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ध्यान दें:

प्रिलिम्स फैक्ट्स

रैपिड फायर

सरकार द्वारा विद्युत् (संशोधन) नियम, 2026 अधिसूचित

स्रोत: द हिंदू 

सरकार ने विद्युत (संशोधन) नियम, 2026 को अधिसूचित किया, जिसमें विद्युत नियम, 2005 के नियम-3 में संशोधन किया गया, जो संलग्न उत्पादन संयंत्रों (CGP) से संबंधित है।

  • CGP उद्योगों या संस्थाओं द्वारा स्थापित विद्युत संयंत्र हैं, जो सार्वजनिक विद्युत ग्रिड पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय मुख्य रूप से अपनी खपत के लिये विद्युत उत्पन्न करते हैं।
  • उद्देश्य: ये संशोधन वैधानिक स्वामित्व और उपभोग संरक्षणों को संरक्षित रखते हुए संलग्न उत्पादन प्रावधानों को स्पष्ट करने, अस्पष्टताओं को दूर करने, कारोबारी सुगमता में सुधार करने और संलग्न विद्युत को भारत के ऊर्जा संक्रमण एवं औद्योगिक विकास लक्ष्यों के साथ संरेखित करने का लक्ष्य रखते हैं।
  • नीतिगत महत्त्व: विद्युत अधिनियम, 2003 के तहत समर्थित और राष्ट्रीय विद्युत नीति, 2005 में मान्यता प्राप्त संलग्न विद्युत उत्पादन उद्योगों को विश्वसनीय और लागत प्रभावी विद्युत प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण रहा है।
    • इसने उद्योगों को विद्युत आपूर्ति बाधाओं को दूर करने और लागत में उतार-चढ़ाव का प्रबंधन करने में सक्षम बनाया है, जिससे औद्योगिक विकास को समर्थन मिला है।
    • जैसे-जैसे उद्योग गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा की ओर बढ़ रहे हैं, संलग्न विद्युत के लिये एक स्पष्ट और पूर्वानुमान योग्य नियामक ढाँचा प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ावा देने और दीर्घकालिक आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिये आवश्यक है।
  • मुख्य सुधार:
    • स्वामित्व की स्पष्ट व्याख्या: स्वामित्व की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए इसमें सहायक कंपनियाँ, होल्डिंग कंपनियाँ तथा उस होल्डिंग कंपनी की अन्य सहायक कंपनियाँ भी शामिल की गई हैं, जो कैप्टिव जनरेटिंग प्लांट की स्थापना करती हैं।
    • कैप्टिव स्टेटस सत्यापन के लिये नोडल एजेंसियाँ: 1 अप्रैल, 2026 से राज्य/केंद्रशासित प्रदेश एक नोडल एजेंसी नामित करेंगे, जबकि अंतर-राज्यीय सत्यापन का कार्य राष्ट्रीय लोड डिस्पैच केंद्र (NLDC) द्वारा किया जाएगा।
    • सत्यापन सुधार: स्पष्टता और समान रूप से कार्यान्वयन सुनिश्चित करने हेतु अब पूरे वित्तीय वर्ष के लिये कैप्टिव स्टेटस का वार्षिक सत्यापन किया जाएगा।

और पढ़ें: भारत का ऊर्जा विकास


प्रारंभिक परीक्षा

सरकार द्वारा 'ऑरेंज इकॉनमी' के लिये 3 पहलें आरंभ

स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों?

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने तीन परिवर्तनकारी पहलें राष्ट्रीय AI कौशल पहल, मायवेव्स और अंतर्निहित सैटेलाइट ट्यूनर के साथ उन्नत EPG शुरू की हैं, जो भारत की ऑरेंज इकॉनमी को सुदृढ़ करने और डिजिटल प्रौद्योगिकी तक पहुँच का लोकतंत्रीकरण करने के लिये हैं।

  • ये कदम भविष्य के लिये तैयार कार्यबल का निर्माण करने और भारत को डिजिटल सामग्री एवं नवाचार के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक सामरिक कदम को दर्शाते हैं।

ऑरेंज इकॉनमी को बढ़ावा देने के लिये कौन-सी 3 परिवर्तनकारी पहलों  की शुरुआत हुई?

