प्रारंभिक परीक्षा
संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
चर्चा में क्यों?
संसद का बजट सत्र 2026 सांसदों (MPs) की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न कर चुका है, क्योंकि भाषणों के विलोपन ने अनुच्छेद 105 के तहत प्रदत्त सुरक्षा उपायों पर प्रश्न खड़े कर दिये हैं।
सांसदों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कैसे संरक्षित और नियंत्रित है?
संवैधानिक संरक्षण:
- अनुच्छेद 105(1) (संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता): यह संसद और इसकी समितियों में सांसदों को सत्र के दौरान एवं संसदीय कार्यवाही के दौरान स्वतंत्र रूप से बोलने का अधिकार सुनिश्चित करता है।
- यह संरक्षण सांसदों को निर्भीक रूप से अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति देता है, जिससे सशक्त बहस, कार्यपालिका की समीक्षा और प्रभावी विधायिका निर्माण संभव हो पाता है।
- यह एक विशेष संसदीय विशेषाधिकार है और यह सामान्य नागरिकों को अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से अलग काम करता है, जो विशिष्ट “युक्तिसंगत प्रतिबंधों” (जैसे– सार्वजनिक व्यवस्था या नैतिकता) के अधीन होती है।
- अनुच्छेद 105(2) (कानूनी कार्यवाही से सुरक्षा): यह सांसदों को संसद और इसकी समितियों में कही गई किसी भी बात या दिये गए किसी भी मत के लिये पूर्ण नागरिक या आपराधिक दायित्व से सुरक्षा प्रदान करता है।
- यह संरक्षण पूर्ण रूप से व्यापक है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि अदालतें संसदीय कार्यवाही के दौरान दिये गए वक्तव्यों के लिये सांसदों पर प्रश्न नहीं उठा सकतीं और उन्हें दंडित नहीं कर सकतीं।
- यह सुरक्षा मुकदमेबाज़ी के माध्यम से डराने-धमकाने को रोकती है और विधायी विचार-विमर्श की स्वतंत्रता को बनाए रखती है।
- असदस्य पर सुरक्षा का विस्तार: अनुच्छेद 105 (2) के तहत संरक्षण उन व्यक्तियों तक भी फैलता है जिन्हें संवैधानिक रूप से संसदीय कार्यवाहियों में भाग लेने का अधिकार है, जैसे कि भारत का अटॉर्नी जनरल (महान्यायवादी)।
- यह सभी अधिकृत प्रतिभागियों को कानूनी परिणामों से सुरक्षा प्रदान करके बहस में निरंतरता और खुलापन सुनिश्चित करता है।
- अनुच्छेद 121: यह संसदीय भाषण पर सीमा लगाता है, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा को निषिद्ध करता है, सिवाय अभियोग कार्यवाही के दौरान।
- यह प्रावधान विधायी स्वतंत्रता और न्यायिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि संसद में न्यायपालिका को अनायास या राजनीतिक रूप से प्रेरित आलोचना का सामना न करना पड़े।
- प्रक्रिया नियमों के माध्यम से विनियमन:
- विलोपन: लोकसभा कार्यविधि नियमावली का नियम 380 स्पीकर को यह विवेकाधिकार देता है कि वे संसदीय बहस में उपयोग किये गए ऐसे शब्द या अभिव्यक्तियाँ हटा दें जिन्हें मानहानिकारक, अश्लील, असंसदीय या अपमानजनक माना जाता है।
- सब ज्यूडिस मामले: सांसद अभी न्यायालय में चल रहे मामलों पर चर्चा नहीं कर सकते।
- व्यक्तिगत आरोप: किसी व्यक्ति के खिलाफ मानहानिकारक या आपराधिक आरोप बिना स्पीकर को पूर्व सूचना दिये लगाना प्रतिबंधित है।
- उच्च प्राधिकारी: उच्च संवैधानिक प्राधिकरण वाले व्यक्तियों के आचरण पर नकारात्मक टिप्पणी करना प्रतिबंधित है।
- सहकर्मी सदस्यों के प्रति आचरण: सहकर्मी सदस्यों की सद्भावना (Bona fides) पर प्रश्न उठाना सामान्यतः नियमों के विरुद्ध माना जाता है।
- दुरुपयोग के विरुद्ध आंतरिक नियंत्रण: विशेषाधिकार समिति संसदीय विशेषाधिकार के उल्लंघन या दुरुपयोग के मामलों की जाँच करती है। यह सुनिश्चित करती है कि सांसद अपनी प्रतिरक्षा का उपयोग किसी ऐसे व्यक्ति की मानहानि या उसे नुकसान पहुँचाने के लिये न करें, जिसके पास अन्यथा सीमित कानूनी उपाय उपलब्ध हों।
