भारतीय अर्थव्यवस्था
भारत में कृषि ऋण माफी
प्रिलिम्स के लिये: भारतीय रिज़र्व बैंक, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (NPA), प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना।
मेन्स के लिये: भारत में कृषि संकट और किसानों की ऋणग्रस्तता, कृषि ऋण माफी का राज्य वित्त पर राजकोषीय प्रभाव, बैंकिंग क्षेत्र और ऋण संस्कृति पर ऋण माफी का प्रभाव।
चर्चा में क्यों?
महाराष्ट्र सरकार ने ₹35,000 करोड़ की ‘पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होलकर किसान ऋण माफी योजना’ की घोषणा की है, जिससे ऋण अनुशासन, राजकोषीय स्थिरता तथा कृषि वित्त की दीर्घकालिक सेहत पर इसके प्रभाव को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।
- यह पिछले एक दशक में महाराष्ट्र की तीसरी कृषि ऋण माफी है, जिसके अंतर्गत 30 सितंबर, 2025 तक बकाया फसल ऋणों में ₹2 लाख तक की छूट दी जाएगी तथा नियमित रूप से ऋण चुकाने वाले किसानों को ₹50,000 तक का प्रोत्साहन दिया जाएगा।
- यह कदम भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और विशेषज्ञ समितियों द्वारा दी गई बार-बार की चेतावनियों के बावजूद उठाया गया है कि बार-बार ऋण माफी से ग्रामीण ऋण संस्कृति प्रभावित हो सकती है।
सारांश
- कृषि ऋण माफी संकटग्रस्त किसानों को अल्पकालिक राहत प्रदान करती है, जिससे वे ऋण जाल से निकलने में सक्षम होते हैं और ग्रामीण मांग को भी बढ़ावा मिलता है; किंतु बार-बार दी जाने वाली ऋण माफी ऋण अनुशासन को कमज़ोर करती है, बैंकों के NPA को बढ़ाती है और राज्य के वित्त पर दबाव डालती है।
- दीर्घकालिक समाधान संरचनात्मक सुधारों में निहित हैं, जैसे– प्रत्यक्ष आय सहायता, सशक्त फसल बीमा, बेहतर कृषि अवसंरचना, उन्नत बाज़ार पहुँच तथा किफायती संस्थागत ऋण व्यवस्था, न कि बार-बार दी जाने वाली ऋण माफी।
भारत में कृषि ऋण माफी का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
- कृषि ऋण माफी: कृषि ऋण माफी वह सरकारी उपाय है जिसमें राज्य सरकार किसानों के कृषि ऋणों का भुगतान बैंकों और वित्तीय संस्थानों को कर देती है।
- इसे फसल विफलता, प्राकृतिक आपदाओं या कीमतों में गिरावट के कारण उत्पन्न कृषि संकट के समय राहत के उपाय के रूप में उपयोग किया जाता है।
- कृषि ऋण माफी के प्रकार:
- पूर्ण (ब्लैंकेट) छूट: सरकार सभी किसानों के लिये बकाया ऋण की पूरी राशि को समाप्त कर देती है, चाहे ऋण की राशि या भूमिधारण (लैंड होल्डिंग) का आकार कुछ भी हो। भारी राजकोषीय बोझ के कारण इसका उपयोग बहुत कम किया
- आंशिक ऋण माफी: ऋण केवल एक निश्चित सीमा तक ही माफ किया जाता है (उदाहरण के लिये, प्रति किसान ₹1-2 लाख)। इस सीमा से अधिक की राशि किसान को चुकानी होगी।
- लक्षित माफी: राहत केवल विशिष्ट वर्गों तक सीमित होती है, जैसे– लघु एवं सीमांत किसान, आपदा-प्रभावित क्षेत्रों के किसान या केवल कुछ विशेष प्रकार के ऋण, मुख्यतः– अल्पकालिक फसल ऋण।
- ब्याज माफी: केवल ऋण पर लगने वाले ब्याज या दंडात्मक ब्याज को माफ किया जाता है जबकि मूलधन राशि का भुगतान किसान को करना पड़ता है।
- केंद्रीय पहल: पहली बड़ी राष्ट्रव्यापी ऋण माफी कृषि और ग्रामीण ऋण राहत योजना (ARDRS), 1990 थी, जिसमें प्रति किसान 10,000 रुपये तक की राहत प्रदान की गई थी (उस समय इसकी लागत लगभग 10,000 करोड़ रुपये थी)।
- इसके बाद कृषि ऋण माफी एवं ऋण राहत योजना (ADWDRS), 2008 लागू की गई, जिसकी लागत लगभग 52,500 करोड़ रुपये थी और जिसका उद्देश्य लघु एवं सीमांत किसानों (5 एकड़ तक भूमि रखने वाले) को अधिक राहत प्रदान करना था।
- राज्य के नेतृत्व में वृद्धि: वर्ष 2014-15 के बाद से यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से राज्य सरकारों की ओर स्थानांतरित हो गई है।
- आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और तमिलनाडु सहित विभिन्न राज्य सरकारों ने कुल मिलाकर 2.5 लाख करोड़ रुपये (2016-17 की GDP का लगभग 1.4%) के ऋण माफी की घोषणा की है।
- कुल व्यय: विगत 35 वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर विभिन्न कृषि ऋण माफी योजनाओं पर लगभग 3 लाख करोड़ रुपये की राशि व्यय की है।
बढ़ती कृषि ऋण माफी के क्या निहितार्थ हैं?
