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भारतीय अर्थव्यवस्था

गिग इकॉनमी: विकास और श्रमिक सुरक्षा के बीच संतुलन

  • 02 Jan 2026
  • 154 min read

यह एडिटोरियल 01/01/2026 को द हिंदू में प्रकाशित “Gig workers’ strike reveals intolerable working conditions” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत की प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में गरिमा, नियमन और जवाबदेही की मांग करने वाले गिग वर्कर्स द्वारा पहली बार किये गए राष्ट्रव्यापी सामूहिक विरोध को उजागर करता है।

प्रिलिम्स के लिये: गिग इकॉनमी, NITI आयोग, नए श्रम संहिता, ई-कॉमर्स, न्यूनतम मजदूरी, सतत विकास लक्ष्य, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDPA), 2023, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI)

मेन्स के लिये: गिग इकॉनमी और अर्थव्यवस्था में इसका महत्त्व, प्रमुख मुद्दे और व्यावहारिक उपाय 

भारत की गिग इकॉनमी श्रम बाज़ार का एक प्रमुख हिस्सा बनकर उभरी है। सत्र 2020-21 में प्लेटफॉर्म आधारित कामों में 77 लाख श्रमिक लगे थे और अनुमानतः सत्र 2029-30 तक इनकी संख्या बढ़कर 235 लाख होने की उम्मीद है। हाल में नववर्ष की पूर्व संध्या पर ऐप-आधारित डिलीवरी और परिवहन क्षेत्र से जुड़े हज़ारों श्रमिकों द्वारा की गई राष्ट्रव्यापी हड़ताल ने ‘सुविधा आधारित अर्थव्यवस्था’ के पीछे छिपी कठोर वास्तविकताओं (लंबे कार्य घंटे, कम पारिश्रमिक एवं असुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ) को स्पष्ट रूप से उजागर किया है। यह विरोध इस तथ्य को रेखांकित करता है कि गिग श्रमिक भारत के शहरी दैनिक सेवाओं के लिये कितने महत्त्वपूर्ण बन चुके हैं। साथ ही यह उन नियामक खामियों को भी सामने लाता है, जिनके कारण लाखों गिग वर्कर्स बुनियादी अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा से वंचित हैं। इस प्रकार गिग इकॉनमी आज तीव्र विस्तार और श्रम न्याय की तात्कालिक आवश्यकता के बीच एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है।

गिग इकॉनमी क्या है?

  • परिचय: गिग इकॉनमी एक ऐसे श्रम बाज़ार को संदर्भित करती है जहाँ कार्य पारंपरिक पूर्णकालिक रोज़गार के बजाय अल्पकालिक, अनुकूल और कार्य-आधारित अनुबंधों के माध्यम से किया जाता है।
    • इस प्रणाली में, जिन व्यक्तियों को प्रायः गिग या प्लेटफॉर्म वर्कर कहा जाता है, वे उबर, स्विगी, ज़ोमैटो, अर्बन कंपनी या ओला जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से भोजन वितरण, राइड-हेलिंग, लॉजिस्टिक्स, फ्रीलांस काम या घरेलू सेवाओं जैसी सेवाएँ प्रदान करके आय अर्जित करते हैं।
  • भारत में गिग इकॉनमी की स्थिति: भारत की गिग इकॉनमी में हाल के वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, वित्त वर्ष 2024-25 तक लगभग 12 मिलियन गिग श्रमिकों का अनुमान है, जो सत्र 2020-21 में लगभग 7.7 मिलियन था। 
    • यह वर्ग अब कुल कार्यबल का 2% से अधिक हिस्सा है तथा डिजिटल कनेक्टिविटी, शहरीकरण और फूड डिलीवरी व राइड-हेलिंग जैसी ऑन-डिमांड सेवाओं के उदय के कारण इसका विस्तार हो रहा है।
    • सरकारी अनुमानों के अनुसार, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों की संख्या सत्र 2029-30 तक लगभग 23.5 मिलियन तक बढ़ सकती है, जो भारत के गैर-कृषि कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा होगा। 
    • केंद्रीय बजट- 2025 में गिग वर्कर्स के लिये पहचान पत्र और स्वास्थ्य देखभाल लाभों की शुरुआत की गई है, जिससे बेहतर सामाजिक सुरक्षा एवं वित्तीय समावेशन सुनिश्चित होगा।
  • भारत में विनियमन: सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020) ने औपचारिक रूप से गिग व प्लेटफॉर्म श्रमिकों को मान्यता दी तथा सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की अनुमति दी, लेकिन मजदूरी, काम के घंटे, शिकायत निवारण और एल्गोरिदम जवाबदेही पर लागू करने योग्य मानक कमज़ोर या लागू नहीं किये गए हैं। 
    • राजस्थान और कर्नाटक जैसे राज्यों ने कल्याणकारी कानून पारित किये हैं, हालाँकि उनका कार्यान्वयन पिछड़ रहा है।
    • जनवरी 2026 में जारी सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत मसौदा नियमों में यह प्रस्ताव है कि केंद्र द्वारा स्थापित सामाजिक सुरक्षा लाभों के लिये पात्र होने हेतु गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिकों को एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 90 दिनों के लिये एक एग्रीगेटर के साथ जुड़ा होना चाहिये।
      • एक से अधिक एग्रीगेटर के साथ काम करने वालों के लिये, आवश्यक अवधि बढ़कर 120 दिन हो जाती है।