  • राष्ट्रीय AI कौशल पहल: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, गूगल और यूट्यूब के बीच एक सार्वजनिक-निजी  भागीदारी है, जिसका उद्देश्य AVGC (एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स) क्षेत्र में 15,000 पेशेवरों को प्रशिक्षित करना है। इसे मुंबई के भारतीय रचनात्मक प्रौद्योगिकी संस्थान (IICT) के माध्यम से कार्यान्वित किया जा रहा है।
    • चरण I (मार्च–जून 2026): गूगल कॅरियर सर्टिफिकेट्स और गूगल क्लाउड जनरेटिव AI लर्निंग पाथवे के माध्यम से बड़े पैमाने पर फाउंडेशनल AI लर्निंग पर केंद्रित है, जिसमें प्रॉम्प्टिंग और AI लीडरशिप जैसे बुनियादी बिंदु शामिल हैं।
    • चरण II (जुलाई–दिसंबर 2026): जेमिनी 3, नैनो बनाना, वियो और वर्टेक्स AI जैसे उच्च-स्तरीय उपकरणों का उपयोग करके डिजिटल स्टोरी टेलिंग में महारत हासिल करने के लिये उन्नत, व्यावहारिक परियोजना-आधारित विशेषज्ञता पर केंद्रित है।
  • मायवेव्स प्लेटफॉर्म: वेव्स OTT प्लेटफॉर्म पर एक नई सुविधा है, जो उपयोगकर्त्ताओं को निष्क्रिय दर्शकों से सक्रिय रचनाकारों में परिवर्तित करती है, जो विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपयोगकर्त्ता-जनित सामग्री (UGC) का समर्थन करती है।
    • इसे क्रिएट इन इंडिया चैलेंज (CIC) के साथ संरेखित करने के लिये डिज़ाइन किया गया है, जो लोकल स्टोरीटेलर को क्षेत्रीय विविधता प्रदर्शित करने के लिये एक संरचित ईकोसिस्टम प्रदान करता है।
      • CIC विभिन्न थीमों पर दर्ज़नों प्रतियोगिताओं की मेज़बानी करता है, जैसे– एनीमे चैलेंज, AI फिल्म मेकिंग, कॉमिक्स क्रिएटर चैंपियनशिप, ट्रुथ टेल हैकाथॉन (गलत सूचना को फैलने से रोकने के लिये) और XR क्रिएटर हैकाथॉन, ताकि भारत की क्रिएटर इकॉनमी को सशक्त बनाया जा सके।
  • TV में अंतर्निहित सैटेलाइट ट्यूनर के साथ उन्नत EPG: यह सेट-टॉप बॉक्स के बिना डीडी फ्री डिश एक्सेस की अनुमति देता है, जो दूरदराज़ के क्षेत्रों में पहुँच में काफी सुधार करता है और हार्डवेयर की लागत को कम करता है।

ऑरेंज इकॉनमी क्या है?

  • परिचय: ऑरेंज इकॉनमी, जिसे क्रिएटिव इकॉनमी के रूप में भी जाना जाता है, एक उत्पादन मॉडल को संदर्भित करती है जहाँ मूल्य मुख्य रूप से भौतिक विनिर्माण या प्राकृतिक संसाधनों के बजाय बौद्धिक संपदा, क्रिएटिविटी और सांस्कृतिक पूंजी से प्राप्त होता है।
  • प्रमुख क्षेत्र: इसमें AVGC-XR (एनिमेशन, विज़ुअल इफेक्ट्स, गेमिंग, कॉमिक्स और एक्सटेंड रियलिटी), फिल्म, संगीत, फैशन, डिज़ाइन, विज्ञापन, परफॉर्मिंग आर्ट और सांस्कृतिक पर्यटन शामिल हैं।
  • आर्थिक प्रभाव
    • वैश्विक स्तर पर: यह लगभग 3% वैश्विक GDP और 30 मिलियन नौकरियों के लिये ज़िम्मेदार है।
    • भारत: भारत का मनोरंजन और मीडिया राजस्व 2025 में 35.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2029 तक 47.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
  • बजट 2026-27 का मुख्य बिंदु: सरकार ने हाल ही में वर्ष 2030 तक 20 लाख पेशेवरों का कार्यबल तैयार करने के लिये 15,000 स्कूलों और 500 कॉलेजों में AVGC कंटेंट क्रिएटर लैब्स स्थापित करने की घोषणा की है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. ऑरेंज इकॉनमी क्या है?
ऑरेंज इकॉनमी एक उत्पादन मॉडल है, जिसमें मूल्य बौद्धिक संपदा, रचनात्मकता और सांस्कृतिक पूंजी से प्राप्त होता है।

