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भारतीय अर्थव्यवस्था

विकसित भारत 2047 हेतु भारत की राजकोषीय नीति का सुदृढ़ीकरण

  • 01 Jan 2026
  • 169 min read

यह एडिटोरियल “The case for states to adopt fiscal reforms” पर आधारित है, जो 28/12/2025 को द हिंदू टाइम्स में प्रकाशित हुआ था। यह लेख भारत की विकास गाथा की समीक्षा करता है तथा दीर्घकालिक विकास दर को बनाए रखने के लिये राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

प्रिलिम्स के लिये: राजकोषीय नीति, FRBM अधिनियम 2003, राजकोषीय घाटा, GDP, ऋण-GDP अनुपात, कर उत्प्लावन

मेन्स के लिये: राजकोषीय नीति और अर्थव्यवस्था पर उसका प्रभाव, राजकोषीय प्रबंधन से जुड़ी प्रमुख समस्याएँ तथा चुनौतियों के समाधान के उपाय।

वर्ष 2047 तक उच्च विकास दर को बनाए रखते हुए विकसित राष्ट्र बनने की भारत की महत्त्वाकांक्षा, केंद्र और राज्यों दोनों स्तरों पर राजकोषीय अनुशासन को सुदृढ़ करने पर निर्भर करती है। जहाँ केंद्र ने अपने राजकोषीय घाटे को 9.2% से घटाकर 5.6% कर लिया है तथा सार्वजनिक ऋण को GDP के 89% से लगभग 82% तक कम किया है, वहीं राज्यों के स्तर पर राजकोषीय सुधार अभी भी असमान बने हुए हैं। वैश्विक निवेशक भारत के समग्र (जनरल गवर्नमेंट) राजकोषीय वित्त का आकलन करते हैं, जिससे समन्वित राजकोषीय शासन अत्यंत आवश्यक हो जाता है। अतः ऋण स्थिरता और जवाबदेही पर आधारित, राज्यों के स्तर पर गहन राजकोषीय सुधारों को अपनाना दीर्घकालिक व्यापक-आर्थिक स्थिरता तथा समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिये अनिवार्य है।

भारत का वर्तमान राजकोषीय शासन ढाँचा क्या है?