गिग इकॉनमी भारत के विकास पथ में किस प्रकार योगदान देती है?

  • रोज़गार सृजन और युवा समायोजन: गिग इकॉनमी 7-8 मिलियन से अधिक श्रमिकों को आजीविका प्रदान करती है (वर्ष 2030 तक 23.5 मिलियन तक पहुँचने का अनुमान है), जो कृषि और अनौपचारिक क्षेत्रों से अतिरिक्त श्रम को समायोजित करती है।
    • विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में यह युवाओं, प्रवासी तथा अर्द्ध-कुशल श्रमिकों के लिये रोज़गार का महत्त्वपूर्ण माध्यम बनती है, जिससे खुली बेरोज़गारी में कमी आती है।
  • सेवा क्षेत्र और GDP को बढ़ावा: गिग प्लेटफॉर्म सेवा क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं, जो भारत की GDP का 55% से अधिक हिस्सा है।
    • राइड-हेलिंग, फूड डिलीवरी, लॉजिस्टिक्स, ई-कॉमर्स, होम सर्विसेज़ और डिजिटल फ्रीलांसिंग जैसे क्षेत्रों का तेज़ी से विस्तार हुआ है, जिससे सेवा-उपभोग संचालित विकास को समर्थन मिला है।
  • डिजिटल अर्थव्यवस्था और नवाचार को बढ़ावा देना: गिग प्लेटफॉर्म डिजिटलीकरण, कैशलेस भुगतान, GPS-आधारित लॉजिस्टिक्स और AI-संचालित सेवा आपूर्ति को गति प्रदान करते हैं।
    • वे भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) इकोसिस्टम — UPI, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी का समर्थन करते हैं, जिससे आर्थिक दक्षता एवं औपचारिकीकरण में वृद्धि होती है।
    • इसके परिणामस्वरूप भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था के समग्र अर्थव्यवस्था की तुलना में लगभग दोगुनी गति से बढ़ने और सत्र 2029–30 तक राष्ट्रीय आय के लगभग पाँचवें हिस्से का योगदान देने की संभावना है।
  • लघु एवं मध्यम उद्यमों और उद्यमिता को समर्थन: गिग प्लेटफॉर्म प्रवेश बाधाओं को कम कर सूक्ष्म उद्यमिता को प्रोत्साहित करते हैं, जहाँ श्रमिक न्यूनतम पूँजी निवेश के साथ आय अर्जित कर सकते हैं।
    • छोटे व्यवसायों एवं MSME को लास्ट-माइल डिलीवरी, डिजिटल मार्केटिंग और लॉजिस्टिक्स सहायता से लाभ मिलता है।
    • यह श्रमिकों को अपने काम के घंटे चुनने और आय के स्रोतों में विविधता लाने की अनुमति देकर श्रम बाज़ार के लचीलेपन को बढ़ाता है, साथ ही कोविड-19 के बाद की आर्थिक रिकवरी जैसे आर्थिक झटकों के दौरान विस्थापित श्रमिकों को भी समायोजित करता है।
  • महिला श्रम बल भागीदारी (FLFPR) को बढ़ावा देना: प्लेटफॉर्म-आधारित कार्य पारंपरिक 9-से-5 बाधाओं को समाप्त करता है, और महिलाओं को घरेलू दायित्वों के साथ आय अर्जन का अवसर देता है, विशेषकर लचीले और प्रायः घर-आधारित डिजिटल कार्यों के माध्यम से।