2. ऑरेंज इकॉनमी के लिये तीन परिवर्तनकारी पहलें कौन-सी हैं?
तीन पहलें हैं: (1) राष्ट्रीय AI कौशल पहल, (2) MyWAVES प्लेटफॉर्म और (3) टीवी में इन-बिल्ट सैटेलाइट ट्यूनर के साथ उन्नत EPG।

3. राष्ट्रीय AI कौशल पहल का लक्ष्य क्या है?
इसका उद्देश्य 15,000 युवाओं को निशुल्क प्रशिक्षण देना है। चरण I में AI की बुनियादी शिक्षा शामिल है, जबकि चरण II में उन्नत, प्रोजेक्ट-आधारित विशेषज्ञता पर ध्यान दिया जाता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रश्न. निम्नलिखित पर विचार कीजिये: (2022)

  1. आरोग्य सेतु 
  2. कोविन 
  3. डिजीलॉकर 
  4. दीक्षा

उपर्युक्त में से कौन-से ओपेन-सोर्स डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बनाए गए हैं ?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2, 3 और 4

(c) केवल 1, 3 और 4

(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (d)


रैपिड फायर

सरकार ने RoDTEP लाभों की पूर्ण बहाली की

स्रोत: हिंदुस्तान टाइम्स

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने निर्यातकों को बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागत और पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक जोखिमों से बचाने के लिये निर्यातित उत्पादों पर शुल्क और करों में छूट (RoDTEP) योजना के लाभों को पूर्णतः बहाल कर दिया है।

  • पूर्व में, वैश्विक व्यापार अस्थिरता के बीच RoDTEP दरों को आधा कर दिया गया था, जिस पर निर्यातकों ने सख्त आलोचना की। हालाँकि, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण निर्यातों को इस कटौती से छूट दी गई थी।

RoDTEP योजना

  • परिचय: वर्ष 2021 में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा शुरू की गई एक प्रमुख निर्यात प्रोत्साहन योजना है। इसने पूर्ववर्ती मर्चेंडाइज़ एक्सपोर्ट्स फ्रॉम इंडिया स्कीम (MEIS) का स्थान लिया।
  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य निर्यातित वस्तुओं के निर्माण एवं वितरण के दौरान लगने वाले निहित उन केंद्रीय, राज्य एवं स्थानीय शुल्कों, करों और उपकरों की क्षतिपूर्ति करना है, जिन्हें किसी अन्य मौजूदा तंत्र (जैसे– GST इनपुट टैक्स क्रेडिट या ड्यूटी ड्रॉबैक) के तहत वापस नहीं किया जाता।
    • यह अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में भारतीय वस्तुओं की लागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाता है, जिससे निर्यातकों के लिये समान अवसर (लेवल प्लेइंग फील्ड) सुनिश्चित होता है।
  • WTO अनुरूपता: MEIS को प्रत्यक्ष सब्सिडी होने के आधार पर विश्व व्यापार संगठन (WTO) में चुनौती दी गई थी। इसके विपरीत, RoDTEP एक प्रोत्साहन योजना के बजाय शुल्क छूट (ड्यूटी रिमिशन) योजना के रूप में कार्य करता है, जिससे यह पूर्णतः WTO के अनुरूप बनता है।
    • छूट हस्तांतरणीय इलेक्ट्रॉनिक ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप्स (e-scrips) के रूप में जारी की जाती है, जिनका उपयोग आयात पर बेसिक कस्टम ड्यूटी के भुगतान के लिये किया जा सकता है।
    • यह छूट सामान्यतः निर्यातित वस्तुओं के फ्रेट ऑन बोर्ड (FOB) मूल्य का लगभग 0.5% से 4.3% तक होता है, जो उत्पाद क्षेत्र के अनुसार भिन्न होता है।
  • दायरा: इसमें ऐसे अंतर्निहित कर शामिल होते हैं, जैसे– मंडी कर, ईंधन पर वैट (VAT), कोयला उपकर, ईंधन पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क, विद्युत शुल्क तथा अन्य स्थानीय उपकर, जिन्हें अन्यत्र वापस नहीं किया जाता।
  • पात्रता: यह अधिकांश निर्यातित वस्तुओं पर लागू होती है (8,500 से अधिक टैरिफ लाइनों को कवर करती है)। कुछ श्रेणियाँ (जैसे– निर्यात नीति के तहत प्रतिबंधित वस्तुएँ) इससे बाहर रखी गई हैं।