सांसदों की वाक्-स्वतंत्रता से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय
- तेज किरण जैन बनाम एन. संजीव रेड्डी (1970): सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 105(2) के तहत सांसदों को पूर्ण प्रतिरक्षा (एब्सोल्यूट इम्युनिटी) प्रदान करने को निरंतर रखा। न्यायालय ने “कुछ भी” (Anything) शब्द की सबसे व्यापक व्याख्या पर बल दिया तथा यह पुनः स्थापित किया कि संसद में दिया गया भाषण न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है।
- पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम राज्य (1998): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि रिश्वत का संबंध संसद में दिये गए मत (वोट) से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हो, तो सांसद उस मामले में अभियोजन से प्रतिरक्षित रहेंगे।
- राजा राम पाल बनाम माननीय अध्यक्ष, लोकसभा (2007): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि संसदीय विशेषाधिकारों के प्रयोग में संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन होता है, तो वे न्यायिक समीक्षा के अधीन होंगे।
- कौशल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी मंत्री का बयान स्वतः सरकार का आधिकारिक रुख नहीं माना जाएगा और जब तक सरकार उन टिप्पणियों का औपचारिक रूप से समर्थन न करे, तब तक सरकार उसके लिये उत्तरदायी नहीं होगी।
- सीता सोरेन बनाम भारत संघ (2024): सर्वोच्च न्यायालय ने 1998 के पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम राज्य के निर्णय को निरस्त करते हुए कहा कि सांसदों और विधायकों को सदन में वोट देने या भाषण करने के लिये रिश्वत लेने पर अभियोजन से कोई प्रतिरक्षा प्राप्त नहीं है।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि रिश्वत लेना एक आपराधिक कृत्य है और इसे अनुच्छेद 105(2) या अनुच्छेद 194(2) (जो विधायकों को संरक्षण प्रदान करता है) के तहत संरक्षण प्राप्त नहीं है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 105 सासंदों को क्या प्रदान करता है?
अनुच्छेद 105 सांसदों को संसद में भाषण की स्वतंत्रता और सदन या उसकी समितियों में दिये गए किसी भी मत के लिये कानूनी कार्रवाई से प्रतिरक्षा प्रदान करता है।
2. क्या न्यायालय संसद में सांसदों द्वारा दिये गए बयान पर प्रश्न उठा सकती हैं?
नहीं। संसद में दिया गया भाषण अनुच्छेद 105(2) के तहत प्रतिरक्षित है, हालाँकि रिश्वत जैसे आपराधिक कृत्य इससे संरक्षित नहीं हैं।
3. संसदीय कार्यवाही में 'रिकॉर्ड से हटाने' का उद्देश्य क्या है?
रिकॉर्ड से हटाने (Expunction) का प्रयोग अपमानजनक, अश्लील या असंसदीय शब्दों को हटाने के लिये किया जाता है, ताकि संसदीय शिष्टाचार बना रहे और सार्थक चर्चा सुरक्षित रहे।
4. विशेषाधिकार समिति की भूमिका क्या है?
यह संसदीय विशेषाधिकार के उल्लंघन या दुरुपयोग की जाँच करती है और यह सुनिश्चित करती है कि प्रतिरक्षा का उपयोग किसी व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने या विधायी सत्यनिष्ठा को कमज़ोर करने के लिये न किया जाए।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. समाज में समानता होने का एक निहितार्थ यह है कि उसमें: (2017)
विशेषाधिकारों का अभाव है
अवरोधों का अभाव है
(c) प्रतिस्पर्द्धा का अभाव है
(d) विचारधारा का अभाव है
उत्तर: A
मेन्स
प्रश्न. संसद और उसके सदस्यों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ (इम्यूनिटीज़), जैसे कि वे संविधान की धारा 105 में परिकल्पित हैं, अनेकों असंहिताबद्ध (अन-कोडिफाइड) और अ-परिगणित विशेषाधिकारों के जारी रहने का स्थान खाली छोड़ देती हैं। संसदीय विशेषाधिकारों के विधिक संहिताकरण की अनुपस्थिति के कारणों का आकलन कीजिये। इस समस्या का क्या समाधान निकाला जा सकता है? (2014)
प्रारंभिक परीक्षा
ग्रीन अमोनिया
चर्चा में क्यों?
भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI) SIGHT कार्यक्रम के तहत अपनी ग्रीन अमोनिया नीलामी में सफल रहा, जिसने नए वैश्विक मूल्य के बेंचमार्क स्थापित किये और उभरते हुए स्वच्छ अमोनिया बाज़ार में भारत को एक संभावित अग्रणी देश के रूप में प्रतिष्ठित किया है।
ग्रीन अमोनिया क्या है?
- परिचय: ग्रीन अमोनिया से तात्पर्य उस अमोनिया (NH₃) से है, जिसे एक स्थायी प्रक्रिया के माध्यम से संश्लेषित किया जाता है। पारंपरिक विधियों के विपरीत, यह पूरी तरह से नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर करती है, जिसके परिणामस्वरूप कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य होता है।
- उत्पादन प्रक्रिया: यह स्थापित हैबर-बॉश प्रक्रिया का उपयोग करती है, लेकिन कुछ महत्त्वपूर्ण बदलावों के साथ:
- ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन: नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन, जलविद्युत) द्वारा संचालित इलेक्ट्रोलिसिस के माध्यम से जल (H₂O) को ग्रीन हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है।
- नाइट्रोजन निष्कर्षण: वायुमंडलीय पवन से नाइट्रोजन (N₂) को पृथक् किया जाता है।
- अमोनिया संश्लेषण: पूर्ण रूप से नवीकरणीय ऊर्जा द्वारा संचालित उत्प्रेरक का उपयोग करके उच्च दाब और तापमान पर हाइड्रोजन और नाइट्रोजन को मिलाया जाता है।
अन्य प्रकार के अमोनिया से तुलना:
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अमोनिया के प्रकार |
स्रोत/उत्पादन विधि |
कार्बन उत्सर्जन प्रोफाइल |
मुख्य विशेषताएँ |
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ग्रे/ब्राउनअमोनिया |
जीवाश्म ईंधन से उत्पादित – स्टीम मीथेन रिफॉर्मिंग (SMR) या कोल गैसीफिकेशन के माध्यम से प्राकृतिक गैस। |
उच्चतम CO₂ उत्सर्जन (कार्बन कैप्चर की सुविधा नहीं) |
पारंपरिक विधि: कार्बन-गहन, उर्वरक उद्योग में व्यापक रूप से उपयोग की जाती है। |
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ब्लू अमोनिया |
कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (CCS) के साथ जीवाश्म ईंधन (SMR या गैसीकरण) से उत्पादित |
मध्यम उत्सर्जन (CCS के माध्यम से आंशिक रूप से कम किया गया) |
संक्रमणकालीन निम्न कार्बन विकल्प, CCS की दक्षता पर निर्भर करता है |
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ग्रीन अमोनिया |
जलविद्युत अपघटन के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग करके हरित हाइड्रोजन का उत्पादन किया जाता है, जिसे नाइट्रोजन के साथ मिलाया जाता है। |
लगभग शून्य उत्सर्जन |
पूर्णतः कार्बनमुक्त मार्ग, जलवायु लक्ष्यों और ऊर्जा परिवर्तन के अनुरूप |
पर्यावरण महत्त्व: पारंपरिक अमोनिया उत्पादन विश्व के सबसे बड़े औद्योगिक उत्सर्जकों में से एक है, जो वैश्विक CO₂ उत्सर्जन का लगभग 2% हिस्सा है। इससे उत्पादित अमोनिया के प्रति टन लगभग 2-3 टन CO₂ उत्सर्जित होता है। हरित अमोनिया के उपयोग से इस कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है।
अनुप्रयोग:
- हरित उर्वरक: कृषि के लिये जीवाश्म ईंधन आधारित कच्चे माल को प्रतिस्थापित करके वैश्विक खाद्य शृंखला को कार्बन मुक्त करता है।