    • एक सुरक्षित और स्वायत्त वातावरण प्रदान करके, गिग इकॉनमी शहरी एवं अर्द्ध-शहरी महिला रोज़गार में हालिया वृद्धि के पीछे प्राथमिक चालक है।
    • भारत में महिला श्रम बल भागीदारी (FLFPR) में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, जिसमें महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 28% है। 
      • अर्बन कंपनी और ‘ब्यूटी-एट-होम’ जैसी सेवाओं ने हज़ारों महिलाओं को पारंपरिक सैलॉन की तुलना में 40–50 प्रतिशत अधिक आय अर्जित करने में सक्षम बनाया है।
  • क्षेत्रीय आर्थिक विकेंद्रीकरण का इंजन: टियर-2 और टियर-3 शहरों में क्विक कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स का आक्रामक विस्तार बंगलुरु एवं दिल्ली जैसे अत्यधिक शहरीकृत महानगरों से आर्थिक विकास को विकेंद्रीकृत कर रहा है। 
    • उदाहरण के लिये, सत्र 2025-26 में, भारत का क्यू-कॉमर्स बाज़ार बढ़कर ₹64,000 करोड़ हो गया।
    • डार्क स्टोर मॉडल और AI-संचालित रूट ऑप्टिमाइज़ेशन का उपयोग करके, गिग इकॉनमी शहरी क्षेत्रों में निहित मांग को तत्काल आर्थिक गतिविधि में परिवर्तित करती है, जिससे उच्च आवृत्ति उपभोग का एक चक्र चलता है।
      • इस परिवर्तन से स्थानीय स्तर पर रोज़गार के केंद्र बनते हैं, जिससे संकटग्रस्त प्रवासन को रोका जा सकता है तथा उपभोग में वृद्धि एवं लास्ट-माइल डिलीवरी नेटवर्क के माध्यम से अति-स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को प्रोत्साहन मिलता है।
    • वर्ष 2026 में, ब्लिंकइट और ज़ेप्टो जैसे प्लेटफॉर्मों के छोटे शहरों में विस्तार के कारण लगभग 20 लाख (20 लाख) नए गिग जॉब्स के सृजन होने का अनुमान है। वर्ष 2025 के त्योहार के सीज़न के दौरान, इन प्लेटफॉर्मों ने ऑर्डर में 120% की भारी वृद्धि दर्ज की, जिससे ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी आय में प्रत्यक्ष रूप से वृद्धि हुई।
  • संरचनात्मक परिवर्तन और औपचारिकीकरण के लिये उत्प्रेरक: गिग इकॉनमी लाखों अपंजीकृत शारीरिक श्रमिकों को एक डिजिटल इकोसिस्टम में लाकर एक औपचारिकीकरण सेतु के रूप में कार्य करती है जो आय, कौशल और कार्य इतिहास को ट्रैक करता है।
    • यह परिवर्तन सरकार को लक्षित कल्याणकारी योजनाओं को तैयार करने के लिये विस्तृत डेटा प्रदान करता है, जिससे भारत के असंगठित कार्यबल की ऐतिहासिक अदृश्यता प्रभावी रूप से कम हो जाती है।
    • दिसंबर 2025 तक, ई-श्रम पोर्टल पर 31.2 करोड़ से अधिक श्रमिक पंजीकृत हैं। साथ ही, मई 2025 में EPFO ने 20.06 लाख सदस्यों की अब तक की सबसे अधिक निवल वृद्धि दर्ज की है, जो रोज़गार के अवसरों और जागरूकता में वृद्धि का संकेत है।

भारत की गिग इकॉनमी से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?

