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शासन व्यवस्था

परिसीमन

  • 03 Jan 2023
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

परिसीमन आयोग, सर्वोच्च न्यायालय, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, लोकसभा, राज्यसभा

मेन्स के लिये:

भारतीय संविधान, चुनाव, वैधानिक निकाय, परिसीमन प्रक्रिया

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में असम राज्य मंत्रिमंडल ने चार ज़िलों के उनके घटक ज़िलों के साथ विलय को मंज़ूरी दे दी है।

  • 27 दिसंबर को चुनाव आयोग ने असम में विधानसभा और संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन की प्रक्रिया की घोषणा करते हुए कहा कि यह कार्य वर्ष 2001 की जनगणना के आँकड़ों के आधार पर किया जाएगा। असम में वर्तमान में 14 लोकसभा क्षेत्र और 126 विधानसभा क्षेत्र हैं।

परिसीमन

  • परिचय
    • परिसीमन से तात्पर्य किसी देश में आबादी का प्रतिनिधित्त्व करने हेतु किसी राज्य में विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिये निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं का निर्धारण करना है। 
    • इसमें परिसीमन आयोग को बिना किसी कार्यकारी प्रभाव के काम करना होता है।
    • संविधान के अनुसार, आयोग का निर्णय अंतिम होता है और उसे न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती क्योंकि ऐसा करने से चुनाव में हमेशा ही देरी होती रहेगी
    • परिसीमन आयोग के आदेश लोकसभा या राज्य विधानसभा के समक्ष रखे जाते हैं, तो वे आदेशों में कोई संशोधन नहीं कर सकते हैं।
  • आवश्यकता: 
    • जनसंख्या के प्रत्येक वर्ग के नागरिकों को प्रतिनिधित्व का समान अवसर प्रदान करना।
    • भौगोलिक क्षेत्रों का उचित विभाजन ताकि चुनाव में किसी एक राजनीतिक दल को दूसरों की अपेक्षा लाभ न हो।
    • "एक वोट एक मूल्य" के सिद्धांत का पालन करना।
  • संरचना: 

परिसीमन की प्रक्रिया: 

  • प्रत्येक जनगणना के बाद भारत की संसद द्वारा संविधान के अनुच्छेद-82 के तहत एक परिसीमन अधिनियम लागू किया जाता है।
  • अनुच्छेद 170 के तहत राज्यों को भी प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम के अनुसार क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।
  • एक बार अधिनियम लागू होने के बाद केंद्र सरकार एक परिसीमन आयोग का गठन करती है।
  • हालाँकि पहला परिसीमन अभ्यास राष्ट्रपति द्वारा (निर्वाचन आयोग की मदद से) 1950-51 में किया गया था। 
  • परिसीमन आयोग अधिनियम 1952 में अधिनियमित किया गया था। 
  • 1952, 1962, 1972 और 2002 के अधिनियमों के आधार पर चार बार वर्ष 1952, 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है।
  • परिसीमन आयोग प्रत्येक जनगणना के बाद संसद द्वारा परिसीमन अधिनियम लागू करने के बाद अनुच्छेद 82 के तहत गठित एक स्वतंत्र निकाय है।
  • वर्ष 1981 और वर्ष 1991 की जनगणना के बाद परिसीमन नहीं किया गया।

परिसीमन से संबंधित मुद्दे: 

  • जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण में कम रुचि लेते हैं उन्हें संसद में अधिक संख्या में सीटें मिल सकती हैं। परिवार नियोजन को बढ़ावा देने वाले दक्षिणी राज्यों को अपनी सीटें कम होने की आशंका का सामना करना पड़ा। 
  • वर्ष 2002-08 तक परिसीमन, जनगणना 2001 के आधार पर की गई थी लेकिन वर्ष 1971 की जनगणना के अनुसार, विधानसभाओं और संसद में तय की गई सीटों की कुल संख्या में कोई बदलाव नहीं किया गया था।
    • वर्ष 2003 के 87वें संशोधन अधिनियम में निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का प्रावधान वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर किया गया, न कि वर्ष 1991 की जनगणना के आधार पर। हालाँकि यह लोकसभा में प्रत्येक राज्य को आवंटित सीटों की संख्या में बदलाव किये बिना किया जा सकता है।
  • संविधान ने लोकसभा एवं राज्यसभा सीटों की संख्या को क्रमशः 550 तथा 250 तक सीमित कर दिया है और बढ़ती जनसंख्या का प्रतिनिधित्त्व एक ही प्रतिनिधि द्वारा किया जा रहा है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)  

प्रश्न. परिसीमन आयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2012)

  1. परिसीमन आयोग के आदेश को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
  2. जब परिसीमन आयोग के आदेश लोकसभा या राज्य विधानसभा के समक्ष रखे जाते हैं, तो वे आदेशों में कोई संशोधन नहीं कर सकते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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