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SC ने सशस्त्र बलों में महिलाओं के प्रति भेदभाव को रेखांकित किया

  • 25 Mar 2026
  • 24 min read

स्रोत: द हिंदू 

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने महिला अधिकारियों की पदोन्नति और चिकित्सा फिटनेस मूल्यांकन में प्रणालीगत लैंगिक पक्षपात को उजागर किया, साथ ही सशस्त्र बलों में उन्हें स्थायी आयोग तथा पेंशन संबंधी लाभ पाने का अधिकार बनाए रखने की पुष्टि की।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की मुख्य बातें:

  • प्रणालीगत पक्षपात: शॉर्ट सर्विस कमीशन महिला अधिकारियों (SSCWOs) की वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों (ACRs) को असावधानीपूर्वक ग्रेड किया जाता था, अक्सर उन्हें ‘औसत’ अंक दिये जाते थे क्योंकि यह मान लिया जाता था कि उनका दीर्घकालिक कॅरियर नहीं होगा।
    • महिलाओं को ऐतिहासिक रूप से कम ग्रेडिंग का सामना करना पड़ा, जबकि पुरुष अधिकारियों को अनौपचारिक रूप से उच्च लाभ मिलता रहा।
  • कॅरियर विकास में बाधाएँ: महिलाओं को प्रशिक्षण और कॅरियर सुधार के अवसर नहीं दिये गए, जिसके परिणामस्वरूप उनका सेवा प्रोफाइल कमज़ोर रहा।
  • संवैधानिक दायित्व: स्थायी आयोग (PC) में महिलाओं को शामिल करना संवैधानिक उत्तरदायित्व है, जो समानता और गरिमा सुनिश्चित करता है।
    • लैंगिक आधार पर समान अवसर अस्वीकार करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोज़गार में समान अवसर) का उल्लंघन है।

सशस्त्र बलों में महिलाएँ

  • प्रारंभिक सैन्य भूमिकाएँ: महिलाएँ पहली बार मिलिट्री नर्सिंग सर्विस (1888) के माध्यम से शामिल हुईं और बाद में भारतीय सेना मेडिकल कॉर्प्स (1958) में डॉक्टर के रूप में नियमित आयोग के साथ शामिल हुईं।
  • गैर-चिकित्सा प्रवेश: वर्ष 1992 में वुमेन स्पेशल एंट्री स्कीम (WSES) ने शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) में शिक्षा, कानून, लॉजिस्टिक्स और इंजीनियर्स जैसी शाखाओं में गैर-युद्ध भूमिकाओं के लिये महिलाओं के प्रवेश के रास्ते खोले।
    • सेना अधिनियम, 1950 ने महिलाओं की भूमिकाओं को सीमित कर दिया, उन्हें केवल सूचित शाखाओं में शामिल होने की अनुमति दी, जैसे– आर्मी पोस्टल सर्विस, जज एडवोकेट जनरल (JAG) विभाग, आर्मी एजुकेशन कॉर्प्स (AEC), आर्डिनेंस कॉर्प्स और सर्विस कॉर्प्स।
  • शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC): वर्ष 2005 में SSC प्रणाली शुरू की गई थी, जिसमें महिला अधिकारियों को 14 वर्ष का कार्यकाल दिया गया और यह एक अधिक औपचारिक कॅरियर संरचना की शुरुआत थी।
  • स्थायी आयोग की उपलब्धि: महिलाओं को पहली बार वर्ष 2008 में सीमित शाखाओं, जैसे– JAG और AEC में स्थायी आयोग प्रदान किया गया।
    • भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2020 के बबिता पुनिया निर्णय में सभी शाखाओं में, जहाँ शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) मौजूद है, महिलाओं को स्थायी आयोग प्रदान करने का आदेश दिया, जिससे वे कमांड की भूमिकाएँ संँभाल सकें।
  • NDA (2021) का उद्घाटन: सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश जारी कर महिलाओं को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) परीक्षा देने की अनुमति दी, जिससे सैन्य प्रशिक्षण और प्रवेश में एक और बड़ी लैंगिक बाधा दूर हुई।
  • वर्तमान स्थिति: महिलाएँ भारतीय वायु सेना में फाइटर पायलट, नौसेना में युद्धपोतों की कमान संँभालती हैं और सेना की विभिन्न शाखाओं में स्थायी आयोग (PC) धारक हैं। हालाँकि मुख्य युद्ध शाखाएँ (जैसे– इंफेंट्री और आर्मर्ड कॉर्प्स) अधिकांशतः उनके लिये बंद ही हैं।

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