  • राजकोषीय नीति: राजकोषीय नीति से तात्पर्य अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिये सरकार द्वारा कराधान, सार्वजनिक व्यय और उधारी के उपयोग से है।
    • यह सरकार का एक प्रमुख उपकरण है, जिसके माध्यम से आर्थिक वृद्धि, रोज़गार, मुद्रास्फीति, आय वितरण तथा समग्र व्यापक-आर्थिक स्थिरता को नियंत्रित किया जाता है।
    • यह दो प्रमुख घटकों के माध्यम से संचालित होती है राजस्व नीति (कर एवं गैर-कर राजस्व) और व्यय नीति (पूंजीगत तथा राजस्व व्यय)।
    • भारत की राजकोषीय नीति ‘समेकन के साथ वृद्धि (Growth with Consolidation)’ की रणनीति पर आधारित है, जिसके तहत सरकार दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने के लिये उच्च स्तर के पूंजीगत व्यय (अवसंरचना पर व्यय) को बनाए रखते हुए राजकोषीय घाटे को कम करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
      • राजकोषीय नीति, मौद्रिक नीति से भिन्न होती है, जिसे मुद्रा आपूर्ति और ब्याज दरों को विनियमित करने के लिये केंद्रीय बैंक द्वारा संचालित किया जाता है।
  • संघ के लिये संवैधानिक ढाँचा: यह ढाँचा मुख्यतः संविधान के भाग V (संघ) तथा भाग XII (वित्त, संपत्ति, संविदाएँ और वाद) से लिया गया है।
    • बजटीय प्रक्रिया (संघ स्तर): संविधान में ‘बजट’ शब्द का उपयोग नहीं किया गया है। इसके बजाय इसे वार्षिक वित्तीय विवरण (Annual Financial Statement) के रूप में संदर्भित किया गया है।
      • अनुच्छेद 112: राष्ट्रपति से संसद को वार्षिक आय और व्यय के अनुमान (Annual Estimates of Receipts and Expenditure) प्रस्तुत करने की आवश्यकता।
      • अनुच्छेद 113: लोक सभा से संघीय कोष (Consolidated Fund) से व्यय के लिये Demands for Grants के माध्यम से स्वीकृति लेने का अनिवार्य प्रावधान, जिसमें चार्ज्ड व्यय शामिल नहीं।
      • अनुच्छेद 114 (अप्रोप्रियेशन एक्ट): संसद की स्वीकृति के बिना संघीय कोष से निकासी निषिद्ध।
      • अनुच्छेद 110 (वित्त विधेयक): कर प्रस्तावों को धन विधेयक (Money Bill) के रूप में वर्गीकृत करता है, जो कर में परिवर्तन के लिये कानूनी आधार प्रदान करता है।
    • तीन सार्वजनिक कोष: संविधान तीन प्रमुख सार्वजनिक खातों की स्थापना करता है:
      • भारत की संचित निधि (अनुच्छेद 266(1)): सरकार की राजस्व और व्यय के लिये प्रमुख खाता।
      • भारत के लोक लेखा (अनुच्छेद 266(2)): सरकार द्वारा ट्रस्ट में रखे गए कोष; निकासी के लिये संसद की स्वीकृति आवश्यक नहीं।
      • भारत की आकस्मिकता निधि (अनुच्छेद 267): अनियोजित व्ययों को पूरा करने के लिये भारत की आकस्मिकता निधि, जिसका उपयोग विधायी स्वीकृति प्राप्त होने तक किया जाता है।
    • राजकोषीय संघवाद (केंद्र-राज्य संबंध): संविधान संघ और राज्यों के बीच सहकारी राजकोषीय संबंध सुनिश्चित करता है।
      • अनुच्छेद 280 (वित्त आयोग): प्रत्येक पाँच वर्ष में ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज कर अंतरण (Vertical and Horizontal Tax Devolution) की अनुशंसा करता है।
      • अनुच्छेद 279A (GST काउंसिल): GST से संबंधित मामलों पर संयुक्त निर्णय लेने के लिये संस्थागत मंच प्रदान करता है।
    • अनुदान:
      • अनुच्छेद 275: वित्त आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर कानूनी अनुदान (Statutory Grants)।
      • अनुच्छेद 282: सार्वजनिक प्रयोजनों के लिये विवेकाधीन अनुदान (Discretionary Grants)।
    • कराधान पर नियंत्रण:
      • अनुच्छेद 265: कराधान के लिये विधायी अधिकार होना अनिवार्य।
