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डेली न्यूज़

  • 30 Sep, 2023
  • 48 min read
अंतर्राष्ट्रीय संबंध

नेपाल में चीन की भू-राजनीतिक पहल

प्रिलिम्स के लिये:

नेपाल में चीन की भू-राजनीतिक पहल, चीन-नेपाल संबंध, भारत-नेपाल संबंध, नेपाल की छह महीने की आर्थिक नाकेबंदी, चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI)

मेन्स के लिये:

नेपाल में चीन की भू-राजनीतिक पहल, भारत को लेकर इसके निहितार्थ

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

हाल ही में चीन और नेपाल ने व्यापार, सड़क संपर्क और सूचना प्रौद्योगिकी सहित कई क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने के लिये 12 समझौतों पर हस्ताक्षर किये।

नेपाल और चीन के बीच हस्ताक्षरित समझौते:

  • समझौतों में निम्नलिखित के लिये समझौता ज्ञापन शामिल हैं:
    • नेपाल के राष्ट्रीय योजना आयोग और चीन के राष्ट्रीय विकास एवं सुधार आयोग के बीच सहयोग।
    • डिजिटल अर्थव्यवस्था निगम को बढ़ावा।
    • हरित और निम्न-कार्बन विकास पर सहयोग।
    • कृषि, पशुधन और मत्स्य पालन के क्षेत्र में सहयोग।
    • विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार और मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में सहयोग।
    • नेपाल-चीन व्यापार और भुगतान समझौते की समीक्षा के लिये तंत्र।
  • नेपाल से चीन तक चीनी चिकित्सा के लिये पौधों से प्राप्त औषधीय सामग्रियों के निर्यात के लिये फाइटोसैनिटरी आवश्यकताओं के एक प्रोटोकॉल पर भी हस्ताक्षर किये गए।
  • नेपाल ने चीन की वैश्विक सुरक्षा पहल (GSI) में शामिल होने के चीन के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया, इस बात का समर्थन करते हुए कि भारत, चीन और अमेरिका के बीच रणनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिये संयुक्त सुरक्षा नेपाल के हित में नहीं है।

चीन-नेपाल संबंध की पूर्व स्थिति: 

  • भू-राजनीतिक संबंध:
    • नेपाल अपनी विदेश नीति की रणनीति के हिस्से के रूप में अपने दो पड़ोसियों, भारत और चीन के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है।
    • हाल के वर्षों में नेपाल में चीन का प्रभाव काफी बढ़ गया है, सितंबर 2015 से भारत द्वारा नेपाल की लगभग छह महीने की आर्थिक नाकेबंदी ने चीन को देश में तेज़ी से प्रवेश करने का मौका दिया।
      • चीन ने नेपाल की राजनीति में आक्रामक हस्तक्षेप करने के साथ ही दो कम्युनिस्ट पार्टियों- माओवादी सेंटर तथा यूनिफाइड मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट को एक साथ लाने में भूमिका निभाई।
      • नेपाल में कम्युनिस्ट आंदोलन के साथ चीन के ऐतिहासिक संबंध हैं, विशेष रूप से नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) के साथ, जो नेपाली राज्य के खिलाफ एक दशक लंबे सशस्त्र विद्रोह में शामिल थी। इस अवधि के दौरान माओवादी आंदोलन को चीन से वैचारिक, तार्किक और यहाँ तक ​​कि सैन्य समर्थन भी प्राप्त हुआ।
  • आर्थिक सहयोग:
    • व्यापार, निवेश और बुनियादी ढाँचे के विकास पर ध्यान केंद्रित करते हुए चीन एवं नेपाल के बीच आर्थिक सहयोग में तेज़ी देखी गई है।
    • क्रॉस-हिमालयन रेलवे, बंदरगाह और पनबिजली संयंत्र जैसी प्रमुख परियोजनाएँ कनेक्टिविटी बढ़ाने के साथ ही नेपाल की आर्थिक वृद्धि में योगदान दे रही हैं।
  • सुरक्षा एवं रक्षा सहयोग:
    • चीन और नेपाल संयुक्त सैन्य अभ्यास करते हैं और क्षमता निर्माण एवं सैन्य प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित करते हुए रक्षा सहयोग बढ़ा रहे हैं।
    • चीन ने अपने रक्षा संबंधों को और मज़बूत करते हुए नेपाल को सैन्य सहायता प्रदान की है।
  • चीन और नेपाल के बीच मुद्दा:
    • अपने नए मानचित्र में चीन ने नेपाल के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में भूमि के एक हिस्से की पहचान करने से इनकार कर दिया, यह एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर नेपाल ने दावा किया था और वर्ष 2020 में अपने मानचित्र में इसे चित्रित किया था।

नेपाल में चीन की बढ़ती उपस्थिति का भारत पर प्रभाव: 