और पढ़ें: RoDTEP योजना


रैपिड फायर

SC ने सशस्त्र बलों में महिलाओं के प्रति भेदभाव को रेखांकित किया

स्रोत: द हिंदू 

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने महिला अधिकारियों की पदोन्नति और चिकित्सा फिटनेस मूल्यांकन में प्रणालीगत लैंगिक पक्षपात को उजागर किया, साथ ही सशस्त्र बलों में उन्हें स्थायी आयोग तथा पेंशन संबंधी लाभ पाने का अधिकार बनाए रखने की पुष्टि की।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की मुख्य बातें:

  • प्रणालीगत पक्षपात: शॉर्ट सर्विस कमीशन महिला अधिकारियों (SSCWOs) की वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों (ACRs) को असावधानीपूर्वक ग्रेड किया जाता था, अक्सर उन्हें ‘औसत’ अंक दिये जाते थे क्योंकि यह मान लिया जाता था कि उनका दीर्घकालिक कॅरियर नहीं होगा।
    • महिलाओं को ऐतिहासिक रूप से कम ग्रेडिंग का सामना करना पड़ा, जबकि पुरुष अधिकारियों को अनौपचारिक रूप से उच्च लाभ मिलता रहा।
  • कॅरियर विकास में बाधाएँ: महिलाओं को प्रशिक्षण और कॅरियर सुधार के अवसर नहीं दिये गए, जिसके परिणामस्वरूप उनका सेवा प्रोफाइल कमज़ोर रहा।
  • संवैधानिक दायित्व: स्थायी आयोग (PC) में महिलाओं को शामिल करना संवैधानिक उत्तरदायित्व है, जो समानता और गरिमा सुनिश्चित करता है।
    • लैंगिक आधार पर समान अवसर अस्वीकार करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोज़गार में समान अवसर) का उल्लंघन है।

सशस्त्र बलों में महिलाएँ

  • प्रारंभिक सैन्य भूमिकाएँ: महिलाएँ पहली बार मिलिट्री नर्सिंग सर्विस (1888) के माध्यम से शामिल हुईं और बाद में भारतीय सेना मेडिकल कॉर्प्स (1958) में डॉक्टर के रूप में नियमित आयोग के साथ शामिल हुईं।
  • गैर-चिकित्सा प्रवेश: वर्ष 1992 में वुमेन स्पेशल एंट्री स्कीम (WSES) ने शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) में शिक्षा, कानून, लॉजिस्टिक्स और इंजीनियर्स जैसी शाखाओं में गैर-युद्ध भूमिकाओं के लिये महिलाओं के प्रवेश के रास्ते खोले।
    • सेना अधिनियम, 1950 ने महिलाओं की भूमिकाओं को सीमित कर दिया, उन्हें केवल सूचित शाखाओं में शामिल होने की अनुमति दी, जैसे– आर्मी पोस्टल सर्विस, जज एडवोकेट जनरल (JAG) विभाग, आर्मी एजुकेशन कॉर्प्स (AEC), आर्डिनेंस कॉर्प्स और सर्विस कॉर्प्स।
  • शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC): वर्ष 2005 में SSC प्रणाली शुरू की गई थी, जिसमें महिला अधिकारियों को 14 वर्ष का कार्यकाल दिया गया और यह एक अधिक औपचारिक कॅरियर संरचना की शुरुआत थी।
  • स्थायी आयोग की उपलब्धि: महिलाओं को पहली बार वर्ष 2008 में सीमित शाखाओं, जैसे– JAG और AEC में स्थायी आयोग प्रदान किया गया।
    • भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2020 के बबिता पुनिया निर्णय में सभी शाखाओं में, जहाँ शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) मौजूद है, महिलाओं को स्थायी आयोग प्रदान करने का आदेश दिया, जिससे वे कमांड की भूमिकाएँ संँभाल सकें।
  • NDA (2021) का उद्घाटन: सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश जारी कर महिलाओं को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) परीक्षा देने की अनुमति दी, जिससे सैन्य प्रशिक्षण और प्रवेश में एक और बड़ी लैंगिक बाधा दूर हुई।
  • वर्तमान स्थिति: महिलाएँ भारतीय वायु सेना में फाइटर पायलट, नौसेना में युद्धपोतों की कमान संँभालती हैं और सेना की विभिन्न शाखाओं में स्थायी आयोग (PC) धारक हैं। हालाँकि मुख्य युद्ध शाखाएँ (जैसे– इंफेंट्री और आर्मर्ड कॉर्प्स) अधिकांशतः उनके लिये बंद ही हैं।