      • सातवीं अनुसूची: संघ और राज्यों के बीच कराधान शक्तियों का विभाजन करती है, जो संघ सूची (Union List) एवं राज्य सूची (State List) में निर्दिष्ट है।
  • राज्यों के लिये संवैधानिक ढाँचा: राज्यों के लिये संवैधानिक ढाँचा संघ के समान है, किंतु इसे क्षेत्रीय शासन की आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला गया है।
    • राज्यीय बजटीय प्रक्रिया
      • अनुच्छेद 202 (वार्षिक वित्तीय विवरण): संघ की तरह ही, राज्यपाल को प्रत्येक वर्ष विधान मंडल के समक्ष राज्य के अनुमानित प्राप्तियों और व्यय प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
      • अनुच्छेद 203 एवं 204: ये सुनिश्चित करते हैं कि बिना विधानसभा द्वारा पारित अनुदान की मांग और उसके बाद उपयुक्त व्यय विधेयक पारित किये बिना कोई धन व्यय नहीं किया जा सकता।
      • अनुच्छेद 199: राज्य स्तर पर धन विधेयकों (विशेषकर कर और उधारी से संबंधित) की परिभाषा करता है, जिससे विधानसभा (निचला सदन) को विधान परिषद (उच्च सदन) पर सर्वोच्च शक्ति प्राप्त होती है।
    • राज्य निधियाँ और उनके संरक्षण: राज्य तीन ऐसी निधियाँ रखते हैं जो प्रकृति में संघ के समान हैं:
      • राज्य की एकीकृत निधि (अनुच्छेद 266): इसमें सभी राज्य कर और राजस्व जमा किये जाते हैं।
      • राज्य का सार्वजनिक खाता (अनुच्छेद 266): उन लेन-देन के लिये जहाँ राज्य बैंक की भूमिका निभाता है (जैसे, राज्य भविष्य निधि)।
      • राज्य की आकस्मिक निधि (अनुच्छेद 267): अप्रत्याशित व्यय के लिये राज्यपाल के नियंत्रण में एक आपातकालीन निधि।
    • कर लगाने और उधार लेने का अधिकार
      • सातवीं अनुसूची (सूची II): राज्यों को विशिष्ट वस्तुओं पर कर लगाने का विशेष अधिकार प्रदान करती है, जिसमें शामिल हैं:
        • कृषि आय
        • भूमि और भवन
        • मानव उपभोग के लिये शराब
        • बिजली, वाहन और मनोरंजन
      • अनुच्छेद 293 (उधारी): एक राज्य भारत के भीतर धन उधार ले सकता है। हालाँकि यदि राज्य अभी भी संघ सरकार का कोई ऋण शेष रखता है, तो उसे नया ऋण लेने से पहले संघ की सहमति प्राप्त करनी होगी।
    • राजकोषीय हस्तांतरण
      • अनुच्छेद 243-I एवं 243-Y (राज्य वित्त आयोग): प्रत्येक पाँच वर्ष में, राज्यपाल एक राज्य वित्त आयोग का गठन करता है, जो यह सिफारिश करता है कि राज्य की आय को पंचायतों और नगरपालिकाओं के साथ कैसे वितरित किया जाना चाहिये।
  • कानूनी ढाँचा: भारत का राजकोषीय कानूनी ढाँचा संवैधानिक सिद्धांतों को क्रियान्वित करता है, जिसमें घाटा, ऋण और कराधान से संबंधित प्रमुख संसदीय कानून शामिल हैं।
    • FRBM अधिनियम, 2003 घाटा लक्ष्यों, सकल घरेलू उत्पाद के सापेक्ष ऋण ढाँचे और अनिवार्य राजकोषीय प्रकटीकरण के माध्यम से वित्तीय अनुशासन को स्थापित करता है; इसके पश्चात अधिकांश राज्यों ने अपने स्वयं के FRBM अधिनियम लागू किये।
      • FRBM अधिनियम का एक प्रमुख प्रावधान यह है कि केंद्रीय लेखा परीक्षक (CAG) को अधिनियम के अनुपालन का वार्षिक मूल्यांकन करना अनिवार्य है।
      • यह सरकार को बजट के साथ संसद में तीन वक्तव्य प्रस्तुत करने का भी आदेश देता है: समष्टि अर्थशास्त्रीय ढाँचागत विवरण, मध्यवर्ती राजकोषीय नीति विवरण और राजकोषीय कार्यनीति संबंधी विवरण
    • आयकर अधिनियम, 2025 (अप्रैल, 2026 से लागू) प्रत्यक्ष कराधान को आधुनिक बनाता है, प्रावधानों को सरल बनाकर नए कर ढाँचे को डिफाॅल्ट बनाता है। अप्रत्यक्ष कराधान वर्ष 2017 के GST कानूनों द्वारा नियंत्रित है, जिसमें हाल के सुधारों ने अनुपालन को सुदृढ़ किया और महामारी के बाद राज्य राजस्व की चुनौतियों का समाधान किया।