  • सुरक्षा चिंताएँ:
    • नेपाल में चीन का बढ़ता प्रभाव संभावित रूप से भारत के लिये रणनीतिक घेराबंदी का कारण बन सकता है, क्योंकि यह उस देश में अपनी उपस्थिति मज़बूत करता है जो भारत के साथ लंबी सीमा साझा करता है।
    • इससे भारत के लिये सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं।
  • संसाधनों तक पहुँच:
    • नेपाल में चीन की बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ और आर्थिक जुड़ाव भारतीय निवेश तथा  आर्थिक हितों के साथ प्रतिस्पर्द्धा का कारण बन सकते हैं, जिससे क्षेत्र में संसाधनों और बाज़ारों तक भारत की पहुँच प्रभावित हो सकती है।
  • बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) और कनेक्टिविटी:
    • चीन की BRI पहल में नेपाल की भागीदारी से चीन समर्थित बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं और कनेक्टिविटी में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है, जिससे व्यापार के लिये चीन पर नेपाल की निर्भरता बढ़ेगी परिणामस्वरूप भारत के हितों को हानि होगी।
  • क्षेत्रीय समन्वय को लेकर चुनौतियाँ:
    • चीन के साथ नेपाल के घनिष्ठ संबंध दक्षिण एशिया में चीन को रणनीतिक मज़बूती प्रदान करते हैं, जिससे संभावित रूप से चीन को अपनी सीमाओं से परे शक्ति और प्रभाव दिखाने की अनुमति मिलती है।
    • नेपाल में चीन की मज़बूत भागीदारी से भारत के लिये क्षेत्रीय प्रतिक्रियाओं और पहलों को प्रभावी ढंग से समन्वित करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

भारत के लिये नेपाल का महत्त्व:

  • नेपाल का सामरिक महत्त्व:
    • नेपाल की सीमा 5 भारतीय राज्यों- उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, सिक्किम और बिहार से लगती है। इसलिये नेपाल साझे सांस्कृतिक एवं आर्थिक आदान-प्रदान का एक प्रमुख बिंदु है।
    • नेपाल, भारत की 'हिमालयी सीमाओं' के मध्य में स्थित है, और भूटान के साथ यह उत्तरी 'सीमावर्ती' पार्श्व-भाग के रूप में कार्य करता है। साथ ही यह चीन द्वारा किसी भी संभावित आक्रमण के खिलाफ बफर राज्य के रूप में कार्य करता है।
  • रक्षा सहयोग:
    • भारत उपकरण आपूर्ति और प्रशिक्षण प्रदान करने के सस्थ ही नेपाल सेना को उसके आधुनिकीकरण में सहायता करता है।
    • 'भारत-नेपाल बटालियन-स्तरीय संयुक्त सैन्य अभ्यास सूर्य किरण' का आयोजन भारत और नेपाल द्वारा बारी-बारी से किया जाता है।
      • इसके अतिरिक्त वर्तमान में नेपाल के लगभग 32,000 गोरखा सैनिक भारतीय सेना में सेवारत हैं।
  • आर्थिक सहयोग:
    • भारत, नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। नेपाल, भारत का 11वाँ सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य भी है।
    • कुल स्वीकृत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 30% से अधिक का योगदान के साथ भारतीय कंपनियाँ नेपाल में सबसे बड़े निवेशकों में से हैं।
  • 1950 की शांति और मित्रता की संधि:
    • यह संधि दोनों देशों के बीच निवास, संपत्ति, व्यापार और आवाजाही के संदर्भ में भारतीय तथा नेपाली नागरिकों के साथ पारस्परिक व्यवहार को बढ़ावा देती है।
  • विद्युत क्षेत्र में सहयोग:
    • जून 2023 में भारत और नेपाल ने एक दीर्घकालिक विद्युत व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किये, जिसमें आने वाले वर्षों में नेपाल से 10,000 मेगावाट विद्युत के आयात का लक्ष्य रखा गया।
    • फुकोट कर्णाली जलविद्युत परियोजना और लोअर अरुण जलविद्युत परियोजना के विकास के लिये भारत के नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) तथा नेपाल के विद्युत उत्पादन कंपनी लिमिटेड के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये गए।

आगे की राह

  • चुनौतियों को कम करने के लिये भारत को नेपाल के साथ सक्रिय रूप से जुड़ने, विकास में सहयोग करने, आर्थिक संबंधों को मज़बूत करने तथा लोगों के बीच संबंधों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
  • इसके अतिरिक्त भारत को नेपाल में बढ़ते चीनी प्रभाव को संतुलित करने और क्षेत्र में स्थिरता तथा समृद्धि सुनिश्चित करने के लिये बहुपक्षीय पहल एवं क्षेत्रीय सहयोग पर काम करना चाहिये।
  • इन चुनौतियों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने में कूटनीति, संवाद व सहयोग की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण हो सकती है।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रश्न. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिये: (2016)

समाचारों में कभी-कभी उल्लिखित समुदाय किसके मामले में
1. कुर्द बांग्लादेश
2. मधेसी नेपाल
3. रोहिंग्या म्याँमार

उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

(a) 1 और 2
(b) केवल 2
(c) 2 और 3
(d) केवल 3

उत्तर: (c)


शासन व्यवस्था

महिला आरक्षण विधेयक, 2023 में परिसीमन संबंधी चिंताएँ

प्रिलिम्स के लिये:

महिला आरक्षण विधेयक, 2023, परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170

मेन्स के लिये:

भारतीय संविधान, चुनाव, वैधानिक निकाय, परिसीमन प्रक्रिया

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय संसद में महिला आरक्षण विधेयक, 2023 का पारित होना देश के राजनीतिक परिदृश्य में लैंगिक समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानी गई है। 

