दृष्टि के NCERT कोर्स के साथ करें UPSC की तैयारी और जानें
ध्यान दें:

डेली अपडेट्स



प्रारंभिक परीक्षा

NavIC नेविगेशन सिस्टम

  • 17 Mar 2026
  • 83 min read

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

चर्चा में क्यों? 

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने घोषणा की कि भारत की क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली के उपग्रह (IRNSS) -1F पर लगी परमाणु घड़ी ने कार्य करना बंद कर दिया है।

  • यह भारत के नेविगेशन कॉन्स्टेलेशन में अन्य तकनीकी आघातों के बीच आया है, जिसमें NVS-02 उपग्रह का अपनी अंतिम कक्षा तक पहुँचने में विफल होना शामिल है, जिससे नाविक (नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन) की विश्वसनीयता के बारे में चिंताएँ बढ़ गई हैं।

IRNSS या NavIC क्या है?

  • परिचय: भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS), जिसे परिचालन रूप से नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन (NavIC) के रूप में जाना जाता है, भारत का स्वदेशी उपग्रह नेविगेशन सिस्टम है।
    • इसे भारत और इसकी सीमाओं से 1500 किमी. तक के उपयोगकर्त्ताओं को सटीक स्थिति की जानकारी प्रदान करने के लिये डिज़ाइन किया गया था, जो प्राथमिक सेवा क्षेत्र का निर्माण करता है।
    • इसके अतिरिक्त एक विस्तारित सेवा क्षेत्र प्राथमिक क्षेत्र और 30° दक्षिण से 50° उत्तरी अक्षांश और 30° पूर्व से 130° पूर्वी देशांतर से घिरे आयत के बीच के क्षेत्र को कवर करता है।
  • नाविक की आवश्यकता: यह परियोजना नेविगेशन सेवाओं में सामरिक स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिये शुरू की गई थी।
    • वर्ष 1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान अमेरिका ने भारत को GPS डेटा तक पहुँच से वंचित कर दिया था, जिससे विदेशी प्रणालियों पर निर्भर रहने के जोखिम उजागर हुए। इस भेद्यता को दूर करने के लिये भारत ने वर्ष 2006 में नाविक परियोजना को स्वीकृति प्रदान की।
  • नाविक सेवाएँ:
    • मानक स्थिति निर्धारण सेवा (SPS) सभी नागरिक उपयोगकर्त्ताओं के लिये उपलब्ध है और सामान्य नेविगेशन उद्देश्यों के लिये स्थिति की जानकारी प्रदान करती है।
    • प्रतिबंधित सेवा (RS) एक एंक्रिप्टेड सेवा है जो केवल अधिकृत उपयोगकर्त्ताओं के लिये उपलब्ध है, मुख्यतः सामरिक और रक्षा अनुप्रयोगों के लिये
      • सिस्टम को प्राथमिक सेवा क्षेत्र में 20 मीटर से बेहतर स्थिति की सटीकता प्रदान करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
  • प्रमुख विशेषताएँ: नाविक की मानक स्थिति निर्धारण सेवा संपूर्ण भारत में लगभग 5–10 मीटर की सटीकता प्रदान करती है।
    • भारत से 1,500 किमी. दूर तक के क्षेत्रों में लगभग 20 मीटर की सटीकता की उम्मीद है।
    • GPS के विपरीत, नाविक दोहरी आवृत्तियों (Lऔर S बैंड) का उपयोग करता है, जिससे वायुमंडलीय त्रुटियों का बेहतर सुधार और संभावित रूप से उच्च सटीकता प्राप्त होती है।
      • यह उत्खात क्षेत्रों, जैसे– घाटियों, वनों एवं शहरी क्षेत्रों में जहाँ GPS सिग्नल कमज़ोर हो सकते हैं, वैश्विक प्रणालियों से बेहतर काम करता है।
  • नाविक के अनुप्रयोग: स्थलीय, हवाई और समुद्री नेविगेशन, आपदा प्रबंधन, वाहन ट्रैकिंग और बेड़ा प्रबंधन का समर्थन करता है।
    • मोबाइल फोन और स्मार्ट डिवाइस के साथ एकीकरण को सक्षम बनाता है, सटीक समय सेवाएँ  प्रदान करता है और ड्राइवरों, पैदल यात्रियों एवं अन्य यात्रियों के लिये मानचित्रण, भूगणितीय डेटा संग्रह और नेविगेशन असिस्टेंस का समर्थन करता है।