सकारात्मक पक्ष
- त्वरित वित्तीय राहत: फसल खराब होने, सूखे या अचानक कीमतों में गिरावट के कारण संकट का सामना कर रहे किसानों को त्वरित सहायता प्रदान करती है।
- ऋण जाल से उन्मुक्ति: संस्थागत ऋणों के बकाए का निपटान किसानों को अगले फसल चक्र के लिये पुनः नया ऋण प्राप्त करने की पात्रता प्राप्त करने में सहायक हो सकता है।
- ग्रामीण मांग को बढ़ावा: ऋण भुगतान में कमी से अस्थायी रूप से प्रयोज्य आय और ग्रामीण उपभोग में वृद्धि होती है।
- मनोवैज्ञानिक राहत: वर्ष 2023 में, कृषि क्षेत्र से संबद्ध 10,700 से अधिक लोगों ने आत्महत्या की, जिसका मुख्य कारण वित्तीय संकट और संबंधित दबाव थे।
- कृषि ऋण माफी से ऋण के मानसिक तनाव को कम करने में मदद मिलती है, जो गंभीर कृषि संकटों में ऋण से जुड़ी कृषक आत्महत्याओं को कम करने में सहायक हो सकती है।
नकारात्मक पक्ष
- ऋण संस्कृति पर दुष्प्रभाव: जब ऋण माफी की घोषणा की जाती है या उसकी संभावना बनती है, तब ईमानदार किसान भी अपने ऋण का पुनर्भुगतान रोक देते हैं, इस आशा में कि उनका ऋण भी माफ कर दिया जाएगा।
- इससे ऋण अनुशासन कमज़ोर होता है तथा रणनीतिक, जानबूझकर की गई चूक को बढ़ावा मिलता है।
- अनर्जक आस्तियों (NPA) में वृद्धि: जैसे-जैसे ऋणों का पुनर्भुगतान रुकता है, बैंकों पर खराब ऋणों का बोझ बढ़ता जाता है।
- मार्च 2019 तक कृषि क्षेत्र से संबंधित सकल अनर्जक आस्तियाँ (Gross NPAs) चिंताजनक स्तर 8.44% तक पहुँच गई थीं। आँकड़े दर्शाते हैं कि जिन राज्यों ने वर्ष 2017–18 और 2018–19 में ऋण माफी की घोषणा की, वहाँ लगभग सभी में NPAs में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
- परिणामस्वरूप, बैंक अत्यधिक जोखिम से बचने लगते हैं और किसानों को उनकी अगली फसल के लिये नए ऋण जारी करने में संकोच करते हैं।
- राजकोषीय संकट: RBI के आंतरिक कार्यसमूह (2019) ने पाया कि ऋण माफी हेतु राज्य सरकारों को अपने बजट से एक बड़ा हिस्सा (GSDP का 0.1% से 1.8% तक) व्यय करना पड़ता है।
- इससे कृषि अवसंरचना (जैसे–सिंचाई, शीत भंडारण और ग्रामीण सड़कें) में उत्पादक पूंजीगत व्यय के लिये उपलब्ध राजकोषीय संसाधन सीमित हो जाते हैं, जो कि दीर्घकाल में किसानों की आय में स्थायी वृद्धि की संभावना रखते हैं।
- कमज़ोर लक्ष्यीकरण और कार्यान्वयन: SBI के शोध के अनुसार वर्ष 2014 और 2022 के बीच 50% पात्र किसानों को ही घोषित ऋण माफी का वास्तविक लाभ प्राप्त हुआ।
- इसके अतिरिक्त, पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन जैसे विशेषज्ञों ने इंगित किया है कि इन योजनाओं का लाभ प्रायः उन किसानों को मिलता है जो औपचारिक बैंकिंग प्रणाली तक पहुँच रखते हैं, जबकि भूमिहीन श्रमिक तथा अत्यंत गरीब किसान, जो सामान्यतः अनौपचारिक साहूकारों पर निर्भर रहते हैं, इससे वंचित रह जाते हैं।
- राजनीतिक साधन, स्थायी समाधान नहीं: ऋण माफी केवल एक अल्पकालिक राहत प्रदान करती है। यह एक मौसम के लिये किसानों को राहत दे सकती है, परंतु अगले वर्ष वे पुनः उन्हीं बाज़ार तथा जलवायु जोखिमों के प्रति संवेदनशील बने रहते हैं।
- चूँकि अधिकांश ऋण माफी योजनाएँ चुनावों के आसपास घोषित की जाती हैं (वर्ष 2014 के बाद घोषित राज्य स्तरीय ऋण माफी योजनाओं में से 10 में से 8 योजनाएँ चुनाव परिणामों की घोषणा के 90 दिनों के भीतर घोषित की गईं), इसलिये इन्हें प्रायः राजनीतिक उपकरण के रूप में देखा जाता है, न कि वास्तविक आर्थिक समाधान के रूप में।
- निजी निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव: सरकार द्वारा अधिक उधारी लेने से ब्याज दरों में वृद्धि होती है, जिसके परिणामस्वरूप निजी क्षेत्र के लिये उपलब्ध ऋण तथा निवेश के अवसर सीमित हो जाते हैं।
कृषि ऋण माफी के विकल्प क्या हैं?
