिका ने राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण अधिनियम, 2020 के तहत नाविक को एक संबद्ध नेविगेशन प्रणाली के रूप में मान्यता प्रदान की।
    • नाविक 2025 भारत के राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला के लिये संदर्भ समय प्रदाता के रूप में भी कार्य करेगा।

अन्य देशों के उपग्रह नेविगेशन प्रणालियाँ

  • ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS)
    • संयुक्त राज्य अमेरिका: ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम (GPS)
    • रूस: GLONASS(ग्लोबलनाया नाविगात्सियोन्नाया स्पुतनिकवाया सिस्तेमा)
    • यूरोपीय संघ: गैली लियो
    • चीन: बेइदौ
  • क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणालियाँ
    • भारत: NavIC (IRNSS)
    • जापान: क्वासी-ज़ेनिथ सैटेलाइट सिस्टम (QZSS), जो जापान के ऊपर GPS संकेतों को सुदृढ़/सहायक बनाता है।
  • उपग्रह तारामंडलों में प्रमुख अंतर
    • GPS, GLONASS और गैलीलियो: मध्यम पृथ्वी कक्षा (~20,000 किमी.) में 20 से अधिक उपग्रहों के साथ संचालित होते हैं।
    • BeiDou: लगभग 40 से अधिक उपग्रहों का उपयोग करता है, जो मध्यम पृथ्वी कक्षा तथा भू-समकालिक कक्षा (~35,000 किमी.) के संयोजन में संचालित होते हैं।
    • NavIC और QZSS: इनमें अपेक्षाकृत कम उपग्रह होते हैं और ये मुख्यतः उच्च भू-समकालिक कक्षाओं में संचालित होते हैं, इसलिये इनका ध्यान वैश्विक नेविगेशन के बजाय क्षेत्रीय कवरेज प्रदान करने पर होता है।

एटॉमिक क्लॉक क्या है?

  • परिचय: एटॉमिक क्लॉक एक अत्यंत सटीक समय मापने वाला उपकरण है, जो समय को परमाणुओं की प्राकृतिक कंपन आवृत्ति (Natural Vibration Frequency) के आधार पर मापता है (आवृत्ति मूलतः समय का व्युत्क्रम होती है)।
    • सामान्य घड़ियों के विपरीत, जो यांत्रिक गति या क्वार्ट्ज़ क्रिस्टल पर निर्भर करती हैं, एटॉमिक क्लॉक परमाणुओं के स्थिर ऊर्जा संक्रमणों का उपयोग करती हैं, जिससे वे अब तक निर्मित सबसे सटीक घड़ियाँ बन जाती हैं।
  • कार्य सिद्धांत: एटॉमिक क्लॉक इस सिद्धांत पर काम करती है कि किसी परमाणु में इलेक्ट्रॉन को एक ऊर्जा स्तर से दूसरे ऊर्जा स्तर में स्थानांतरित करने के लिये आवश्यक माइक्रोवेव की विशेष आवृत्ति को मापा जाता है।
    • यह आवृत्ति प्रत्येक प्रकार के परमाणु के लिये स्थिर होती है और समय मापने के लिये प्राकृतिक संदर्भ के रूप में कार्य करती है।
  • सटीकता: एटॉमिक क्लॉक अत्यंत सटीक और स्थिर होती हैं। कुछ उन्नत एटॉमिक क्लॉक लाखों वर्षों में भी एक सेकंड से कम का अंतर (आगे या पीछे) करती हैं, जिससे वे अत्यधिक सटीक समय की आवश्यकता वाले अनुप्रयोगों के लिये आदर्श बन जाती हैं।
  • नेविगेशन में उपयोग: एटॉमिक क्लॉक का व्यापक उपयोग GPS और NavIC जैसी उपग्रह नेविगेशन प्रणालियों में किया जाता है, जहाँ वे उपग्रहों और रिसीवरों के बीच संकेतों के यात्रा करने में लगे सटीक समय को मापती हैं, जिससे सटीक स्थान का निर्धारण किया जा सके।
  • महत्त्व: अत्यधिक सटीक एटॉमिक क्लॉक अंतरिक्ष यानों की ट्रैकिंग, उनकी पथ-रेखाओं (trajectories) की गणना करने तथा गहरे अंतरिक्ष अभियानों के लिये स्वायत्त नेविगेशन को संभव बनाने में भी सहायता करती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. NavIC क्या है?
NavIC (Navigation with Indian Constellation) भारत की स्वदेशी क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली है, जो भारत तथा उसकी सीमाओं से लगभग 1500 किमी. तक के क्षेत्र में सटीक स्थान और समय संबंधी सेवाएँ प्रदान करती है।