  • नाविक सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन का प्रदर्शन: नाविक कॉन्स्टेलेशन का निर्माण ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV) का उपयोग करके उपग्रह प्रक्षेपणों की एक शृंखला के माध्यम से किया गया है।
    • पहली पीढ़ी (IRNSS शृंखला): नाविक उपग्रहों की पहली पीढ़ी में IRNSS-1 शृंखला शामिल है, जिसे वर्ष 2013 और 2018 के बीच लॉन्च किया गया था।
      • प्रमुख उपग्रहों में IRNSS-1A, 1B, 1C, 1D, 1E, 1F, 1G और प्रतिस्थापन उपग्रह IRNSS-1I शामिल हैं।
      • IRNSS-1H (2017), जिसे IRNSS-1A को बदलने के लिये लॉन्च किया गया था, हीट शील्ड सेपरेशन फेल्योर के कारण कक्षा तक पहुँचने में विफल रहा।
      • वर्ष 2017 में IRNSS-1H मिशन के विफल होने के बाद IRNSS-1I को वर्ष 2018 में एक प्रतिस्थापन के रूप में लॉन्च किया गया था।
      • इस शृंखला के कई उपग्रहों में परमाणु घड़ी की विफलता का अनुभव हुआ है या वे अपने मिशन लाइफ के अंत के करीब हैं, जिससे नेविगेशन सर्विस प्रभावित हो रही है।
    • दूसरी पीढ़ी (NVS शृंखला): NVS शृंखला नाविक उपग्रहों की दूसरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे विश्वसनीयता में सुधार और क्षमताओं का विस्तार करने के लिये विकसित किया गया है।
      • इसमें NVS-01, NVS-02 शामिल हैं।
      • NVS-01 (2023) परिचालन में है और इसमें स्वदेशी रूप से विकसित रुबिडियम (परमाणु) घड़ी और L1 बैंड सिग्नल शामिल हैं।
      • NVS-02 (2025) को एक ऑनबोर्ड तकनीकी समस्या के कारण अपनी अंतिम परिचालन कक्षा तक पहुँचने में समस्या का सामना करना पड़ा।
      • नए उपग्रहों का मिशन लाइफ 12 वर्ष है, जो पिछली पीढ़ी के 10-वर्षीय जीवनकाल से उन्नत है।
      • L5 और S आवृत्ति संकेतों के अतिरिक्त नए उपग्रह तीसरी आवृत्ति, L1 में संचारित होते हैं।
        • L1 आवृत्ति GPS जैसी अन्य वैश्विक स्थिति निर्धारण प्रणालियों के साथ अंतर-संचालन में सुधार करती है और नाविक डेटा को कम-शक्ति वाले पहनने योग्य उपकरणों, जैसे– स्मार्टवॉच में उपयोग करने की अनुमति देती है।
    • सक्रिय उपग्रह: IRNSS-1F की परमाणु घड़ी के खराब होने के बाद, वर्तमान में केवल चार उपग्रह ही वास्तविक डेटा प्रदान करने में सक्षम हैं: IRNSS-1B, 1C, 1I और नई पीढ़ी का NVS-01
  • नाविक में तकनीकी विकास:
    • स्वदेशी परमाणु घड़ियाँ: इसरो ने आयातित आवृत्ति मानकों पर निर्भरता कम करने के लिये भारतीय रुबिडियम परमाणु घड़ियाँ विकसित कीं। ये घड़ियाँ उपग्रहों की अगली पीढ़ी (NVS शृंखला) को शक्ति प्रदान करेंगी।
    • NavIC-कोम्पैटिबल चिप्स: क्वालकॉम चिपसेट ने वर्ष 2020 में NavIC सिग्नल का समर्थन करना शुरू किया।
      • भविष्य के उपकरण L1 बैंड सिग्नल का समर्थन करेंगे, जिससे स्मार्टफोन और IoT उपकरणों के साथ संगतता में सुधार होगा।
    • स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर: IIT बॉम्बे द्वारा विकसित अजित माइक्रोप्रोसेसर (भारत में अवधारणा, डिजाइन, विकास और निर्मित होने वाला पहला माइक्रोप्रोसेसर), को नाविक रिसीवर में एकीकृत करने की योजना है।
  • नीतिगत और नियामक विकास: नाविक-आधारित वाहन ट्रैकिंग सिस्टम 2019 से संबंधित नियमों को भारत में वाणिज्यिक वाहनों के लिये अनिवार्य कर दिया गया था।
    • वर्ष 2019 में अमेरिका ने राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण अधिनियम, 2020 के तहत नाविक को एक संबद्ध नेविगेशन प्रणाली के रूप में मान्यता प्रदान की।
    • नाविक 2025 भारत के राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला के लिये संदर्भ समय प्रदाता के रूप में भी कार्य करेगा।