- किसानों को प्रत्यक्ष आय सहायता: एकमुश्त ऋण माफी के स्थान पर किसानों को नियमित आय हस्तांतरण प्रदान किया जाए।
- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी योजनाएँ पूर्वानुमेय आय सहायता सुनिश्चित करती हैं और किसानों के व्यापक वर्ग तक पहुँच बनाती हैं।
- फसल बीमा को सुदृढ़ बनाना: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत कवरेज और समय पर भुगतान में सुधार किया जाए। बीमा किसानों को सूखा, बाढ़, कीट या अत्यधिक मौसमीय घटनाओं के कारण होने वाली फसल क्षति से सुरक्षा प्रदान करता है।
- कृषि अवसंरचना में निवेश: सिंचाई, कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउसिंग और ग्रामीण रसद/लॉजिस्टिक्स में सार्वजनिक निवेश बढ़ाया जाए। बेहतर अवसंरचना से कटाई के बाद होने वाले नुकसान कम होते हैं और कृषि उत्पादकता में सुधार होता है।
- बाज़ार तक पहुँच और मूल्य प्राप्ति में सुधार: पारदर्शी बाज़ार पहुँच के माध्यम से किसानों को बेहतर मूल्य सुनिश्चित करने हेतु e-NAM जैसे प्लेटफॉर्म को सुदृढ़ किया जाए। किसानों की आय बढ़ाने के लिये मूल्य शृंखलाओं और खाद्य प्रसंस्करण का विस्तार किया जाए।
- सुलभ तथा किफायती संस्थागत ऋण: किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) जैसी योजनाओं के माध्यम से कम ब्याज दर पर कृषि ऋण की उपलब्धता का विस्तार किया जाना चाहिये। इससे किसानों की उच्च ब्याज दर वाले अनौपचारिक ऋण स्रोतों पर निर्भरता कम होगी।
- जलवायु-अनुकूल कृषि: सूखा-प्रतिरोधी बीज, सूक्ष्म सिंचाई तथा जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना चाहिये, जिससे किसानों की मौसमी आघातों के प्रति सुभेद्यता कम हो सके।
- ग्रामीण आय का विविधीकरण: डेयरी, मत्स्य पालन, बागवानी तथा कृषि-आधारित प्रसंस्करण गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, ताकि किसानों की आय केवल एक फसल पर निर्भर न रहे।
- कृषि ऋण संबंधी छूट अल्पकालिक राहत तो प्रदान करती है, लेकिन यह ऋण अनुशासन को कमज़ोर करती है और सार्वजनिक वित्त पर दबाव डालती है। स्थायी समाधानों के लिये ऋण संबंधी छूट के बजाय संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है, जो बेहतर बुनियादी ढाँचे, मज़बूत जोखिम सुरक्षा और बेहतर बाज़ार पहुँच के माध्यम से कृषि आय को बढ़ा सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. किसानों को ऋण संबंधी छूट से तत्काल राहत तो मिलती है, किंतु इससे ऋण अनुशासन और राजकोषीय स्थिरता कमज़ोर हो सकती है। समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. कृषि एवं ग्रामीण ऋण राहत योजना (ARDRS), 1990 क्या थी?
कृषि एवं ग्रामीण ऋण राहत योजना सर्वप्रथम राष्ट्रव्यापी कृषि ऋण संबंधी छूट से संबंधित वह योजना थी, जिसने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों से लिये गए ऋणों पर प्रति किसान 10,000 रुपये तक की राहत प्रदान की।
2. कृषि ऋण संबंधी छूट एवं ऋण राहत योजना (ADWDRS), 2008 क्या थी?
कृषि ऋण संबंधी छूट एवं ऋण राहत योजना ने कई बैंकिंग संस्थानों से लिये गए कृषि ऋणों में छूट या राहत प्रदान की, जिसमें लघु और सीमांत किसानों के लिये उच्च राहत प्रदान की गई थी।
3. RBI बार-बार कृषि ऋण संबंधी छूट के खिलाफ क्यों आगाह करता है?
भारतीय रिज़र्व बैंक ने चेतावनी दी है कि बार-बार छूट से ऋण अनुशासन कमज़ोर होता है, कृषि NPA बढ़ता है और बैंक किसानों को नया ऋण देने से हतोत्साहित होते हैं।
4. PM-किसान योजना का उद्देश्य क्या है?
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि किसानों की आय को मज़बूत करने के लिये आवधिक नकद हस्तांतरण के माध्यम से प्रत्यक्ष आय सहायता प्रदान करती है।
5. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों की कैसे मदद करती है?