भारत के राजकोषीय सुदृढ़ीकरण लक्ष्यों की वर्तमान स्थिति क्या है?

  • राजकोषीय घाटा: भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिये सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.4% का राजकोषीय घाटा लक्ष्य निर्धारित किया है, जो वित्त वर्ष 2024-25 के संशोधित अनुमान 4.8% से कम है। यह एफआरबीएम ढाँचे के तहत जारी राजकोषीय सुदृढ़ीकरण प्रयासों को दर्शाता है। 
  • राजस्व घाटा और अन्य संकेतक: वित्त वर्ष 2025-26 के लिये, राजस्व घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 1.5% रहने का अनुमान है, जो वित्त वर्ष 2024-25 के लिये संशोधित अनुमान 1.9% से कम है। प्राथमिक घाटे में भी कमी आने की उम्मीद है, जो ब्याज भुगतान को ध्यान में रखने के बाद बेहतर संतुलन का संकेत देता है।
  • ऋण लक्ष्य: केंद्रीय बजट वर्ष 2025 में घाटे के लक्ष्यों से ध्यान हटाकर ऋण-से-GDP अनुपात के प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता को स्वीकार किया गया, जिसका उद्देश्य धीरे-धीरे कुल देनदारियों को कम करना है।
    • वित्त वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार की बकाया देनदारियाँ GDP के लगभग 56.1% होने का अनुमान लगाया गया था और वित्त वर्ष 2030-31 तक इसे GDP के लगभग 50% तक लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
  • राज्यों की राजकोषीय स्थिति: राज्यों का संयुक्त ऋण-से-GDP अनुपात मार्च, 2021 में GDP के लगभग 31% से घटकर मार्च, 2024 तक 28.5% हो गया, हालाँकि यह अभी भी महामारी से पूर्व के 25.3% के स्तर से ऊपर है।

भारत में राजकोषीय प्रबंधन से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?