2. भारत ने NavIC क्यों विकसित किया?
NavIC का विकास नेविगेशन सेवाओं में सामरिक स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिये किया गया था, विशेषकर 1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान जब अमेरिका ने GPS डेटा उपलब्ध कराने से मना कर दिया था।

3. NavIC द्वारा प्रदान की जाने वाली दो सेवाएँ क्या हैं?
NavIC नागरिक उपयोगकर्त्ताओं के लिये स्टैंडर्ड पोज़िशनिंग सर्विस (SPS) और अधिकृत उपयोगकर्त्ताओं सहित सैन्य के लिये प्रतिबंधित सेवा (RS), एक एंक्रिप्टेड नेविगेशन सेवा प्रदान करता है।

4. नेविगेशन उपग्रहों में एटॉमिक क्लॉक क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
एटॉमिक क्लॉक अत्यंत सटीक समय संकेत प्रदान करती हैं, जिससे उपग्रह सिग्नल के यात्रा समय को मापकर सटीक स्थान और स्थिति निर्धारित कर सकते हैं।

5. दूसरी पीढ़ी के NavIC उपग्रहों (NVS शृंखला) में मुख्य सुधार क्या हैं?
NVS उपग्रहों में स्वदेशी रूबिडियम एटॉमिक क्लॉक, 12 वर्ष का लंबा मिशन जीवन और L1 आवृत्ति संकेत शामिल हैं, जो उनकी सटीकता बढ़ाते हैं और उन्हें वैश्विक नेविगेशन प्रणालियों के साथ संगत बनाते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से किस देश का अपना सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम है? (2023)

(a) ऑस्ट्रेलिया

(b) कनाडा

(c) इज़रायल

(d) जापान

उत्तर: (d)


प्रश्न 2. भारतीय क्षेत्रीय-संचालन उपग्रह प्रणाली (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम /IRNSS) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (2018)

  1. IRNSS के तुल्यकाली (जियोस्टेशनरी) कक्षाओं में तीन उपग्रह हैं और भूतुल्यकाली (जियोसिंक्रोनस) कक्षाओं में चार उपग्रह हैं।
  2. IRNSS की व्याप्ति सम्पूर्ण भारत पर और इसकी सीमाओं के लगभग 5500 वर्ग किमी बाहर तक है।
  3. 2019 के मध्य तक भारत की, पूर्ण वैश्विक व्याप्ति के साथ अपनी उपग्रह संचालन प्रणाली होगी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 1 और 2

(c) केवल 2 और 3

(d) कोई नहीं

उत्तर: (a) 


मेन्स 

प्रश्न. भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) की आवश्यकता क्यों है? यह नेविगेशन में कैसे मदद करती है? (2018)


चर्चित स्थान

खर्ग द्वीप–फुजैरा हमले

स्रोत: द हिंदू 

पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव इस चर्चा के बाद बढ़ गया है कि अमेरिका ने कथित तौर पर ईरान के प्रमुख तेल निर्यात केंद्र खर्ग द्वीप पर बमबारी की, हालाँकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के फुजैरा में तेल प्रतिष्ठानों पर हमला किया।