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना सूखा, बाढ़, कीट और चरम मौसमी घटनाओं जैसे जोखिमों के खिलाफ फसल बीमा प्रदान करती है, जिससे किसानों को आय के नुकसान से बचाने में मदद मिलती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रश्न 1. ‘किसान क्रेडिट कार्ड’ योजना के अंतर्गत, निम्नलिखित में से किन-किन उद्देश्यों के लिये कृषकों को अल्पकालीन ऋण समर्थन उपलब्ध कराया जाता है? (2020)
- फार्म परिसंपत्तियों के रख-रखाव हेतु कार्यशील पूंजी के लिये
- कंबाइन कटाई मशीनों, ट्रैक्टरों एवं मिनी ट्रकों के क्रय के लिये
- फार्म परिवारों की उपभोग आवश्यकताओं के लिये
- फसल कटाई के बाद खर्चों के लिये परिवार के लिये
- घर निर्माण तथा गाँव में शीतागार सुविधा की स्थापना के लिये।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1, 2 और 5
(b) केवल 1, 3 और 4
(c) केवल 2, 3, 4 और 5
(d) 1, 2, 3, 4 और 5
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न. भारतीय कृषि की प्रकृति की अनिश्चितताओं पर निर्भरता के मद्देनज़र, फसल बीमा की आवश्यकता की विवेचना कीजिये और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिये। (2016)

शासन व्यवस्था
हरीश राणा प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी
प्रिलिम्स के लिये: सर्वोच्च न्यायालय, प्राथमिक एवं द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड, भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023, अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार), भारत का विधि आयोग, उच्च न्यायालय, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, 2013, आयुष्मान भारत, गैर-संचारी रोगों के लिये राष्ट्रीय कार्यक्रम, 2010, वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम, 2010, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY), आयुष्मान वय वंदना योजना, प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन।
मेन्स के लिये: हरीश राणा प्रकरण 2026 में सर्वोच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ, इच्छामृत्यु से संबंधित प्रमुख तथ्य, इच्छामृत्यु को वैध बनाने के पक्ष और विपक्ष में प्रमुख तर्क और आगे की राह।
चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने हरीश राणा बनाम भारत संघ प्रकरण (2026) में जीवन-रक्षक प्रणाली को हटाने की अनुमति देकर निष्क्रिय इच्छामृत्यु की स्वीकृति प्रदान की, जो गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को मान्यता देने वाले वर्ष 2018 के कॉमन कॉज जजमेंट का प्रथम व्यावहारिक अनुप्रयोग है।
सारांश
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 32 वर्षीय हरीश राणा, जो विगत 13 वर्षों से परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट की स्थिति में थे, के लिये निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिससे चिकित्सकीय देखरेख में जीवन रक्षक उपचार को बंद करने की स्वीकृति मिल गई।
- यह निर्णय अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को मान्यता देने वाले पूर्ववर्ती दिशानिर्देशों को लागू करता है और भारत में न्यायालय द्वारा अनुमोदित निष्क्रिय इच्छामृत्यु के प्रथम क्रियान्वयन को चिह्नित करता है।
हरीश राणा प्रकरण, 2026 में सर्वोच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ क्या हैं?
प्रकरण के बारे में
- अगस्त 2013 में चंडीगढ़ में रहने वाले 19 वर्षीय छात्र हरीश राणा इमारत की चौथी मंज़िल से गिर गए थे। इस दुर्घटना के कारण उन्हें मस्तिष्क में गंभीर चोटें आईं, जिसके परिणामस्वरूप वे परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) में चले गए क्योंकि उन्हें 100 प्रतिशत चतुरंगघात (क्वाड्रिप्लेजिया) हो गया।
- लगभग 13 वर्षों तक उन्हें केवल नैदानिक रूप से सहायक पोषण एवं जलयोजन (CANH) के माध्यम से जीवित रखा गया, जो शल्य-चिकित्सा द्वारा स्थापित PEG ट्यूबों के ज़रिये दिया जाता था और इस अवधि में स्वास्थ्य में किसी प्रकार का सुधार नहीं हुआ। वर्ष 2024 में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा उनके पिता की याचिका खारिज किये जाने के बाद परिवार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की, जहाँ अंततः निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति प्रदान की गई।