  • हालाँकि इस ऐतिहासिक कानून का भविष्य वर्तमान में परिसीमन के मुद्दे के साथ जुड़ा हुआ है, जिसकी विपक्षी दलों ने आलोचना की है।

परिसीमन:

  • परिचय:
    • परिसीमन प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की समान संख्या सुनिश्चित करने के लिये संसदीय या विधानसभा सीट की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया है।
    • यह प्रत्येक जनगणना के बाद कुछ वर्षों में किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि देश भर में प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र का लोकसभा और राज्य विधानसभा दोनों में एक प्रतिनिधि हो।
    • परिसीमन जनसंख्या वृद्धि को राज्य में निर्वाचित विधायकों की संख्या से जोड़ता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि किसी भी प्रतिनिधि का प्रतिनिधित्व अधिक या कम न हो।
  • परिसीमन से संबंधित संवैधानिक प्रावधान:
    • अनुच्छेद 82:
      • संसद प्रत्येक जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम बनाती है। यह अधिनियम संसद को लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में सीटों के आवंटन को फिर से समायोजित करने की अनुमति देता है।
    • अनुच्छेद 170:
      • यह लेख राज्य विधानसभाओं की संरचना से संबंधित है, जिसमें न्यूनतम 60 सदस्य और अधिकतम 500 सदस्य निर्दिष्ट हैं।
      • जनसंख्या, जैसा कि सबसे हालिया जनगणना द्वारा निर्धारित की गई है, परिसीमन और सीट वितरण का आधार बनती है।
  • परिसीमन आयोग:
    • परिसीमन आयोग अधिनियम वर्ष 1952 में बनाया गया था।
      • एक बार अधिनियम लागू हो जाने के बाद केंद्र सरकार एक परिसीमन आयोग का गठन करती है।
    • वर्ष 1952, 1962, 1972 और 2002 के अधिनियमों के आधार पर चार बार वर्ष 1952, 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है। 
    • परिसीमन आयोग का गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है तथा यह भारत निर्वाचन आयोग के सहयोग से कार्य करता है।
    • आयोग का मुख्य कार्य हाल की जनगणना के आधार पर सीमाओं को फिर से तैयार करना है।
    • लोकसभा और राज्य विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की वर्तमान सीमाएँ वर्ष 2002 के परिसीमन आयोग द्वारा 2001 की जनगणना के आधार पर तैयार की गई थीं।
      • 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 ने वर्ष 1971 के परिसीमन के आधार पर लोकसभा में सीटों के आवंटन और प्रत्येक राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजन पर रोक लगा दी।
      • वर्ष 2001 में संविधान के 84वें संशोधन के साथ इस प्रतिबंध को वर्ष 2026 तक के लिये बढ़ा दिया गया।

महिला आरक्षण विधेयक, 2023 का परिसीमन से संबंध:

  • भारत सरकार ने कहा है कि महिला आरक्षण विधेयक, 2023 जनगणना के आँकड़ों के आधार पर परिसीमन प्रक्रिया शुरू होने के बाद ही लागू होगा, इसमें कोविड-19 महामारी और कई अन्य कारणों से देरी हुई है, जिसे अगले आदेश वर्ष 2024-25 तक बढ़ा दिया गया है।
  • सरकार ने तर्क दिया है कि आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने से महिलाओं हेतु सीटों का पारदर्शी तथा निष्पक्ष आवंटन सुनिश्चित होगा और पुरुषों एवं महिलाओं दोनों के लिये सीटों की कुल संख्या में भी वृद्धि होगी, क्योंकि परिसीमन अभ्यास से लोकसभा व राज्य विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है।

परिसीमन को लेकर चिंताएँ:

  • संभावित कम प्रतिनिधित्व: 
    • प्राथमिक चिंताओं में से एक यह है कि यदि जनसंख्या मापदंडों के आधार पर परिसीमन किया जाता है, तो तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्य और अन्य जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण उपायों को सफलतापूर्वक लागू किया है, उन्हें संसद में कम प्रतिनिधित्व का सामना करना पड़ सकता है।
      • यह डर इस संभावना से उत्पन्न होता है कि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले उत्तरी राज्य, जैसे कि बिहार और उत्तर प्रदेश, दक्षिण की कीमत पर संसद में अधिक सीटें हासिल कर सकते हैं।
    • देश की आबादी का केवल 18% होने के बावजूद दक्षिणी राज्य देश की GDP में 35% का योगदान करते हैं।
      • नेताओं का तर्क है कि उनकी आर्थिक ताकत राजनीतिक प्रतिनिधित्व में प्रतिबिंबित होनी चाहिये ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उनके हितों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो।
    • दक्षिण के राजनीतिक नेताओं को चिंता है कि लोकसभा सीटों की संख्या उत्तरी राज्यों की ओर बढ़ने से राष्ट्रीय स्तर पर दक्षिण की राजनीतिक आवाज़ कम मुखर हो सकती है।
  • महिला आरक्षण विधेयक से जुड़ाव:
    • महिला आरक्षण विधेयक के क्रियान्वयन को परिसीमन से जोड़ने का सरकार का फैसला विपक्षी दलों के लिये बड़ी चिंता का विषय है
    • विपक्ष का तर्क है कि दोनों मुद्दों को जोड़ने का कोई स्पष्ट कारण या आवश्यकता नहीं है, क्योंकि महिला आरक्षण विधेयक की पिछली चर्चाओं में ऐसा कोई मुद्दा नहीं था।
      • उनका सुझाव है कि सरकार महिलाओं के आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से अलग करने का विकल्प चुन सकती थी। एक सरल विधेयक सभी दलों को लोकसभा की वर्तमान संरचना के अंदर महिलाओं के लिये 33% आरक्षण सुनिश्चित करने की अनुमति दे सकता था।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. परिसीमन आयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2012)

