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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. अंतरात्मा का संकट (Crisis of conscience) शब्द से आप क्या समझते हैं? अपने व्यक्तिगत या सार्वजनिक जीवन के किसी उदाहरण की सहायता से स्पष्ट कीजिये कि आपने ऐसी स्थिति का सामना किस प्रकार किया। (150 शब्द)

    06 Nov, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण :

    • अंतःकरण के संकट की स्पष्ट एवं सटीक परिभाषा से शुरुआत कीजिये।
    • एक उदाहरण की सहायता से स्पष्ट कीजिये।
    • आगे की राह बताते हुए निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    अंतरात्मा का संकट वह स्थिति है, जब कोई व्यक्ति यह तय करने में गहरे द्वंद्व का सामना करता है कि नैतिक रूप से सही क्या है और बाहरी दबाव, सामाजिक अपेक्षाएँ या निजी लाभ उससे क्या करवाना चाहते हैं। ऐसे समय में व्यक्ति की आंतरिक नैतिक समझ प्रलोभनों, परिणामों के भय या सामाजिक संबंधों से टकराने लगती है। इस प्रकार की परिस्थितियाँ व्यक्ति की सत्यनिष्ठा, न्यायबोध, नैतिक दृढ़ता और चरित्र की शुचिता की वास्तविक परीक्षा लेती हैं।

    मुख्य भाग:

    अंतरात्मा का संकट

    • यह नैतिक सिद्धांतों और बाहरी दबावों के बीच उत्पन्न होने वाले आंतरिक संघर्ष को दर्शाता है।
    • यह तब उत्पन्न होता है, जब अपने नैतिक मूल्यों का पालन करना किसी व्यक्तिगत हानि, असुविधा अथवा टकराव का कारण बन सकता है।
    • यह कर्त्तव्य बनाम भावना, सत्य बनाम सुविधा या जनहित बनाम व्यक्तिगत दायित्व के बीच टकराव को दर्शाता है।
    • यह समझौता करने की बजाय अंतरात्मा के अनुसार कार्य करने के लिये नैतिक साहस और स्पष्टता की मांग करता है।

    मेरे जीवन से उदाहरण: अंतरात्मा के संकट का सामना

    प्रसंग:

    • मैं एक प्रमुख सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिये अपने कॉलेज की आयोजन समिति का हिस्सा था।
    • एक करीबी मित्र ने समय-सीमा के बाद एक प्रायोजन प्रस्ताव प्रस्तुत किया और मुझसे अनुरोध किया कि मैं प्रचार कंटेंट पर उसकी संस्था का लोगो शामिल करूँ।

    संकट की प्रकृति

    • व्यक्तिगत निष्ठा और संस्थागत निष्पक्षता के बीच संघर्ष।
    • ‘सिर्फ इस बार’ अपवाद बनाने का दबाव।
    • यह डर कि मना करने से मित्रता प्रभावित हो सकती है।

    मूल्यों का मतभेद

    • सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, पारदर्शिता बनाम मित्रता, सामाजिक अपेक्षा, भावनात्मक दबाव।

    मेरे समक्ष मौजूद विकल्प

    • अनुरोध स्वीकार कर निष्पक्षता से समझौता करना चाहिये।
    • अनुरोध को सीधे अस्वीकार कर व्यक्तिगत संबंधों में तनाव का जोखिम उठाना चाहिये।
    • डिज़ाइन में विलंब करके बीच का रास्ता (सख्त समय-सीमा के कारण यह संभव नहीं है) खोजना चाहिये।

    नैतिक दृष्टिकोण से विचार:

    • अपवाद देना उन प्रायोजकों के साथ अनुचित होगा, जिन्होंने नियमों का पालन किया।
    • इससे एक गलत मिसाल कायम होगी और आयोजन समिति की विश्वसनीयता कमज़ोर हो जाएगी।
    • नियमों का पालन करने से विश्वास, समानता और व्यावसायिकता सुनिश्चित होती है।

    अंतिम निर्णय:

    • मैंने विनम्रतापूर्वक, लेकिन दृढ़ता से अनुरोध अस्वीकार कर दिया।
    • मैंने बताया कि नियम सभी प्रतिभागियों के लिये निष्पक्षता बनाए रखते हैं तथा उन्हें तोड़ने से आयोजन समिति की विश्वसनीयता कमज़ोर हो जाएगी।

    परिणाम:

    • मित्र को शुरुआत में निराशा हुई, लेकिन बाद में उसने तर्क की सराहना की।
    • आयोजन सुचारु रूप से संपन्न हुआ, जिसमें सभी प्रायोजकों के लिये समान मानक बनाए रखे गए।

    निष्कर्ष

    इस घटना से यह सीख मिलती है कि अंतरात्मा का संकट केवल सही मार्ग पहचानने तक सीमित नहीं होता, बल्कि उस मार्ग का पालन करने के लिये नैतिक साहस रखने की आवश्यकता होती है, भले ही बाह्य दबाव क्यों न हो। लोक सेवकों के लिये ऐसे आंतरिक संघर्ष सामान्य हैं जिसे उन्हें सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता एवं जनहित के प्रति प्रतिबद्धता के आधार पर सुलझाना चाहिये। जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा है, “अंतरात्मा के मामलों में, बहुमत का कानून कोई स्थान नहीं रखता।”

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