अन्य देशों के उपग्रह नेविगेशन प्रणालियाँ

  • ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS)
    • संयुक्त राज्य अमेरिका: ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम (GPS)
    • रूस: GLONASS(ग्लोबलनाया नाविगात्सियोन्नाया स्पुतनिकवाया सिस्तेमा)
    • यूरोपीय संघ: गैली लियो
    • चीन: बेइदौ
  • क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणालियाँ
    • भारत: NavIC (IRNSS)
    • जापान: क्वासी-ज़ेनिथ सैटेलाइट सिस्टम (QZSS), जो जापान के ऊपर GPS संकेतों को सुदृढ़/सहायक बनाता है।
  • उपग्रह तारामंडलों में प्रमुख अंतर
    • GPS, GLONASS और गैलीलियो: मध्यम पृथ्वी कक्षा (~20,000 किमी.) में 20 से अधिक उपग्रहों के साथ संचालित होते हैं।
    • BeiDou: लगभग 40 से अधिक उपग्रहों का उपयोग करता है, जो मध्यम पृथ्वी कक्षा तथा भू-समकालिक कक्षा (~35,000 किमी.) के संयोजन में संचालित होते हैं।
    • NavIC और QZSS: इनमें अपेक्षाकृत कम उपग्रह होते हैं और ये मुख्यतः उच्च भू-समकालिक कक्षाओं में संचालित होते हैं, इसलिये इनका ध्यान वैश्विक नेविगेशन के बजाय क्षेत्रीय कवरेज प्रदान करने पर होता है।

एटॉमिक क्लॉक क्या है?

  • परिचय: एटॉमिक क्लॉक एक अत्यंत सटीक समय मापने वाला उपकरण है, जो समय को परमाणुओं की प्राकृतिक कंपन आवृत्ति (Natural Vibration Frequency) के आधार पर मापता है (आवृत्ति मूलतः समय का व्युत्क्रम होती है)।
    • सामान्य घड़ियों के विपरीत, जो यांत्रिक गति या क्वार्ट्ज़ क्रिस्टल पर निर्भर करती हैं, एटॉमिक क्लॉक परमाणुओं के स्थिर ऊर्जा संक्रमणों का उपयोग करती हैं, जिससे वे अब तक निर्मित सबसे सटीक घड़ियाँ बन जाती हैं।
  • कार्य सिद्धांत: एटॉमिक क्लॉक इस सिद्धांत पर काम करती है कि किसी परमाणु में इलेक्ट्रॉन को एक ऊर्जा स्तर से दूसरे ऊर्जा स्तर में स्थानांतरित करने के लिये आवश्यक माइक्रोवेव की विशेष आवृत्ति को मापा जाता है।
    • यह आवृत्ति प्रत्येक प्रकार के परमाणु के लिये स्थिर होती है और समय मापने के लिये प्राकृतिक संदर्भ के रूप में कार्य करती है।
  • सटीकता: एटॉमिक क्लॉक अत्यंत सटीक और स्थिर होती हैं। कुछ उन्नत एटॉमिक क्लॉक लाखों वर्षों में भी एक सेकंड से कम का अंतर (आगे या पीछे) करती हैं, जिससे वे अत्यधिक सटीक समय की आवश्यकता वाले अनुप्रयोगों के लिये आदर्श बन जाती हैं।
  • नेविगेशन में उपयोग: एटॉमिक क्लॉक का व्यापक उपयोग GPS और NavIC जैसी उपग्रह नेविगेशन प्रणालियों में किया जाता है, जहाँ वे उपग्रहों और रिसीवरों के बीच संकेतों के यात्रा करने में लगे सटीक समय को मापती हैं, जिससे सटीक स्थान का निर्धारण किया जा सके।
  • महत्त्व: अत्यधिक सटीक एटॉमिक क्लॉक अंतरिक्ष यानों की ट्रैकिंग, उनकी पथ-रेखाओं (trajectories) की गणना करने तथा गहरे अंतरिक्ष अभियानों के लिये स्वायत्त नेविगेशन को संभव बनाने में भी सहायता करती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. NavIC क्या है?
NavIC (Navigation with Indian Constellation) भारत की स्वदेशी क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली है, जो भारत तथा उसकी सीमाओं से लगभग 1500 किमी. तक के क्षेत्र में सटीक स्थान और समय संबंधी सेवाएँ प्रदान करती है।