  1. परिसीमन आयोग के आदेशों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
  2. परिसीमन आयोग के आदेश जब लोकसभा या राज्य विधानसभा के सम्मुख रखे जाते हैं, तब उन आदेशों में कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)


शासन व्यवस्था

फार्मा मेडटेक क्षेत्र के लिये नीतिगत पहल

प्रिलिम्स के लिये:

फार्मास्यूटिकल सेक्टर, भारत में फार्मा-मेडटेक सेक्टर में अनुसंधान और विकास तथा नवाचार पर राष्ट्रीय नीति, फार्मा मेडटेक सेक्टर में अनुसंधान और नवाचार

मेन्स के लिये:

चिकित्सा और फार्मास्यूटिकल क्षेत्रों से संबंधित नीतियाँ एवं पहल

स्रोत: पी.आई.बी.

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री ने भारत में फार्मा-मेडटेक क्षेत्र में अनुसंधान व विकास तथा नवाचार पर राष्ट्रीय नीति और फार्मा में अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देने के लिये योजना की शुरुआत की।

  • ये पहलें भारत में फार्मा-मेडटेक क्षेत्र में अनुसंधान और विकास तथा नवाचार पर राष्ट्रीय नीति और फार्मा मेडटेक क्षेत्र में अनुसंधान व नवाचार को बढ़ावा देने की योजना (Promotion of Research and Innovation in Pharma MedTech Sector- PRIP) हैं।

नोट: भारतीय फार्मास्यूटिकल उद्योग आकार की दृष्टि से विश्व का तीसरा सबसे बड़ा फार्मास्यूटिकल उद्योग है, जिसका वर्तमान बाज़ार लगभग 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर का है।

शुरू की गई पहलें: 

  • फार्मा-मेडटेक क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास और नवाचार पर राष्ट्रीय नीति:
    • नीति का उद्देश्य पारंपरिक दवाओं और फाइटोफार्मास्यूटिकल्स तथा चिकित्सा उपकरणों सहित फार्मास्यूटिकल में अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करना है।
      • यह संभावित रूप से अगले दशक में इस क्षेत्र को 120-130 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाने में सहायता कर सकता है, जिससे सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान लगभग 100 आधार अंकों तक बढ़ जाएगा।
    • उद्देश्य:
      • एक नियामक वातावरण बनाना जो उत्पाद विकास में नवाचार और अनुसंधान की सुविधा प्रदान करता है, सुरक्षा तथा गुणवत्ता के पारंपरिक नियामक उद्देश्यों का विस्तार करता है।
      • राजकोषीय और गैर-राजकोषीय उपायों के संयोजन के माध्यम से नवाचार में निजी एवं सार्वजनिक निवेश को प्रोत्साहित करना।
      • क्षेत्र में सतत् विकास के लिये एक मज़बूत संस्थागत आधार के रूप में नवाचार और क्रॉस-सेक्टोरल अनुसंधान का समर्थन करने हेतु डिज़ाइन किया गया एक सक्षम पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना।
  • फार्मा-मेडटेक क्षेत्र में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने की योजना (PRIP):
    • यह योजना नवाचार को बढ़ावा देने और मेडटेक क्षेत्र को नवाचार-संचालित पावरहाउस में बदलने पर केंद्रित है।
    • यह उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान और नवाचार पर ज़ोर देती है, जिसका लक्ष्य क्षेत्र को मूल्य और नवाचार-आधारित दृष्टिकोण की ओर स्थानांतरित करना है।
    • अवयव:
      • घटक A: राष्ट्रीय फार्मास्यूटिकल शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (NIPER) में 7 उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना करके अनुसंधान बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करना।
      • घटक B: नई रासायनिक इकाइयों, बायोसिमिलर सहित जटिल जेनेरिक, चिकित्सा उपकरणों, स्टेम सेल थेरेपी, ओर्फन ड्रग्स दवाओं, एंटी-माइक्रोबियल प्रतिरोध आदि जैसे छह प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में अनुसंधान को प्रोत्साहित करके फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देना, जिसमें उद्योग, MSME, SME, सरकारी संस्थानों के साथ कार्य करने वाले स्टार्टअप और इन-हाउस एवं अकादमिक अनुसंधान दोनों के लिये वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। 

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

भू-स्थानिक बुद्धिमता

प्रिलिम्स के लिये:

भू-स्थानिक बुद्धिमता, ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम (GPS), उपग्रह, मोबाइल सेंसर, एरियल इमेजेज़  

मेन्स के लिये:

आपदाओं के प्रबंधन में भू-स्थानिक प्रौद्योगिकियों का महत्त्व 

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों? 

