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ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    "गैर सरकारी संगठनों NGOs से यह अपेक्षा की जाती हैं कि वे राज्य एवं समाज के बीच की खाई को कम कर व्यक्ति को सरकार से जोड़ने का कार्य करें, किंतु अधिकांशतः NGOs इन अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे हैं।" इस कथन की सप्रमाण पुष्टि करते हुए ऐसे सुझाव दें जिनसे कि NGOs को अधिक उत्तरदायी बनाया जा सके।

    10 May, 2017 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर(1945) के अध्याय 10 के अनुच्छेद 71 में ऐसे संगठनों की चर्चा की गई थी जो समाज के हित में बिना लाभ की मंशा से लोककल्याणकारी कार्य करें। जेनेवा कनवेंशन(1949) के अनुसार राज्य, जनता के संपूर्ण विकास के सभी कार्यों को नहीं देख सकता अतः विकास कार्यों में जनता को भागीदार बनाना चाहिये। इसके बाद से ही NGOs की परिकल्पना सामने आई जो सरकार एवं समाज के बीच एक कड़ी का कार्य कर विकास में योगदान दे सके।

    किंतु, वर्तमान में भारत के संदर्भ में देखा जाए तो अधिकांशतः NGOs इन अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे हैं। इसे निम्नलिखित उदाहरणों के माध्यम से समझा जा सकता है-

    • भारत में रूस के पश्चात सर्वाधिक संख्या में NGOs हैं फिर भी जनहित एवं जनकल्याण सुनिश्चित नहीं हो पाया है।
    • प्रतिवर्ष लगभग 1000 करोड़ रुपए की राशि NGOs को दी जाती है लेकिन इनमें से जन हितार्थ कितनी राशि खर्च हुई, कहाँ खर्च हुई एवं उसका आउटपुट क्या रहा, इसका कोई लेखा-जोखा नहीं दिया जाता।
    • उदारीकरण के पश्चात NGOs की संख्या में तीव्र वृद्धि हुई है जिससे यह चिंता उभरती है कि ये संगठन जनहित के कार्यों में संलग्न हैं अथवा नव उदारवादी हितों के संरक्षण में।
    • कई देश भारत के आर्थिक विकास को अवरूद्ध करने के लिये यहाँ NGOs खुलवाते हैं। विदेशी चंदे से पोषित ऐसे NGOs पर जल-जंगल-जमीन के नाम पर आदिवासियों एवं स्थानीय समुदायों को भड़काकर विकास कार्यों में बाधा पहुँचाने के भी आरोप लगे हैं।
    • भारत में लगभग 33 लाख NGOs हैं जिनमें से केवल 10% NGOs ने ही अपने आय-व्यय का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया हैं। इससे NGOs के कार्यों एवं आय-व्यय की पारदर्शिता भी संदेह के घेरे में है।

    सुझावः

    • NGOs की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करने के लिये इसके पंजीकरण नियमों को सख्त किया जाना चाहिये। NGOs को उनके कामकाज एवं नैतिक स्टैंडर्ड के मूल्यांकन के पश्चात ही मान्यता प्रदान की जाए। 
    • NGOs विनियमन एवं फंड के लेखा-जोखा से संबंधित स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किये जाएँ एवं फंड के इस्तेमाल के मूल्यांकन के लिये एक अधिकार प्राप्त समिति का गठन किया जाए। यदि जाँच में यह पाया जाता है कि NGOs द्वारा फंड का युक्तिपूर्ण उपयोग नहीं किया जा रहा अथवा उसका दुरूपयोग किया जा रहा है तो फंड को तत्काल प्रभाव से रोक देना चाहिये एवं उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिये।
    • NGOs में पारदर्शिता बढ़ाने के लिये उनका ऑनलाइन पंजीकरण करवाने के साथ-साथ उनके कार्यों का विवरण ऑनलाइन रखना अनिवार्य करना चाहिये। 
    • विदेशी अनुदान(नियमन)अधिनियम, 1976 (FCRA) का उल्लंघन करने अथवा देश के विकास कार्यों में बाधा पहुँचाने वाले NGOs पर आपराधिक कार्रवाई करनी चाहिये।

    गैर सरकारी संगठनों को दिया गया फंड जनता का धन है जिसका उपयोग जनता के लिये ही किया जाना चाहिये। इसके किसी भी प्रकार के दुरूपयोग पर अविलंब कार्रवाई होनी चाहिये। इसलिये वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए NGOs के नियमन के लिये नए सिरे से एक सख्त कानून लाने की आवश्यकता को सर्वोच्च न्यायालय ने भी महसूस किया है। अतः सरकार को इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाने की जरूरत है।

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