और पढ़ें: भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाएँ


प्रारंभिक परीक्षा

विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 प्रस्तुत करने जा रही है, जिसका उद्देश्य विदेशी निधियों से निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन में कानूनी कमियों को दूर करना तथा NGO के पदाधिकारियों की जवाबदेही को सुदृढ़ करना है।

प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 से संबंधित प्रमुख तथ्य क्या हैं?

  • परिसंपत्तियों हेतु नामित प्राधिकरण: एक प्रमुख प्रस्तावित परिवर्तन के तहत सरकार को यह अधिकार दिया जाएगा कि वह एक ‘नामित प्राधिकरण’ निर्धारित करे, जो उन गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की विदेशी निधियों से निर्मित परिसंपत्तियों को अपने अधीन लेकर उनका प्रबंधन या निपटान कर सके, जिनका FCRA पंजीकरण निलंबित, रद्द या नवीनीकृत नहीं हुआ है। यह प्रावधान पहले से मौजूद एक कानूनी अंतराल को दूर करने के उद्देश्य से लाया गया है।
    • इसके बाद इन परिसंपत्तियों को हस्तांतरित या बेचा जा सकेगा और प्राप्त आय को भारत के संघीय कोष में जमा किया जाएगा।
  • ‘प्रमुख पदाधिकारी’ की विस्तारित परिभाषा: अब इस परिभाषा में निदेशक, भागीदार, ट्रस्टी, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) का कर्त्ता, सोसाइटी/ट्रस्ट/ट्रेड यूनियन के पदाधिकारी तथा प्रबंधन पर नियंत्रण रखने वाला कोई भी व्यक्ति शामिल किया गया है। इससे वे व्यक्तिगत रूप से अपराधों के लिये उत्तरदायी होंगे, जब तक वे यह प्रमाणित न कर दें कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी अथवा उन्होंने आवश्यक सावधानी बरती थी।
  • जाँच के लिये पूर्व अनुमोदन: यह विधेयक यह अनिवार्य करता है कि किसी भी कानून प्रवर्तन एजेंसी या राज्य सरकार को FCRA से संबंधित शिकायतों की जाँच शुरू करने से पहले केंद्रीय सरकार से पूर्व अनुमोदन लेना आवश्यक होगा।
  • निर्धारित समय-सीमा एवं स्वतः समाप्ति: यह पूर्व अनुमोदन के तहत विदेशी फंड की प्राप्ति तथा उपयोग के लिये निश्चित समय-सीमा प्रस्तावित करता है, अवधि समाप्त होने या नवीनीकरण न होने पर पंजीकरण की स्वतः समाप्ति (Automatic Lapse) एवं निलंबन के दौरान संपत्ति के संचालन पर स्पष्ट नियम प्रदान करता है।
  • कैद अवधि में कमी: यह विधेयक FCRA अपराधों के लिये अधिकतम कैद अवधि को 5 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष करने का प्रस्ताव करता है, साथ ही दंड को भी तर्कसंगत बनाया गया है।

विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम, 2010 क्या है?