  • ये दोनों स्थान वैश्विक तेल आपूर्ति शृंखला के लिये महत्त्वपूर्ण केंद्र हैं और हमलों से अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग मार्ग और तेल बाज़ार खतरे में पड़ गए हैं।

खर्ग द्वीप:

  • स्थान: खर्ग द्वीप फारस की खाड़ी में ईरान का एक छोटा-सा द्वीप है, जो ईरान के दक्षिण-पश्चिमी तट से लगभग 25 किमी. दूर स्थित है।
  • ईरान का मुख्य तेल निर्यात केंद्र: यह द्वीप ईरान का प्राथमिक निर्यात केंद्र बन गया क्योंकि यह अहवाज़, मारुन और गचसारन जैसे प्रमुख तेल क्षेत्रों से पाइपलाइनों द्वारा जुड़ा हुआ है और यह अधिक गहराई के कारण सुपरटैंकरों के आवागमन को सुगम बनाता है।
    • ईरान के कुल कच्चे तेल निर्यात का लगभग 90% भाग खर्ग द्वीप से होकर गुज़रता है, यहाँ से प्रतिदिन लगभग 1.3–1.6 मिलियन बैरल तेल का परिसंचरण होता है और इसमें लगभग 30 मिलियन बैरल भंडारण करने की क्षमता है।
  • ऐतिहासिक व्यापार केंद्र: खर्ग 10वीं शताब्दी से क्षेत्रीय व्यापार नेटवर्क का हिस्सा रहा है, जो भारत और बसरा (इराक) के बीच आवागमन करने वाले मोती गोताखोरों और व्यापारियों की सेवा करता रहा है।
    • बाद में 18वीं शताब्दी में डचों ने इसे किलेबंद किया और 19वीं शताब्दी में अंग्रेज़ों ने इस पर संक्षिप्त रूप से कब्ज़ा कर लिया।

फुजैरा: 

  • स्थान: फुजैरा संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के सात अमीरातों में से एक है, जो ओमान की खाड़ी के तट पर स्थित है।
    • UAE में यह एकमात्र ऐसा अमीरात है, जिसकी फारस की खाड़ी पर कोई तटरेखा नहीं है, जो इसे ऊर्जा परिवहन के लिये सामरिक महत्त्व प्रदान करता है।
    • UAE की सीमा पश्चिम और दक्षिण में सऊदी अरब तथा पूर्व एवं उत्तर-पूर्व में ओमान से लगती है। फारस की खाड़ी में इसकी समुद्री सीमा कतर और ईरान के साथ भी लगती है।
  • होर्मुज़ जलडमरूमध्य को दरकिनार करना: हबशान-फुजैरा पाइपलाइन UAE के तेल निर्यात को एक संकीर्ण और संवेदनशील समुद्री संकीर्ण मार्ग (चोकप्वाइंट) होर्मुज़ जलडमरूमध्य को दरकिनार करने की अनुमति देती है।
  • वैश्विक ऊर्जा केंद्र: फुजैरा का बंदरगाह, विश्व के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक का केंद्र है और सिंगापुर के बाद दूसरा सबसे बड़ा जहाज़ बंकर केंद्र है।

और पढ़ें: अमेरिका-इज़रायल-ईरान युद्ध में संघर्ष क्षेत्र


रैपिड फायर

भारत का पहला पांडुलिपि मानचित्रण अभियान

स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया 

संस्कृति मंत्रालय ने भारत की पांडुलिपि विरासत का मानचित्रण करने के लिये अपनी तरह का पहला तीन माह का राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण शुरू किया है।

  • इस अभ्यास का उद्देश्य भारत की विशाल पांडुलिपि विरासत का डिजिटलीकरण करके बौद्धिक चोरी (Intellectual Piracy) पर अंकुश लगाना है, जिसमें लगभग 1 करोड़ पांडुलिपियों का विश्व का सबसे बड़ा संग्रह शामिल है।