  • उच्च ब्याज भार तथा ऋण सेवा-व्यय: भारत के राजस्व का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा विगत ऋणों पर ब्याज भुगतान में व्यय हो जाता है, जिससे सामाजिक क्षेत्र के व्यय के लिये सीमित संभावना बचती है। 
    • हालाँकि ऋण-GDP अनुपात क्रमशः घट रहा है, लेकिन ब्याज की कुल मात्रा एक "प्रतिबद्ध व्यय" बनी हुई है जो राजकोषीय कठोरता सृजित करती है। 
    • ब्याज भुगतान एक बड़े "क्राउडिंग आउट" कारक के रूप में कार्य करता है, जो कुल बजट का लगभग 25% हिस्सा व्यय कर देता है और स्वास्थ्य और शिक्षा को वित्तपोषित करने की सरकार की क्षमता को सीमित करता है।
      • वित्त वर्ष 2025-26 के बजट में, ब्याज भुगतान को केंद्र सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियों का लगभग 37% हिस्सा होने का अनुमान लगाया गया था।
  • उच्च राजकोषीय घाटा और धीमी राजकोषीय सुदृढ़ीकरण प्रक्रिया: राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के प्रयासों के बावजूद, राजकोषीय घाटा उच्च बना हुआ है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिये राजकोषीय घाटे का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद का 4.4% निर्धारित किया गया है, लेकिन प्रगति धीमी है और दबाव बना हुआ है। 
    • हालिया आँकड़ों से पता चलता है कि अप्रैल-नवंबर, 2025 तक, राजकोषीय घाटा पहले ही पूरे वर्ष के लक्ष्य (₹9.76 लाख करोड़) के 62.3% तक पहुँच चुका था, जो विगत वर्ष की इसी अवधि से अधिक है, जो राजस्व और व्यय प्रबंधन पर जारी दबावों को दर्शाता है ।
  • उच्च सार्वजनिक ऋण भार: भारत का कुल सरकारी ऋण (केंद्र + राज्य) अत्यधिक है। केंद्रीय बजट 2025-26 में, कुल केंद्रीय सरकारी ऋण का अनुमान सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 56.1% लगाया गया था। 
    • हालाँकि समय के साथ इसे कम करने का लक्ष्य है, लेकिन वर्तमान स्तर अभी भी विकास को बढ़ावा देने वाले व्यय के लिये राजकोषीय संभावना को सीमित करता है।
  • राज्यों का राजकोषीय तनाव और ऋण स्थिरता: राज्य के वित्त लगातार तनाव में हैं। RBI और राज्य बजट के आँकड़ों पर आधारित PRS इंडिया की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023-24 में राज्यों पर सामूहिक रूप से GDP का लगभग 27.5% बकाया देयताएँ थीं, जो GDP के 20% के दीर्घकालिक लक्ष्य से अधिक है।
    • वर्ष 2023–24 में 19 राज्यों का राजकोषीय घाटा GSDP के 3% मानक से अधिक रहा। इसके अतिरिक्त, आंध्र प्रदेश, पंजाब तथा तमिलनाडु जैसे कई राज्य अब भी संरचनात्मक असंतुलनों से ग्रस्त हैं।
    • उच्च ऋण स्तरों के कारण राज्यों में ब्याज भुगतान की देयता बढ़ गई है। वर्ष 2016-17 और वर्ष 2024-25 के बीच ब्याज भुगतान में 10% की वार्षिक दर से वृद्धि हुई, जो राजस्व प्राप्ति की 9.2% की वृद्धि से अधिक है।
  • प्रतिबद्ध व्यय के कारण विकासात्मक व्यय का संकुचन: सरकारी बजट का एक बड़ा हिस्सा प्रतिबद्ध एवं अनिवार्य व्ययों (जैसे- वेतन, ब्याज भुगतान तथा सहायिकी) पर व्यय हो जाता है, जिससे विकासोन्मुख व्यय के लिये उपलब्ध संसाधन सीमित हो जाते हैं।
    • राज्यों के लिये वर्ष 2023-24 में, राजस्व प्राप्तियों का 53% से अधिक हिस्सा वेतन, ब्याज और पेंशन पर व्यय किया गया, जिससे पूंजीगत व्यय तथा उत्पादक निवेश के लिये राजकोषीय संभावना अत्यधिक सीमित हो गई।
  • केंद्र-राज्य समन्वय एवं FRBM क्रियान्वयन में अंतराल: इस प्रकार, FRBM ढाँचे की उपस्थिति के बावजूद, केंद्र एवं राज्यों द्वारा बार-बार लक्ष्य-विचलन यह दर्शाता है कि राजकोषीय अनुशासन अब भी संस्थागत सुदृढ़ता की प्रतीक्षा कर रहा है।
    • राज्य प्रायः कमज़ोर राजस्व संग्रहण तथा उच्च प्रतिबद्ध व्यय के कारण विशेष ऋण प्रावधानों पर निर्भर रहते हैं और अप्रयुक्त ऋण सीमा को आगे के वर्षों में स्थानांतरित करने को विवश होते हैं।
  • कमज़ोर राजस्व संग्रहण और कर प्रवाह में अस्थिरता से जुड़ी चुनौतियाँ: विभिन्न विकसित अर्थव्यवस्थाओं और यहाँ तक ​​कि कुछ उभरते बाज़ारों की तुलना में भारत का कर-GDP अनुपात अपेक्षाकृत कम है, जो कि अधिक ऋण लिये बिना विकास एवं कल्याणकारी प्रतिबद्धताओं के विस्तार को वित्तपोषित करने की इसकी क्षमता को सीमित करता है।
    • विश्व बैंक के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 में भारत का कर-राजस्व (केंद्रीय स्तर पर) GDP का मात्र लगभग 6.73% था, जो आर्थिक उत्पादन की तुलना में कर-आधार की सीमित व्यापकता को दर्शाता है।
    • राज्य कर-संग्रह को सम्मिलित करने पर भी भारत का कुल कर–GDP अनुपात हाल के वर्षों में सामान्यतः 11–12% की सीमा में ही रहा है, जो OECD देशों के 34% से अधिक के औसत कर–GDP अनुपात की तुलना में अत्यंत कम है। यह स्थिति राजस्व संसाधन जुटाने की क्षमता में विद्यमान व्यापक अंतर को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है।
    • कम कर वृद्धि दर राजकोषीय नियोजन को और जटिल बना देती है; विश्लेषकों का सुझाव है कि भारत को मध्यम अवधि के विकास लक्ष्यों (6.5 से 7%) का समर्थन करने के लिये 1.2 से 1.5 की कर वृद्धि दर की आवश्यकता है, जो आधार को व्यापक बनाने और अनुपालन में सुधार के लिये संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

भारत में राजकोषीय प्रबंधन के सुदृढ़ीकरण हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?