  • परिचय: यह एक केंद्रीय कानून है जिसे भारत सरकार द्वारा लागू किया गया है, जिसका उद्देश्य व्यक्तियों, संघों और NGO द्वारा प्राप्त विदेशी योगदान और विदेशी आतिथ्य की स्वीकृति, उपयोग तथा लेखांकन को विनियमित करना है।
    • यह अधिनियम मूल रूप से वर्ष 2010 में पारित किया गया और वर्ष 2011 में लागू हुआ तथा वर्ष 2016, 2018 तथा 2020 में संशोधित किया गया। इसका प्रशासन गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा किया जाता है।
    • लगभग 16,000 संघ FCRA के तहत पंजीकृत हैं, जो प्रतिवर्ष लगभग 22,000 करोड़ रुपये प्राप्त करते हैं।
  • उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना कि विदेशी फंड का उपयोग भारत के राष्ट्रीय हित, संप्रभुता या सार्वजनिक व्यवस्था के लिये हानिकारक गतिविधियों के लिये न किया जाए।
    • विदेशी फंड का दुरुपयोग देशविरोधी, राजनीतिक या धार्मिक परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों के लिए होने से रोकना।
  • मुख्य प्रावधान और विशेषताएँ:
    • पंजीकरण: किसी भी व्यक्ति या संगठन को केंद्र सरकार से पूर्व पंजीकरण या विशिष्ट पूर्व अनुमति के बिना विदेशी योगदान स्वीकार करना वर्जित है।
    • पंजीकरण के लिये पात्रता: किसी संगठन को निम्नलिखित शर्तें पूरी करनी होंगी:
      • सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1860, भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 या कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के तहत पंजीकृत होना अनिवार्य है।
      • कम-से-कम 3 वर्षों की संबंधित गतिविधियों का प्रमाणित रिकॉर्ड होना आवश्यक है।
      • न्यूनतम व्यय सीमा पूरी करनी होगी (वर्तमान में इसे पिछले 3 वर्षों में 15 लाख रुपये तक बढ़ाया गया है)
    • निर्दिष्ट FCRA खाता: समस्त विदेशी योगदान केवल नई दिल्ली के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (मुख्य शाखा) में खोले गए एक निर्दिष्ट बैंक खाते में प्राप्त किये जाने चाहिये।
    • उपयोग पर प्रतिबंध: विदेशी निधि को किसी अन्य व्यक्ति या संगठन को हस्तांतरित (उप-अनुदान) नहीं किया जा सकता है जब तक कि उनके पास भी वैध FCRA पंजीकरण न हो।
    • पंजीकरण की वैधता:पंजीकरण की वैधता पाँच वर्ष की निर्धारित अवधि के लिये प्रभावी होती है। निरंतरता सुनिश्चित करने हेतु, इसकी समाप्ति से कम-से-कम छह माह पूर्व नवीनीकरण (Renewal) का आवेदन प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
  • निषिद्ध गतिविधियाँ: आवेदकों को काल्पनिक संस्थाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करना चाहिये और उनका सांप्रदायिक तनाव, असामंजस्य या राजद्रोही गतिविधियों का कोई इतिहास नहीं होना चाहिये। इसके अतिरिक्त, FCRA चुनाव के लिये उम्मीदवारों, पत्रकारों, मीडियाकर्मियों, न्यायाधीशों, सरकारी कर्मचारियों, राजनेताओं और राजनीतिक संगठनों के लिये विदेशी वित्तपोषण को प्रतिबंधित करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. वर्ष 2026 के विधेयक में प्रस्तावित 'नामित प्राधिकारी' कौन है?
यह केंद्र द्वारा नियुक्त एक अधिकारी है, जो उन NGO की विदेशी निधियों से बनाई गई संपत्तियों का प्रबंधन या निपटान करता है जिनके लाइसेंस रद्द या निलंबित कर दिये गए हैं।