  • आय में अस्थिरता और नौकरी की असुरक्षा: नियमित वेतनभोगी नौकरियों के विपरीत गिग वर्क पूरी तरह मांग, प्लेटफॉर्म की नीतियों और प्रतिस्पर्द्धा पर निर्भर करता है।
    • कई श्रमिकों को अपनी आय में सप्ताह दर सप्ताह व्यापक उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है, जिससे वित्तीय योजना बनाना या ऋण और क्रेडिट प्राप्त करना कठिन हो जाता है।
      • आय की इस अनियमितता का मतलब यह भी है कि श्रमिकों को प्रायः अपना गुजारा चलाने के लिये अधिक घंटे काम करना पड़ता है। 
    • प्रिज़नर्स ऑन व्हील्स नामक रिपोर्ट गिग इकॉनमी में गंभीर कार्य तनाव को उजागर करती है— लगभग 55% डिलीवरी कर्मी प्रतिदिन 10–12 घंटे काम करते हैं जबकि लगभग 20% 12–14 घंटे तक कार्य करते हैं।
      • इतने लंबे कार्य-घंटों के बावजूद एक-तिहाई से अधिक श्रमिक खर्चों (जैसे: EMI, रख-रखाव और जुर्माने) की कटौती के बाद प्रति माह ₹10,000 से भी कम आय घर ले जाते हैं।
  • व्यावसायिक स्वास्थ्य और हसल से जुड़े जोखिम: 10 मिनट में डिलीवरी के लक्ष्य का दबाव और ऐप्स की हमेशा चालू रहने वाली प्रकृति गंभीर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य जोखिमों को जन्म देती है।
    • श्रमिक प्रायः डिलीवरी की समय सीमा को पूरा करने के लिये सुरक्षा प्रोटोकॉल की अनदेखी करते हैं, जिससे सड़क दुर्घटनाओं की दर बहुत अधिक हो जाती है तथा प्रायः इन दुर्घटनाओं के लिये मुआवज़ा नहीं दिया जाता है क्योंकि तकनीकी रूप से श्रमिक गिग्स के बीच ‘ऑफ-ड्यूटी’ माने जाते हैं।
    • प्रिजनर्स ऑन व्हील्स नामक रिपोर्ट गंभीर स्वास्थ्य तनाव को उजागर करती है: 80% से अधिक लोग प्रतिदिन 10 घंटे से अधिक कार्य करते हैं, लगभग आधे लोगों को साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलता और 99% से अधिक शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की शिकायत करते हैं, जिन्हें लंबे कार्य-घंटे, आय की असुरक्षा व मनमानी ID निष्क्रियता और भी गंभीर बना देती है।
  • पर्याप्त विनियमन और विधिक संरक्षण का अभाव: भारत में वर्तमान में एक व्यापक नियामक कार्यढाँचा मौजूद नहीं है, जो गिग वर्कर्स के अधिकारों की रक्षा करता हो। 
    • गिग वर्कर्स को औपचारिक कर्मचारियों के बजाय मुख्य रूप से स्वतंत्र ठेकेदार के रूप में माना जाता है।
      • सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 सामाजिक सुरक्षा के उद्देश्य से गिग वर्कर्स को मान्यता देती है, लेकिन न्यूनतम मजदूरी, काम के घंटे, उचित भुगतान तंत्र और शिकायत निवारण के मानकों को अभी तक प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया है।
      • परिणामस्वरूप, भारत में 82% से अधिक गिग वर्कर बुनियादी रोज़गार सुरक्षा उपायों तक अभिगम्यता के बिना अनौपचारिक क्षेत्र में बने रहते हैं।
    • राजस्थान प्लेटफाॅर्म-आधारित गिग कर्मकार (पंजीकरण और कल्याण) अधिनियम, 2023 और कर्नाटक में इसी तरह के कानूनों जैसे राज्य के प्रयासों का उद्देश्य सुरक्षा में सुधार करना है, लेकिन कार्यान्वयन असमान बना हुआ है।
  • एल्गोरिदम आधारित प्रबंधन और पारदर्शिता का अभाव: प्लेटफॉर्म बड़े पैमाने पर अपारदर्शी एल्गोरिदम के माध्यम से काम का प्रबंधन करते हैं, जो वेतन, रेटिंग और प्रोत्साहन तय करते हैं। 
    • श्रमिकों को प्रायः यह जानकारी नहीं होती कि ये एल्गोरिदम संबंधी निर्णय किस प्रकार लिये जाते हैं और दंड या निष्क्रियता से प्रभावित होने पर उनके पास कोई औपचारिक अपील तंत्र नहीं होता है।
      • इससे एक ब्लैक बॉक्स जैसा माहौल बनता है, जहाँ कर्मचारियों को एल्गोरिदम संबंधी चिंता का सामना करना पड़ता है, यानी उन्हें लगातार इस बात का तनाव रहता है कि उनकी रेटिंग क्यों गिर गई या उन्हें अचानक शैडो-बैन क्यों कर दिया गया, या ऐप से ब्लॉक क्यों कर दिया गया।
    • एल्गोरिदम की जवाबदेही की इस कमी से पूर्वाग्रह और अनुचित व्यवहार कायम रहता है, जिसे कर्मचारी आसानी से चुनौती नहीं दे सकते।
  • गिग रोज़गार में अंतर्निहित लैंगिक और सामाजिक अंतर: महिला गिग श्रमिकों को सीमित कॅरियर प्रगति, कम वेतन और सुरक्षा संबंधी चिंताओं जैसी अतिरिक्त बाधाओं का सामना करना पड़ता है, विशेषकर रात की शिफ्ट के दौरान या उच्च जोखिम वाले वातावरण में।
    • विश्व आर्थिक मंच (WEF) ने गिग इकॉनमी में 30% लैंगिक वेतन अंतर को नोट किया है, जो पारंपरिक नौकरियों की तुलना में अधिक है; भारत में, संरचनात्मक अनौपचारिकता एवं देखभाल के बोझ से यह अंतर और भी बढ़ सकता है।
    • जाति और वर्ग जैसे सामाजिक कारक अप्रत्यक्ष रूप से गिग वर्क तक अभिगम्यता को प्रभावित करते हैं, प्रायः यह निर्धारित करते हैं कि कौन कम वेतन वाली भूमिकाओं में केंद्रित है और किसके पास इस क्षेत्र में भाग लेने के लिये आर्थिक सुरक्षा है।