- कार्बन-मुक्त ईंधन: इसका उपयोग समुद्री परिवहन (भारी ईंधन तेल के स्थान पर) और विद्युत उत्पादन (कोयले के साथ सह-दहन या समर्पित टर्बाइनों में) में किया जा सकता है। हालाँकि दहन से NOx उत्पन्न होता है, लेकिन इसे सेलेक्टिव कैटेलिटिक रिडक्शन (SCR) जैसी तकनीकों से नियंत्रित किया जा सकता है।
- हाइड्रोजन वाहक: यह हाइड्रोजन के भंडारण और परिवहन संबंधी चुनौतियों का समाधान करता है। अमोनिया को हाइड्रोजन (-253°C) की तुलना में -33°C पर तरल रूप में परिवर्तित करना आसान है और यह मौजूदा अवसंरचना का उपयोग कर सकता है। इसे गंतव्य पर पुनः हाइड्रोजन में परिवर्तित (crack) किया जा सकता है।
ग्रीन हाइड्रोजन संक्रमण के लिये रणनीतिक हस्तक्षेप (SIGHT) योजना:
- परिचय: SIGHT योजना राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत एक वित्तीय प्रोत्साहन कार्यक्रम है। इसे नवीकरणीय और नवीन ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) द्वारा SECI के माध्यम से प्रतिस्पर्द्धात्मक बोली प्रक्रिया के तहत लागू किया जाता है।
- उद्देश्य: इस योजना का लक्ष्य घरेलू इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण को प्रोत्साहित करना और ग्रीन हाइड्रोजन एवं उसके व्युत्पन्न उत्पादों, जैसे– ग्रीन अमोनिया, के उत्पादन को बढ़ावा देना है।
- इसके उद्देश्य में जीवाश्म ईंधन के मुकाबले लागत प्रतिस्पर्द्धा हासिल करना, प्रौद्योगिकी में उन्नति सुनिश्चित करना और वैश्विक मानकों के अनुरूप क्रमिक स्थानीयकरण को सक्षम बनाना शामिल है।
- दो मुख्य घटक:
- घटक I (इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण): यह इलेक्ट्रोलाइज़र के स्वदेशी निर्माण पर केंद्रित है। प्रोत्साहन प्रदर्शन-आधारित होते हैं, जो ऊर्जा दक्षता और स्थानीयकरण पर आधारित हैं।
- घटक II (ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन): इसका लक्ष्य ग्रीन हाइड्रोजन और उसके व्युत्पन्न उत्पादों (विशेष रूप से ग्रीन अमोनिया) का उत्पादन है। इसे प्रतिस्पर्द्धात्मक बोली प्रक्रिया के माध्यम से लागू किया जाता है। यह वित्तीय समर्थन तथा दीर्घकालिक ऑफटेक समझौते (7–10 वर्ष) प्रदान करता है ताकि निवेश के जोखिम को कम किया जा सके।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. ग्रीन अमोनिया क्या है?
ग्रीन अमोनिया (NH₃) वह अमोनिया है जिसे नवीकरणीय ऊर्जा-संचालित इलेक्ट्रोलाइसिस के माध्यम से उत्पादित किया जाता है, जिससे पारंपरिक जीवाश्म ईंधन आधारित तरीकों की तुलना में कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य होता है।
2. ग्रीन अमोनिया, ग्रे और ब्लू अमोनिया में क्या अंतर है?
ग्रे अमोनिया में कार्बन कैप्चर के बिना जीवाश्म ईंधन का उपयोग होता है; ब्लू अमोनिया में CCS शामिल होता है; जबकि ग्रीन अमोनिया पूरी तरह से नवीकरणीय ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन पर आधारित होता है।
3. SIGHT योजना का उद्देश्य क्या है?
यह योजना इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण और ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन को वित्तीय प्रोत्साहन और प्रतिस्पर्द्धात्मक बोलियों के माध्यम से बढ़ावा देती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. निम्नलिखित भारी उद्योगों पर विचार कीजिये: (2023)
- उर्वरक संयंत्र
- तेलशोधक कारखाने
- इस्पात संयंत्र
उपर्युक्त में से कितने उद्योगों के विकार्बनन में हरित हाइड्रोजन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होने की अपेक्षा है?
