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प्रश्न :
प्रश्न. “जीनोम इंजीनियरिंग में अभूतपूर्व प्रगति के बावजूद कृत्रिम मानव-जीनोम परियोजनाएँ नैतिक तथा जैव-सुरक्षा संबंधी चिंताओं से अब भी घिरी हुई हैं।” विवेचना कीजिये। (150 शब्द)
11 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्नउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- जैव-प्रौद्योगिकी में हुई प्रगति तथा उससे संबंधित नैतिक सरोकारों का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
- मुख्य भाग में इन प्रौद्योगिकियों से संबंधित प्रमुख नैतिक चिंताओं को लिखिये।
- तदनुसार निष्कर्ष लिखिये।
परिचय:
बड़े पैमाने पर DNA संश्लेषण तथा CRISPR-आधारित जीन संपादन में हुई प्रगति अब मानव जीनोम के खंडों के पुनर्लेखन को संभव बनाती है, और ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट–राइट जैसी पहलें कृत्रिम मानव जीनोम की तकनीकी व्यवहार्यता को प्रदर्शित करती हैं। इससे वैश्विक स्तर पर गहन नैतिक तथा जैव-सुरक्षा संबंधी विमर्श प्रारंभ हुआ है। ये विमर्श अब ऐसे अनुसंधान की गति, दिशा और वैधता को निर्धारित करने वाले महत्त्वपूर्ण कारक बन चुके हैं।
मुख्या भाग:
नैतिक बाधाएँ
- नैतिक और दार्शनिक मुद्दे: मानव जीनोम का निर्माण या पुनर्लेखन मानव पहचान और गरिमा से जुड़े मौलिक प्रश्न उठाता है। कई लोग इसे “भगवान बनने का प्रयास” मानते हैं।
- पीढ़ियों के बीच सहमति: यदि इसे जर्मलाइन (भ्रूण/गामीट) पर लागू किया जाता है, तो इससे वंशानुगत परिवर्तन होंगे। भविष्य की पीढ़ियाँ, जो स्थायी रूप से इन परिवर्तनों को सहन करेंगी, उनकी सहमति संभव नहीं है, जो जैव-नैतिकता के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है।
- डिज़ाइनर शिशुओं और असमानता का जोखिम: जीनोम संश्लेषण का उपयोग शारीरिक, संज्ञानात्मक या व्यवहारिक लक्षणों के चयन जैसे संवर्द्धन के लिये किया जा सकता है। इससे सामाजिक असमानता गहराने, आनुवंशिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग बनाने और नए प्रकार के भेदभाव को उत्पन्न करने का जोखिम है।
- मानव आनुवंशिक विविधता का नुकसान: कृत्रिम डिज़ाइन के माध्यम से कुछ लक्षणों को मानकीकृत करने से प्राकृतिक आनुवंशिक विविधता कम हो सकती है, जिससे रोगों के प्रति सहनशीलता घटती है और विकासात्मक प्रक्षेप बदल सकते हैं।
- सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक संवेदनशीलताएँ: विभिन्न समाज मानव जीवन में संशोधन को लेकर अलग-अलग नैतिक दृष्टिकोण रखते हैं। इसलिये कृत्रिम जीनोम परियोजनाओं को सार्वभौमिक नैतिक वैधता नहीं प्राप्त होती है और ये भू-राजनीतिक एवं सामाजिक तनाव उत्पन्न कर सकती हैं।
- मानव संवर्द्धन की ढलान: भले ही प्रारंभिक उद्देश्य चिकित्सीय हों, कृत्रिम जीनोम क्षमताएँ धीरे-धीरे बुद्धिमत्ता, रूप, व्यवहार आदि जैसे संवर्द्धन की दिशा में बढ़ सकती हैं, जिससे उपचार और मानव पुन:निर्माण के बीच की सीमा धुंधली हो जाती है।
जैव सुरक्षा संबंधी चिंताएँ
- दोहरा उपयोग अनुसंधान जोखिम: मानव जीनोम संश्लेषण में प्रयुक्त प्रौद्योगिकियों का उपयोग हानिकारक जैविक एजेंट बनाने के लिये भी किया जा सकता है।
- अनियमित या निजी प्रयोग: जैसे-जैसे DNA संश्लेषण सस्ता और सुलभ होता जा रहा है, निजी प्रयोगशालाएँ, DIY बायोलॉजी समूह या वाणिज्यिक संस्थाएँ उचित निगरानी के बिना प्रयोग कर सकती हैं।
- वैश्विक शासन में अंतराल: वर्तमान वैश्विक मानक जैसे जैविक हथियार अभिसमय, WHO दिशानिर्देश, या राष्ट्रीय जैव-सुरक्षा नियम जीन-संशोधित जीवों या जीन संपादन के लिये बनाए गए थे, न कि पूर्ण जीनोम संश्लेषण के लिए।
- अनपेक्षित जैविक परिणामों की संभावना: कृत्रिम रूप से निर्मित मानव जीनोम अप्रत्याशित व्यवहार कर सकता है। किसी भी आकस्मिक उत्सर्जन या चिकित्सीय दुरुपयोग से अज्ञात स्वास्थ्य या पारिस्थितिक जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं।
- भू-राजनीतिक और सुरक्षा तनाव: कुछ देशों में तीव्र प्रगति से तकनीकी प्रतिस्पर्द्धा शुरू हो सकती है।
- राज्य कृत्रिम जीनोम की सफलता को रणनीतिक लाभ के रूप में देख सकते हैं, जिससे विश्वास की कमी और समान क्षमताएँ विकसित करने का दबाव बढ़ता है, और वैश्विक जैव-सुरक्षा चिंता तीव्र होती है।
निष्कर्ष:
मानव पहचान, सहमति और असमानता से जुड़े नैतिक दुविधाओं के साथ-साथ गंभीर जैव-सुरक्षा जोखिम और शासन अंतराल इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वैश्विक स्तर पर समन्वित मानकों की आवश्यकता है। भविष्य में, पारदर्शिता, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और मज़बूत नियामक ढाँचे द्वारा निर्देशित ज़िम्मेदार नवाचार आवश्यक होगा, ताकि ये परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकियाँ जन-विश्वास और सामूहिक सुरक्षा के अनुरूप विकसित हों।
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