वर्ष 2023 की गर्मियों में संपूर्ण संयुक्त राज्य में अभूतपूर्व प्राकृतिक आपदाओं की एक शृंखला देखी गई है, जिसमें रिकॉर्ड तोड़ तापमान, कनाडाई वनाग्नि, ऐतिहासिक बाढ़ और एक शक्तिशाली तूफान शामिल है, ऐसे संकटों को भू-स्थानिक बुद्धिमत्ता का उपयोग कर कम किया जा सकता है।

भू-स्थानिक बुद्धिमता (Geospatial Intelligence):

  • भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी में भौगोलिक मानचित्रण और विश्लेषण हेतु भौगोलिक सूचना प्रणाली (Geographic Information System- GIS), ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम (Global Positioning System- GPS) तथा रिमोट सेंसिंग जैसे उपकरणों का उपयोग किया जाता है।
  • ये उपकरण वस्तुओं, घटनाओं और परिघटनाओं (पृथ्वी पर उनकी भौगोलिक स्थिति के अनुसार अनुक्रमित जियोटैग) के बारे में स्थानिक जानकारी प्रदान करते हैं। हालाँकि किसी स्थान का डेटा स्थिर (Static) या गतिशील (Dynamic) हो सकता है।
    • किसी स्थान के स्थिर डेटा/स्टेटिक लोकेशन डेटा (Static Location Data) में सड़क की स्थिति, भूकंप की घटना या किसी विशेष क्षेत्र में बच्चों में कुपोषण की स्थिति के बारे में जानकारी शामिल होती है, जबकि किसी स्थान के गतिशील डेटा/डायनेमिक लोकेशन डेटा (Dynamic Location Data) में संचालित वाहन या पैदल यात्री, संक्रामक बीमारी के प्रसार आदि से संबंधित डेटा शामिल होता है।
  • बड़ी मात्रा में डेटा में स्थानिक प्रतिरूप की पहचान के लिये इंटेलिजेंस मैप्स  (Intelligent Maps) निर्मित करने हेतु प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जा सकता है।
  • यह प्रौद्योगिकी दुर्लभ संसाधनों के महत्त्व और उनकी प्राथमिकता के आधार पर निर्णय लेने में मददगार हो सकती है। 

भू-स्थानिक बुद्धिमता का महत्त्व:

  • उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की निगरानी में सहायता:
    • राष्ट्रीय तूफान केंद्र चक्रवात की अवस्थिति, उसके गठन और दिशा की निगरानी के लिये भू-स्थानिक बुद्धिमता से प्राप्त सूचनाओं पर निर्भर करता है।
    • ये सूचनाएँ संसाधन आवंटन, चेतावनी जारी करने तथा निकासी प्रबंधन में मदद करती है।
  • सर्च एंड रेस्क्यू प्रयास:
    • तुर्किये और सीरिया (फरवरी 2023) में 7.8 तीव्रता के भूकंप के बाद से भू-स्थानिक बुद्धिमता से प्राप्त जानकारियों के उपयोग से क्षति की पहचान करने तथा जीवित बचे लोगों का पता लगाने में  काफी मदद मिली।
    • इसने राहत केंद्रों की स्थापना और आपातकालीन आपूर्ति वितरण की सुविधा में अहम योगदान दिया।
  • पर्यावरणीय निगरानी:
    • जलवायु-संबंधित घटनाओं का पूर्वानुमान:
      • तापमान, वर्षा, स्नोपैक और ध्रुवीय बर्फ की निगरानी की सहायता से किसी प्रकार के व्यवधान का पूर्वानुमान तथा संभावित तैयारी करने में मदद मिलती है।
      • जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली चरम मौसमी घटनाओं से उत्पन्न बढ़ते खतरों का समाधान करने हेतु यह काफी महत्त्वपूर्ण है।
  • सैन्य और सार्वजनिक क्षेत्र में अनुप्रयोग:
    • सीमा प्रबंधन में भू-स्थानिक बुद्धिमता का उपयोग:
      • यूक्रेन के संघर्ष में रूसी सैन्य बलों की गतिविधियों और पाकिस्तान से भारत में घुसपैठ आदि की रिपोर्ट करने में सैटेलाइट तस्वीरों से प्राप्त महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ बड़ी भूमिका निभाती हैं।
    • परिवहन एवं रसद:
      • GPS तकनीक और भू-स्थानिक डेटा वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के कुशल प्रबंधन में सहायता करते हैं।
      • यह सरकारों और व्यवसायों को कार्गो आवाजाही संबंधी आवश्यक जानकारी प्रदान करता है।
  • शहरी नियोजन और स्वायत्त वाहन:
    • शहरी विकास में योगदान:
      • उच्च-रिज़ॉल्यूशन छवियों की सहायता से शहर के योजनाकार एक अधिक सुरक्षित और अधिक कुशल समुदायों का निर्माण कर सकते हैं।
      • इसकी सहायता से साइकिल लेन और यातायात दिशा-निर्देश जैसी सुविधाओं का आसानी से पता लगाया जा सकता है।
    • स्वायत्त वाहनों में भूमिका:
      • भू-स्थानिक बुद्धिमत्ता ज़मीनी स्तर का विवरण प्रदान करके स्वायत्त वाहनों के विकास का समर्थन करती है।
      • सुरक्षित और स्मार्ट परिवहन प्रणालियाँ बनाई जा रही हैं।
  • निर्णय लेने के लिये डिजिटल ट्विन:
    • संकल्पना और अनुप्रयोग:
      • वे मौसम और क्षेत्र के अनुकूल संघर्ष स्थितियों में प्रभावी साबित हुए हैं।