(a) केवल एक
(b) केवल दो
(c) सभी तीन
(d) कोई भी नहीं
उत्तर: (c)
प्रश्न. हरित हाइड्रोजन के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2023)
- इसे आंतरिक दहन के लिये ईंधन के रूप में सीधे इस्तेमाल किया जा सकता है।
- इसे प्राकृतिक गैस के साथ मिलाकर ताप या शक्ति जनन के लिये ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
- इसे वाहन चालन के लिये हाइड्रोजन ईंधन प्रकोष्ठ में इस्तेमाल किया जा सकता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
(a) केवल एक
(b) केवल दो
(c) सभी तीन
(d) कोई भी नहीं
उत्तर: (c)
प्रश्न. हाइड्रोजन ईंधन सेल वाहन "निकास" के रूप में निम्नलिखित में से एक का उत्पादन करते हैं: (2010)
(a) NH3
(b) CH4
(c) H2O
(d) H2O2
उत्तर: (c)
रैपिड फायर
नेशनल मोनेटाइज़ेशन पाइपलाइन (NMP) 2.0
केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट कार्य मंत्री ने नेशनल मोनेटाइज़ेशन पाइपलाइन (NMP) 2.0 का शुभारंभ किया, जिसे केंद्रीय बजट 2025–26 में की गई घोषणा के अनुसार एसेट मोनेटाइज़ेशन प्लान 2025–30 को क्रियान्वित करने के लिये नीति आयोग द्वारा विकसित किया गया है।
- NMP की सफलता: शुभारंभ के दौरान यह उल्लेख किया गया कि NMP 1.0 ने अपने 6 लाख करोड़ रुपए के लक्ष्य का लगभग 90% सफलतापूर्वक पूरा किया, जिससे दूसरे चरण के लिये "सर्वोत्तम प्रथाओं" का एक आधार तैयार हुआ है।
- NMP 2.0: केंद्रीय बजट 2025–26 में परिचालन सार्वजनिक संपत्तियों के मुद्रीकरण के माध्यम से सतत बुनियादी ढाँचे के वित्तपोषण का विस्तार करने के लिये NMP 2.0 का प्रस्ताव दिया गया था।
- यह एक मध्यम अवधि का रोडमैप, निजी निवेशकों के लिये संपत्तियों की दृश्यता और कार्यप्रणाली एवं कार्यान्वयन को रेखांकित करने वाला एक मार्गदर्शन ढाँचा प्रदान करता है।
- NMP 2.0 "एसेट रिसाइक्लिंग" पर केंद्रित है, जहाँ निजी क्षेत्र की दक्षता का लाभ उठाकर ब्राउनफील्ड एसेट से कैपिटल को फ्री किया जाता है, ताकि सरकार के बजट खर्च को बढ़ाए बगैर नए बुनियादी ढाँचे में निवेश किया जा सके।
- प्रतिभागी क्षेत्र: इस पाइपलाइन में सड़क, रेलवे, बिजली, तेल और गैस, सिविल एन्क्लेव, बंदरगाह, दूरसंचार, कोयला और खान जैसे प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं।
- शासन ढाँचा: इसकी प्रगति की निगरानी कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एसेट मोनेटाइज़ेशन पर सचिवों का एक सशक्त कोर समूह (CGAM) द्वारा की जाएगी, जो एक "संपूर्ण सरकार" दृष्टिकोण सुनिश्चित करेगा।
- राजस्व आवंटन: संपत्ति मुद्रीकरण परियोजनाओं से प्राप्त आय को कार्यान्वयन एजेंसी के आधार पर विभिन्न शीर्षों में आवंटित किया जाता है, जिसमें भारत की संचित निधि (मंत्रालय के नेतृत्व वाली परियोजनाओं के लिये), PSU/पत्तन प्राधिकरण (इकाई के नेतृत्व वाली परियोजना) और राज्य की संचित निधि (मुख्य रूप से खनन रॉयल्टी) शामिल हैं।
- एक अलग शीर्ष उन मुद्रीकरण परियोजनाओं में प्रत्यक्ष निजी निवेश को दर्ज करता है जिनमें निर्माण या प्रमुख रखरखाव संबंधी कारक शामिल हैं।
- NMP 2.0 अवार्ड के लक्ष्य: इस पाइपलाइन में कुल 16.72 लाख करोड़ रुपये की संभावित राशि का अनुमान लगाया गया है, जिसमें 5.8 लाख करोड़ रुपये का निजी क्षेत्र का निवेश शामिल है, जो NMP 1.0 की तुलना में 2.6 गुना अधिक है।