पांडुलिपि मानचित्र सर्वेक्षण

  • परिचय: यह सर्वेक्षण देश भर में पांडुलिपियों का पता लगाने और एक समेकित राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने के लिये ज़िला स्तर से उच्च स्तर पर आयोजित किया जाएगा।
    • एकत्र किये गए डेटा को ज्ञान भारतम मिशन के तहत एक राष्ट्रीय डिजिटल भंडार में संकलित किया जाएगा।
  • उद्देश्य: इस पहल का उद्देश्य भारत की विशाल पांडुलिपि विरासत को संरक्षित, डिजिटाइज़ करना और उसे बढ़ावा देना है, जिससे अनुसंधान के लिये पहुँच में वृद्धि हो और सांस्कृतिक ज्ञान की रक्षा हो सके।
  • प्रौद्योगिकी का उपयोग: संस्थानों, संग्रहों और व्यक्तिगत संरक्षकों से प्राप्त पांडुलिपियों को संरक्षण और डिजिटलीकरण आवश्यकताओं के लिये जियोटैग किया जाएगा।
    • सर्वेक्षण दल विवरण अपलोड करने के लिये ज्ञान भारतम ऐप का उपयोग करेंगे, जिसके बाद उन्हें व्यापक रूप से सुलभ बनाने के लिये मानकीकृत करते हुए डिजिटलीकरण किया जाएगा।
  • नीतिगत संपर्क: यह पहल नई दिल्ली घोषणा (ज्ञान भारतम सम्मेलन) के अनुरूप है और भारत की संस्कृति, साहित्य और चेतना को प्रदर्शित करने के दृष्टिकोण का समर्थन करती है।
  • कार्यान्वयन ढाँचा: सर्वेक्षण मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली राज्य-स्तरीय समितियों और ज़िलाधिकारी की अध्यक्षता वाली ज़िला-स्तरीय समितियों के माध्यम से आयोजित किया जाएगा।

और पढ़ें: ज्ञान भारतम मिशन


रैपिड फायर

आर्थिक स्थिरीकरण कोष

स्रोत: बिज़नेस लाइन 

लोकसभा ने अनुदानों की पूरक मांगों (2025-26) के दूसरे बैच को मंज़ूरी दे दी तथा वित्त मंत्री ने आर्थिक स्थिरीकरण कोष (Economic Stabilisation Fund- ESF) की शुरुआत की है। यह ₹1 लाख करोड़ का वित्तीय सुरक्षा कवच व्यापक आर्थिक स्थिरता और अर्थव्यवस्था की दृढ़ता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाया गया है।

  • अनुच्छेद 115 के तहत, जब विनियोग अधिनियम द्वारा किसी सेवा के लिये अधिकृत कोष अपर्याप्त सिद्ध होता है, तो अनुदान के लिये पूरक मांगें आवश्यक होती हैं। राष्ट्रपति वित्तीय वर्ष समाप्त होने से पहले इन्हें संसद के दोनों सदनों के समक्ष अनुमोदन के लिये रखते हैं।

आर्थिक स्थिरीकरण कोष

  • परिचय: इसका उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये एक 'फाइनेंशियल शॉक एब्जॉर्बर' के रूप में कार्य करना है। यह तंत्र राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों का उल्लंघन किये  बिना, वैश्विक चुनौतियों, जैसे–  पश्चिम एशिया संघर्ष, तेल की कीमतों में वृद्धि और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान (उदाहरण के लिये, होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकेबंदी) से अर्थव्यवस्था की रक्षा करता है।
  • वित्तपोषण स्रोत: कुल शुद्ध व्यय में से 57,381.84 करोड़ रुपये पूरक मांगों के माध्यम से प्राप्त किये  गए हैं। शेष राशि की पूर्ति बचत, वसूली और विभिन्न मंत्रालयों से प्राप्त उच्चतर राशि से की गई है।
    • इस कोष का प्रबंधन वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग (DEA) द्वारा प्रबंधित आरक्षित कोष के तहत किया जाएगा।
  • राजकोषीय अनुशासन: सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि यह आवंटन अतिरिक्त ऋण के माध्यम से नहीं किया गया है और यह 2025-26 (संशोधित अनुमान) के लिये 4.4% के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को प्रभावित नहीं करेगा।
  • वैश्विक तुलना: ESF की वैश्विक तुलना अन्य देशों के संप्रभु धन कोषों या स्थिरीकरण कोषों से की जा सकती है। उदाहरण के लिये, नॉर्वे में तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिये ऐसा ही एक कोष है, जबकि चिली में यह तांबे की कीमतों में अचानक बदलावों के प्रबंधन के लिये कार्य करता है।

