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प्रश्न :
प्रश्न. “शुचिता किसी लोक सेवक के नैतिक मूल्यों को सुनिश्चित करती है, जबकि अभिरुचि उसकी कार्यकुशल उत्कृष्टता को निर्धारित करती है।” उपयुक्त उदाहरणों सहित स्पष्ट कीजिये। (150 शब्द)
11 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्नउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- परिचय में, संबंधित शब्दों को संक्षेप में परिभाषित कीजिये।
- मुख्या भाग में समझाइए कि किस प्रकार शुचिता नैतिक दिशा-निर्देशक के रूप में और अभिरुचि कार्यात्मक आवश्यकता के रूप में कार्य करती है।
- आगे यह बताइए कि उनके बीच तालमेल से शासन व्यवस्था कैसे बेहतर होती है।
- इसके बाद समझाइए कि नौकरशाही के लिए ये दोनों अपरिहार्य क्यों हैं।
- संवैधानिक दृष्टिकोण प्राप्त करने में उनके महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए निष्कर्ष लिखिये।
परिचय:
शुचिता से आशय सार्वजनिक जीवन में सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, पारदर्शिता तथा जवाबदेही जैसे नैतिक मूल्यों के प्रति दृढ़ और सतत प्रतिबद्धता से है। अभिरुचि से तात्पर्य उन क्षमताओं, कौशलों, अभिवृत्तियों तथा व्यवहारगत दक्षताओं के समुच्चय से है, जो किसी अधिकारी को अपने कर्तव्यों का प्रभावी निर्वहन करने में सक्षम बनाते हैं। इस प्रकार शुचिता नैतिक दिशा-सूचक प्रदान करती है, जबकि अभिरुचि कार्यात्मक उत्कृष्टता सुनिश्चित करती है।
उदाहरण के लिये, एक ईमानदार ज़िला मजिस्ट्रेट जो अनुबंध आवंटन में राजनीतिक दबाव का प्रतिरोध करता है तथा सर्वश्रेष्ठ बोलीदाता के चयन हेतु डेटा-आधारित मूल्यांकन का उपयोग करता है, वह शासन में शुचिता और अभिरुचि के तालमेल को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता है।
मुख्या भाग:
लोक सेवक के नैतिक दिशा-सूचक के रूप में शुचिता
- हितों के टकराव, पक्षपात अथवा स्वार्थी समूहों के दबाव से जुड़ी दुविधाओं में नैतिक निर्णय-निर्माण का मार्गदर्शन करती है।
- राजनीतिक परिवर्तन की परवाह किये बिना समता, न्याय और तटस्थता जैसे संवैधानिक मूल्यों के पालन को सुनिश्चित करती है।
- पारदर्शिता और जवाबदेही को प्रोत्साहित करती है, जिससे भ्रष्टाचार या सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की संभावनाएँ कम होती हैं।
- प्रशासन में जन-विश्वास का निर्माण करती है, जिससे लोकतांत्रिक शासन की वैधता सुदृढ़ होती है।
- उदाहरण: प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) को लागू करते समय अधिकारियों ने भ्रष्टाचार से लाभ उठाने वाले मध्यस्थों के स्थानीय दबाव का प्रतिरोध किया। इस प्रक्रिया में शुचिता ने निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाई।
कार्यात्मक उत्कृष्टता के प्रेरक के रूप में अभिरुचि
- विश्लेषणात्मक अभिरुचि साक्ष्य-आधारित निर्णय-निर्माण, नीति-मूल्यांकन तथा संकट-प्रबंधन को सक्षम बनाती है।
- भावनात्मक बुद्धिमत्ता अधिकारियों को जन-शिकायतों के प्रबंधन, टीम का मनोबल बनाए रखने तथा संघर्ष की स्थिति में संवाद और समन्वय स्थापित करने में सहायक होती है।
- नेतृत्व तथा प्रशासनिक कौशल विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और प्रभावी सेवा वितरण को सुनिश्चित करते हैं।
- संप्रेषण अभिरुचि जन-जागरूकता और व्यवहारगत परिवर्तन को बढ़ावा देती है, जो व्यापक जन-कार्यक्रमों के लिये अत्यंत आवश्यक है।
- उदाहरण: कोविड-19 महामारी के दौरान ज़िला मजिस्ट्रेटों ने डेटा विश्लेषण, समानुभूतिपूर्ण संप्रेषण तथा सुव्यवस्थित लॉजिस्टिक योजना का उपयोग कर कंटेनमेंट ज़ोनों का प्रभावी प्रबंधन किया।
शासन को सुदृढ़ बनाने में शुचिता और अभिरुचि का तालमेल
- नैतिक अभिप्राय और तकनीकी दक्षता का समन्वय टिकाऊ तथा नागरिक-केंद्रित प्रशासन को सुनिश्चित करता है।
- शुचिता यह सुनिश्चित करती है कि निर्णय निष्पक्ष हों, जबकि अभिरुचि यह सुनिश्चित करती है कि वे समयबद्ध तथा क्रियान्वयन योग्य हों।
- यह अधिकारियों को राजनीतिक, आर्थिक अथवा सामाजिक जैसे बाह्य दबावों का प्रतिरोध करने में सक्षम बनाता है, साथ ही तथ्य-आधारित औचित्य प्रस्तुत करने की क्षमता भी प्रदान करता है।
- उदाहरण: मनरेगा भुगतानों में अनियमितताओं का पता लगाने वाला कोई लोक सेवक उन्हें उजागर करने के लिये शुचिता पर निर्भर करता है, जबकि लेखा-परीक्षण तंत्र के पुनर्रचना तथा पारदर्शिता बढ़ाने के लिये अभिरुचि की आवश्यकता होती है।
नौकरशाही के लिये दोनों अपरिहार्य क्यों हैं?
- अभिरुचि के बिना शुचिता नैतिक तो होती है, परंतु वह प्रशासनिक अक्षमता होती है।
- शुचिता के बिना अभिरुचि कुशल अधिकारियों द्वारा तंत्र के दुरुपयोग की स्थिति उत्पन्न करती है, जिससे भ्रष्टाचार अथवा पक्षपात को बढ़ावा मिलता है।
- दोनों गुणों का संतुलित समावेश नीतिगत हेरफेर को रोकता है, विधि के शासन को प्रोत्साहित करता है तथा दीर्घकालिक संस्थागत विश्वसनीयता को बनाए रखता है।
- उदाहरण: सार्वजनिक खरीद से जुड़े घोटाले प्रायः तब सामने आते हैं जब तकनीकी रूप से दक्ष अधिकारी नैतिक शुचिता से विहीन होते हैं, जो शुचिता के बिना अभिरुचि के दुष्परिणामों को रेखांकित करता है।
निष्कर्ष:
भगवद्गीता में कहा गया है, “योगस्थः कुरु कर्माणि”, अर्थात अपने कर्तव्यों का पालन धर्म और कौशल के साथ करो। यह आदर्श आधुनिक लोक-सेवा के मूल भाव को अभिव्यक्त करता है, जहाँ शुचिता नैतिक आधार प्रदान करती है और अभिरुचि प्रभावी कार्रवाई का साधन बनती है। दोनों का समन्वय ऐसे शासन को सुनिश्चित करता है जो सिद्धांतनिष्ठ, दक्ष तथा भारत की संवैधानिक दृष्टि के अनुरूप हो।
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