- मोनेटाइज़ेशन के उपकरण: ट्रांजेक्शन में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) संबंधी रियायतें, इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (InvITs) और नकदी प्रवाह का प्रतिभूतीकरण शामिल होगा।
- आर्थिक दृष्टिकोण: 'विकसित भारत' के अनुरूप, इस परियोजना का उद्देश्य संसाधनों का अनुकूलन करना और भारत की विकास-यात्रा में दीर्घकालिक भागीदारी के लिये निजी निवेशकों को एक स्पष्ट रोडमैप प्रदान करना है।
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और पढ़ें: नेशनल मोनेटाइज़ेशन पाइपलाइन |
रैपिड फायर
भारत-फ्राँस दोहरे कराधान वंचन संधि में संशोधन
भारत और फ्राँस ने भारत-फ्राँस दोहरे कराधान वंचन संधि (DTAC 1992) के संशोधन प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किये हैं, जिसमें पूंजीगत लाभ कराधान, सर्वाधिक वरीयतापूर्ण राष्ट्र (मोस्ट-फेवर्ड नेशन- MFN) क्लॉज में महत्त्वपूर्ण बदलाव किये गए हैं तथा बहुपक्षीय आधार क्षरण और लाभ स्थानांतरण (BEPS) ढाँचे के प्रावधानों को शामिल किया गया है।
- संशोधन करदाताओं को अधिक कर-निश्चितता प्रदान करने के लिये तैयार किये गए हैं और इनसे दोनों देशों के बीच निवेश, प्रौद्योगिकी तथा कर्मियों के प्रवाह को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
भारत-फ्राँस DTAC में किये गए प्रमुख संशोधन
- पूंजीगत लाभ कराधान का प्रावधान: इस प्रोटोकॉल के तहत किसी कंपनी के शेयरों की बिक्री से होने वाले पूंजीगत लाभ पर कराधान का पूर्ण अधिकार उस क्षेत्राधिकार को दिया जाता है, जहाँ वह कंपनी मूल रूप से स्थापित है।
- मोस्ट-फेवर्ड नेशन- MFN) क्लॉज: संशोधन प्रोटोकॉल इस प्रोटोकॉल से DTAC में तथाकथित सर्वाधिक वरीयतापूर्ण राष्ट्र (मोस्ट-फेवर्ड नेशन- MFN) क्लॉज को भी हटा देता है।
- लाभांश पर कराधान: संशोधन प्रोटोकॉल कम-से-कम 10 प्रतिशत पूंजी रखने वालों के लिये 5 प्रतिशत की विभाजन दर और अन्य सभी मामलों के लिये 15 प्रतिशत कर रखने वालों के लिये कर के 10 प्रतिशत की एकल दर को बदलकर लाभांश से आय के कराधान को भी संशोधित करता है।
- तकनीकी सेवाओं के लिये शुल्क (FTS): भारत-अमेरिका दोहरे कराधान वंचन संधि की परिभाषा के साथ संतुलन स्थापित कर 'तकनीकी सेवाओं के लिये शुल्क’ (FTS) की परिभाषा को भी संशोधित करता है।
- स्थायी प्रतिष्ठान (PE): प्रोटोकॉल सर्विस पीई को जोड़कर 'स्थायी प्रतिष्ठान' के दायरे का विस्तार करता है।
- कर सहयोग: सूचना के आदान-प्रदान के प्रावधानों को भी अद्यतन किया गया है और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार करों के संग्रह में सहायता पर एक नया अनुच्छेद पेश किया गया है ताकि निर्बाध आदान-प्रदान को सुगम बनाया जा सके और पारस्परिक कर सहयोग को मज़बूत किया जा सके।
- BEPS संरेखण: संशोधन प्रोटोकॉल में DTAC के भीतर BEPS बहुपक्षीय लिखत (MLI) के लागू प्रावधान भी शामिल हैं, जो भारत और फ्राँस द्वारा MLI पर हस्ताक्षर और अनुसमर्थन के परिणामस्वरूप पहले से ही लागू हो गए थे।
रैपिड फायर
वी.ओ. चिदंबरनार पोर्ट