  • राजकोषीय सुदृढ़ीकरण और विश्वसनीय मध्यावधि लक्ष्य: लगातार उच्च राजकोषीय घाटे का निवारण करने हेतु, भारत को केवल वार्षिक घाटे के लक्ष्यों के बजाय ऋण कटौती पर आधारित एक विश्वसनीय मध्यावधि राजकोषीय सुदृढ़ीकरण मार्ग का पालन करना चाहिये। 
    • प्रस्तावित ऋण-पर-GDP अनुपात को एक स्थिर स्तर (2030-31 तक लगभग 50%) पर लाने की दिशा में बदलाव को केंद्र और राज्यों दोनों के लिये स्पष्ट मार्ग प्रशस्त करते हुए कार्यान्वित किया जाना चाहिये। 
    • बजटेतर उधारों में बेहतर पारदर्शिता और सुस्पष्ट रूप से परिभाषित बचाव खंड (एस्केप क्लॉज़) के अतिरिक्त, FRBM सीमाओं का सख्ती से पालन करने से राजकोषीय विश्वसनीयता और निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा।
    • नीति आयोग ने उप-राष्ट्रीय राजकोषीय स्वास्थ्य का आकलन करने के लिये राजकोषीय स्वास्थ्य सूचकांक (FHI) रिपोर्ट 2025 जारी की है और इसका उपयोग सतत एवं समुत्थानशील आर्थिक विकास के लिये लक्षित राजकोषीय सुधारों के अभिकल्पन हेतु किया जाना चाहिये।
  • लोक ऋण का प्रबंधन और ऋण स्थिरता का वर्द्धन: चूँकि सामान्य सरकारी ऋण का स्तर उच्च बना हुआ है, इसलिये सक्रिय ऋण प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। 
    • इसमें ऋण परिपक्वता अवधि वर्द्धन, अधिक उपयुक्त समय पर ऋण निर्गम के माध्यम से ब्याज लागत को कम करना और बाज़ार से उधार लेने में केंद्र एवं राज्यों के बीच समन्वय में सुधार करना शामिल है। 
    • RBI के ऋण प्रबंधन ढाँचे की भूमिका को सुदृढ़ करना तथा बॉण्ड बाज़ारों को और अधिक व्यापक बनाना पुनर्वित्त जोखिमों को कम करने एवं राजकोषीय अनुकूलनशीलता में सुधार करने में सहायता कर सकता है।
  • राज्य स्तरीय राजकोषीय भार का समाधान: राज्यों को प्रोत्साहन और अनुशासन के संतुलित मिश्रण की आवश्यकता है। केंद्र को अतिरिक्त उधार लेने की क्षमता को माप्य राजकोषीय सुधारों (विद्युत क्षेत्र सुधार, सहायिकी युक्तिकरण, परिसंपत्ति मुद्रीकरण) से संबद्ध करना चाहिये।
    • राज्य स्तर पर मध्यावधि राजकोषीय ढाँचों को अपनाने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। इसके साथ ही, बजटेतर उधारों और गारंटियों की पारदर्शी रिपोर्टिंग को बढ़ावा देना आवश्यक है।
    • राजस्व जुटाने एवं व्यय को प्राथमिकता देने के लिये राज्य की क्षमता का और अधिक वर्द्धन करना निरंतर ऋण संचय के निवारण की दृष्टि से आवश्यक है।
  • प्रतिबद्ध व्यय नियंत्रण और व्यय की गुणवत्ता में सुधार: इस समस्या के समाधान के लिये, सरकार को बेहतर लक्ष्यीकरण के माध्यम से सहायिकी को युक्तिसंगत बनाने की आवश्यकता है, विशेष रूप से प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) तंत्र का विस्तार करके जो कमियों को कम करता है और लाभ का लक्षित लाभार्थियों तक पहुँचना सुनिश्चित करता है।