सर्वोच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ
- मेडिकल बोर्ड की अनुशंसाओं की स्वीकृति: सर्वोच्च न्यायालय ने चिकित्सा बोर्डों तथा परिवार के सदस्यों की सर्वसम्मत अनुशंसा को स्वीकार करते हुए जीवन-रक्षक प्रणाली के परिसमापन की अनुमति दी तथा अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), दिल्ली को निर्देश दिया कि वह हरीश राणा को अपने प्रशामक देखभाल विभाग में भर्ती करे और एक “मज़बूत, प्रशामक तथा जीवन के अंतिम चरण की देखभाल योजना” तैयार करे।
- इसने इस बात पर ज़ोर दिया कि जीवन-रक्षक प्रणाली के परिसमापन को मानवीय तरीके से किया जाना चाहिये, जिसमें पीड़ा तथा लक्षणों का समुचित प्रबंधन सुनिश्चित किया जाए ताकि रोगी की गरिमा बनी रहे और यह रोगी के परित्यजन के रूप में न माना जाए।
- नैदानिक रूप से प्रशासित पोषण (CAN) की स्थिति: सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि PEG (परक्यूटेनियस एंडोस्कोपिक गैस्ट्रोस्टोमी) ट्यूबों के माध्यम से दिया जाने वाला नैदानिक रूप से प्रशासित पोषण (CAN) केवल मूलभूत देखभाल नहीं, बल्कि चिकित्सकीय उपचार की श्रेणी में आता है।
- अतः इसका परिसमापन निष्क्रिय इच्छामृत्यु के अंतर्गत आता है और यदि यह रोगी के सर्वोत्तम हित में न हो, तो इसे चिकित्सा बोर्डों द्वारा अनुमोदित किया जा सकता है।
- पुनर्विचार अवधि की छूट: अनावश्यक पीड़ा को निवारित करने के लिये, सर्वोच्च न्यायालय ने 30 दिन की मानक पुनर्विचार अवधि का अधित्याग कर दिया, जिससे मेडिकल बोर्ड के CAN को वापस लेने के निर्णयों के त्वरित प्रवर्तन करने की अनुमति मिल गई।
भविष्य के मामलों के लिये प्रक्रियात्मक निर्देश
देश भर में प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने हेतु सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ विशिष्ट निर्देश जारी किये:
- प्रक्रिया का सरलीकरण: उच्च न्यायालयों को सभी न्यायिक मजिस्ट्रेटों को निर्देश देना होगा कि वे निष्क्रिय इच्छामृत्यु से संबंधित मेडिकल बोर्ड के निर्णयों के बारे में अस्पतालों से प्राप्त सूचनाओं को स्वीकार करें और उन पर कार्रवाई करें।
- भारत सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी ज़िलों में मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) पंजीकृत चिकित्सा प्रैक्टिशनरों का एक पैनल बनाए रखें, जो द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड के रूप में कार्य कर सके।
- समग्र कानून की आवश्यकता: सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से जीवन के अंतिम चरण की देखभाल (End-of-Life Care) पर एक व्यापक कानून बनाने का दृढ़ आग्रह किया। न्यायालय ने चेतावनी दी कि ऐसे कानून के अभाव में निर्णय बाह्य कारकों, जैसे– आर्थिक संकट, बीमा की कमी या सामाजिक-आर्थिक संवेदनशीलताओं से प्रभावित हो सकते हैं, जो परिणामों को अनुचित रूप से प्रभावित कर सकते हैं।
लिविंग विल
- कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ (2018) मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने लिविंग विल (अग्रिम चिकित्सा निर्देश) को एक लिखित दस्तावेज़ के रूप में परिभाषित किया, जो किसी रोगी को यह अनुमति देता है कि वह पहले से स्पष्ट निर्देश दे सके कि जब वह असाध्य रूप से बीमार हो या सूचित सहमति व्यक्त करने में सक्षम न रहे, तब उसे कौन-सा चिकित्सकीय उपचार दिया जाए। इसमें यह भी शामिल है कि यदि किसी मेडिकल बोर्ड द्वारा यह घोषित कर दिया जाए कि रोगी के उपचार की कोई संभावना नहीं है, तो ऐसी स्थिति में परिवार को जीवन-रक्षक उपकरण (Life Support) बंद करने की अनुमति दी जा सके।
- इस निर्णय ने रोगी की स्वायत्तता को महत्त्वपूर्ण रूप से विस्तारित किया, क्योंकि इससे व्यक्तियों को जीवन के अंतिम चरण से संबंधित चिकित्सकीय निर्णयों पर नियंत्रण बनाए रखने की अनुमति मिलती है, भले ही वे उस समय अपनी इच्छाएँ व्यक्त करने में सक्षम न हों।
इच्छामृत्यु क्या है?