केंद्रीय बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री ने तमिलनाडु के तूतीकोरिन स्थित वी.ओ. चिदंबरनार पोर्ट में 1,500 करोड़ रुपये से अधिक की अवसंरचना और हरित ऊर्जा परियोजनाओं का उद्घाटन किया तथा उनकी आधारशिला रखी।
- VOC पोर्ट: पहले इसे तूतीकोरिन पोर्ट के नाम से जाना जाता था। इसे वर्ष 2011 में स्वतंत्रता सेनानी वी. ओ. चिदंबरनार के सम्मान में वी.ओ. चिदंबरनार पोर्ट नाम दिया गया। वी.ओ. चिदंबरनार ने 1906 में स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी की स्थापना कर ब्रिटिश समुद्री एकाधिकार को चुनौती दी थी।
- वी.ओ.सी. पोर्ट (VOC Port) कोरोमंडल तट पर स्थित एक कृत्रिम, हर मौसम में चालू रहने वाला गहरा समुद्री बंदरगाह है, जो भूमध्यसागरीय क्षेत्र, यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ भारत के समुद्री व्यापार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- स्थान: वी.ओ. चिदंबरनार (VOC) पोर्ट मन्नार की खाड़ी में कोरोमंडल तट पर स्थित एक कृत्रिम, हर मौसम में चालू रहने वाला गहरे समुद्र का बंदरगाह है। यह पूर्व–पश्चिम अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्ग के निकट रणनीतिक रूप से स्थित होने के कारण भूमध्यसागरीय क्षेत्र, यूरोप और अमेरिका के साथ भारत के व्यापार में इसे महत्त्वपूर्ण बढ़त प्रदान करता है।
- सुरक्षित जलक्षेत्र: वी.ओ. चिदंबरनार (VOC) पोर्ट दक्षिण-पूर्व दिशा में श्रीलंका की उपस्थिति के कारण तूफानों और चक्रवातों से प्राकृतिक रूप से सुरक्षित रहता है।
- बंदरगाह आधुनिकीकरण: वी.ओ. चिदंबरनार (VOC) पोर्ट देश का पहला बंदरगाह है जिसने स्थल पर ही ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन और उपयोग शुरू किया है, जहाँ वर्ष 2025 के अंत से एक पायलट परियोजना सक्रिय है।
- यह भारत का पहला बंदरगाह है जिसने डिजिटल ट्विन प्लेटफॉर्म को लागू किया है, जिसके माध्यम से बंदरगाह संचालन की वास्तविक-समय (रीयल-टाइम) आभासी प्रतिकृति बनाई जाती है। इससे पूर्वानुमानात्मक रखरखाव और डेटा-आधारित अनुकूलन संभव होता है।
- फरवरी 2026 में वी.ओ. चिदंबरनार (VOC) पोर्ट भारत का पहला बंदरगाह बना, जिसने रडार और रेडियो फ्रीक्वेंसी तकनीकों का उपयोग करते हुए उन्नत एंटी-ड्रोन प्रणाली लागू की, ताकि महत्त्वपूर्ण अवसंरचना की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
- सांस्कृतिक संरक्षण: VOC मैरीटाइम हेरिटेज म्यूज़ियम एक प्रमुख सांस्कृतिक धरोहर स्थल है, जो कोरोमंडल तट के समुद्री इतिहास को उजागर करता है।
- आउटर हार्बर परियोजना: वर्तमान विस्तार कार्यों का उद्देश्य बड़े जहाज़ों और मेगा-कैरियर्स (विशाल मालवाहक जहाजों) को सँभालने की क्षमता विकसित करना है, जिससे यह बंदरगाह दक्षिण भारत के भविष्य के ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में स्थापित किया जा सके।
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और पढ़ें: भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 |
रैपिड फायर
INS अंजदीप
भारतीय नौसेना चेन्नई बंदरगाह स्थित पूर्वी नौसेना कमान में अंजदीप, एक स्वदेशी एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट (ASW-SWC) को शामिल करने जा रही है, जिससे महत्त्वपूर्ण तटीय जलक्षेत्रों में जल के भीतर के खतरों का सामना करने की उसकी क्षमताएँ सुदृढ़ होंगी।