India’s Gig Economy

भारत की गिग इकॉनमी को मज़बूत करने के लिये कौन-से उपाय अपनाए जा सकते हैं?

  • सामाजिक सुरक्षा संहिता के सक्रिय कार्यान्वयन को प्रोत्साहन: सामाजिक सुरक्षा कोष और गिग/प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिये वादा की गई योजनाओं (स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा, मातृत्व लाभ, पेंशन) को परिचालन में लाना चाहिये। 
    • इस संहिता में एग्रीगेटर योगदान (सीमित सीमा के भीतर) का प्रावधान है, लेकिन लाभों की स्पष्ट रूप से सूचना दी जानी चाहिये तथा उन्हें प्रदान किया जाना चाहिये।
    • राज्यों/प्लेटफॉर्मों के बीच पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करने तथा पात्रता की निगरानी के लिये ई-श्रम और आधार से जुड़े ID (हाल ही में जारी सरकारी नोटों में ई-श्रम पर प्लेटफॉर्म-कर्मियों के पंजीकरण पर भी प्रकाश डाला गया है।) का पयोग किया जाना चाहिये। 
  • न्यूनतम वेतन सीमा निर्धारण: वेतन समय और दूरी के आधार पर होना चाहिये, न कि प्रोत्साहन के आधार पर। प्रति घंटा/प्रति किलोमीटर के हिसाब से न्यूनतम आय का वैधानिक मानक निर्धारित किया जाना चाहिये, जिसमें समय-समय पर मुद्रास्फीति/ईंधन लागत के अनुसार समायोजन हो।
    • उदाहरण के लिये, न्यूयॉर्क शहर में ऐप-आधारित डिलीवरी कर्मचारियों के लिये न्यूनतम वेतन मानकों में न्यूनतम वेतन और आवधिक समायोजन शामिल है।
  • ID निष्क्रिय करने से पहले निष्पक्ष प्रक्रिया: गिग वर्कर्स को अचानक रोज़गार और आजीविका के नुकसान से बचाने के लिये प्लेटफॉर्म कंपनियों को ID डी-एक्टिवेशन को रोज़गार समाप्ति के समकक्ष मानना चाहिये।
    • इसका अर्थ है कि डी-एक्टिवेशन के स्पष्ट लिखित कारण दिये जाएँ, गंभीर कदाचार के मामलों को छोड़कर पूर्व सूचना प्रदान की जाये तथा श्रमिकों को अपनी बात रखने या बचाव का उचित अवसर मिले।
      • इसके अतिरिक्त, एक स्वतंत्र शिकायत निवारण या अपील तंत्र स्थापित किया जाना चाहिये ताकि श्रमिक अनुचित निर्णयों को चुनौती दे सकें। इस प्रकार के सुरक्षा उपाय गिग इकॉनमी में पारदर्शिता, जवाबदेही और बुनियादी नौकरी सुरक्षा को बढ़ावा देते हैं।
    • यह प्रावधान प्लेटफॉर्म कार्य से जुड़ी आजीविका की सबसे बड़े जोखिमों में से एक अचानक होने वाली ‘लॉग-आउट बेरोज़गारी’ की समस्या का सीधा समाधान करता है।
  • एल्गोरिदम पारदर्शिता और डेटा अधिकार: यह अनिवार्य किया जाना चाहिये कि प्लेटफॉर्म यह खुलासा करें कि रेटिंग, प्रोत्साहन, दंड और नौकरी आवंटन कर्मचारी-अनुकूल भाषा में किस प्रकार काम करते हैं; विवादों के लिये ऑडिट ट्रेल प्रदान किये जाने चाहिये।
    • उदाहरण के लिये, तेलंगाना के गिग वर्कर्स कानून के मसौदे में एल्गोरिदम पारदर्शिता और संरचित शिकायत निवारण का प्रस्ताव है। 