    • इसके अतिरिक्त, बुनियादी ढाँचे, रसद और डिजिटल परिसंपत्तियों जैसे पूंजीगत व्यय को अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिये, जिसका राजस्व व्यय की तुलना में आर्थिक विकास एवं  रोज़गार पर उच्च गुणक प्रभाव होता है।
  • राजस्व जुटाने और कर संग्रहण में सुधार: राजस्व जुटाने में सुधार के लिये कर दरों में बारंबार वृद्धि करने के बजाय संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। कर आधार को व्यापक बनाना, अनुपालन में सुधार करना और डेटा एनालिटिक्स एवं AI जैसे डिजिटल टूल का उपयोग कर संग्रहण दक्षता में उल्लेखनीय सुधार ला सकता है। 
    • कर राजस्व में वृद्धि के लिये दरों का युक्तिकरण, अनुपालन प्रक्रियाओं का सरलीकरण और भ्रष्टाचार निवारण के माध्यम से GST ढाँचे का सुदृढ़ीकरण करना आवश्यक है। 
    • इसके अतिरिक्त, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाकर और आय रिपोर्टिंग में सुधार करके प्रत्यक्ष कर आधार का विस्तार करने से भारत के कर-से-GDP अनुपात को बढ़ाने एवं विकास संबंधी आवश्यकताओं के वित्तपोषण के लिये उधार पर निर्भरता को कम करने में सहायता मिलेगी।
  • केंद्र-राज्य राजकोषीय समन्वय सुदृढ़ीकरण: संघीय प्रणाली में प्रभावी राजकोषीय प्रबंधन के लिये केंद्र और राज्यों के बीच प्रभावी समन्वय आवश्यक है। वित्त आयोग के चक्र से परे नियमित और सुनियोजित केंद्र-राज्य परामर्श राजकोषीय प्राथमिकताओं को संरेखित करने एवं व्यापक आर्थिक जोखिमों को प्रबंधित करने में सहायक हो सकते हैं।
    • विभिन्न राज्यों में उधार लेने के मानदंडों और राजकोषीय नियमों में सामंजस्य स्थापित करने से अनुशासन को बढ़ावा मिलेगा तथा असंतुलन कम होगा। 
    • मानकीकृत लेखांकन और रियल टाइम रिपोर्टिंग प्रणालियों के माध्यम से राज्य के वित्त में अधिक पारदर्शिता से विभिन्न स्तरों की सरकारों के बीच अनुवीक्षण एवं विश्वास में भी सुधार होगा।
  • संस्थागत क्षमता और राजकोषीय शासन में सुधार: धारणीय राजकोषीय प्रबंधन के लिये सशक्त संस्थाएँ आवश्यक हैं। वित्त विभागों और कोषागारों की तकनीकी एवं विश्लेषणात्मक क्षमता बढ़ाने से बजट निर्माण, पूर्वानुमान तथा नीति मूल्यांकन में सुधार होगा।
    • स्वतंत्र वित्तीय संस्थान राजकोषीय नियमों के अनुपालन की निगरानी करने और लोक वित्त का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। 
    • परिणाम-आधारित बजट और डेटा-संचालित निर्णयन के व्यापक अंगीकार से यह सुनिश्चित होगा कि लोक व्यय से अर्थव्यवस्था के लिये बृहद स्तरीय परिणाम और दीर्घकालिक मूल्य प्राप्त हो।