भू-स्थानिक इंटेलिजेंस की आवश्यकता: 

  • भविष्य की चुनौतियों का समाधान:
    • बढ़ते तापमान और शहरीकरण से भू-स्थानिक बुद्धिमत्ता की मांग बढ़ जाती है।
    • यह समुदायों की सुरक्षा करने और उभरती परिस्थितियों के अनुकूल ढलने में सहायता करता है।
  • उद्योग विकास:
    • भू-स्थानिक खुफिया उद्योग वर्ष 2020 के 61 बिलियन डॉलर से बढ़कर वर्ष 2030 तक 209 बिलियन डॉलर से अधिक वृद्धि होने का अनुमान है।
    • यह एक सुरक्षित और सूचित भविष्य को आकार देने में आवश्यक भूमिका निभाता है।
  • परिशुद्धता कृषि:
    • कृषि तेज़ी से डेटा-संचालित होती जा रही है। भू-स्थानिक बुद्धिमत्ता किसानों को फसल प्रबंधन, मृदा की गुणवत्ता, सिंचाई और कीट नियंत्रण के बारे में सूचित निर्णय लेने में मदद करती है।
    • यह भारत के लिये महत्त्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 18% योगदान कृषि क्षेत्र द्वारा दिया जाता है और इसमें 48% कार्यबल कार्यरत है।

भारत में भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिये सरकारी पहल:

  • सरकार ने "भूस्थानिक सूचना विनियमन विधेयक, 2021" प्रस्तुत किया। इस विधेयक का उद्देश्य भारत में भू-स्थानिक जानकारी के अधिग्रहण, प्रसार और उपयोग को विनियमित करना है।
    • इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को केंद्र में रखकर मानचित्रण तथा भू-स्थानिक डेटा संग्रह के लिये दिशा-निर्देश निर्धारित करने का प्रस्ताव रखा गया।
  • भू-स्थानिक बुद्धिमत्ता के उपयोग को सुव्यवस्थित करने के लिये राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति, 2022 की शुरुआत की गई थी।

भू-स्थानिक बुद्धिमता से संबंधित चुनौतियाँ:

  • भारत की क्षमता तथा आकार से संबद्ध पैमाने पर भू-स्थानिक सेवाओं एवं उत्पादों की कोई मांग नहीं है।
    • यह मुख्य रूप से सरकारी एवं निजी क्षेत्र में संभावित उपयोगकर्ताओं के बीच जागरूकता की कमी के कारण है।
    • दूसरी बाधा कुशल जनशक्ति की कमी है।
  • उच्च-रिज़ॉल्यूशन पर आधारभूत डेटा की अनुपलब्धता भी एक बड़ी बाधा है।
    • अनिवार्य रूप से आधारभूत डेटा को सामान्य डेटा तालिकाओं के रूप में देखा जा सकता है जिसे  कई अनुप्रयोगों अथवा प्रक्रियाओं के बीच साझा किया जाता है, इन्हें उचित सेवा तथा प्रबंधन हेतु एक मज़बूत आधार निर्माण के लिये जाना जाता है।
  • डेटा साझाकरण और सहयोग पर स्पष्टता की कमी सह-निर्माण एवं परिसंपत्ति को अधिकतम करने से रोकती है।
  • भारत की समस्याओं को हल करने के लिये विशेष रूप से विकसित उपायों में रेडी-टू-यूज़ समाधान (Ready-To-Use Solutions) अभी उपलब्ध नहीं हैं।

आगे की राह

  • जियो-पोर्टल और डेटा क्लाउड की स्थापना: सभी सार्वजनिक-वित्तपोषित डेटा को सेवा मॉडल के रूप में बिना किसी शुल्क अथवा नाममात्र शुल्क के सुलभ बनाने हेतु एक जियो-पोर्टल स्थापित करने की आवश्यकता है।
    • सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि डेटा साझाकरण, सहयोग और सह-निर्माण की संस्कृति को विकसित किया जाए
  • फाउंडेशन डेटा का सृजन: इसमें डेटा एकत्रीकरण, शहरों के लिये डेटा लेयर और प्राकृतिक संसाधनों का डेटा शामिल होना चाहिये। 
  • भू-स्थानिक में स्नातक कार्यक्रम: देश को भारत के प्रमुख संस्थानों में भू-स्थानिक में स्नातक कार्यक्रम शुरू करना चाहिये।
    • ये कार्यक्रम अनुसंधान और विकास प्रयासों को बढ़ावा देंगे जो स्थानीय स्तर पर प्रौद्योगिकियों तथा समाधानों के विकास के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
  • विनियमन: सर्वे ऑफ इंडिया (SoI) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) जैसे राष्ट्रीय संगठनों को राष्ट्र की सुरक्षा तथा वैज्ञानिक महत्त्व से संबंधित परियोजनाओं के विनियमन की ज़िम्मेदारी सौंपी जानी चाहिये।
    • इन संगठनों को सरकारी व्यवसाय के लिये उद्यमियों के साथ प्रतिस्पर्द्धा नहीं करनी चाहिये क्योंकि सरकारी व्यवसाय नुकसानदेह स्थिति में रहता है।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के संदर्भ में हाल ही में खबरों में रहा "भुवन" क्या है?  (2010)