    • भारत यूरोपीय संघ के प्लेटफॉर्म वर्क डायरेक्टिव (2024) से बहुमूल्य सीख ले सकता है, जो अपारदर्शी एल्गोरिदम प्रबंधन के खिलाफ सुरक्षा उपायों को मज़बूत करता है तथा रोज़गार की स्थिति निर्धारित करने के लिये स्पष्ट परीक्षण पेश करता है।
    • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के एल्गोरिदम प्रबंधन संबंधी कार्यढाँचे के साथ घरेलू नियमों को संरेखित करने से पारदर्शिता, जवाबदेही एवं प्लेटफॉर्म श्रमिकों के साथ उचित व्यवहार सुनिश्चित करने में सहयता मिलेगी, साथ ही नवाचार और श्रम अधिकारों के बीच संतुलन भी बना रहेगा।
  • राज्य के नेतृत्व में कार्यान्वयन के साथ राष्ट्रीय मानकों को सुनिश्चित करना: भारत को एक एकीकृत गिग वर्कर्स कल्याण और अधिकार कार्यढाँचा अपनाना चाहिये, जो मज़दूरी, कार्य-घंटे, सामाजिक सुरक्षा, सुरक्षा एवं शिकायत निवारण पर न्यूनतम राष्ट्रीय मानक निर्धारित करे, जबकि राज्यों को समर्पित बोर्डों और कल्याण कोषों के माध्यम से इनके कार्यान्वयन की अनुमति दे। 
    • राजस्थान प्लेटफॉर्म आधारित गिग श्रमिक अधिनियम, 2023 एक आदर्श प्रस्तुत करता है, जो श्रमिक पंजीकरण को अनिवार्य करता है, एक कल्याण बोर्ड की स्थापना करता है तथा सामाजिक सुरक्षा लाभों के वित्तपोषण हेतु डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कल्याण शुल्क लगाता है।
  • व्यावसायिक सुरक्षा को बढ़ावा देना: गिग वर्कर्स को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये अनिवार्य दुर्घटना बीमा, आपातकालीन सहायता और सुरक्षात्मक उपकरण उपलब्ध कराए जाने चाहिये। प्लेटफॉर्म कार्य को सुरक्षा-विनियमित पेशे के रूप में मान्यता दी जानी चाहिये, जिसमें हेलमेट, रिफ्लेक्टिव जैकेट, वाहन फिटनेस जाँच और कार्य-घंटों की सीमा शामिल हो।
    • शहर स्तर पर प्रवर्तन एजेंसियों को सुरक्षित डिलीवरी ज़ोन बनाने चाहिये, निर्दिष्ट पिक-अप/ड्रॉप पॉइंट निर्धारित करने चाहिये और श्रमिकों की सुरक्षा के लिये यातायात अधिकारियों के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिये।
    • इसके अलावा, त्वरित वितरण मॉडल के लिये, जोखिम मूल्यांकन, यथार्थवादी समयसीमा अनिवार्य करना चाहिये और ऐसी दंड संरचनाओं पर रोक लगाना चाहिये जो गति सीमा को बाध्य करती हैं।
  • श्रमिक आवाज़ और शिकायत निवारण तंत्र को सुदृढ़ करना: राज्य स्तर पर त्रिपक्षीय मंच (सरकार–प्लेटफॉर्म–श्रमिक प्रतिनिधि) स्थापित किये जाने चाहिये, ताकि दरों में संशोधन, विवाद निपटान और कल्याण की रूपरेखा पर संवाद हो सके, जैसा कि अन्य श्रम कल्याण कानूनों के अंतर्गत बोर्डों में होता है।
    • सामूहिक प्रतिनिधित्व की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिये, जिसमें यूनियन गतिविधियों के लिये प्रतिशोध पर प्रतिबंध शामिल हो।