2. भारत ने NavIC क्यों विकसित किया?
NavIC का विकास नेविगेशन सेवाओं में सामरिक स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिये किया गया था, विशेषकर 1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान जब अमेरिका ने GPS डेटा उपलब्ध कराने से मना कर दिया था।

3. NavIC द्वारा प्रदान की जाने वाली दो सेवाएँ क्या हैं?
NavIC नागरिक उपयोगकर्त्ताओं के लिये स्टैंडर्ड पोज़िशनिंग सर्विस (SPS) और अधिकृत उपयोगकर्त्ताओं सहित सैन्य के लिये प्रतिबंधित सेवा (RS), एक एंक्रिप्टेड नेविगेशन सेवा प्रदान करता है।

4. नेविगेशन उपग्रहों में एटॉमिक क्लॉक क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
एटॉमिक क्लॉक अत्यंत सटीक समय संकेत प्रदान करती हैं, जिससे उपग्रह सिग्नल के यात्रा समय को मापकर सटीक स्थान और स्थिति निर्धारित कर सकते हैं।

5. दूसरी पीढ़ी के NavIC उपग्रहों (NVS शृंखला) में मुख्य सुधार क्या हैं?
NVS उपग्रहों में स्वदेशी रूबिडियम एटॉमिक क्लॉक, 12 वर्ष का लंबा मिशन जीवन और L1 आवृत्ति संकेत शामिल हैं, जो उनकी सटीकता बढ़ाते हैं और उन्हें वैश्विक नेविगेशन प्रणालियों के साथ संगत बनाते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से किस देश का अपना सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम है? (2023)

(a) ऑस्ट्रेलिया

(b) कनाडा

(c) इज़रायल

(d) जापान

उत्तर: (d)


प्रश्न 2. भारतीय क्षेत्रीय-संचालन उपग्रह प्रणाली (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम /IRNSS) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (2018)

  1. IRNSS के तुल्यकाली (जियोस्टेशनरी) कक्षाओं में तीन उपग्रह हैं और भूतुल्यकाली (जियोसिंक्रोनस) कक्षाओं में चार उपग्रह हैं।
  2. IRNSS की व्याप्ति सम्पूर्ण भारत पर और इसकी सीमाओं के लगभग 5500 वर्ग किमी बाहर तक है।
  3. 2019 के मध्य तक भारत की, पूर्ण वैश्विक व्याप्ति के साथ अपनी उपग्रह संचालन प्रणाली होगी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 1 और 2

(c) केवल 2 और 3

(d) कोई नहीं

उत्तर: (a) 


मेन्स 

प्रश्न. भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) की आवश्यकता क्यों है? यह नेविगेशन में कैसे मदद करती है? (2018)

close
Share Page
images-2
images-2