निष्कर्ष: 

भारत की राजकोषीय स्थिरता राजस्व संग्रहण में सुधार लाने, व्यय को युक्तिसंगत बनाने और एक विश्वसनीय सुदृढ़ीकरण पथ का अनुपालन करने पर निर्भर है। वर्ष 2030-31 तक राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 4.4% तक कम करने और लोक ऋण को सकल घरेलू उत्पाद के 50% तक लाने के लक्ष्य के साथ, अनुशासित राजकोषीय प्रबंधन आवश्यक है। पूंजीगत व्यय और कर संग्रह में सुधार करना तथा केंद्र-राज्य समन्वय को प्रभावी बनाना उच्च विकास को बनाए रखने के लिये महत्त्वपूर्ण होगा। सशक्त संस्थाओं और पारदर्शी राजकोषीय शासन को इन सुधारों का समर्थन करना चाहिये। ये सभी उपाय संयुक्त रूप से वर्ष 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने की लक्ष्य प्राप्ति की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

प्रश्न. सतत राजकोषीय सुदृढ़ीकरण भारत की दीर्घकालिक विकास रणनीति का केंद्रीय तत्त्व है। भारत के राजकोषीय प्रबंधन से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा कीजिये तथा आर्थिक संवृद्धि को मध्य में रखते हुए राजकोषीय स्थिरता सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक उपायों का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत का वर्तमान राजकोषीय घाटा लक्ष्य क्या है?
भारत का लक्ष्य मध्यम अवधि में राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 4.4 प्रतिशत तक कम करना है।

2. राजकोषीय सुदृढ़ीकरण क्यों महत्त्वपूर्ण है?
राजकोषीय सुदृढ़ीकरण समष्टि रूप से आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करता है, सार्वजनिक ऋण को नियंत्रित करता है तथा विकासोन्मुख व्यय के लिये आवश्यक वित्तीय साधनों का सृजन करता है।

3. भारत के राजकोषीय प्रबंधन की प्रमुख चुनौती क्या है?
उच्च सार्वजनिक ऋण, प्रतिबद्ध व्यय में निरंतर वृद्धि तथा राजस्व संग्रहण की सीमित क्षमता भारत के राजकोषीय प्रबंधन की प्रमुख चुनौतियाँ हैं।

4. केंद्र–राज्य समन्वय क्यों अत्यंत आवश्यक है?
क्योंकि केंद्र और राज्य—दोनों मिलकर—भारत की समग्र राजकोषीय स्थिति एवं उधारी स्तर का निर्धारण करते हैं।

5. राजकोषीय सुधार भारत के ‘विज़न 2047’ को किस प्रकार सहयोग प्रदान करते हैं?
राजकोषीय सुधार सतत आर्थिक संवृद्धि, उच्च सार्वजनिक निवेश तथा दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को सक्षम बनाकर भारत के ‘विज़न 2047’ को सुदृढ़ आधार प्रदान करते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. निम्नलिखित कथनाें पर विचार कीजिये: (2018)

  1. राजकोषीय दायित्व और बजट प्रबंधन (एफ.आर.बी.एम.) समीक्षा समिति के प्रतिवेदन में सिफारिश की गई है कि वर्ष 2023 तक केंद्र एवं राज्य सरकारों को मिलाकर ऋण-जी.डी.पी. अनुपात 60% रखा जाए जिसमें केंद्र सरकार के लिये यह 40% तथा राज्य सरकारों के लिये 20% हो।
  2.   राज्य सरकाराें के जी.डी.पी. के 49% की तुलना में केंद्र सरकार के लिये जी.डी.पी. का 21% घरेलू देयताएँ हैं।
  3.   भारत के संविधान के अनुसार यदि किसी राज्य के पास केंद्र सरकार की बकाया देयताएँ हैं तो उसे कोई भी ऋण लेने से पहले केंद्र सरकार से सहमति लेना अनिवार्य है।

उपर्युत्त कथनाें में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1  
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3  
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)


मेन्स:

प्रश्न.1 उदारीकरण के बाद की अवधि के दौरान बजट बनाने के संदर्भ में सार्वजनिक व्यय प्रबंधन भारत सरकार के लिये एक चुनौती है। स्पष्ट कीजिये। (2019)

प्रश्न.2 सामान्यतः देश कृषि से उद्योग और बाद में सेवाओं को अंतरित होते हैं पर भारत सीधे ही कृषि से सेवाओं को अंतरित हो गया है। देश में उद्योग के मुकाबले सेवाओं की विशाल संवृद्धि के क्या कारण हैं? क्या भारत सशक्त औद्योगिक आधार के बिना एक विकसित देश बन सकता है? (2014)

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