और पढ़ें: भारत पर अमेरिका-इज़राइल-ईरान संघर्ष के भू-आर्थिक प्रभाव


रैपिड फायर

60वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार

स्रोत: द हिंदू 

प्रतिष्ठित तमिल गीतकार और लेखक आर. वैरामुथु को 60वें ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिये चुना गया है। वे यह पुरस्कार पाने वाले तीसरे तमिल लेखक और पहले तमिल कवि बन गए हैं।

  • उन्होंने अपने उपन्यास कल्लिकट्टू इतिहासम के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार (2003) भी जीता। उन्हें वर्ष 2003 में पद्म श्री और वर्ष 2014 में पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया था।
  • यह पुरस्कार पहले तमिल लेखक अकिलन (1975) और जयकांतन (2002) को प्रदान किया जा चुका है।

ज्ञानपीठ पुरस्कार

  • परिचय: भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा वर्ष 1961 में स्थापित ज्ञानपीठ पुरस्कार लेखकों के आजीवन असाधारण योगदान को मान्यता देने वाला भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान है।
    • प्रायः "भारतीय साहित्य का नोबेल पुरस्कार" माना जाने वाला यह पुरस्कार भारत की भाषायी  विविधता और साहित्यिक अखंडता को उजागर करता है।
  • संस्थागत पृष्ठभूमि: यह पुरस्कार उद्योगपति साहू शांति प्रसाद जैन और उनकी पत्नी रमा जैन द्वारा वर्ष 1944 में स्थापित एक सांस्कृतिक संगठन भारतीय ज्ञानपीठ के माध्यम से स्थापित किया गया था। प्रथम पुरस्कार वर्ष 1965 में जी. शंकर कुरुप (मलयालम) को प्रदान किया गया था।
    • पहली महिला पुरस्कार प्राप्तकर्त्ता वर्ष 1976 में आशापूर्णा देवी (बंगाली) थीं और अंग्रेज़ी भाषा के पहले विजेता वर्ष 2018 में अमिताव घोष थे।
  • पात्रता और दायरा: यह पुरस्कार प्रतिवर्ष केवल एक भारतीय लेखक को साहित्य में उसके "असाधारण योगदान" के लिये प्रदान किया जाता है। वर्ष 1965 से 1981 तक यह पुरस्कार किसी विशिष्ट पुस्तक/कृति के लिये दिया जाता था। वर्ष 1982 से यह किसी लेखक के भारतीय साहित्य में आजीवन योगदान के लिये प्रदान किया जाता है।
    • यह आठवीं अनुसूची की सभी 22 भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेज़ी (2013 में शामिल) को भी कवर करता है। मरणोपरांत कोई पुरस्कार नहीं दिया जाता है।
  • पुरस्कार और प्रतीकात्मकता: प्राप्तकर्त्ता को 11 लाख रुपये का नकद पुरस्कार, एक प्रशस्ति पत्र और ज्ञान की देवी वाग्देवी (सरस्वती) की एक कांस्य प्रतिमा प्रदान की जाती है। यह पुरस्कार प्रायः भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है।
  • चयन प्रक्रिया: प्रतिष्ठित विद्वानों और साहित्यकारों की एक उच्च-स्तरीय समिति (प्रवर परिषद) रचनात्मकता, दृष्टिकोण और भारतीय साहित्य पर प्रभाव के आधार पर नामांकन का मूल्यांकन करती है।