- परिचय: इच्छामृत्यु (Euthanasia) वह जानबूझकर और उद्देश्यपूर्ण किया गया कार्य है, जिसमें किसी व्यक्ति के जीवन को समाप्त कर दिया जाता है ताकि उसे असाध्य या अंतिम अवस्था की बीमारी, अपरिवर्तनीय कोमा (Irreversible Coma) या लगातार पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट के कारण होने वाली लगातार और असहनीय पीड़ा से मुक्ति मिल सके।
- युथनेसिया (इच्छामृत्यु) शब्द ग्रीक मूल का है, जिसका अर्थ है ‘अच्छी मृत्यु’ (Good Death) (eu = अच्छा, thanatos = मृत्यु)। इसे अक्सर जीवन के अंतिम चरणों में गरिमा बनाए रखने के उद्देश्य से दया के रूप में किया गया कार्य माना जाता है।
- वर्गीकरण: इसे मुख्य रूप से दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है अर्थात सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) (एक जानबूझकर किया गया कार्य, जैसे– मृत्यु लाने के लिये घातक इंजेक्शन) और निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) (जीवन-रक्षक चिकित्सा उपचार को रोकना या वापस लेना, जिससे प्राकृतिक मृत्यु होने दी जाती है)। इसे आगे सहमति के आधार पर विभाजित किया जाता है।
- स्वेच्छा आधारित (Voluntary): रोगी की स्पष्ट सहमति के साथ किया गया।
- अस्वेच्छा आधारित (Non-voluntary): तब किया जाता है जब रोगी सहमति देने में असमर्थ हो (जैसे– कोमा में)।
- अनैच्छिक (Involuntary): रोगी की सहमति के बिना किया जाता है, जो अधिकांश स्थानों पर वैध नहीं है।
- कानूनी ढाँचा: भारतीय कानून सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु के बीच स्पष्ट भेद करता है।
- सक्रिय इच्छामृत्यु को भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत स्पष्ट रूप से निषिद्ध किया गया है, जहाँ जानबूझकर जीवन को समाप्त करना धारा 100 (आपराधिक मानव वध/Culpable Homicide) या धारा 101 (हत्या) के अंतर्गत अपराध माना जाता है।
- हालाँकि, कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ (2018) मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध ठहराया और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत गरिमा के साथ मरने के अधिकार को एक अनिवार्य हिस्सा मान्यता दी।
- भारत की 241वीं विधि आयोग रिपोर्ट ने आगे यह स्पष्ट किया कि एक सक्षम रोगी द्वारा जीवन-रक्षक उपचार अस्वीकार करना कानूनी रूप से वैध है और ऐसी इच्छाओं का पालन करने वाले डॉक्टरों पर दुष्प्रेरण या दोषपूर्ण हत्या का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
- भारत में इच्छामृत्यु को आकार देने वाले निर्णय:
- मारुति श्रीपति दुबल बनाम महाराष्ट्र राज्य (1987): बॉम्बे उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि मरने का अधिकार अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) में निहित है और यह अंतिम अवस्था की बीमारी से पीड़ित या लगातार गंभीर दर्द में रहने वाले रोगियों को अपने जीवन का अंत करने की अनुमति देता है।
- ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व निर्णय को पलटा और यह तय किया कि जीवन का अधिकार में मरने का अधिकार शामिल नहीं है और जीवन की सुरक्षा (Preservation of Life) पर बल दिया।
- अरुणा शानबाग बनाम भारत संघ (2011): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त कानूनी और चिकित्सकीय सुरक्षा उपायों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, यहाँ तक कि उन रोगियों के लिये भी जो सहमति देने में असमर्थ थे, जिससे इसमें महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया।
- कॉमन कॉज़ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गरिमा के साथ मरने का अधिकार को मान्यता दी, सक्रिय इच्छामृत्यु को अस्वीकृत और निष्क्रिय इच्छामृत्यु को मान्य ठहराया तथा लिविंग विल (अग्रिम चिकित्सा निर्देश) को कानूनी मान्यता प्रदान की।
- अक्रिय इच्छामृत्यु की विधिक प्रक्रिया: वर्ष 2018 के कॉमन कॉज़ दिशा-निर्देशों में, जिन्हें वर्ष 2023 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संशोधित किया गया, अक्रिय इच्छामृत्यु के लिये दो-चरणीय चिकित्सकीय समीक्षा प्रक्रिया निर्धारित की गई है।
- प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड: यह अस्पताल द्वारा गठित किया जाता है और इसमें रोगी का उपचार कर रहा चिकित्सक तथा कम-से-कम 5 वर्ष के अनुभव वाले दो स्वतंत्र डॉक्टर शामिल होते हैं (पूर्व में यह अनुभव सीमा 20 वर्ष थी)।
- द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड: इसमें तीन स्वतंत्र डॉक्टर होते हैं, जिन्हें ज़िला चिकित्सा अधिकारी द्वारा तैयार किये गए पैनल से चुना जाता है। यह बोर्ड प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड के निर्णय की समीक्षा करता है।
- दोनों बोर्डों को अपनी राय यथासंभव 48 घंटे के भीतर देनी होती है और उपचार वापस लेने के निर्णय को रोगी के परिवार या अभिभावक की सहमति के साथ प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) को सूचित करना आवश्यक होता है।
- इच्छामृत्यु पर वैश्विक परिप्रेक्ष्य: विभिन्न देशों में इच्छामृत्यु की कानूनी स्थिति में भिन्नता है। नीदरलैंड में सक्रिय इच्छामृत्यु और सहाय प्रदत्त इच्छामृत्यु दोनों की अनुमति है; स्विट्ज़रलैंड में केवल सहाय प्रदत्त इच्छामृत्यु की अनुमति है, जबकि इटली में अक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई है।
इच्छामृत्यु को वैध बनाने के पक्ष और विपक्ष में प्रमुख तर्क कौन-से हैं?
