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अमेरिका द्वारा भारत और 59 अन्य देशों में ‘बलात् श्रम’ की जाँच

  • 17 Mar 2026
  • 18 min read

स्रोत: द हिंदू

अमेरिका ने ट्रेड एक्ट, 1974 की धारा 301 के तहत भारत और 59 अन्य अर्थव्यवस्थाओं के विरुद्ध एक व्यापार जाँच शुरू की है। इस जाँच का उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि क्या इन देशों की आपूर्ति शृंखलाओं में ऐसे उत्पाद शामिल हैं जो बलात् श्रम का उपयोग करके बनाए गए हैं।

  • इस जाँच का उद्देश्य निम्न उत्पादन लागत से उत्पन्न होने वाले अनुचित व्यापार लाभों को संबोधित करना है, जिसके बारे में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USR) का तर्क है कि यह अमेरिकी उद्योगों और श्रमिकों को नुकसान पहुँचाता है।
    • अमेरिका वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में बलात् श्रम को एक ओर मानवाधिकारों का उल्लंघन और दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा मानता है।
  • टैरिफ को पुनः लागू करने का प्रयास: इस जाँच को एक कानूनी औचित्य के रूप में देखा जा रहा है ताकि शुल्क (टैरिफ) को फिर से लागू किया जा सके। यह कदम वर्ष 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व के पारस्परिक शुल्क (रेसिप्रोकल टैरिफ) को रद्द किये जाने के बाद उठाया जा रहा है।
  • वैश्विक दायरा: इस जाँच में भारत, चीन, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, रूस, बांग्लादेश और श्रीलंका सहित 60 अर्थव्यवस्थाओं को लक्षित किया गया है।
    • इस जाँच में वस्त्रों में कपास और धागे जैसे आयातित मध्यवर्ती वस्तुओं, सौर पैनलों और इलेक्ट्रॉनिक्स में उपयोग किये जाने वाले महत्त्वपूर्ण खनिजों और जैव ईंधन में उपयोग किये जाने वाले ताड़ के फलों से बने उत्पादों की जाँच की जाएगी।
  • भारत पर प्रभाव: यद्यपि भारत बंधित श्रम पद्धति (उत्सादन) अधिनियम, 1976 के तहत बँधुआ श्रम को प्रतिबंधित करता है, फिर भी इसके निर्यात उद्योगों की जाँच हो सकती है क्योंकि इनमें से कई चीन से आयातित कच्चे माल और घटकों पर निर्भर हैं।
    • सौर पैनल (चीनी पॉलीसिलिकॉन का उपयोग करने वाले), इलेक्ट्रॉनिक्स (चीनी उप-असेंबली पर निर्भर) और वस्त्र एवं परिधान (आयातित वस्त्रों का उपयोग करने वाले) जैसे प्रमुख क्षेत्र विशेष रूप से संवेदनशील हो सकते हैं।
    • इसके अतिरिक्त भारत को सौर मॉड्यूल, पेट्रोकेमिकल और इस्पात जैसे क्षेत्रों में "अतिरिक्त विनिर्माण क्षमता" पर अलग अमेरिकी जाँच का भी सामना करना पड़ रहा है।
    • यदि अमेरिका को उल्लंघन मिलते हैं, तो वह प्रभावित देशों से आयात पर भारी टैरिफ या व्यापार प्रतिबंध लगा सकता है।
      • निर्यातकों को यह सिद्ध करने के लिये सख्त ट्रेसेबिलिटी तंत्र अपनाने की आवश्यकता हो सकती है कि उत्पाद बँधुआ श्रम से मुक्त हैं।

और पढ़ें: भारत-अमेरिका व्यापार समझौता 2026

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