2. नए संशोधन में 'स्वतः समाप्ति' खंड क्या है?
यह अनिवार्य करता है कि यदि नवीनीकरण आवेदन सफलतापूर्वक संसाधित नहीं होता है, तो एक FCRA पंजीकरण प्रमाणपत्र अपनी समाप्ति तिथि पर तुरंत अपनी कानूनी वैधता खो देगा।

3. FCRA के तहत प्रशासनिक व्यय की वर्तमान सीमा क्या है?
NGO एक वित्तीय वर्ष में प्राप्त विदेशी योगदान का अधिकतम 20% प्रशासनिक लागतों पर खर्च करने के लिये प्रतिबंधित हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

मेन्स

प्रश्न. क्या नागरिक समाज और गैर-सरकारी संगठन आम नागरिक को लाभ प्रदान करने के लिये लोक सेवा प्रदायगी का वैकल्पिक प्रतिमान प्रस्तुत कर सकते हैं? इस वैकल्पिक प्रतिमान की चुनौतियों की विवेचना कीजिये। (2021)


चर्चित स्थान

लितानी नदी और टायर शहर

स्रोत: द हिंदू 

इज़रायल-हिज़्बुल्लाह संघर्ष के बढ़ने से दक्षिणी लेबनान पर ध्यान बढ़ गया है, इज़रायल लितानी नदी तक एक सुरक्षा क्षेत्र चाहता है, हालाँकि भारी बमबारी यूनेस्को विश्व धरोहर टायर शहर के लिये खतरा उत्पन्न करती है।

लितानी नदी

  • लितानी नदी पूरी तरह से लेबनान के भीतर बहने वाली सबसे लंबी नदी है और दक्षिणी लेबनान में एक महत्त्वपूर्ण जल संसाधन है।
    • यह बेका घाटी से निकलती है, सीरियाई सीमा के समानांतर दक्षिण की ओर प्रवाहित होती है और टायर शहर के पास भूमध्य सागर में गिरती है।

रणनीतिक महत्त्व:

  • बफर ज़ोन: यह नदी ब्लू लाइन (लेबनान और इज़रायल को अलग करने वाली संयुक्त राष्ट्र मान्यता प्राप्त सीमा) के समानांतर प्रवाहित होती है। 
    • इज़रायल लितानी नदी के दक्षिणी क्षेत्र को हिज़्बुल्लाह की रॉकेट फायर और सीमापार घुसपैठ के खिलाफ एक महत्त्वपूर्ण सुरक्षा बफर के रूप में देखता है।
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 1701: वर्ष 2006 के लेबनान युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 1701 पारित किया।
    • इसने अनिवार्य किया कि ब्लू लाइन और लितानी नदी के बीच का क्षेत्र लेबनान की सरकार और UNIFIL (लेबनान में संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल) के अलावा किसी भी सशस्त्र कार्मिक, संपत्ति और हथियारों से पूरी तरह मुक्त हो।

टायर शहर

  • परिचय: टायर (अरबी में सूर) लेबनान के दक्षिणी तट पर लितानी नदी के मुहाने के दक्षिण में स्थित है। यह फोनीशियन (1500-300 ईसा पूर्व) काल में एक प्रमुख समुद्री शक्ति तथा भूमध्यसागरीय व्यापार और नौवहन का महत्त्वपूर्ण केंद्र था।
  • विशेषता: यह टायरियन पर्पल रंग (जो म्यूरैक्स समुद्री घोंघों से प्राप्त होता था) के लिये प्रसिद्ध था और प्राचीन व्यापार नेटवर्क एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
  • ऐतिहासिक विकास: सिकंदर महान (332 ईसा पूर्व) ने इसे द्वीप से प्रायद्वीप में परिवर्तित कर दिया। बाद में यूनानी और रोमन शासन के अधीन इसका विकास हुआ, जिसके परिणामस्वरूप यहाँ हिप्पोड्रोम, स्नानागार और स्तंभयुक्त सड़कों जैसे महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय संरचनाएँ निर्मित हुए।
  • यूनेस्को मान्यता: इसकी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्ता को मान्यता देते हुए इसे वर्ष 1984 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया। 

LEBANON

और पढ़ें:  इज़रायल-हिज़्बुल्लाह संघर्ष और युद्ध सिद्धांत


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