निष्कर्ष: 

भारत की गिग इकॉनमी तभी धारणीय बनी रह सकती है जब विकास के साथ-साथ श्रमिकों की सुरक्षा और उचित नियमन भी सुनिश्चित हो। अंतर्राष्ट्रीय संगठन संगठन (ILO) के सिद्धांतों का पालन करने से डिजिटल श्रम में पारदर्शिता, गरिमा और जवाबदेही सुनिश्चित हो सकती है। श्रमिकों के शोषण को रोकने के लिये सामाजिक सुरक्षा को मज़बूत करना, एल्गोरिदम को विनियमित करना तथा उचित वेतन सुनिश्चित करना आवश्यक है। ऐसे सुधार SDG 8 (उत्कृष्ट श्रम और आर्थिक विकास) और SDG 10 (असमानताएँ कम करना) को आगे बढ़ाते हैं।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

प्रश्न: भारत में गिग इकॉनमी की वृद्धि श्रम सुरक्षा कानूनों के विकास की तुलना में कहीं अधिक तीव्र रही है। गिग वर्कर्स द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये तथा निष्पक्ष एवं स्थायी रोज़गार सुनिश्चित करने के लिये नीतिगत उपायों का सुझाव प्रस्तावित कीजिये।

 

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न 

प्रश्न 1. गिग इकॉनमी क्या है?
एक ऐसा श्रम बाज़ार जो डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से संचालित अल्पकालिक, कार्य-आधारित कार्य पर आधारित है।

प्रश्न 2. भारत की गिग इकॉनमी क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह लाखों लोगों को रोज़गार प्रदान करती है तथा शहरी सेवाओं, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल विकास को बढ़ावा देती है।

प्रश्न 3. गिग वर्कर्स को मुख्य रूप से किस समस्या का सामना करना पड़ता है?
कमज़ोर नियमन के कारण नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और उचित वेतन का अभाव है।

प्रश्न 4. एल्गोरिदम प्रबंधन श्रमिकों को किस प्रकार प्रभावित करता है?
पारदर्शिता या अपील तंत्र के बिना एल्गोरिदम वेतन, रेटिंग और कार्य आवंटन को नियंत्रित करते हैं।

प्रश्न 5. यूरोपीय संघ के प्लेटफॉर्म वर्क निर्देश से भारत क्या सीख ले सकता है?
रोज़गार का स्पष्ट वर्गीकरण, एल्गोरिदम में पारदर्शिता और श्रमिकों के लिये मज़बूत सुरक्षा उपाय।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1. भारत में नियोजित अनियत मज़दूरों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये- (2021)

  1. सभी अनियत मज़दूर, कर्मचारी भविष्य निधि सुरक्षा के हकदार हैं। 
  2. सभी अनियत मज़दूर नियमित कार्य-समय एवं समयोपरि भुगतान के हकदार हैं। 
  3. सरकार अधिसूचना के द्वारा यह विनिर्दिष्ट कर सकती है कि कोई प्रतिष्ठान या उद्योग केवल अपने बैंक खातों के माध्यम से मज़दूरी का भुगतान करेगा।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

(a) केवल 1 और 2            

(b)  केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3  

(d) 1, 2 और 3

उत्तर:(d) 


मेन्स 

प्रश्न 1. भारत में महिलाओं के सशक्तीकरण की प्रक्रिया में 'गिग इकॉनमी' की भूमिका का परीक्षण कीजिये।  (2021)

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