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श्रेणी |
वैधीकरण के पक्ष में तर्क |
Arguments Against Legalization वैधीकरण के विपक्ष में तर्क |
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स्वायत्तता और अधिकार |
व्यक्तियों को आत्मनिर्णय का मूल अधिकार प्राप्त है, जिसमें अपने शरीर पर नियंत्रण और मृत्यु के समय/तरीके का निर्धारण शामिल है। इसका हनन व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का उल्लंघन है । |
"मृत्यु-अधिकार" जैसा कोई मान्यता प्राप्त अधिकार नहीं है; जीवन का अधिकार (विभिन्न संविधानों और मानवाधिकार ढाँचों में संरक्षित) दूसरों द्वारा साशय मृत्यु की मांग किये जाने के अधिकार तक विस्तारित नहीं होता है। |
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करुणा और पीड़ा |
असाध्य रोग के मामलों में, इच्छामृत्यु एक दयापूर्ण अंत प्रदान करती है, जिससे लंबी और असहनीय पीड़ा से मुक्ति मिलती है और गरिमापूर्ण मृत्यु प्राप्त की जा सकती है। |
आधुनिक प्रशामक देखभाल और रोगी पीड़ा प्रबंधन के माध्यम से अधिकांश पीड़ा को प्रभावी रूप से कम किया जा सकता है; जब उच्च गुणवत्ता वाले जीवन के अंतिम चरण की देखभाल उपलब्ध हो और उसके लिये पर्याप्त धन उपलब्ध हो, तो इच्छामृत्यु अनावश्यक है। |
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गरिमा एवं जीवन की गुणवत्ता |
यदि जीवन में सार्थक गुणवत्ता शेष न रहे, तो उसे जबरन जारी रखना क्रूरता जैसा हो सकता है। इच्छामृत्यु व्यक्ति के लिये नियंत्रित और शांतिपूर्ण तरीके से जीवन से मुक्ति का विकल्प है। |
मानव जीवन का अंतर्निहित मूल्य होता है, चाहे उसकी गुणवत्ता कैसी भी क्यों न हो। इच्छामृत्यु को वैध बनाने से दिव्यांग, वृद्ध या दीर्घकालिक रोगियों के जीवन का अवमूल्यन होने का खतरा रहता है, जिससे यह संदेश प्रेषित हो सकता है कि कुछ जीवन “जीने योग्य नहीं” हैं। |
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विनियमन एवं सुरक्षा उपाय |
कठोर मानदंडों, जैसे– असाध्य रोग, सक्षम सहमति और अनेक चिकित्सकीय मत के साथ इच्छामृत्यु को सुरक्षित रूप से विनियमित किया जा सकता है, जैसा कि भारत, नीदरलैंड, बेल्जियम और कनाडा जैसे क्षेत्रों में देखने को मिलता है। |
उदार नीतियों वाले देशों के अनुभव से “खतरनाक स्थिति” की आशंका व्यक्त की जाती है। पात्रता धीरे-धीरे केवल असाध्य रोगों से आगे बढ़कर अन्य स्थितियों या मानसिक रोगों तक विस्तारित हो सकती है, जिससे अनैच्छिक या गैर-स्वैच्छिक मामलों की संभावना बढ़ जाती है। |
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दूसरों पर भार |
इससे रोगी अपने परिवार या समाज पर लंबे समय तक देखभाल का बोझ बनने से बच सकता है तथा प्रियजनों के भावनात्मक और आर्थिक दबाव को कम कर सकता है। |
वैधीकरण से सुभेद्य व्यक्तियों पर यह दबाव बढ़ सकता है कि वे स्वयं को “बोझ” मानकर मृत्यु का विकल्प चुनें (जैसे अमेरिका के ओरेगन राज्य में इसके बढ़ते मामलों में यह कारण स्पष्ट किया गया), जिससे दबाव या अपर्याप्त सामाजिक समर्थन की अनदेखी हो सकती है। |
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चिकित्सकीय पेशा |
यह चिकित्सकों के उस कर्त्तव्य के अनुरूप माना जाता है जिसमें उन्हें पीड़ा को कम करना होता है; निराशाजनक परिस्थितियों में करुणापूर्वक जीवन समाप्त करना उपचार की व्यापक मानवीय भूमिका का हिस्सा माना जा सकता है। |
यह चिकित्सा नैतिकता के मूल सिद्धांतों, जैसे– हिप्पोक्रेटी शपथ का “डू नो हार्म” सिद्धांत के विपरीत माना जाता है। इससे चिकित्सक की उपचारक/जीवन-रक्षक भूमिका और रोगियों का विश्वास दोनों प्रभावित हो सकते हैं। |
भारत गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों के लिये एक बेहतर सहायता तंत्र का निर्माण कैसे कर सकता है?