- सामरिक महत्त्व: ASW-SWC परियोजना के तहत अंजदीप को आठ जहाज़ों में तीसरा स्थान प्राप्त है, जो रक्षा में 'आत्मनिर्भर भारत' की दिशा में एक प्रमुख प्रतिनिधित्व को दर्शाता है। इसका निर्माण कोलकाता की गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) द्वारा किया गया है।
- यह भारतीय नौसेना के एक दुर्जेय यूनिट 'बिल्डर्स नेवी' में परिवर्तन के रूप में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतीक है, जो युद्धपोत निर्माण में आत्मनिर्भरता पर बल देता है।
- प्राथमिक भूमिका एवं उपनाम: इसे एक 'डॉल्फिन हंटर' के रूप में कार्य करने के लिये विकसित/डिज़ाइन किया गया है, जिसका कार्य तटीय क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना, उन पर नज़र रखना और उन्हें निष्प्रभावी करना है।
- स्वदेशी हथियार एवं सेंसर: यह युद्धपोत एक अत्याधुनिक स्वदेशी हथियार और सेंसर पैकेज से सुसज्जित है, जिसमें हल माउंटेड सोनार 'अभय', साथ ही लाइटवेट टॉरपीडो और ASW रॉकेट शामिल हैं।
- अपनी मुख्य ASW (पनडुब्बी-रोधी युद्ध) भूमिका के अतिरिक्त, यह अत्यधिक गतिशील तटीय निगरानी, अल्प तीव्रता समुद्री संचालन (LIMO) और खोज एवं बचाव (SAR) मिशनों को संचालित करने में सक्षम है।
- इसमें एक उच्च-गति वाली वाटर-जेट प्रणोदन प्रणाली है, जो इसे तीव्र प्रतिक्रिया हेतु 25 नॉट की अधिकतम गति प्राप्त करने में सक्षम बनाती है।
- अंजदीप द्वीप का महत्त्व: इस पोत का नाम अंजदीप द्वीप (गोवा का भाग) के नाम पर रखा गया है, जो अरब सागर में सामरिक रूप से स्थित है। वास्को-डि-गामा ने भारत की अपनी पहली यात्रा के दौरान, 24 सितंबर, 1498 को इस द्वीप को पुर्तगाली क्राउन क्षेत्र घोषित किया था।
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रैपिड फायर
भारत में E175 जेट
विमानन क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस और ब्राज़ील की एंब्रेयर ने भारत में E175 क्षेत्रीय जेट की फाइनल असेंबली लाइन (FAL) स्थापित करने के हेतु समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किये हैं।
- इस साझेदारी का लक्ष्य विनिर्माण, आपूर्ति शृंखला प्रबंधन और पायलट प्रशिक्षण को समाहित करते हुए एक संपूर्ण क्षेत्रीय परिवहन विमान (RTA) पारितंत्र स्थापित करना है।
- E175 जेट: E175 जेट विशेष रूप से उच्च-आवृत्ति संचालन के लिये डिज़ाइन किया गया है, जिसका उद्देश्य टियर-2 और टियर-3 शहरों को जोड़ना है। इस जेट में 88 यात्रियों तक के बैठने की क्षमता है।
- अनुमान है कि भारत को अगले दो दशकों में 80-146 सीटों वाले सेगमेंट में कम-से-कम 500 विमानों की आवश्यकता होगी।
- UDAN योजना के लिये समर्थन: यह परियोजना क्षेत्रीय संपर्क योजना (RCS-UDAN) के अनुरूप है, जो निम्न सेवा वाले बाज़ारों में आर्थिक विस्तार का समर्थन करने हेतु स्वदेशी विमानन पारितंत्र की आवश्यकताओं को संबोधित करती है।
- औद्योगिक दायरा: यह सहयोग असेंबली के अतिरिक्त बिक्री उपरांत सेवाओं और नए ऑर्डर प्राप्त करने पर भी ध्यान केंद्रित करता है, ताकि प्रस्तावित असेंबली लाइन की निरंतर व्यवहार्यता सुनिश्चित की जा सके।
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