(A) भारत में दूरस्थ शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये इसरो द्वारा लॉन्च किया गया एक छोटा उपग्रह
(B) चंद्रयान-द्वितीय के लिये अगले चंद्रमा प्रभाव जाँच को दिया गया नाम
(C) भारत की 3डी इमेजिंग क्षमताओं के साथ इसरो का एक जियोपोर्टल
(D) भारत द्वारा विकसित अंतरिक्ष दूरदर्शी

उत्तर: (C)


मेन्स:

प्रश्न. भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की क्या योजना है और यह हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम को कैसे लाभान्वित करेगा? (2019)

प्रश्न. अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों पर चर्चा कीजिये। इस प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग ने भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में किस प्रकार मदद की? (2016)


सामाजिक न्याय

वीमेन, पॉवर एंड कैंसर: लैंसेट

प्रिलिम्स के लिये:

वीमेन, पॉवर एंड कैंसर: लैंसेट, कैंसर, लैंगिक असमानता, मानव विकास सूचकांक, जीवन के खोए हुए वर्ष (YLLs), लैंसेट ग्लोबल हेल्थ, हेपेटाइटिस B और C संक्रमण

मेन्स के लिये:

वीमेन, पॉवर एंड कैंसर: लैंसेट, कैंसर की रोकथाम

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

हाल ही में द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ ने "वीमेन, पॉवर एंड कैंसर" शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें बताया गया है कि कैसे महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति सामाजिक उदासीनता ने कैंसर की रोकथाम तक उनकी पहुँच में देरी की है।

अध्ययन की पद्धति:

  • इस अध्ययन में 30-69 वर्ष की आयु में समय से पहले होने वाली मृत्यु का अनुमान लगाया गया है और इन्हें पूरे विश्व के 185 देशों में ऐसी मृत्यु के रूप में पहचाना गया है जिन्हें रोका जा सकता है या इलाज किया जा सकता है।
  • इस जनसंख्या-आधारित अध्ययन के लिये देश, कैंसर, लिंग और आयु समूहों के आधार पर कैंसर के कारण होने वाली अनुमानित मृत्यु संबंधी आँकड़े इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर के GLOBOCAN 2020 डेटाबेस से प्राप्त किये गए थे।
  • 36 कैंसर प्रकारों के लिये अपरिष्कृत और आयु-समायोजित कैंसर-विशिष्ट जीवन के खोए हुए वर्ष (YLLs) की गणना की गई।

रिपोर्ट के निष्कर्ष:

  • कैंसर से संबंधित मृत्यु दर और भार: 
    • वर्ष 2020 में पूरे विश्व में कैंसर से संबंधित 5.28 मिलियन असामयिक मृत्यु हुईं, जिनकी आयु 30 से 69 वर्ष के बीच थी।
    • इन असामयिक मौतों के परिणामस्वरूप 182.8 मिलियन वर्ष की जीवन हानि (Years Of Life Lost- YLLs) का महत्त्वपूर्ण बोझ पड़ा, जो सभी आयु समूहों में कैंसर से होने वाले कुल YLL का 68.8% है।  
  • रोकथाम और उपचार हेतु प्रयास:
    • समय-पूर्व YLL में से 68% को प्राथमिक रोकथाम या शीघ्र पता लगाने के प्रयासों के माध्यम से रोकने योग्य माना गया है।
    • शेष 32.0% YLL को उपचार योग्य माना गया, जहाँ उपचारात्मक उद्देश्य से प्रभावी साक्ष्य-आधारित उपचार से मृत्यु दर को कम किया जा सकता है।
  • लैंगिक असमानताएँ:
    • पुरुषों में महिलाओं (पुरुषों के लिये 70.3% बनाम महिलाओं हेतु 65.2%) की तुलना में रोकथाम योग्य समय-पूर्व YLL का अनुपात अधिक था।
    • हालाँकि इलाज योग्य समय-पूर्व YLL का अनुपात पुरुषों (महिलाओं के लिये 34.8% बनाम पुरुषों हेतु 29.7%) की तुलना में महिलाओं में अधिक था।
  • मानव विकास सूचकांक (HDI) और मृत्यु दर:
    • कम HDI स्तर वाले देशों में बहुत उच्च HDI देशों की तुलना में समय से पहले उम्र में YLL का अनुपात अधिक था।
    • मध्यम से बहुत उच्च HDI देशों में रोकथाम योग्य समय-पूर्व YLL में फेफड़ों का कैंसर एक प्रमुख योगदानकर्ता था, जबकि कम HDI देशों में गर्भाशय ग्रीवा कैंसर का नेतृत्व किया गया था।
    • HDI के सभी स्तरों में कोलोरेक्टल और स्तन कैंसर प्रमुख उपचार योग्य कैंसर थे।

भारत के संबंध में अध्ययन की मुख्य बातें:

  • भारत में महिलाओं में कैंसर से होने वाली मौतें:
    • भारत में महिलाओं में कैंसर से होने वाली लगभग 63% मौतों को जोखिम कारकों को कम करके स्क्रीनिंग अथवा शीघ्र निदान द्वारा रोका जा सकता था
    • उचित तथा समय पर उपचार से 37% मौतों को रोका जा सकता था।
  • महिलाओं के लिये कैंसर देखभाल को प्रभावित करने वाली चुनौतियाँ और कारक:
    • महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति सामाजिक उदासीनता, जागरूकता की कमी और प्राथमिक देखभाल स्तर पर गुणवत्ता विशेषज्ञता की अनुपस्थिति ने महिलाओं के लिये कैंसर की रोकथाम, पहचान तथा देखभाल तक पहुँच में बाधा उत्पन्न की।
  • स्वास्थ्य देखभाल में लैंगिक अंतर और भेदभाव:
    • कैंसर देखभाल में लैंगिक असमानता के कारण एक महिला की स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को खारिज कर दिया गया अथवा नज़रअंदाज कर दिया गया
    • महिलाओं के सत्ता की स्थिति में होने की संभावना कम है और लैंगिक पूर्वाग्रह और भेदभाव के कारण उन्हें अपनी देखभाल का निर्धारण करने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।
  • भारत में महिलाओं के बीच प्रमुख जोखिम कारक:
    • भारत में महिलाओं में शीर्ष तीन कैंसर में स्तन, गर्भाशय ग्रीवा और डिम्बग्रंथि कैंसर शामिल हैं।
      • हर आठ मिनट में एक महिला की सर्वाइकल कैंसर से मौत हो जाती है।
    • भारतीय महिलाओं में कैंसर के लिये संक्रमण सबसे बड़ा जोखिम कारक बना हुआ है, जो 23% मौतों का कारण बनता है।
      • कैंसर के खतरे में वृद्धि करने वाले संक्रमणों में HPV वायरस शामिल है, जो सर्वाइकल कैंसर का कारण बनता है। साथ ही यह हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमण यकृत कैंसर के खतरे में वृद्धि करता है।
      • दूसरा महत्त्वपूर्ण जोखिम कारक तंबाकू है, कैंसर से होने वाली 6% मौतें इसी कारण होती हैं।
      • भारत में कैंसर से होने वाली मृत्यु में शराब के सेवन से होने वाले नुकसान और मोटापे का योगदान 1% है।
  • आर्थिक और सामाजिक प्रभाव:
    • ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) देशों में समय से पहले कैंसर से होने वाली मौतों के परिणामस्वरूप उत्पादकता में कमी के कारण 46.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ।
    • भारत के कुल राष्ट्रीय स्वास्थ्य व्यय का लगभग 3.66 प्रतिशत महिलाओं की अवैतनिक कैंसर देखभाल (unpaid cancer care-giving) पर खर्च होता है।

रिपोर्ट की सिफारिशें:

  • कैंसर की देखभाल के लिये एक नए नारी-केंद्रित और समावेशी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसका लक्ष्य कैंसर की उचित रोकथाम, पहचान तथा उपचार तक पहुँच में महिलाओं के समक्ष आने वाली लैंगिक असमानताओं व चुनौतियों का समाधान करना है।
  • स्वास्थ्य प्रणाली तक महिलाओं की पहुँच को प्रभावित करने वाली दीर्घकालिक भेदभावपूर्ण प्रथाओं का समाधान करते हुए लैंगिक रूप से अधिक समावेशी नीतियों तथा दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है।
  • समय से पहले कैंसर की असमानताओं को कम करने के लिये, शीघ्र निदान, जाँच, संपूर्ण उपचार, जोखिम कारक में कमी और टीकाकरण के लिये विशेष कार्यक्रम तैयार किये जाने की आवश्यकता है।
  • स्तन और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर का शीघ्र पता लगाने और रोकथाम के लिये स्क्रीनिंग महत्त्वपूर्ण है।
    • हर महीने स्तनों की स्व-जाँच और प्रत्येक वर्ष डॉक्टर से क्लिनिकल जाँच की सलाह दी जाती है।
    • 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को स्तन कैंसर की जाँच के लिये वर्ष में एक बार मैमोग्राफी करानी चाहिये।
    • 25 से 65 वर्ष की आयु की महिलाओं को अपने गर्भाशय ग्रीवा पर कैंसर-पूर्व वृद्धि की जाँच के लिये पैप स्मीयर परीक्षण करवाना चाहिये।

कैंसर से मृत्यु के प्रति महिलाओं की अधिक संवेदनशीलता 

  • भारत में कई महिलाओं को स्वास्थ्य देखभाल तक पहुँच में बाधाओं का सामना करना पड़ता है। विकासशील मस्तिष्क कैंसर से उत्पन्न होने वाले सिरदर्द को आमतौर पर कई मामलों में नज़रअंदाज कर दिया जाता है।
    • महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति सामाजिक उदासीनता, जागरूकता की कमी और प्राथमिक स्तर पर गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल की अनुपस्थिति को संबोधित करने की आवश्यकता है।
  • दिव्यांग महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियाँ, जिनमें कम उम्र में विवाह, शिक्षा की कमी और वित्तीय निर्भरता शामिल है, चिकित्सा सहायता लेने तथा उपचार जारी रखने की उनकी क्षमता में बाधा डालती हैं।
  • ज्ञान की कमी और स्थानीय स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं द्वारा निदान में देरी से मरीज़ को लेकर पूर्वानुमान जीवन की गुणवत्ता पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।

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