- एक राष्ट्रीय उपशामक देखभाल मिशन की स्थापना: राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन 2013 की तर्ज़ पर एक समर्पित राष्ट्रीय उपशामक देखभाल मिशन की शुरुआत किया जाना चाहिये, ताकि स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित किया जा सके और पैन मैनेजमेंट क्लीनिक स्थापित किये जा सकें।
- साथ ही सुनिश्चित करें कि ओरल मॉर्फिन (गंभीर, पुराने या कैंसर से संबंधित दर्द का प्रबंधन करने के लिये) जैसी दवाएँ प्रत्येक ज़िले में उपलब्ध हों।
- एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली: उपशामक देखभाल को स्वास्थ्य सेवा के सभी स्तरों पर एकीकृत किया जाना चाहिये– प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) से लेकर ज़िला अस्पतालों तक और आयुष्मान भारत, गैर-संचारी रोगों के लिये राष्ट्रीय कार्यक्रम 2010 और वरिष्ठ नागरिकों के लिये स्वास्थ्य देखभाल के राष्ट्रीय कार्यक्रम 2010 जैसे कार्यक्रमों के साथ समन्वित किया जाए।
- विधिक साक्षरता और जीवित वसीयतें: जन जागरूकता अभियानों के माध्यम से नागरिकों को अग्रिम निर्देश (जीवित वसीयत) के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिये। अस्पतालों को प्रशिक्षित "रोगी अधिवक्ता" नियुक्त करने चाहिये जो परिवारों के साथ जीवन के अंत की इच्छाओं पर चर्चा कर सकें।
- पारिवारिक और सामुदायिक सहायता प्रणालियों को मज़बूत करना: एक व्यापक "केयरगिवर सपोर्ट" मॉडल को परिवारों के लिये राहत देखभाल सेवाएँ, गृह देखभाल प्रशिक्षण और मनोवैज्ञानिक परामर्श प्रदान करना चाहिये।
- स्थानीय स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित करके समुदाय-आधारित देखभाल को पुनरुज्जीवित किया जाना चाहिये, जिसमें केरल-आधारित नेबरहुड नेटवर्क इन पैलियेटिव केयर (पुराने रोगों से ग्रस्त और मरणासन्न लोगों के लिये घरेलू देखभाल प्रदान करना) मॉडल को कॉपी किया जा सके।
- वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करना: बाह्य रोगी, गृह-आधारित और धर्मशाला (हॉस्पिस) उपशामक देखभाल को प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) और वरिष्ठ नागरिकों के लिये आयुष्मान वय वंदना योजना में पूरी तरह से शामिल किया जाना चाहिये, जिसमें विनाशकारी स्वास्थ्य व्यय को कम करने के लिये आवश्यक दवाएँ और केयरगिवर सपोर्ट शामिल हो।
- प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना: आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के तहत डिजिटल उपकरणों का उपयोग करके ग्रामीण क्षेत्रों के लिये टेली-उपशामक देखभाल सेवाओं का विस्तार किया जाना चाहिये। मज़बूत निगरानी तंत्र को प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन के डेटा द्वारा समर्थित, ओपिओइड (Opioid) उपलब्धता और रोगी परिणामों पर नज़र रखनी चाहिये।
निष्कर्ष
हरीश राणा मामला 2026 जीवन के अंतिम चरण की देखभाल पर भारतीय न्यायशास्त्र के एक संवेदनशील विकास का प्रतिनिधित्व करता है। कानूनी रूप से सख्त दिशा-निर्देशों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देते हुए, उच्चतम न्यायालय ने उपशामक देखभाल सहायता प्रणाली के निर्माण पर बल दिया। आगे की राह व्यापक कानून, सुव्यवस्थित प्रक्रियाओं और सभी नागरिकों के लिये मृत्यु में गरिमा सुनिश्चित करने के लिये दर्द प्रबंधन (Pain Management) तक सार्वभौमिक पहुँच की मांग करता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. इच्छामृत्यु के कानूनी और नैतिक पहलुओं की जाँच कीजिये। इसको वैध करने के पक्ष और विपक्ष में क्या तर्क हैं? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. हरीश राणा मामले (2026) में उच्चतम न्यायालय ने क्या फैसला सुनाया?
उच्चतम न्यायालय ने चिकित्सा बोर्डों द्वारा अनुमोदन के बाद नैदानिक रूप से प्रशासित पोषण (CAN) को वापस लेने की अनुमति देकर निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिससे अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान के साथ मरने के अधिकार की पुष्टि हुई।
2. कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ (2018) के निर्णय का क्या महत्त्व था?
इसने कानूनी रूप से सम्मान के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी, जीवित वसीयत (अग्रिम चिकित्सा निर्देश) को वैध बनाया और भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिये दिशा-निर्देश स्थापित किये।
3. उपशामक देखभाल क्या है?
उपशामक देखभाल एक विशेष चिकित्सा देखभाल है, जो गंभीर बीमारी के दर्द, लक्षणों और तनाव को कम करने पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य रोगियों और उनके परिवारों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. निजता के अधिकार को जीवन एवं व्यत्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्भूत भाग के रूप में संरक्षित किया जाता है। भारत के संविधान में निम्नलिखित में से किससे उपर्युक्त कथन सही एवं समुचित ढंग से अर्थित होता है? (2018)
(a) अनुच्छेद 14 एवं संविधान के 42वें संशोधन के अधीन उपबंध
(b) अनुच्छेद 17 एवं भाग IV में दिये राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व
(c) अनुच्छेद 21 एवं भाग III में गारंटी की गई स्वतंत्रताएँ
(d) अनुच्छेद 24 एवं संविधान के 44वें संशोधन के अधीन उपबंध
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. सामाजिक विकास की संभावनाओं को बढ़ाने के क्रम में, विशेषकर जराचिकित्सा एवं मातृ स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में सुदृढ़ और पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल संबंधी नीतियों की आवश्यकता है। विवेचन कीजिये। (2020)