और पढ़ें: 58वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार


रैपिड फायर

अमेरिका द्वारा भारत और 59 अन्य देशों में ‘बलात् श्रम’ की जाँच

स्रोत: द हिंदू

अमेरिका ने ट्रेड एक्ट, 1974 की धारा 301 के तहत भारत और 59 अन्य अर्थव्यवस्थाओं के विरुद्ध एक व्यापार जाँच शुरू की है। इस जाँच का उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि क्या इन देशों की आपूर्ति शृंखलाओं में ऐसे उत्पाद शामिल हैं जो बलात् श्रम का उपयोग करके बनाए गए हैं।

  • इस जाँच का उद्देश्य निम्न उत्पादन लागत से उत्पन्न होने वाले अनुचित व्यापार लाभों को संबोधित करना है, जिसके बारे में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USR) का तर्क है कि यह अमेरिकी उद्योगों और श्रमिकों को नुकसान पहुँचाता है।
    • अमेरिका वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में बलात् श्रम को एक ओर मानवाधिकारों का उल्लंघन और दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा मानता है।
  • टैरिफ को पुनः लागू करने का प्रयास: इस जाँच को एक कानूनी औचित्य के रूप में देखा जा रहा है ताकि शुल्क (टैरिफ) को फिर से लागू किया जा सके। यह कदम वर्ष 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व के पारस्परिक शुल्क (रेसिप्रोकल टैरिफ) को रद्द किये जाने के बाद उठाया जा रहा है।
  • वैश्विक दायरा: इस जाँच में भारत, चीन, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, रूस, बांग्लादेश और श्रीलंका सहित 60 अर्थव्यवस्थाओं को लक्षित किया गया है।
    • इस जाँच में वस्त्रों में कपास और धागे जैसे आयातित मध्यवर्ती वस्तुओं, सौर पैनलों और इलेक्ट्रॉनिक्स में उपयोग किये जाने वाले महत्त्वपूर्ण खनिजों और जैव ईंधन में उपयोग किये जाने वाले ताड़ के फलों से बने उत्पादों की जाँच की जाएगी।
  • भारत पर प्रभाव: यद्यपि भारत बंधित श्रम पद्धति (उत्सादन) अधिनियम, 1976 के तहत बँधुआ श्रम को प्रतिबंधित करता है, फिर भी इसके निर्यात उद्योगों की जाँच हो सकती है क्योंकि इनमें से कई चीन से आयातित कच्चे माल और घटकों पर निर्भर हैं।
    • सौर पैनल (चीनी पॉलीसिलिकॉन का उपयोग करने वाले), इलेक्ट्रॉनिक्स (चीनी उप-असेंबली पर निर्भर) और वस्त्र एवं परिधान (आयातित वस्त्रों का उपयोग करने वाले) जैसे प्रमुख क्षेत्र विशेष रूप से संवेदनशील हो सकते हैं।
    • इसके अतिरिक्त भारत को सौर मॉड्यूल, पेट्रोकेमिकल और इस्पात जैसे क्षेत्रों में "अतिरिक्त विनिर्माण क्षमता" पर अलग अमेरिकी जाँच का भी सामना करना पड़ रहा है।
    • यदि अमेरिका को उल्लंघन मिलते हैं, तो वह प्रभावित देशों से आयात पर भारी टैरिफ या व्यापार प्रतिबंध लगा सकता है।
      • निर्यातकों को यह सिद्ध करने के लिये सख्त ट्रेसेबिलिटी तंत्र अपनाने की आवश्यकता हो सकती है कि उत्पाद बँधुआ श्रम से मुक्त हैं।

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